Saturday, November 12, 2016

जो ईमानदार है उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं-हिन्दी लेख (Jo Imandar hain Unhen parshan hone ki jaroorat nahin hai-Hindi Article)

                                            प्रधानमंत्री ने कहा है कि ईमानदार आदमी को नोटबंदी से परेशान होने की जरूरत नही है।  हम संतुष्ट हैं।  भले ही  पहले दुर्भाग्य पर बाद में सौभाग्य मानते हैं कि अपनी सेवा में एक रुपये का भी दाग लिये बिना बाहर आये।  एक तरह से कह सकते हैं कि हमारे भाग्य ने हमें जबरदस्ती ईमानदार बनाया पर अब भगवान का इसी बात के लिये धन्यवादी भी करते हैं कि जब कार्यालय से निकले तो मन में इस बात पर खुशी थी कि हम लोगों को बता सकते हैं कि ईमानदारी से भी जिंदा रह सकते हैं।  इसलिये बड़े नोटों पर रोक से हमें कोई फर्क भी नहीं पड़ रहा है।  मजा इस बात का है कि जिनकी ऊपरी कमाई देखकर मन में मलाल होता था अब उनके लिये तनाव का भारी दौर शुरु होने वाला है।             
                                   निम्न तथा मध्यम वर्ग की समस्या नोट बदलवाना नहीं वरन् व्यय के लिये मुद्रा जुटाना है इसलिये सरकार बैंक भले ही रविवार को बंद रखे पर उनको पूरा दिन सभी एटीएम चालू रखने को कहे। अब दस बीस पांच सौ या हजार के नोट बदलने पर मानवीय श्रम नष्ट करने की बजाय अधिक से अधिक लोगों को व्यय के लिये मुद्रा देने पर जोर होना चाहिये।  हमें तो लग रहा है कि भीड़ मेें कुछ लोग मजबूर हो सकते हैं पर भीड़ में ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो कालेधन वालों के लिये दलाली करते हुए आयें हों।  अतः कोशिश यह होनी चाहिये कि किसी भी तरह निम्न तथा मध्यम वर्ग का आदमी एटीएम से पैसे निकालकर अपनी व्यय पूर्ति करे। यही राष्ट्रवादियों का वास्तविक साथी है।

                                                   बैंक वालों के पास सौ के नोट  तो होंगे वह कहां गये उनको एटीएम में क्यों नहीं डाले। कहीं रातों रात उन्होंने पांच सौ वह हजार नोट वालों से बदल तो नहीं दिये। बाज़ार में दो हजार का नहीं वरन् सौ का नोट चाहिये। दो तीन दिन में स्थिति संभलना ही चाहिये निम्न व मध्यम वर्ग अपना घर चला सके।
                                      इस देश में मूर्ख ज्यादा हैं या मासूम यह तो पता नहीं पर अज्ञानी बहुत हैं जो इस अफवाह पर ही नाचने लगते हैं कि नमक अब नहीं मिलने वाला।  उन्हें मालुम नहीं है पूरे विश्व के सब प्राणी नष्ट हो जायें पर नमक कभी खत्म नहीं होगा। 
                                  गरीबों की चिंता करते दिखने जरूरी था पर नोट बदलने के लिये शनिवार और रविवार को बैंक खोलने की बजाय सरकार एटीएम भरवाने का आदेश देती।  मध्यम वर्ग की समस्या नोट बदलने से ज्यादा खर्च के लिये नोट जुटाने की है और वह राष्ट्रवादियों की पूंजी है। एटीएम की नाकामी बड़े नोट बंद करने पर मिले जनसमर्थन खोने की तरफ ले जा रही है। अच्छा तो यह है कि सरकार शनिवार शाम छह बजे के बाद बैंक कर देश में सारे एटीएम भरने का आदेश दे क्योंकि ऐसा नहीं किया तो लोगों की समस्या बढ़ जायेगी।  निम्न तथा मध्यम वर्ग के पास पांच सो तथा हजार के नोट बदलने के लिये इतने नहीं जितना उसके पास नयी नकदी का अभाव है।  प्रतिद्वंद्वियों के तर्कों पर प्रहार करने की बजाय राष्ट्रवादी देश के प्रबंध पर ध्यान दें जिसमें बड़े अधिकारी इतने सक्षम नहीं है जितना दावा करते हैं। अगर देश के एटीएम कल तक काम नहीं कर पाये तो निम्न व मध्यम वर्ग नोटबंदी पर अपनी प्रसन्नता नहीं दिखा पायेगा। एक तरह से राष्ट्रवादी भी अकुशल प्रबंध के आरोप को अपने ऊपर लेने जा रहे हैं।
                        वरिष्ठ समाज सेवकों को चाहिये कि बैंकों के बाहर लोगों की पंक्ति में खड़े होकर मनोरंजन करें ताकि समय अच्छा पास हो। इससे एक दिन तो समाजवाद का रूप देखकर खुशी होगी। अनेक लोग सोशन मीडिया पूछ रहे हैं कि क्या नोट बदलने या निकालने की पंक्ति में किसी खास आदमी को देखा है क्या? हम तो गये थे लाइन में लगने पर कोई खास आदमी न देखकर लौट आये।

