Friday, January 30, 2009

आस्था जो शराब की बोतल की तरह टूट जाती है-व्यंग्य कविता

शराब की बूंदों में जो संस्कृति ढह जाती है
ढह जाने दो, वह भला किसके काम जाती हैे
ऐसी आस्था
जो शराब की बोतल की तरह टूट जाती है
उसके क्या सहानुभूति जतायें
लोहे की बजाय कांच से रूप पाती है
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नशा कोई और करे
झगड़ा कोई और
क्यों कर रहा है पूरा जमाना उस पर गौर
संस्कृति के झंडे तले शराब का विज्ञापन
अधिकारों के नाम पर
नशे के लिये सौंप रहे ज्ञापन
जिंदा रहे पब और मधुशाला
इस मंदी के संक्रमण काल में
मुफ्त के विज्ञापन का चल रहा है
शायद यह एक दौर

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

1 comment:

  1. जिंदा रहे पब और मधुशाला
    इस मंदी के संक्रमण काल में
    मुफ्त के विज्ञापन का चल रहा है
    शायद यह एक दौर

    यह अंदेशा सही लगता है.

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