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Friday, December 04, 2009

एक बूंद रौशनी-हिन्दी लघु कथा (ek boond roshni-hindi short story)

बड़े शहर के विशाल मकान में रहने वाला वह शख्स एक दिन बरसात के दिनों मे गांव की ओर जाने वाली पगंडडी पर पानी मे अंधेरे में कांपते हुए कदम रखता हुआ आगे बढ़ रहा था। दरअसल शाम के समय वह बस मुख्य सड़क पर उतरा था उस समय बरसात धीरे शुरु हुई थी। उसे गांव जाना था जिसका रास्ता एक पगडंडी थी। बरसात के कारण वह वहीं खड़ी एक दुकान पर कुछ देर खड़ा हो गया। जब बरसात बंद हो गयी तो उसने वहां दुकानदार गांव का रास्ता पूछा तो पगडंडी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि‘यहां से एक मील दूर जाने पर वह गांव आ जायेगा।
वह गांव वहां से कम से कम चार किलोमीटर दूर था। इधर सूरज भी एकदम डूबने वाला था। वह जल्दी जल्दी चल पड़ा कुछ दूर जाने पर उसे कीचड़ दिखाई दी पर वह सूखी जमीन पर कदम रखता हुआ आगे बढ़ रहा था। इधर सूरज भी पूरी तरह से डूब गया। अंधेरे में उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। दूर दूर रौशनी भी नहीं दिख रही थी। चारों तरफ पेड़ और छोटे पहाड़ के पीछे छिपे उस गांव की तरफ जाते हुए उसका हृदय अब कांपने लगा था। अनेक जगह वह फिसला। अपने जूत भी उसे अपने हाथ में ले लिये ताकि फिसल न जाये। रास्ते में वह अनेक बार चिल्लाया-‘कोई है! कोई मेरी आवाज सुन रहा है।’
वह फिसलता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। एक समय तो उसे लगा कि उसका अब कहीं गिरकर अंत हो जायेगा
वह अब पीछे नहीं लौट सकता था क्योंकि मुख्य सड़क बहुत दूर थी और वह आशा कर रहा था कि बहुत जल्दी गांव आ जायेगा। अब तो उसे यह भी पता नहीं चला रहा था कि गांव होगा कहां? कोई कुछ बताने वाला नहीं था।
न दिशा का ज्ञान न रास्ते का। चलते चलते अचानक वह एक झौंपड़ी के निकट पहुंच गया। वहां एक मोमबती चल रही थी। उसे देखकर उस शख्स ने राहत अनुभव की। वहां खड़े एक आदमी से उसने उस गांव का रास्ता पूछा- उस आदमी ने इशारा करके बताया और उससे कहा-‘आपके चिल्लाने की आवाज तो आ रही थी पर मेरी समझ में नहीं आ रहा था। अब गांव अधिक दूर नहीं है। बरसात बंद हो गयी है। मैं मोमबती लेकर खड़ा हूं आप निकल जाईये थोड़ी देर में आपको वहां रौशनी दिखाई देगी। बिजली नहीं भी होगी तो भी लोगों की लालटेन या मोमबतियां जलती हुई दिखाई देंगी।’
वह मोमबती लेकर खड़ा। उसकी रौशनी में उसे पूरा मार्ग दिखाई दिया। कीचड़ थी पर वहां से निकलने के लिये कुछ सूखी जमीन भी दिखाई दी। वह धीरे धीरे चलकर गांव में अपने रिश्तेदार के यहां पहुंच गया।
रिश्तेदार ने कहा-‘हमें आपके घर से फोन आया था कि आप आ रहे हैं। इतनी देर न देखकर चिंता हो रही थी। आपने हमें इतला दी होती तो हम लेने मुख्य सड़क पर आ जाते। यह रास्ता खराब है। इतने अंधेरे में आप कैसे पहुंचे।’
उस शख्स ने आसमान में देखा और कहा-‘सच तो यह है कि इस अंधेरे से वास्ता नहीं पड़ता तो रौशनी का मतलब समझ में नहीं आता। शहर में हम इतनी रौशनी बरबाद करते हैं एक बूंद रौशनी की कीमत ऐसे अंधेरे में ही पता लगती है।’
वह रिश्तेदार उसकी तरफ देखने लगा। उसने लंबी सांस भरकर फिर कहा-‘एक मोमबती की बूंद भर रौशनी ने जो राहत दी उसे भूल नहीं सकता। जाओ, पानी ले आओ।’
वह रिश्तेदार उस शख्स का चेहरा गौर से देख रहा था जो आसमान में देखकर कुछ सोच रहा था।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Sunday, November 22, 2009

