Sunday, August 08, 2010

ताकत लगाते तारे जमीन पर लाने में-हिन्दी व्यंग्य कविता (taqat lagate tare zamin par lane men)

पेड़ की छाया भी सुख न दे सके, लोग लगे ऐसे तनाव लाने में।
घास भी पांव में छाले कर दे, ऐसे मैदान में लगे पांव बढ़ाने में।।
बुलंदियों को छूना चाहते सभी, ऊंचाई का पता नहीं किसी को,
बिना पंख आकाश में उड़ते, जिंदगी दांव पर होती भाग्य अजमाने में।।
कलम की कद्र नहीं करते, तलवार उठाते अपने हाथ में,
अपनी गर्दन कटवाते या काटते, नाक की झूठी इज्जत बचाने में।।
बहुत सी चीजों की तरह, हर आदमी भी उगा इस धरती पर
ढेर सारे तोहफे यहां, मगर ताकत लगाते तारे जमीन पर लाने में।
कुदरत ने अक्ल दी, इंसान के ढेर सारी बिना मोल के,
कहें दीपक बापू लोग उसे अमन की बजाय लगाते लड़ाने में।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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