Wednesday, October 26, 2016

जनमानस अब कालेधन पर सर्जीकल स्ट्राइक के इंतजार में-अंतर्जाल पर हिन्दी संदेश(Public now has Waiting Surgical Strike on Black Money-Hindi Message on Internet)

                              देख जाये तो जनहित का ठेका कार्यपालिका के पास है जब उससे नाखुश जन न्यायालय जायें और उसके पक्ष में निर्णय आये तो कथित जनसेवक लोग कहते हैं कि न्यायपालिका अतिसक्रिय हो रहा है पर अपनी जिम्मेदारी की नाकामी कभी नहीं स्वीकारते।  जनहित याचिका पर न्यायालय जब टोल टैक्स को गलत ठहरता है तो प्रश्न यह है कि कार्यपालिका आखिर ऐसी अवैध वसूली रोकने के लिये क्या कर रही थी?
राज्य प्रबंध अब किसकी जेब में होगा-औद्योगिक घराने की उठापठक पर चर्चा

                       जहां तक हमारी जानकारी भारत के नंबर एक व्यवसायिक समूह के स्वामी चार वर्ष पूर्व भारत से अमेरिका चले गये-जाते जाते अपना पद एक अन्य व्यक्ति को सौंप गये।  अब अचानक वापस लौटे और फिर उस व्यक्ति को पद से हटाकर फिर स्वयं विराजमान हो गये।  कारण जो बताये और सुनाये जा रहे हैं उससे अलग  कोई दूसरी बात भी हो सकती है।  हमारे पत्रकारिता के गुरु ने हमें सिखाया था कि असली लेखक या पत्रकार वही है जो तस्वीर के पीछे जाकर देखता और सोचता है।  लोग तो अपनी बात अपने हिसाब से कहते हैं पर विद्वान को उनकी बातों के पीछे जाकर देखना चाहिये।  उस व्यवसायिक समूह के बारे में हमारी कुछ अलग ही सोच है।
चार वर्ष पूर्व भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति अलग थी।  तब यहां का राज्य प्रबंध मिमियाते लोगोें के हाथ में था तो आर्थिक हालत भी बहुत संघर्षपूर्ण थी।  अब हालात बदले हैं।  ऐसा लग रहा है कि भारत न केवल सामरिक वरन् राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्र में-हिन्दुत्व के सिद्धांतों के साथ- विश्व में एक महाशक्ति बनने की तरफ अग्रसर हैं।  हमारा तो अनुमान है कि अगले पांच से दस वर्षों में अनेक ऐसी घटनायें होंगी जिसका अभी कोई अनुमान नहंी कर रहा पर यह सभी भारत के अभ्युदय में सहायक होंगी।  नंबर एक व्यवसायिक के स्वामी ने संभवत भारत वापसी इसी उद्देश्य से की है कहीं वह इस देश में एतिहासिक रूप से अप्रासंगिक न हो जायें। वैसे अभी तक बड़े व्यवसायिक घरानों में इतनी ताकत है कि वह राज्य प्रबंध को अपने अनुसार प्रभावित करते हैं।  इस स्वामी के अमेरिका जाने का कारण यह भी हो सकता है कि उस समय इनके एक प्रतिद्वंद्वी व्यवसायिक घराने का दावा था कि उसके जेब में पूरा राज्य प्रबंध है-इसे चुनौती देना इस स्वामी के लिये संभव नहीं था क्योंकि उसी समय इनकी एक महिला अधिकारी भी एक टेपकांड में फंसी थी। प्रचार में विवादों से बचने के लिये भी इस स्वामी ने नेपथ्य में गमन किया होगा।  अब सब ठीक हो गया तो लौट आयें।  बाकी तो अंदर जाने क्या क्या चलता है? इन्हीं की जनसंपर्क अधिकारी के टेप से यह बात पता चली थी।