भारतीय प्रचार माध्यम, तिब्बत और चीन-आलेख (indian media, tibbat and china-hindi artcile)

भारत के बौद्धिक वर्ग में बहुत कम लोग इस बात का अनुमान लगा पाये थे कि विश्वव्यापी मंदी इतने व्यापक रूप से विश्व में अंतर्राष्ट्रीय समीकरण बदल देगी। कुछ विशेषज्ञों ने इस बात से आगाह कर दिया था कि यह मंदी चैंकाने वाले  बदलाव लायेगी क्योंकि विश्व की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र बिंदु में स्थित अमेरिका इसका सबसे बड़ा शिकार बन रहा था।  अमेरिका और चीन के बीच तात्कालिक सद्भाव इसी का मंदी की मार से उपजा परिणाम है।  चार देशों की यात्रा समाप्त कर अपने देश पहुंचे अमेरिकन राष्ट्रपति ने अपने साप्ताहिक उद्बोधन में अपनी जनता को बताया कि वह तो अमेरिकन बेरोजगारों के लिये वहां नौकरी ढूंढने गये थे। 



जिन लोगों को अमेरिका द्वारा तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लेने पर आश्चर्य है उन्हें अब यह बात समझ लेना चाहिये कि वहां अमेरिका अपने लिये अपनी अर्थव्यवस्था की प्राणवायु ढूंढ रहा है।  मुखर भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक-जो अपनी विशेषज्ञताओं के कारण प्रचार माध्यमों में छाये रहते हैं- इसका पहले अनुमान नहीं लगा पाये तो उसमें उनकी चिंतन क्षमता का अभाव ही जिम्मेदार है।  दरअसल भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक लकीर से हटकर नहीं सोचते-हालांकि ऐसा करने से प्रचार माध्यमों द्वारा उनको नकाने जाने का भी भय रहता है।  दूसरी बात यह है कि वह राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक आधारों को अलग अलग देखने के इतने आदी हो चुके हैं कि एक को दूसरे विषय से जोड़ने का उनमें साहस नहीं होता।  अगर आर्थिक विशेषज्ञ है तो वह अन्य आधारों से परे रहकर सोचता है और अगर अन्य विषयों का हो तो  आर्थिक विषयों से परहेज करता है। सच बात तो यह है कि वैश्विक आर्थिक उदारीकरण ने न केवल बाजारोें को दायरा बढ़ाया है वरन् उसने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामरिक विषयों को भी प्रभावित करना शुरु कर दिया है। भारतीय बुद्धिजीवियों और चिंतकों की संकीर्ण सोच के ही कारण है कि भारत आर्थिक रूप से दूसरों के लिये बाजार होते हुए भी अन्य क्षेत्रों में पिछड़ रहा है।  यहंा तक कि भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन चीन भी भारतीय अर्थव्यवस्था का दोहन करने के बावजूद आंख दिखा रहा है। उस दिन अंतर्जाल पर एक ब्लाग पर पढ़ने को मिला कि एक स्थान पर चीन की कंपनी अपने यहां से अनेक कर्मचारी लायी है जो यहां अपने यहां कार्यरत भारतीय कर्मचारियों से अधिक वेतन पाते हैं।  इससे तो यह जाहिर हो रहा है कि चीन के लोगों को भी भारत रोजगार दे रहा है।  चीन बड़ी चालाकी से अन्य विषयों को राजनीति से अलग कर आगे बढ़ा रहा है पर उसने यह सुविधा अमेरिका को नहीं दी।  मंदी की मार से जूझ रहे अमेरिका को अपने देश के बेरोजगारों के साहबी किस्म की नौकरी चाहिये-जहां तक शारीरिक श्रम की बात है तो विश्व भर के गोरे देशों के लोग  उससे दूर रहते हैं और एशियाई देशों के लोग ही वहां पहुंचकर उनकी गुलामी करते हैं।  यह साहबी किस्म की नौकरी अब एशियाई देशों में सुलभ है। इस मामले में भारत से बड़ा बाजार चीन है।  चीन में भी तिब्बत का एक बहुत बड़ा भूभाग है जहां विकास की संभावनाएं हैं और वहां अमेरिका अपनी दृष्टि रख सकता है। संभव है चीन उसकी कंपनियों और लोगों को वहां घुसने का अवसर प्रदान करे ।

