Wednesday, November 05, 2008

सभी जगह होते हैं मध्यस्थ-आलेख

धर्म के नाम पर व्यापार करने वाले बहुत हैं पर उसके धर्म ग्रंथों का ज्ञान कितनों को है यह एक विचार का विषय है। देखा जाए तो ज्ञान न होने की वजह से ही आम लोग हर किसी रंग विशेष के वस्त्र पहनने वाले को संत मान लेते हैं। उसने कोई बात कही तो उसकी चर्चा तो लोग करते हैं पर जो गृहस्थ हैं उनको तो ज्ञान देना का अधिकार ही नहीं है यह मान कर लोग भारी गलती करते हैं। आखिर रंग विशेष के वस्त्र पहनी वाले व्यक्तियों की बात को ही महत्व क्यों दिया जाता है और सामान्य वेशधारी गृहस्थ को कोई भी आदमी एक ज्ञान या विद्वान के रूप में सम्मान क्यों नहीं देता? फिर भगवाधारी-कहीं श्वेत वस्त्रधारी भी-को बिना प्रमाण के ही सन्यासी,धर्मात्मा या ज्ञानी मान लेना एक और गलती है।
शायद इसका कारण मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह अपने जैसे दिखने,बोलने और चलने वाले को महत्व नहीं देता क्योंकि उसके अंदर तब अपने समान दृष्टिगोचर होने वाले की बात मानने पर कुंठा पैदा होती है। आपने सुना होगा कि विपरीत लिंग वालों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण होता है और यही नियम अपने से अलग दिखने वाले व्यक्ति पर भी लागू हो जाता है। सभी व्यक्ति अपने से प्रथक दृष्टिगोचर व्यक्ति का सम्मान कर यह दिखाते हैं कि वह स्वयं भी कोई निम्न कोटि के नहीं है। अपने जैसे दृष्टिगोचर व्यक्ति को देखकर सम्मान देने में उनको शायद हीनता का अनुभव होता है।

ऐसा ही भगवाधारी और श्वेतधारी कथित साधुओंसन्यासियो और संतों के साथ भी होता है। कोई भी अपने आश्रम या मंच पर दूसरे भगवा और श्वेत वस्त्रधारी संत,साधू सन्यासी को अपने बराबर के आसन पर नहीं बिठाता-यदि सामान्य स्थिति हो तो, आपातकाल में तो सभी सन्यासी या गृहस्थ एक हो जाते है। इस तरह कथित साधु और सन्यासी हो या सामान्य आदमी वह इसी भावना का शिकार होते हैं। संत, साधु सन्यासी भी अपने सामने जुटी भीड़ दिखाकर एक दूसरे के साथ प्रतिद्वंद्वता करते हैं। सभी लोगों में हर जगह अपने आश्रम बनाने की होड़ लगी है यह तो कोई भी देख सकता है। सच तो यह है कि ईंट और पत्थर के आश्रम बनाये जाते हैं पर नाम दिया जाता है कुटिया-पुराने धर्म ग्रंथों में यह धास फूंस की बनती थी।

कथित ज्ञानी और ध्यानी अपने प्रवचनों में पुरानी कहानियां सुनाते हैं पर उस मूल तत्त्व ज्ञान की चर्चा बिलकुल नहीं करते जो प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है।
कहने को विश्व के सभी समाज सभ्य है पर जिस तरह विश्व में आतंक और अपराध बढे हैं और उससे आदमी पहले से अधिक डरपोक और अविश्वासी हो गया है। सभी कथित धर्मों के बीच में आम आदमी को उसके धर्म ग्रंथों की जानकारी देने वाला कोई न कोई मध्यस्थ होता है। सभी धर्मों में कर्म कांडों की रचना इस तरह की गयी है कि विवाह और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों के लिए की मध्यस्थ की जरूरत पड़ जाती है। एक तरह से कहा जाए तो सभी मध्यस्थों को ही धर्म का प्रतीक बनाया गया है। आदमी के स्वतन्त्र रूप से सोचने और समझने का अवसर ही नहीं होता और यह मध्यस्थ उनको भेड़ की तरह हांके चला जाता है। एक मजे की बात यह कि सभी धर्मों में यह मध्यस्थ अपने कपडे के तय रंग रखते हैं जिससे समाज में उनको अलग से पहचान बनी रहे। हर धर्म आदमी के मनोविज्ञान को देखकर बनाया गया है कि वह अपने से अलग व्यक्तित्वों का ही सम्मान करता है।