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                        कालेधन वालों को सर्जीकल स्ट्राइक की चेतावनी! गुरु अगर ऐसा हुआ तो दृश्य अपने ही देश में दृश्यव्य होने के साथ ही लंबा होगा जिसकी प्रतीक्षा लोग ऐसे ही करेंगे जैसे पाकिस्तान के विरुद्ध चाहते थे। वैसे यह चेतावनी अभी ज्यादा गंभीर नहीं लग रही थी पर कीं उस पर अमल हो गया तो बड़े बड़े औद्योगिक इसकी लपेट में आ सकते हैं।
                  राजनीति में लोकतांत्रिक दलों स्वामित्व जिस तरह चंद परिवारों के इर्दगिर्द सिमट गया है उसे देखते हुए उन्हें एक चुनाव चिन्ह से पंजीकृत नहीं करना चाहिये।  सर्वोदयी नेता स्व.जयप्रकाश के गैरदलीय लोकतंत्र प्रणाली अपनाने का जो सुझाव दिया था उसे अब मान लेना चाहिये। यह नहीं किया जा सके तो कम से कम चुनाव चिन्ह का दलों के लिये संरक्षण समाप्त करना चाहिये।
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                   भारत के उन सभी खिलाड़ियों को ढेर सारी बधाई जिन्होंने कबड्डी का विश्व जीत लिया। अभी तक विदेशी गुलामी के प्रतीक क्रिकेट खेल वाली टीम को बड़े बेमन से किसी जीत पर बधाई देते थे पर आज हृदय से भारतीय कबड्डी टीम को ईरान पर 48-39 से हरा कर विश्वकप जीतने पर बधाई देते हैं।
भारतीय कबड्डी टीम को विश्व कप जीतने पर बधाई।  हमारे लिये यह विजय क्रिकेट के विश्व कप से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इंग्लैंड का तो कबड्डी हमारा परंपरागत तथा वास्तविक पहचान वाला खेल है।
                 प्रगतिशील और जनवादियों की संगत कर चुके पत्रकार कभी नहीं समझ पायेंगे कि जब ए दिल है मुश्किल जैसी समस्या हो तो दो दुश्मनो के बीच पंचायत कर उन्हें आगे लड़ने के लिये प्रेरित भी किया जाता है।  इधर  एक तरफ राष्ट्रवादियों को रखिये और दूसरी तरफ सुलहनामा तो समझ में आ जायेगा कि दोनों ही पक्ष कभी उनके अनुकूल नहीं रहे।  इधर राष्ट्रवादी जनमानस की विवाद में अधिक रुचि नहीं रही थी  तो शीर्ष पुरुष निपटाने के लिये सुलहकार बन गये। इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहिष्णु छवि भी बनी और देश में अपने ही दो विरोधियों को सदा के लिये आपस में लड़ा भी दिया।
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नोट-खाली समय में लिखे गये इस संदेश का ‘ऐ दिल है मुश्किल’ पर हुए समझौते से कोई लेना देना नहीं है। 
 भारत के डेबिट कार्ड का डाटा चीन में चुराया गया है-यह बात कही जा रही है।  अगर प्रमाण मिल जायें तो चीन के सामने यह मामला राजकीय स्तर पर उठाया जाना चाहिये।  वहां के नेता नाराज होंगे इस बात की चिंता किये बिना यह मामला उठाना चाहिये। अगर वह सही जवाब न दें  तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके विरुद्ध प्रचार करना होगा।  अपनी सुरक्षा करने की बात सही है पर आक्रमणकारी को भी चेतावनी देना ही चाहिये। 