अमेरिका भारत से पूरा फायदा बिना किसी राजनीतिक सुविधा के ले रहा है इसलिये परवाह नहीं करता है पर चीन बहुत चालाक है। इसके अलावा तिब्बत का बहुत बड़ा भूभाग जहां अभी विदेशियों का जाना कठिन है वह भी अमेरिका के लिये सहज सुलभ हो सकता है।  दूसरी बात यह है कि अमेरिका हथियारों को बहुत बड़ा सौदागर है और तिब्बती हिंसक नहीं है।  इतने बरसों से वह अपनी आजादी के लिये जूझ रहे हैं पर उन्होंने हिंसा के लिये कोई हथियार खरीदने की मुहिम नहीं चलाई जिससे वह किसी पश्चिम देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकें।  यही कारण है कि पश्चिमी देशों की तिब्बतियों से केवल शाब्दिक सहानुभूति रही है वह भी इसलिये कि कभी कभी चीन की राजनीतिक रूप से बांह मरोड़ सकें। अब जबकि पश्चिमी देश लाचार हो गये हैं इसलिये उसका बाजार पाने के लिये उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि वह तिब्बत को उसका हिस्सा माने।

अब समस्या भारतीय बुद्धिजीवियों और चिंतकों के सामने है। वह यह कि अभी तक यहां के चिंतक इस बात से आश्वस्त थे कि अमेरिका और पश्चिमी देशों का तिब्बत को लेकर चीन से हमेशा लड़ते रहेंगेे। इस तरह वह चीन विरोध मंच पर हमारे साथ हमेशा खड़े मिलेंगे।  ऐसे में चीन से सीधे टकराव की बात सोचने वह बचते रहे। अब स्थिति बदल गयी है। चीन के लिये तिब्बत की समस्या बहुत गंभीर है और दलाई लामा भारत में ही रहते हैं।  पश्चिम का जो सुरक्षित वैचारिक आवरण था जिसके सहारे भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक अपने वक्तव्य सुरक्षित अनुभव करते हुए देते थे, अब वह नहीं रहा।  स्पष्टतः चीन के साथ सीधा टकराव करते हुए लिखना और बोलना पड़ेगा, शायद यही बात भारतीय बुद्धिजीवियों को परेशान किये हुए है। वैसे एक बात तय है कि अगर चीन पर भारत आर्थिक दबाव डाले तो वह भी उसी तरह कई विषयों से पीछ हट सकता है। एक बात याद रहे चीन का बना सामान हमारे यहां बिकता है पर उसका खुद का बाजार कोरियो और जापानी सामानों से वैसे ही पटा पड़ा है जैसा उसके सामानो को हमारे यहां-ऐसे समाचार आये दिन अखबार तथा अंतर्जाल पर पढ़ने को मिल जाते हैं। सबसे आश्चर्य तो इस बात का है कि जब भारत ने तिब्बत विवाद से स्वयं पीछे हटने का निर्णय लिया तब उससे अरुणांचल पर ही ऐसी राय रखने के लिये बाध्य क्यों नहीं किया? चीन की सामरिक ताकत बहुत है पर भारत कोई कम नहीं है। अगर उससे हमें तबाही का भय है तो वह भी हमारी शक्ति को देखते हुए कोई उससे मुक्त नहीं है। मुख्य विषय है आर्थिक आधार जिसके संदर्भ देते हुए उससे भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक प्रचार माध्यमों के द्वारा उसे चेताते रहें।

एक बाद यह भी तय करना चाहिये कि आर्थिक रूप से परेशान अमेरिका अब किसी भी आधार पर भारत को वैचारिक समर्थन नहीं देगा। आपको याद होगा उसने बाहर के लोगों को अमेरिका में नौकरी कम देने का फैसला किया तो उसके आर्थिक विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया क्योंकि अनेक प्रकार की ऐसी नौकरियां ऐसी हैं जो अमेरिकन करते ही नहीं और करते हैं तो उनका वेतन अधिक होता है।   इस पर भारत और चीन में साहबी किस्म की नौकरियों के लिये ब्रिटेन और अमेरिका दोनों ही हाथ पंाव मार रहे हैं।  उनके राजनीतिक हित आर्थिक लाभ के आसपास ही घूमते हैं।   अब वह अपने ही गुलाम रहे इन दो देशों में-चीन और भारत-साहबी किस्म की नौकरियों के लिये अपने लोग भेजना चाहते हैं।  बदले में अपनी गुलामी किस्म की नौकरियों के लिये वह अपने यहां इन्हीं देशों से लोग बुलाते भी हैं। ऐसे में अगर भारत के बुद्धिजीवी और चिंतक आक्रामक ढंग से प्रचार माध्यमों में अपने आर्थिक आधार पर अन्य विषयों को भी जोड़कर रखें तो संभव है कि चीन थोड़ा सतर्क रहे। कम से कम भारतीय प्रचार माध्यमों की ताकत इतनी तो है कि चीन भी उनसे परेशान रहता है।  वैसे आजकल प्रचार माध्यमों से जो कहा जाता है उसका प्रभाव रहता ही इससे इंकार करना कठिन है। एक बात निश्चित है कि तिब्बत चीन का हिस्सा नहीं है और वह अपनी सम्राज्यवादी नीति के कारण वह जमा हुआ है जो उसने पश्चिम से उधार ली है।






