Tuesday, February 11, 2014

हंसी का इंतजाम-हिन्दी व्यंग्य कविता(hansi ka intzam-hindi vyangya kavita)




हर कोई लगा रहा एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का इल्जाम,
अपने कसूरों से बेखबर लिखते खुद ही अपना ईमानदारों में नाम।
लोगों के खजाने पर खतरे मंडराते हैं नहीं देते अब सांप पहरा,
सारे सबूत सामने हैं पर दावा यह कि चोरी का राज है गहरा,
पर्दे पर चर्चा होती विज्ञापनों के बीच भ्रष्टाचार हटाने की,
हंसी और मजाक करते हुए विद्वान कहते बात महंगाई घटाने की,
शिखर पर पहुंचे खास लोग लगाते हैं भलाई के नये नारे,
बेबस हो रहा आम इंसान दिन में दिखते हैं जमीन पर तारे,
कहें दीपक बापू दूसरे पर न छोड़ो  अपनी खुशी का काम,
हुक्मतों के लिये मुश्किल है खुद ही करो अपनी हंसी का इंतजाम।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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