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डेबिट कार्ड का विवरण चोरी होने का केवल यह अर्थ भी कदापि नहीं है कि उसमें से केवल धनराशि निकाली जाये वरन् अपराधियों को भी इसकी जानकारी देकर भी खाताधारक के लिये खतरा पैदा किया जा सकता है।  प्रारंभिक जानकारी में चीनी हैकर पर संदेह जताया जा रहा है।  अगर प्रमाण हों तो चीन से बात की जानी चाहिये। अभी तक चीन की छवि आतंकियों के मुंहजुबानी समर्थन तक ही खराब है अगर प्रमाण देने पर वह कार्यवाही नहीं करता तो फिर यह दुनियां को बताना पड़ेगा कि वह पाकिस्तान का मित्र नहीं वरन् सगा भाई है।  वैसे विश्व के अनेक अर्थशास्त्री मानते हैं कि चीन के विकास में अपराधियों के काले धन की महत्ती भूमिका है जिसमें भारत से फरार और अब पाकिस्तान में बसे एक डॉन का लिया जाता है। 
 हमारा मानना है कि करण जौहर का फिल्म  ए दिल मुश्किल पर ज्यादा विवाद खड़ा करना ठीक नहीं है।  हमें तो उसके प्रसारण पर पहले भी कोई आपत्ति नहीं है पर ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यमों ने आपस में एका कर उसकी छवि बना ली है-उसका वह बयान अब वह नहीं दिखा रहे  जिसने आग में घी डालने का काम किया था।  हमें याद है एक संगठन ने पाक कलाकारों को देश छोड़ने की धमकी दी थी तो पुलिस ने उसे चेतावनी भी दी कि किसी कलाकार को कुछ हुआ तो वही जिम्मेदार होगा।  करण जौहर ने जबरन अपनी हेकड़ी दिखाई थी कि ‘कलाकारों को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिये’, उसके बाद ही विवाद बढ़ गया था। बहरहाल अब इस पर अधिक विवाद भारतीय समाज की छवि के अनुकूल नहीं है।
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   भारत के रणनीतिकारों की प्रशंसा करना चाहिये कि उन्होंने राजकीय तौर पर पाकिस्तान के विरुद्ध कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। यह काम निजी क्षेत्र के राष्ट्रवादी स्वतः कर रहे हैं।  जबकि पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध राजकीय तौर पर ‘भारतीय सामग्री के प्रदर्शन’ पर रोक लगानी पड़ी।  स्पष्टतः यह सेना के दबाव में हुआ है। इसके साथ ही यह तय हो गया कि  पाकिस्तान अब सीधे चीन का दूत बनकर भारत के सामने सीना तानकर भिड़ने आ रहा है। भारत ने पाक कलाकारों का वीजा नहीं रोका। न ही चीन के सामान पर प्रत्यक्ष कहीं रोक लगाई। निजी क्षेत्र स्वतः ही राष्ट्रवादी हो रहा है। समस्या चीन और पाकिस्तान के साथ हो रही है जहां लोकतंत्र दिखावे का है। दोनों ही देश भारत के विरुद्ध सक्रियता के लिये सरकार पर निर्भर हैं।  कम से कम यह तो प्रमाणित हो गया कि भारत सरकार कभी पाक तथा चीन की तरह हल्के निर्णया नहीं लेती-निजी क्षेत्र की जिम्मेदारी उस पर नहीं डाली जा सकती।
राम का नाम तो ऐसा है कि आदमी की जीवन नैया पार लगा देता है फिर चुनाव क्या चीज है? हालांकि राममंदिर का विषय सामान्य जनमानस को पहले की तरह प्रभावित नहीं करता।
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Tuesday, October 11, 2016