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Saturday, November 14, 2009

भूखे पेट न भजन होता न बंदूक चलती- काव्य चिंतन (bhookh ar banddook-hindi kavita aur lekh)

भूखे पेट भजन नहीं होते-यह सच है पर साथ ही यह भी एक तथ्य है कि भूखे पेट गोलियां या तलवार नहीं चलती। देश में कुछ स्थानों-खासतौर से पूर्व क्षेत्र-में व्याप्त हिंसा में अपनी वैचारिक जमीन तलाश रहे कुछ विकासवादी देश के बुद्धिजीवियों को ललकार रहे हैं कि ‘तुम उस इलाके की हकीकत नहीं जानते।’
यह कहना कठिन है कि वह स्वयं उन इलाकों को कितना जानते हैं पर उनके पाठ हिंसा का समर्थन करने वाले बदलाव की जमीन पर लिखे जाते हैं। अपने ढोंग और पाखंड को वह इस तरह पेश करते हैं गोया कि जैसे कि सत्य केवल उनके आसपास ही घूमता हो। दूसरी समस्या यह है कि उनके सामने खड़े परंपरावादी लेखक कोई ठोस तर्क प्रस्तुत कर उनका प्रतिवाद नहीं करते। बस, सभी हिंसा और अहिंसा के नारे लगाते हुए द्वैरथ करने में व्यस्त है।
इन हिंसा समर्थकों से सवाल करने से पहले हम यह स्वीकार करते हैं कि गरीब, आदिवासी तथा मजदूरों को शोषण सभी जगह होता है। इसे रुकना चाहिये पर इसका उपाय केवल राजकीय प्रयासों के साथ इसके लिये अमीर और गरीब वर्ग में चेतना लाने का काम भी होना चाहिये। हमारे अध्यात्मिक ग्रंथ यही संदेश देते हैं कि अमीर आदमी हमेशा ही गरीब की मदद करे। किसी भी काम या उसे करने वाले को छोटा न समझे। सभी को समदर्शिता के भाव से देखें। इस प्रचार के लिये किसी प्रकार की लाल या पीली किताब की आवश्यकता नहीं है। कम से कम विदेशी विचार की तो सोचना भी बेकार है।
अब आते हैं असली बात पर। वह लोग भूखे हैं, उनका शोषण हो रहा है, और बरसों से उनके साथ न्याय नहीं हुआ इसलिये उन्होंने हथियार उठा लिये। यह तर्क विकासवादी बड़ी शान से देते हैं। जरा यह भी बतायें कि जंगलों में अनाज या फलों की खेती होती है न कि बंदूक और गोलियों की। वन्य और धन संपदा का हिस्सा अगर उसके मजदूरों को नहीं मिला तो उन्होंने हथियार कैसे उठा लिये? क्या वह भी पेड़ पर उगते हैं?
अब तर्क देंगे कि-‘सभी नहीं हथियार खरीदते कोई एकाध या कुछ जागरुक आदमी उनको न्याय दिलाने के लिये खरीद ही लेते हैं।’
वह कितनों को न्याय दिलाने के लिये हथियार खरीद कर चलाते हैं। एक, दो, दस, सौ या हजार लोगों के लिये? एक बंदूक कोई पांच या दस रुपये में नहीं आती। उतनी रकम से तो वह कई भूखे लोगों को खाना खिला सकते हैं। फिर जंगल में उनको बंदूक इतनी सहज सुलभ कैसे हो जाती है। इन कथित योद्धाओं के पास केवल बंदूक ही नहीं आधुनिक सुख सुविधा के भी ढेर सारे साधन भी होते हैं। कम से कम व गरीब, मजदूर या शोषित नहीं होते बल्कि उनके आर्थिक स्त्रोत ही संदिग्ध होते हैं।
विकासवादियों का तर्क है कि पूर्वी इलाके में खनिज और वन्य संपदा के लिये देश का पूंजीपति वर्ग राज्य की मदद से लूट मचा रहा है उसके खिलाफ स्थानीय लोगों का असंतोष ही हिंसा का कारण है। अगर विकास वादियों का यह तर्क मान लिया जाये तो उनसे यह भी पूछा जाना चाहिये कि क्या हिंसक तत्व वाकई इसलिये संघर्षरत हैं? वह तमाम तरह के वाद सुनायेंगे पर सिवाय झूठ या भ्रम के अलावा उनके पास कुछ नहीं है। अखबार में एक खबर छपी है जिसे पता नहीं विकासवादियों ने पढ़ा कि नहीं । एक खास और मशहूर आदमी के विरुद्ध आयकर विभाग आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच कर रहा है। उसमें यह बात सामने आयी है कि उन्होंने पद पर रहते हुए ऐसी कंपनियों में भी निवेश किया जिनका संचालन कथित रूप से इन्हीं