Monday, August 08, 2016

बहुरूपिये-हिन्दी कविता (Bahurupiye-HindiPoem)


कुछ चेहरे ऐसे भी
जो नया मुखौटा लगाकर
सामने आते।

भ्रम में पड़ी भीड़
पुरानी नीयत वाले
नये जाने जाते।

कहें दीपकबापू याद से
उनका नाता भी टूट जाता
अपनी औकात से नाता
छूट जाता
बहुरुपिये होते बेशर्म
चाहे जितने ताने खाते।
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Wednesday, July 20, 2016

दिल बेकरार है-हिन्दी कविता (Dil Bekarar hai-Hindi Poem)

पहाड़ पर बर्फ
गिरती देखने के लिये
दिल बेकरार है।

समंदर में लहरें
उठती देखने के लिये
दिल बेकरार है।


कहें दीपकबापू जिंदगी में
 हर किस्म के बंदे
चाहे अनचाहे मिलते हैं
मतलब निकलने के लिये
हमेशा सभी का
दिल बेकरार है।
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Saturday, July 09, 2016

नयी चाहत-हिन्दी कविता (Nayi Chahat-HindiPoem)

जीवन पथ पर
सहयात्री की खोज
आंखे करती हैं।

बहुत नरमुंड मिलते
उनकी इच्छायें ही साथी
हमेशा आहें भरती हैं।

कहें दीपकबापू याद में
किसे बसाकर
अपना दिल बहलाते
हृदय की भावनायें
नयी चाहत पर मरती है।
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Tuesday, July 05, 2016

अनुभूतियों के जंगल-हिन्दी व्यंग्य कविता (Anubhutiyon ke Jungle-HIndi poem)

गणित के खेल में
शब्द कहां टिकते हैं।

मधुर वाणी का
सम्मान नहीं हो सकता
जहां शोर के स्वर बिकते हैं।

कहें दीपकबापू रौशनी में
रहकर चुंधिया गयी आंखें
राख हो चुकी संवदेनाओं में
अनुभूतियों के जंगल
वीरान दिखते हैं।
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Saturday, June 18, 2016

कांचघर के निवासी-हिन्दी कविता (Men Of GlassHouse-Hindi Poem)


देवता बनने की के प्रयास में
इंसान बड़े अपराध भी
कर जाते हैं।

भय के प्रसाद बांटकर
पुण्य के सागर में
तर जाते हैं।

कहें दीपकबापू नये जमाने में
पहरेदारों के आसरे
कांचघर के निवासी
राहगीरों पर फैंकते पत्थर
घायल मौन पीड़ा लेकर
घर जाते हैं।
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Saturday, June 04, 2016

सोच में सभी की दगा है-हिन्दी कविता(Soch mein Sabhi ki saja hai-HindiKavita)

हितचिन्तक का मुखौटा
लगायें चारों तरफ
जमघट लगा है।

मतलब के हिसाब में
लगी भीड़ सामने
लगता हर कोई सगा है।

कहें दीपकबापू पहचान
सभी की संकट में फंसी है
वफा का अकाल ज़माने में
सोच में सभी के दगा है।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Sunday, May 29, 2016

पाखंड के दौर में-हिन्दी कविता(Pakhand ke Daur mein-Hindi Kavita)

अखबार का ज़माना है
विज्ञापन देकर 
चाहे जितने तमगे लगा लो।

पर्दे पर चलती कहानी में
अपने नाम के आगे
चाहे जितनी उपाधि लगा लो।

कहें दीपकबापू कर्म पर
अब किसका विश्वास रहा
फल में देरी पर
इंतजार नहीं रहा।
पाखंड के दौर में
धोखे की चाहे जितनी
बड़ी दुकान लगा लो।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
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