आतंकियों के मददगार पाकिस्तान और चीन को चिंता करना ही चाहिये-हिंदी संपादकीय (Pakistan and china Afraid From India-Hindi Editiorial)


                लखनऊ के एशबाग में जो प्रधानमंत्री मोदी ने कहा उसे अभी भी कुछ लोग हल्के ले रहे हैं पर चीन और पाकिस्तान को डरना ही चाहिये।  भारत में पाकिस्तान और चीन के जो समर्थक छद्म रूप रखकर भारतीय गरीबों के मसीहा बनते हैं वह फिर भाषण के खतरनाक संकेत नहीं समझेंगे-पहले भी नहीं समझे थे। कहते हैं न कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। अपने भारतीय समर्थकों के हल्केपन की उपेक्षा करते हुए इन दोनों देशों को अब  चिंता करनाही  चाहिये। बेहतर हो कि चुपचाप भारत की मान लें वरना उनके भारतीय समर्थकों को मुंह छिपाकर भागते हुए भी देर नहीं लगती।
            चिंता करने वाली दो बातें हैं-
                    पहली पाकिस्तान के लिये यह कि ‘आतंकवादियों को मदद करने वालों पर भी छोड़ा नहीं जायेगा-मतलब पाकिस्तान अब अपने पंजाब प्रांत तक सिमट कर रह जायेगा। एक बात तय रही कि पाकिस्तान से पूरा हिसाब चुकता नहीं हुआ है और उसके विरुद्ध अभियान जारी रहेगा।  जिस तरह कश्मीर में हमले हो रहे हैं उससे यही लगता है कि अब वह अपनी तबाही को आमंत्रण दे रहा है।
                  दूसरी चीन के लिये है कि कोई गलतफहमी में नहीं रहे कि वह आतंकवाद से बचा हुआ है-चीन ने अपने यहां के अरेबिक विचाराधारा मानने वाले लोगों कसकर दबाया है।  इस पर वह बुद्ध बाहुल्य है। भले ही चीनी नेता वामपंथी होने का दंभ भरें पर अरेबिक आतंकी वहां अपना परचम फहराना चाहते हैं और वह उसे बुद्धुपंथी ही मानते हैं।  विश्व के सैन्य व अपराधिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अरेबिक आतंकी चीन पर भी नियमित हमलों की योजना बनाते रहते हैं।  इस पर चीन ने जिन पाक आतंकियों के साथ संपर्क बनाया है वह कहीं न कहीं अरेबिक आतंकियों के सानिध्य में हैं। अतः एक न एक दिन उसके साथ धोखा होना ही है। 

Sunday, September 25, 2016

ऐ दिल तुझे समझाना मुश्किल है-दीपकबापूवाणी (A Dil tujhe samjahan mushkil hai-DeepakBapuWani)


जिंदगी की जीने के तरीके हजार बताने वाले भी आते हैं।
पुरानी किताबों के नुस्खे पवित्र जताने वाले भी आते हैं।।
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अच्छे दिन में अपनी सुधबुध खो देते, बुरे दिन में बस यूं रो देते।
‘दीपकबापू’ हिसाब किताब में बीते दिन, बचे समय में लोग सो लेते।।
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अब अर्थ के लिये शब्द बोले जाते, दाम के लिये ही मुंह खोले जाते।
‘दीपकबापूं’ तय करते मत पहले, फिर स्वार्थ की तराजु पर तोले जाते।।
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 सड़क पर अपनी जय बुलवायें, घर में मय की बोतल खुलवायें।
‘दीपकबापू’ परिवर्तन के वाहक, गरीब से मुफ्त में चंवर झुलवायें।।
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सपने बहुत पर जेब में पैसा नहीं, जीवन पर सोचते वैसा वह नहीं।
‘दीपकबापू’ संघर्ष करते निंरतर, परिणाम कभी चाहत जैसा नहीं।।
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अन्मयस्क लोग हर बार बदल जाते, सभी दिल का हाल छिपाते।
मुश्किल है किसी पर भरोसा करना पर यह ख्याल हम छिपाते।
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ऐ दिल तुझे समझाना
मुश्किल है
दुनियां देखने के लिये
तेरे पास आंखें नहीं
सच यह भी कि
रोक सकें तेरी सोच को
ऐसी सलाखें नहीं है
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कामनाओं के जाल में सभी फंसे हैं, दूसरे की लालच पर भी हंसे हैं।
‘दीपकबापू’ दे रहे त्याग का उपदेश, स्वयं लोभ के कीचड़ में फंसे हैं।
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Wednesday, September 21, 2016