यही वजह से सभी धर्मों के मध्यस्थों के कपडों के रंग ही उनके लोगों के लिए पवित्रता का प्रतीक माने जाते हैं। अनेक विज्ञानी और ज्ञानी इस संसार में हुए हैं पर कोई भी इस प्रवृति से मुक्ति नहीं पा सके। बहुत साधारण सी लगने वाली यह बात इतनी गूढ़ है कि इसे केवल गूढ़ ज्ञानी लोग ही जानते हैं।
अगर लोग यह चाहते हैं कि वह भ्रमित न हों तो उनको ऐसी बातों से मुक्त होना चाहिए। वह ऐसे लोगों से सिर्फ एक ही सवाल करें कि अगर वह ज्ञानी हैं और जीवन में निर्लिप्त भाव से रहते हैं तो फिर वह किसी ख़ास रंग का वस्त्र क्यों पहनते हैं जबकि सभी रंग पैदा इसी धरती पर होते हैं। उन्हें तो हर रंग में समान दिलचस्पी लेनी चाहिए। मगर नहीं! कोई ऐसा नहीं करेगा क्योंकि धर्म के नाम पर व्यवसाय बरसों से चल रहा है। ख़ास रंग की पहचान से वह लोगो अपनी पहचान बनाते हैं ताकि समाज उन पर यकीन करे।
इस प्रकार के ढोंग को रोकने ने लिए जरूरी है कि लोग इस बात को समझें कि धर्म के नाम पर भ्रमजाल में इस तरह फंसाया गया है कि न तो उनकी पहले वाली पीढियां मुक्त हो पायी और न आगे वाली मुक्त हो पाएंगी। लोगों को यह समझना चहिये कि धर्म का मतलब है अपने सांसरिक कर्तव्यों का प्रसन्नता पूवक निर्वहन और परमात्मा की भक्ति और ध्यान एकांत साधना है और उसमें भीड़ में लगने या मध्यस्थ के पास जाने की कोई आवश्यकता नहीं है. शेष फिर कभी।
-----------------
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

1 comment:

''ANYONAASTI '' said...

ओशो प्रसिद्ध क्यों हुए ? यहाँ आशय श्री आचार्य रजनीश से है | दर्शनशास्त्र के ज्ञान के कारण तार्किक शक्ति बहुत क्या बहुत से बहुत ज्यादा तीव्र थी अध्ययन भी था वे जेन कहों केसाथ भारतीय पुराणों ,अरण्यकों ,वैदिक आख्यानों ,जातक -कथाओं के घालमेल से अपनी बात कहते थे और बिल्कुल स्पष्ट कहते थे बिना लाग -लपेट कहते थे;परन्तु कथा का विवरण ,उद्देश्य .मंतव्य संदर्भ आदि सभी बिल्कुल स्पष्ट होते थे ,और दियाजाने वाला संदेशों किसी किंतु- परन्तु,अगर-मगर की कोई संभावना नही रहती थी और शंका की कोई संभावना रहती भी थी तो वह स्वयं उन्ही रची होती थी जिससे उनके अनुयायी उसे उठावें और उन्हें अपनी बात आगे बढाने का एक सूत्र मिलजाता था और उन्हों ने पाने कथनों संदेशों को स्वयं भी जीते थे \ क्षमा प्रार्थी हूँ अति अवशक कार्य से निकलना पड़ रहा है शेष अगले सत्र में

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

लोकप्रिय पत्रिकाएँ

विशिष्ट पत्रिकाएँ