Wednesday, February 24, 2016

अपने हिस्से कमा लिये-हिन्दी कविता(Apane Hisse Kama liye-Hindi Kavita)

आपस में लड़कर
अपने नाम से धरती पर
इलाके बना लिये।

सिंह नहीं है
फिर भी बैठने के लिये
सोने के सिंहासन जमा लिये।

कहें दीपकबापू दुनियां में
एकता की चाहत बहाना है
चालाक लोगों का
जिन्होंने बंटवारे में
दौलत हिस्से के कमा लिये।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Saturday, February 13, 2016

सौदा नहीं कर सकते-हिन्दी कविता (Sauda Nahin kar sakte-hindi kavita)


शोर में कितना भी
मजा मिल जाये
तन्हाई का सौदा
नहीं कर सकते।

नया साथी मिले
चाहे कितना भी वफादार हो
पुराने से बेवफाई का सौदा
नहीं कर सकते।

कहें दीपकबापू शब्दों से
बहला भी सकते हैं
सहला भी सकते हैं
मगर उनमें कभी
जम्हाई नहीं भर सकते।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
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Saturday, January 23, 2016

राजशाही दिलाये दास व दासी-दीपकबापू वाणी (Rajshahi dilaye das v daasi-DeepakBapuWani)

परमार्थ करे ज़माने में दम नहीं, समाज सेवकों की संख्या कम नहीं।
‘दीपकबापू’ भलाई के धंधे मेें सौदागर, फायदा कमाने में कम नहीं।।
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धन की अधिकता बना देती विलासी, राजशाही दिलाये दास व दासी।
चुपड़ी रोटी से भी अनिद्रा दोष, ‘दीपकबापू’ चैन पाये खाकर बासी।।
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पीते हैं गम भूलाने के लिये, लोग सोच झुलाने के लिये।
‘दीपकबापू’ पीये कई घूंट जाम, बेकार सीना फुलाने के लिये।।
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चार कदम सड़क पर चलें  नहीं, मेहनत के सिक्के में ढले नहीं।
‘दीपकबापू’ ताकत घटी चर्बी बढ़ी, फोकट खायें चाहे फले नहीं।।
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पहलेे मदद मांगते हाथ उठाकर, लड़ने आते फिर नया साथ जुटाकर।
‘दीपकबापू’ दोमुंही बातों के साथी, उन्हें खुश करना कठिन सब लुटाकर।।
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हर शहर की बढ़ रही शान, कर्ज से जिंदगी हुई आलीशान।
‘दीपकबापू’ सांस रखे सामान में, टूटने तक बची रहेगी जान।।
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ढूंढ लेते काम से बचने के बहाने, प्रतिकूल बात बदल देते सयाने।
‘दीपकबापू’ उछलकूद की अदा में लगे, अकर्मण्यता में कर्म जताने।।
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हृदय में संवेदना का अभाव, नहीं भरता निर्दयता का घाव।
‘दीपकबापू’ विचार घुमाते रहते, तबाह न करे एकरस भाव।।
......................

वाहन से होती सड़क जाम, चाहत कर देती दिमाग जाम।
‘दीपकबापू’ लेतेे दूषित सांस, कौन खोले सोच का जाम।।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
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Monday, January 04, 2016

शैतान व इंसान-हिन्दी कविता(Shaitan Insan-Hindi Kavita)

सोने की तश्तरी में
सजने से कंकड़ पत्थर
हीरे नहीं हो जाते।

कांटे प्यार से
सहलाने पर भी
गुलाब नहीं हो जाते।

कहें दीपकबापू लेकर त्रिशुल
डटे रहो पहरे पर
शैतानों के चेहरे भी
इंसानों जैसे होते
वह दयावान नहीं हो पाते।
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Saturday, December 26, 2015

दर्द की धारा-हिन्दी कविता(Dard Ki Dhara-Hindi Kavita)


भाषा के अज्ञानी
बोलने से अच्छा
वह मौन रहें।

अपने दर्द पर
चिल्लाने से अच्छा है
वह उसे सहें।

कहें दीपकबापू सांसे लेते हुए
सभी लोग चेतन नहीं होते
जड़ता जिनकी आदत बन गयी
बेलगाम जुबान से
भटकायें अपना मकसद
उससे अच्छा
दर्द की धारा में बहें।
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Wednesday, December 16, 2015

संघर्ष की विरासत-हिन्दी कविता(Samgharsh Ki Virasat-Hindi Kavita)


सभी ने जागते हुए
अपनी आंखों में
सपने संभाल रखे हैं

श्रम किये बिना
चढ़ जायें शिखर पर
ऐसे विचार पाल रखे हैं।

कहें दीपकबापू संघर्ष से
जिनका रोज का नाता है
सिंहासन पाने की
चाहत नहीं करते
जिन्हें मिली दौलत की विरासत
पाप का माल वही रखे हैं।
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Monday, December 07, 2015

जवाब देने वाले-हिन्दी कविता(Javab Dene Wale-Hindi Poem)


चौपायों का काफिला
चलता रहेगा यूं ही
धुंआ उड़ाते हुए।

घर आसमान
छूते रहेंगे यूं ही
कुंआ तुड़ाते हुए।

कहें दीपकबापू विकास पर
कोई सवाल न उठाना
ताकतवर से लड़ना बेकार
कमजोर पर दर्द लुटाना
जवाब देने वाले वैसे भी चल देंगे
हुंआ हुंआ उड़ाते हुए।
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