Friday, November 07, 2008

घर का ज्ञानी बैल समान-व्यंग्य आलेख

पता नहीं कब कैसे इस देश में यह परंपरा शुरू हुई कि बाहर से जब तक आदमी प्रमाण पत्र नहीं मिले उसे घर में भी सम्मान नहीं मिलता। यहाँ कुछ लोकोक्तियाँ प्रचलित हैं जैसे-घर का ज्ञानी बैल सामान ,दूसरे गाँव का सिद्ध, और अपने घर में तो हर आदमी शेर होता है,आदि आदि। यह अपने देश के लोगों की मूल प्रवृतियों का परिचायक है। कितना भी अच्छा करो पर जब तक विदेश से कोई प्रमाणपत्र न मिले तब तक यहाँ किसी को सम्मानीय नहीं माना जा सकता।
हालांकि लोगों को समझाने के लिए यह भी कहा गया है कि दूर के ढोल सुहानी-यानी परे लगने वाली सभी शये आकर्षक लगती हैं। आजकल तो कई शहरों में कचडे के रंग बिरंगे डिब्बे भी दिखते हैं। दूर से देखने पर ऐसे दिखते हैं कि वहां कोई खानपान की दूकान होगी। पास जाने पर पता लगता है कि वह तो कचडे का डिब्बा है। बहरहाल यह लोगों की आदत हो गयी है कि कहीं भी जाकर अपने लिए ढोल बजवा लो तभी यहाँ आपको सम्मान मिलेगा। अपने देश के लोगों की आदत देखकर तो यही लगता है कि अगर दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी जी अगर अंग्रेजों को खिलाफ विजय दर्ज नहीं की होती तो शायद ही इसे देश के लोग उनका लोहा मानते हुए उनके अनुयायी बनते। उनका जीवन सदैव संघर्षमय रहा। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने संघर्ष अपनी आत्मा की आवाज पर शुरू किया था। उनकी कथनी और करनी में कभी कोई अंतर नहीं रहा पर लोगों ने उनसे कुछ और नहीं सीखा सिवाय इसके कि यहाँ लोकप्रिय होने के लिए विदेश में नाम कमाओ चाहे जिस तरह। उन्होंने अपने आन्दोलन के दौरान जो श्रम किया वह किसी के बूते का नहीं है-खासतौर से इस सुविधाभोगी युग में तो कतई नहीं। पर हाँ उन जितना तो नहीं पर उनकी तरह नाम कमाने की ललक कई महानुभावों में है।
लोगों की मानसिकता शायद इसी तरह की है कि वह दूसरे देशों या समाजों से सम्मानित होने पर ही लोहा मानते हैं। यही कारण है कि अधिकतर लब्ध प्रतिष्ठत लोग अपने लिए विदेश से कोई न कोई प्रमाण पत्र जुटाते हैं। इसके अलावा जिन महानुभावों को लगता है कि यहाँ नाम करने के लिए मेहनत करने की जगह सीधे विदेश से कोई सम्मान प्राप्त कर लो और वह सफल भी होते हैं। वैसे तो पहले विदेशी यहाँ सौ फीसदी विश्वसनीय माने जाते थे पर जब से फिक्सिंग वगैरह की बात चली है तो ऐसा भी लगता है कि विदेशी भी जरूर अपने लोगों को यहाँ प्रतिष्ठत करने के लिए कोई पुरस्कार दे सकते हैं। कुछ लोग अब जाकर ऐसे संशय उठाते हैं कि क्योंकि कुछ प्रतिभाशाली लोगों का यहाँ नाम इसलिए हुआ है कि वह विदेश से सम्मानित हैं। इनमें कुछ लेखक और चित्रकार हैं जो पहले विदेश में सम्मानित हुए तब यहाँ ऐसे चर्चित हुए कि प्रचार माध्यम उनकी बातें प्रकाशित ऐसे करते हैं जैसे कि वह ब्रह्म वाक्य हो।
अमेरिका की अनेक पत्रिकाएँ अपने यहाँ विश्व के प्रभावशाली,सैक्सी,धनी, विद्वान तथा अन्य अनेक तरह की सूचियां छपते हैं जिसमें स्त्री पुरुष दोनों के नाम होते हैं। इसमें अगर किसी भारतीय का नाम होता है तो अपने प्रचार मध्य उछाले लगते हैं। दूसरे से लेकर दसवें तक हो तो भी उछालते हैं और पहले पर हो तो कहना ही क्या? लगता है कि भारत की वजह से उन्होंने तमाम तरह की श्रेणियां भी बना दीं हैं। किसी की आँखें सेक्सी तो किसी की टांगें तो किसी की आवाज को सेक्सी घोषित कर देते हैं। अनेक लोग समाज सेवा और अपने प्रभाव की कारण भी चर्चित होते हैं।
इनमें जो नाम होते हैं उनमें कई लोगों का नाम चचित भी नहीं होता क्योंकि जन सामान्य उनका कोई सीधे सरोकार नहीं होता पर जो उनके 'प्रभाव क्षेत्र' में होते हैं वह आम आदमी का ही नही बल्कि समाज और देश का भविष्य तय करते हैं। कई लोगों को गलतफ़हमी होती है कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशो के राज प्रमुख दुनिया से सबसे ताक़तवर और प्रभावशाली लोग हैं उन्हें ऎसी रिपोर्ट बडे ध्यान से पढ़ना चाहिए। आखिर वह अपने राष्ट्र प्रमुखों को प्रभावशाली क्यों नहीं मानते जबकि विश्व में उनको सबसे ताक़तवर माना जाता है। आजकल भारत पर उनको अधिक ही मेहरबानी हैं और यहाँ के अभिनेता और अभिनेत्रियों के नाम भी इन आलीशानों की सूची में शामिल करते हैं।

