Tuesday, October 11, 2011

कद्रदान-हिन्दी शायरी (kadradan-hindi shayari or poem)

उनकी जुदाई के गम में
कभी हमने आँसू नहीं बहाये
भले ही उनको देखने के लिए तरसते रहे,
मगर टूटा आसमान सिर पर
जब पता चला कि
वह दूसरों की बाहों में
बाहर बनकर बरसते रहे।
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खामोशी के बड़ा दोस्त
बहुत ढूँढने पर भी नहीं मिला,
सच बोले तो लोग बने दुश्मन
झूठ बोले तो हुआ जमाने में गिला।
फिर भी कोई शिकायत नहीं हैं
इस जहाँ में
भला कब किसे
अपनी जुबान से निकले लफ्जों का कद्रदान मिला।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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