सेवाओं की आवश्यकतानुसार विषयों के स्नातक नियुक्त किये जायें(Reservation In Govt. Services)


            कभी कभी अंतर्जाल पर ऐसे प्रश्न सामने आ जाते हैं जिनके उत्तर हमारे चिंत्तन से भरपूर मस्तिष्क में सदैव मौजूद रहते हैं। वैसे अगर एक दो पंक्ति में चाहें तो उसका उत्तर संबंधित की दीवार पर ही लिख दें पर भाषा की विशेषज्ञता के अभाव में नहीं लिखते। फिर जो ऐसे प्रश्न उठाते हैं उन्हें सीधे उत्तर देने में यह संकोच होता है कि वह हमारी उपाधि या योग्यता पता करने लगें जो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अध्ययन से अधिक नहीं है। एक तरह से उसके छात्र हैं न कि शिक्षक।
             बहरहाल फेसबुक में ढेर सारे अनुयायियों से जुड़े उन विद्वान ने एक विश्वविद्यालय के चुनाव में विज्ञान संकाय के छात्रों के अन्य संकायों से आधार पर मतदान करने पर यह सवाल उठाया था कि ‘विज्ञान के संकाय के अन्य छात्रों से अलग क्यों सोचते हैं?’
          इस प्रश्न पर सीधे तो नहीं पर अलग से हमारी एक सोच रही है। पुस्तकें मनुष्य की मित्र हैं और जैसे मित्र की संगत होती है उसके गुण उसमें आ ही जाते हैं।  विज्ञान व गणित के सूत्र छात्र के दिमाग में उलझन के बाद सुलझन की प्रक्रिया का दौर चलाते हैं जिससे उसकी बुद्धि में आक्रामकता या उष्णता आती है। एक तरह से बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है। कला, वाणिज्य तथा विधि के अध्ययन करने वालों में वह उष्णता नहीं आती पर शीतलता के कारण उनकी चिंत्तन क्षमता अधिक बढ़ती है।  सीधी बात कहें तो यह कि विज्ञान तथा गणित का अध्ययन मस्तिष्क को तीक्ष्ण करता है जिससे किसी अन्य विषय पर ज्यादा देर तक पाठक सोच नहीं सकता और जबकि अन्य विषय के अध्ययन करने वाला सहजता के कारण ठहराव से चिंत्तन करने का आदी हो जाता है।  यह अलग बात है कि अध्ययन करने के बाद अभिव्यक्त होने की शैली एक बहुत बड़ा महत्व रखती है। वह सभी में समान नहीं होती-किसी में तो होती भी नहीं है। उसका पुस्तकों के अध्ययन से कोई संबंध नहीं है। 
अंग्रेज दुनियां के सबसे अहकारी  माने जाते हैं और उनकी शिक्षा प्रणाली अपनाने के कारण हमारे यहां भी यही स्थिति है। गणित तथा विज्ञान के छात्र जीवन से संबंधित अन्य विषयों में जानते नहीं है और अन्य विषयों के स्नातक अपने अलावा किसी के तर्क को  मानते नहीं है। यही कारण है कि आधुनिक शिक्षा साक्षरता के साथ ही सामाजिक अंतर्द्वंद्वों को भी बढ़ा ही रही है।
आखिरी बात यह है कि हमारा यह भी मानना है कि सरकारी सेवाओं में विषयों के आधार पर लोगों को नियुक्त करना चाहिये। बैंक तथा लेखा सेवाओं में वाणिज्य स्नातक तो प्रबंध में विशेषज्ञता की उपाधि लेने वालों को प्रशासनिक सेवाओं में रखना चाहिये। गणित व विज्ञान के विशेषज्ञों को केवल तकनीकी सेवाओं में रखना चाहिये। उनमें मानवीय संवेनाओं की बजाय नवनिर्माण की क्षमता अधिक होती है जिसकी प्रशासनिक सेवाओं में अधिक आवश्यकता नहीं होती। प्रशासनिक सेवाओं में वाणिज्य स्नातक भी चल सकते हैं क्योंकि प्रबंध उनका विषय होता हैं। कला के स्नातकों का उन सेवाओं में करना चाहिये जहां मानवीय संवेदनाओं की अधिक आवश्यकता होती है। उन विद्वान प्रश्नकर्ता की दीवार पर अपना इतना बड़ा उत्तर रख नहीं सकते थे सो यहां चैंप दिया।
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-दीपक ‘भारतदीप’

