Sunday, January 29, 2012

पत्थर और शब्द-हिन्दी कविता (patthar aur shabd-hindi kavita or poem-stone and ward)

पत्थरों के खेल होते हैं
मगर वह जीते नहीं जाते,
कुछ घायल होते
कुछ बेमौत मर जाते।
कहें दीपक बापू
आओ
चंद शब्द मन में दुहराएँ,
कलम से होते जो कागज पर उतार आयें,
इंसान खुशनसीब है
भाषा मिली है बोलने के वास्ते,
क्यों चुने फिर पत्थर के रास्ते,
जज़्बातों में कुब्बत हो तो
दहशत के माहौल में भी
हँसते नगमे दिल पर परचम फहराते।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
5.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.जागरण पत्रिका 
८.हिन्दी सरिता पत्रिका 
९.शब्द पत्रिका

No comments:

Post a Comment

अपनी प्रतिक्रिया दें