हमारे देश में अगर आप किसी व्यक्ति से प्रभावशाली लोगों के बारे में सवाल करेंगे तो वह अपने विचार के अनुसार अलग-अलग तरह के प्रभाव के रुप बताएंगे। हाँ यहाँ उन लोगों को जरूर प्रभावशाली माना जाता है जो घरेलू हितों के लिए सार्वजनिक काम में पहुँच बनाकर करा लाते हैं। आम आदमी की दृष्टि में प्रभाव का सीधा अर्थ है 'पहुंच'। लोगों के निजी और सार्वजानिक कामों में कठिनाई और लंबी प्रक्रिया के चलते इस देश में उसी व्यक्ति को प्रभावशाली माना जाता रहा है जो अपनी पहुँच का उपयोग कर उसे करा ले आये। इस कारण दलाल टाईप के लोग भी 'प्रभावशाली ' जैसी छबि बना लेते हैं। अब जैसे-जैसे निजीकरण बढ़ रहा है वैसे ही उन लोगों की भी पूछ परख बढ़ रही है जो धनाढ्य लोगों के मूंह लगे हैं, क्योंकि वह भी अपने यहाँ लोगों को नौकरी पर लगवाने और निकलवाने की ताक़त रखने लगे हैं। हर जगह तथाकथित रुप से प्रभावशाली लोगों का जमावड़ा है और तय बात है कि वहाँ चाटुकारिता भी है। इसके बावजूद उनको सम्मानीय नहीं माना जाता क्यों कि इसके लिए उनके पास विदेश से प्रमाण पत्र के रूप में कोई सम्मान नहीं होता।

प्रभावशीलता और चाटुकारिता का चोली दामन का साथ है। सही मायने में वही व्यक्ति प्रभावशाली है जिसे आसपास चाटुकारों का जमावड़ा है-क्योंकि यही लोगों वह काम करके लाते हैं जो प्रभावी व्यक्ति स्वयं नहीं कर सकता है। वैसे भी हमारे देश में बचपन से ही अपने छोटे और बड़े होने का अहसास इस तरह भर दिया जाता है कि आदमी उम्र भर इसके साथ जीता है और इसी कारण तो कई लोग इसलिये प्रभावशाली बन जाते हैं क्योंकि वह लोगों के ऐसे छोटे-मोटे कुछ पैसे लेकर करवा देते हैं जो वह स्वयं ही करा सकते हैं-जिसे दलाल या एजेंट काम भी कहा जाता है और लोग उनका इसलिये भी डरकर सम्मान करते हैं कि पता नहीं कब इस आदमी में काम पड़ जाये। मजे की बात यह है कि घर का आदमी ही बाहर का मुश्किल काम कराकर लाये तो उसे "पहुँच" वाला नहीं माना जाता जब तक बाहर सम्मानित न हो जाए।
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2 comments:

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

badhiya abhivyakti . bharatadeep ji badhai.

''ANYONAASTI '' said...

कहने का सीधा-सीधा भावार्थ यही है " काबुल में केवल घोडे ही नही होते [गधे भी होते हैं] हिन् हिन् न न न n]

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