निरापद रहने की कोशिश
निष्क्रिय बना देती है
बाहर जलती आग पर
दिल को ठंडा रखने की सोच
घर को राख बना देती है.
खामोशी से जीती जा सकती हैं दुनिया
पर जीतती है वही बांह
जो जंग में हथियार लेती है.
----------------------
जिन के पेट भरे हैं
उनके घर भी बहुत बड़े हैं
अय्याशी की चीजों पर वह फ़िदा हो जाते.
भूख का मतलब वह क्या समझें
रोटी को जो पेट तरसे
उनकी निहारती आँखों को अमीर नहीं पढ़ते
बगावत के इन्तजार में उनके पल भी गुजर जाते.
मौके पर टूटे लोग ही
अपने हाथों से जलाकर चिंगारी
अपनी आग को इतिहास की धारा से बुझाते.
ऐ, दौलतमंदों तुम यह क्यों नहीं समझ पाते.
-------------------------------------
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
-------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
No comments:
Post a Comment
अपनी प्रतिक्रिया दें