पूर्वी क्षेत्र के हिंसक तत्वों के हाथ में प्रत्यक्ष रूप से था। यानि यह हिंसक संगठन स्वयं भी वहां की संपत्तियों के दोहन में रत हैं। अब इसका यह तर्क भी दिया जा सकता है क्योंकि भूख और गरीबी से लड़ने के लिये पैसा चाहिये इसलिये यह सब करते हैं। यह एक महाढोंग जताने वाला तर्क होगा क्योंकि आपने इसके लिये उसी प्रकार के बड़े लोगों से साथ लिया जिन पर आप शोषण का आरोप लगाते हैं। हम यहां किसी का न नाम लेना चाहते हैं न सुनना क्योंकि हमारा लिखने का मुख्य उद्देश्य केवल बहस में अपनी बात रखना हैं।
इन पंक्तियों के लेखक के इस पाठ का आधार समाचार पत्र, टीवी और अंतर्जाल पर इस संबंध में उपलब्ध जानकारी ही है। एक सामान्य आदमी के पास यही साधन होते हैं जिनसे वह कुछ जान और समझ पाता है। इनसे इतर की गतिविधियों के बारे में तो कोई जानकारी ही समझ सकता है।
इन हिंसक संगठनों ने अनेक जगह बम विस्फोट कर यह सबित करने का प्रयास किया कि वह क्रांतिकारी हैं। उनमें मारे गये पुलिस और सुरक्षा बलों के सामान्य कर्मचारी और अधिकारी। एक बार में तीस से पचास तक लोगों की इन्होंने जान ली। इनसे पूछिये कि अपनी रोजी रोटी की तलाश में आये सामान्य जनों की जान लेने पर उनके परिवारों का क्या हश्र होता है वह जानते हैं? सच तो यह है कि यह हिंसक संगठन कहीं न कहीं उन्हीं लोगों के शोषक भी हो सकते हैं जिनके भले का यह दावा करते हैं। जब तक गोलियों और बारुद प्राप्त करने के आर्थिक स्त्रोतों का यह प्रमाणिक रूप से उजागर नहीं करते तब उनकी विचारधारा के आधार पर बहस बेकार है। इन पर तब यही आरोप भी लगता है कि हिंसक तत्व ही इनको प्रायोजित कर रहे हैं।
भारत में शोषण और अनाचार कहां नहीं है। यह संगठन केवल उन्हीं जगहों पर एकत्रित होते हैं जहां पर जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रीय आधार पर लोगों को एकजुट करना आसान होता है। यह आसानी वहीं अधिक होती है जहां बाहर से अन्य लोग नहीं पहुंच पाते। जहां लोग बंटे हुए हैं वहां यह संगठन काम नहीं कर पाते अलबत्ता वहां चर्चाएं कर यह अपने वैचारिक आधार का प्रचार अवश्य करते हैं। बहरहाल चाहे कोई भी कितना दावा कर ले। हिंसा से कोई मार्ग नहीं निकलता। वर्तमान सभ्यता में अपने विरुद्ध अन्याय, शोषण तथा दगा के खिलाफ गांधी का अहिंसक आंदोलन ही प्रभावी है। हिंसा करते हुए बंदूक उठाने का मतलब है कि आप उन्हीं पश्चिम देशों का साथ दे रहे हैं जो इनके निर्यातक हैं और जिनके आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सम्राज्य के खिलाफ युद्ध का दावा करते हैं। यह वैचारिक बहस केवल दिखावे की और प्रायोजित लगती है। जब तक हथियारों के खरीदने के लिये जुटाये धन के स्त्रोत नहीं बताये जाते। जहां तक पूर्वी इलाकों को जानने या न जानने की बात है तो शोषण, अन्याय और धोखे की प्रवृत्ति सभी जगह है और उसे कहीं बैठकर समझा जा सकता है। आईये
इस पर इस लेखक की कुछ पंक्तियां
यह सत्य है कि
भूखे पेट भजन नहीं होता।
मगर याद रहे
जिसे दाना अन्न का न मिले
उसमें बंदूक चलाने का भी माद्दा भी नहीं होता।
अरे, हिंसा में वैचारिक आधार ढूंढने वालों!
अगर गोली से
रुक जाता अन्याय, शोषण और गरीबी तो
पहरेदारों का
अमीरों के घर पहरा न होता।
तुम शोर कर रहे हो जिस तरह
सोच रहे सारा जमाना बहरा होता।
कौन करेगा तुम्हारे इस झूठ पर यकीन कि
अन्न और धन नहीं मिलता गरीबों और भूखों को
पर उनको बंदूक और गोली देने के लिये
कोई न कोई मेहरबान जरूर होता।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Friday, November 06, 2009

