Wednesday, May 06, 2009

बेकद्रों की महफिल में मत जाना-हिंदी शायरी

बेकद्रों की महफिल में मत जाना
बहस के नाम पर वहां बस कोहराम मचेगा
पर कौन, किसकी कद्र करेगा।
मुस्कराहट का मुखौटा लगाये सभी
हर शहर में घूम रहे हैं
जो मिल नहीं पाती खुशी उसे
ढूंढते हुए झूम रहे हैं
दूसरे के पसीने में तलाश रहे हैं
अपने लिये चैन की जिंदगी
उनके लिये अपना खून अमृत है
दूसरे का है गंदगी
तुम बेकद्रों को दूर से देखते रहकर
उनकी हंसी के पीछे के कड़वे सच को देखना
दिल से टूटे बिखरे लोग
अपने आपसे भागते नजर आते हैं
शोर मचाकर उसे छिपाते हैं
उनकी मजाक पर सहम मत जाना
अपने शरीर से बहते पसीने को सहलाना
दूसरा कोई इज्जत से उसकी कीमत
कभी तय नहीं करेगा।

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लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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