Saturday, April 21, 2018

ठग भी इज्जतदारों में जुड़ जाते हैं-दीपकबापूवाणी (Tjag bhi ijjatdaoron mein jud jate-DeepakBapuwani)




जैसे जन वैसे ही उनके नेता हैं,
जिंदगी में हर कोई लाभ लेता है।
कहें दीपकबापू परमार्थी भी
स्वार्थ से रिश्ता निभा देता है।
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दिन महीने और वर्ष बीत गये,
वादे अपने रूप रचते रहे नये।
कहें दीपकबापू मिले न हमदर्द
इंसान ही बना रहे दर्द रोज नये।।
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भ्रष्टाचारियों पर पैसे बरसे हैं,
ईमानदार रुपये के लिये तरसे हैं।
कहें दीपकबापू जहां चमक है
वहीं पीछे बेईमानी के फरसे हैं।
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ठग भी इज्जतदारों में जुड़ जाते हैं,
पद पैसे के पंख से उड़ जाते हैं।
कहें दीपकबापू भरोसा बेचकर
सौदागर पीठ दिखा मुड़ जाते हैं।
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हवा में लटके आशियाने हैं,
बिना छत जमीन घर माने हैं।
कहें दीपकबापू बहती जिंदगी
हर पल झूलना ही सब ठाने हैं।
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हमारी बेबसी पर मत तरस खाना
हर बार गिर कर उठे हम।
‘दीपकबापू’ जब चले जीवन की राह
बेहिसाब खुशियां लुटीं रौंदे ढेर  गम।
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Thursday, January 18, 2018

इष्ट का नाम लेकर ढोंगी भक्त करें घमंड-दीपकबापूवाणी (ishq ka Naam lekar Dhongi BhaKt karten Ghamand-DeepakBapuWani)


समाजसेवा सौदे की दुकान खोले हैं, चंदे के धंधे में सभी के परिवार डोले हैं।
‘दीपकबापू’ कानों ने पाई लंगड़ी कुर्सी, अंधों में बैठ सोने का सिंहासन बोले हैं।।
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इष्ट का नाम लेकर ढोंगी भक्त करें घमंड, पूजा के लिये मांग रहे घूमकर फंड।
‘दीपकबापू’ सच्च भक्त बैठे एकांत में जाकर, नकली पकड़े हाथ में झूमते दंड।।
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सड़क का दर्द बंद कमरे में पढ़ते, विकास के पन्ने पर विनाश के शब्द चढ़ते।
‘दीपकबापू’ रोज सजे हमदर्दी की महफिल, सोच की राह नकली जज़्बात बढ़ते।।
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वाहन हाथ में पर चलाने की तमीज नहीं, दौड़ते जैसे सड़क पर दूसरी चीज नहीं।
‘दीपकबापू’ पैसे का जेब से ज्यादा सिर पर लादे, सोचें क्या अक्ल के बीज नहीं।।
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आंख ज़माने का द्वंद्व देखने में ही लगी हैं, नज़र अब पर्दा देखने के लिये जगी है।
‘दीपकबापू’ नहीं रखते वफा बेवफा का हिसाब, अपनी बही भी मतलब की सगी है।।
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सांसों से सुबह की ताजा हवा न लेना जाने, दोपहर की तेज धूप का दर्द न पहचाने।
‘दीपकबापू’ हकीम से दवाखाने तक करें सफर रोज, तंदुरस्ती के कायदे कभी न माने।।
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पाखंड से अपनी छवि हमेशा ताजा करते, जेब में चालाकी से सोने के सिक्के भरते।
‘दीपकबापू’ ईमानदारी के भेष में बेईमान, पहरे में खड़े लुटेरों दोस्ती का दंभ भरते।।
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हल्के शब्द बोलें दावा यह ख्याल गहरे हैं, त्यागी भेष दौलत के महल में ठहरे हैं।
महफिलों में ज़माने की भलाई के गीत गाते, ‘दीपकबापू’ अच्छे श्रोता वह जो बहरे हैं।।
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Saturday, September 02, 2017

हर दर के बाहर फरिश्ते की नाम पट्टिका लगी है-दीपकबापूवाणी(Har Ghar ke bahar Farishtey ki nam Plate lagt hai-DeepakBapuWani)

कोई मुंह फेरता कोई निहारता
सबके अलग अंदाज हैं।
फकीरों ने पाई आजादी
राजाओं के बंधन अपने राज हैं।
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अपनों ने ही नश्तर चुभोये हैं,
इतिहास में गैर तो दुश्मनी ढोये हैं।
‘दीपकबापू’ अपने काम का बहीखाता देखें
अपनी नाकामी आप बोये हैं।
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हर दर के बाहर
फरिश्ते की नाम पट्टिका लगी है।
चमकते अक्षर बताते
कहीं न कहीं पहचान की ठगी है।
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दिल दिमाग में उसका नाम नहीं होता,
जिसमें कभी काम नहीं होता।
‘दीपकबापू’ यायावार होने का लेते मजा,
यार बांके की यारी का दाम नहीं होता।।
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सड़क के राहगीर कहां पहचाने जाते,
पाप ढोते धोने चाहे जहां नहाने जाते।
‘दीपकबापू’ ईमानदार हिसाब नहीं देते
अब बेईमानों के प्रहरी जो जाने जाते।
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विकास के साथ
कचड़े का भी पहाड़ खड़ा है।
दीवार पर चमकती तस्चीर के पीछे
काले कागज की तरह जड़ा है।।
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यह जो तुम विकास दिखा रहे हो,
वह कचड़े का पहाड़ क्यों छिपा रहे हो।
‘दीपकबापू’ विष के उगाये पहाड़
प्रचार में अमृत लिखा रहे हो।।
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वह अपने घर में लगाते तस्वीर
हमारी दीवार पर भी दिख जाती है।
दूर बैठे तो भेंट नहीं होती
उनकी हंसी दिल पर खुशी लिख जाती है।

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