क्या नया रचेंगे-काव्य चिंतन (kya naya rachenge-kavya chintan)

देश के बुरे हालतों पर बोलने और लिखने वाले बहुत हैं। आम आदमी का दर्द बयान करने वाले ढेर सारी तालियां बटोर जाते हैं। ऐसी अनेक किताबें लिखी जाती हैं जिनमें पात्रों का दर्दनाक चित्रण कई लेखकों को अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार दिला चुके हैं। समाज की पीड़ाओं को दिखाते हुए अमीरों को कोसने वालों की तो हमेशा पौबारह रही है। इतना सब लिखे जाने के बावजूद समाज का नैतिक और वैचारिक पतन हुआ है। इसका कारण यह है कि दर्द का बयान सभी करते हैं पर उसके इलाज का नुस्खा कोई नहीं लिखता।
एक कवि से एक आदमी ने कहा-‘यार, तुम कवितायें लिखना बंद कर दो।’
कवि ने कहा-‘एक शर्त पर कि तुम अपनी जिंदगी में कभी स्वयं दुःखी नहीं अनुभव करोगे।’
उस आदमी ने कहा-‘यह संभव नहीं है क्योंकि मैं अपने को कभी दुःखी अनुभव न करने का वादा नहीं कर सकता। वह तो मैं तब से अनुभव कर रहा हूं जब से पैदा होने के बाद होश संभाला है। अरे, इस संसार में कोई सुखी रह सकता है क्या? कैसे कवि हो? इतनी अक्ल भी नहीं है।’
कवि ने कहा-‘बस, यही बात है। जब तक जमाने में दर्द रहेगा कोई न कोई उस पर अपने अल्फाज कहेगा। सभी अगर अंदर ही अंदर रोयेंगे या बाहर केवल चीखेंगे तो फिर दर्द को अल्फाज कौन देगा? यही काम कवि का होता है।’
बहरहाल अब तो कवि ही नहीं दर्द कहते बल्कि गद्यकार भी दर्द का बयां करते हैं। तलवार, तीर या बंदूक की आवाज हो तो उसमें भी वह भूख और गरीबी का दर्द ढूंढा करते हैं। जो आदमी धन और अन्न से मजबूर होता है भला वह कहीं हथियार उठाता है? मगर साहब हमारे देश में इस विश्वास के साथ जीने वाले भी हैं पर उनको यह पता नहीं कि आखिर उन समस्याओं का क्या हल है? वह तो बस अपने दर्द के साथ ऐसा यकीन बयान करते हैं जिसको जमीन पर ढूंढना मुश्किल काम है।
बहरहाल प्रस्तुत हैं इस पर दो पद्य रचनाएं-

दायें चलें कि बायें
वह बताते नहीं।
चलने का नारा देते हैं
वाद सुनाते हैं ढेर सारे
मंजिल का पता खुद नहीं जानते
झंडे उठाये चलते हैं
राहों पर
जमाने का भला करने का
मकसद बताते हैं
अपनी अपनी कहते अघाते नहीं।।
-------------------
कहीं पूरब का बखान करेंगे
कहीं पश्चिम का गान करेंगे।
अपनी जमीन पर खड़ी फसलों को
जलाकर
नयी फसल करने का करते दावा
जमाने से करते छलावा
तलवार, तीर और बंदूक से
मचा रहे शोर
इस जहां में बने स्वर्ग को
जलाकर वह बना रहे नरक
भला क्या नया रचेंगे।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Monday, November 02, 2009

कुदरत का खेल जुआ नहीं-व्यंग्य कविताएं (kudrat ka khel-hindi vyangya kavita)