Thursday, September 08, 2016

भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन -हिन्दी हास्य कविता (Anti Corruption Movement-Hindi Comedy Poem)

आज हमेें एक कविता हमारे ही एक फेसबुकिए साथी की दीवार पर चिपकी मिल गयी। यह कम से 4-5 चार बरस पहले हमने ब्लाग पर लिख थी ऐसा लगा कि यह आज भी प्रासंगिक है। उसे यहां हम फिर प्रकाशित कर रहे हैं।
-दीपक ‘भारतदीप’
भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन
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समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
शामिल मत हो जाना,
वरना पड़ेगा पछताना।
बंद हो जायेगा मिलना कमीशन,
रद्द हो जायेगा बालक का
स्कूल में हुआ नया एडमीशन,
हमारे घर का काम
ऐसे ही लोगों से चलता है,
जिनका कुनबा दो नंबर के धन पर पलता है,
काले धन की बात भी
तुम नहीं उठाना,
मुश्किल हो जायेगा अपना ही खर्च जुटाना,
यह सच है जो मैंने तुम्हें बताया,
फिर न कहना पहले क्यों नहीं समझाया।’
सुनकर समाज सेवक हंसे
और बोले
‘‘मुझे समाज में अनुभवी कहा जाता है,
इसलिये हर कोई आंदोलन में बुलाता है,
अरे,
तुम्हें मालुम नहीं है
आजकल क्रिकेट हो या समाज सेवा
हर कोई अनुभवी आदमी से जोड़ता नाता है,
क्योंकि आंदोलन हो या खेल
परिणाम फिक्स करना उसी को आता है,
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
मेरा जाना जरूरी है,
जिसकी ईमानदारी से बहुत दूरी है,
इसमें जाकर भाषण करूंगा,
अपने ही समर्थकों में नया जोशा भरूंगा,
अपने किसी दानदाता का नाम
कोई थोडे ही वहां लूंगा,
बस, हवा में ही खींचकर शब्द बम दूंगा,
इस आधुनिक लोकतंत्र में
मेरे जैसे ही लोग पलते हैं,
जो आंदोलन के पेशे में ढलते हैं,
भ्रष्टाचार का विरोध सुनकर
तुम क्यों घबड़ाती हो,
इस बार मॉल में शापिंग के समय
तुम्हारे पर्स मे ज्यादा रकम होगी
जो तुम साथ ले जाती हो,
इस देश में भ्रष्टाचार
बन गया है शिष्टाचार,
जैसे वह बढ़ेगा,
उसके विरोध के साथ ही
अपना कमीशन भी चढ़ेगा,
आधुनिक लोकतंत्र में
आंदोलन होते मैच की तरह
एक दूसरे को गिरायेगा,
दूसरा उसको हिलायेगा,
अपनी समाज सेवा का धंधा ऐसा है
जिस पर रहेगी हमेशा दौलत की छाया।’’

Monday, August 08, 2016

बहुरूपिये-हिन्दी कविता (Bahurupiye-HindiPoem)


कुछ चेहरे ऐसे भी
जो नया मुखौटा लगाकर
सामने आते।

भ्रम में पड़ी भीड़
पुरानी नीयत वाले
नये जाने जाते।

कहें दीपकबापू याद से
उनका नाता भी टूट जाता
अपनी औकात से नाता
छूट जाता
बहुरुपिये होते बेशर्म
चाहे जितने ताने खाते।
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