गिला शिकवा खूब किया
दिन भर पूरे जमाने का
फिर भी दिल साफ हुआ नहीं।
इतने अल्फाज मुफ्त में खर्च किये
फिर भी चैन न मिला
दिल के गुब्बारों का बोझ कम हुआ नहीं।
इंसान समझता है
पर कुदरत का खेल कोई जुआ नहीं।
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उन्होंने चमन सजाने का वादा किया
नये फूलों से सजाने का
पता नहीं कब पूरा करेंगे।
अभी तो उजाड़ कर
बना दिया है कचड़े का ढेर
उसे भी हटाने का वादा
करते जा रहै हैं
पता नहीं कब पूरा करेंगे।
इंतजार तो रहेगा
उनके घर का पेट अभी खाली है
पहले उसे जरूर भरेंगे।
तभी शायद कुछ करेंगे।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Thursday, October 29, 2009

समाज में ‘हिंदी’ का उपयोग सामान्य आदत बने-आलेख (hindi ek adat bane-hindi lekh)

सुना है अब इंटरनेट में लैटिन के साथ ही देवनागरी में भी खोज सुगम होने वाली है। यह एक अच्छी खबर है मगर इससे हिंदी भाषा के पढ़ने और लिखने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ जायेगी, यह आशा करना एकदम गलत होगा। सच तो यह है कि अगर देवनागरी में खोज सुगम हुई भी तो भी इसी मंथर गति से ही हिंदी लेखन और पठन में बढ़ोतरी होगी जैसे अब हो रही है। हिंदी को लेकर जितनी उछलकूल दिखती है उतनी वास्तविकता जमीन पर नहीं है। सच कहें तो कभी कभी तो लगता है कि हम हिंदी में इसलिये लिख पढ़े रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी हमारे समझ में नहीं आती। हम हिंदी में लिख पढ़ते भी इसलिये भी है ताकि जैसा लेखक ने लिखा है वैसा ही समझ में आये। वरना तो जिनको थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती है उनको तो हिंदी में लिखा दोयम दर्जे का लगता है। वैसे अंतर्जाल पर हम लोगों की अंग्रेजी देखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि लोगों की अंग्रेजी भी कोई परिपक्व है इस पर विश्वास नहीं करना चाहिए-क्योंकि बात समझ में आ गयी तो फिर कौन उसका व्याकरण देखता है और अगर दूसरे ढंग से भी समझा तो कौन परख सकता है कि उसने वैसा ही पढ़ा जैसा लिखा गया था। बहरहाल अंग्रेजी के प्रति मोह लोगों का इसलिये अधिक नहीं है कि उसमें बहुत कुछ लिखा गया है बल्कि वह दिखाते हैं ताकि लोग उनको पढ़ालिखा इंसान समझें।
‘आप इतना पढ़ें लिखें हैं फिर भी आपको अंग्रेजी नहीं आती-‘’हिंदी में पढ़े लिखे एक सज्जन से उनके पहचान वाले लड़के ने कहा’‘-हमें तो आती है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं न!’
मध्यम वर्ग की यह नयी पीढ़ी हिंदी के प्रति रुझान दिखाने की बजाय उसकी उपेक्षा में आधुनिकता का बोध इस तरह कराती है जैसे कि ‘नयी भारतीय सभ्यता’ का यह एक एक प्रतीक हो।
जैसे जैसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है-निजी क्षेत्र में अंग्रेजी की शिक्षा का प्रसार बढ़ा है। एक दौर था जब सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पाना ही एक विजय समझा जाता था-उस समय निजी क्षेत्र के छात्रों को फुरसतिया समझा जाता था। उस समय के दौर के विद्यार्थियों ने हिंदी का अध्ययन अच्छी तरह किया। शायद उनमें से ही अब ऐसे लोग हैं जो हिंदी में लेखन बेहतर ढंग से करते हैं। अब अगर हिंदी अच्छे लिखेंगे तो वही लोग जिनके माता पिता फीस के कारण अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों में नहीं पढ़ा सकते और सरकारी विद्यालयों में ही जो अपना भविष्य बनाने जाते हैं।
एक समय इस लेखक ने अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध स्तंभकार श्री खुशवंत सिंह के इस बयान पर विरोध करते हुए एक अखबार में पत्र तक लिख डाला‘जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदी गरीब भाषा है।’
बाद में पता लगा कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा बल्कि उनका आशय था कि ‘हिन्दुस्तान में हिंदी गरीबों की भाषा है’। तब अखबार वालों पर भरोसा था इसलिये मानते थे कि उन्होंने ऐसा कहा होगा पर अब जब अपनी आंखों के सामने बयानों की तोड़मोड़ देख रहे हैं तो मानना पड़ता है कि ऐसा ही हुआ होगा। बहरहाल यह लेखक उनकी आलोचना के लिये अब क्षमाप्रार्थी है क्योंकि अब यह लगने लगा है कि वाकई हिंदी गरीबों की भाषा है। इन्हीं अल्पधनी परिवारों में ही हिंदी का अब भविष्य निर्भर है इसमें संदेह नहीं और यह आशा करना भी बुरा नहीं कि आगे इसका प्रसार अंतर्जाल पर बढ़ेगा, क्योंकि यही वर्ग हमारे देश में सबसे बड़ा है।

समस्या यह है कि इस समय कितने लोग हैं जो अब तक विलासिता की शय समझे जा रहे अंतर्जाल पर सक्रिय होंगे या उसका खर्च वहन कर सकते हैं। इस समय तो धनी, उच्च मध्यम, सामान्य मध्यम वर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिये ही यह एक ऐसी सुविधा है जिसका वह प्रयोग कर रहे हैं और इनमें अधिकतर की नयी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित है। जब हम अंतर्जाल की बात करते हैं तो इन्हीं वर्गों में सक्रिय प्रयोक्ताओं से अभी वास्ता पड़ता है और उनके लिये अभी भी अंग्रेजी पढ़ना ही एक ‘फैशनेबल’ बात है। ऐसे में भले ही सर्च इंजिनों में भले ही देवनागरी करण हो जाये पर लोगों की आदत ऐसे नहीं जायेगी। अभी क्या गूगल हिंदी के लिये कम सुविधा दे रहा है। उसके ईमेल पर भी हिंदी की सुविधा है। ब्लाग स्पाट पर हिंदी लिखने की सुविधा का उपयेाग करते हुए अनेक लोगों को तीन साल का समय हो गया है। अगर हिंदी में लिखने की इच्छा वाले पूरा समाज होता तो क्या इतने कम ब्लाग लेखक होते? पढ़ने वालों का आंकड़ा भी कोई गुणात्मक वुद्धि नहीं दर्शा रहा।
गूगल के ईमेल पर हिंदी लिखने की सुविधा की चर्चा करने पर एक नवयौवना का जवाब बड़ा अच्छा था-‘अंकल हम उसका यूज (उपयोग) नहीं करते, हमारे मोस्टली (अधिकतर) फ्रैंड्स हिंदी नहीं समझते। हिंदी भी उनको इंग्लिश (रोमन लिपि) में लिखना पसंद है। सभी अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं। जो हिंदी वाले भी हैं वह भी इससे नहीं लिखते।’
ऐसे लोगों को समझाना कठिन है। कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी की कितनी भी सुविधा अंतर्जाल पर आ जाये उसका लाभ तब तक नहीं है जब तक उसे सामान्य समाज की आदत नहीं बनाया जाता। इसका दूसरा मार्ग यह है कि इंटरनेट कनेक्शन सस्ते हो जायें तो अल्प धन वाला वर्ग भी इससे जुड़ेे जिसके बच्चों को हिंदी माध्यम में शिक्षा मजबूरीवश लेनी पड़ रही है। यकीनन इसी वर्ग के हिंदी भाषा का भविष्य को समृद्ध करेगा। ऐसा नहीं कि उच्च वर्ग में हिंदी प्रेम करने वाले नहीं है-अगर ऐसा होता तो इस समय इतने लिखने वाले नहीं होते-पर उनकी संख्या कम है। ऐसा लिखने वाले निरंकार भाव से लिख रहे हैं पर उनके सामने जो समाज है वह अहंकार भाव से फैशन की राह पर चलकर अपने को श्रेष्ठ समझता है जिसमे हिंदी से मूंह फेरना एक प्रतीक माना जाता है।
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Tuesday, October 20, 2009

किसका हुआ कभी कोहिनूर-व्यंग्य कविता (kiska hua kohinoor-vyangya kavita)

चंद खोये सिक्के ढूंढने के लिए
पूरा घर का सामान बिखेर डाला
मिले पलंग के नीचे गिरे हुए
पहले तो खुशी मिली, फिर हुई काफूर।
बिखरी हुई शयों को समेटने के
ख्याल ने कर दिया बदन पहले ही चूर।
खोये पाये के हिसाब में
पूरी जिंदगी हो जाती है बेनूर।
सिक्के इतने जमा कर लिये संभाले नहीं जाते
गिनती में भूल जायें
तो देखते हैं उनको घूर।
सोचते कौन कम हुआ चश्मेबद्दूर।
खोये हुए सिक्के मिल गये
पर चले जायेंगे हाथ से
बनेंगे किसी दूसरे हाथ का नूर।
जिंदगी में गमों का सिलसिला भी आता है
खुशियां भी साथ चलती थोड़ी दूर।
अपना कितनों ने माना होगा
पर किसका हुआ कभी कोहिनूर।

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