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Wednesday, August 20, 2014

जिंदगी की असलियत-हिन्दी कविता(zindagi ki asaliyat-hindi kavita)



सिंहासन पर बैठते ही
इंसान की  सोच
बदल जाती है।

जब कदम पड़ते हैं
राजमार्ग आम इंसान के भी
उसकी चाल बदल जाती है।

यह अलग बात है
जिंदगी कभी एक रूप में नहीं होती
बदलते रंग के साथ
इंसान की सूरत भी बदल जाती है।

कहें दीपक बापू दूसरों पर
राज करने की ख्वाहिश
करने वाले बहुत हैं
दिलदारों ने रचा भी इतिहास
वरना ज़माने के हित की बात करता हुआ
चढ़ गया जो शिखर पर
उसकी नीयत
अपना महल बचाने में बदल जाती है।
---------------

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Wednesday, August 13, 2014

अखबार पढ़ने के अहसास-हिन्दी कविता(akhbar padhne ke ahasas-hindi poem)



जिस दिन अखबार नहीं आता
होता है खुशनुमा अहसास
कोई बुरी खबर शायद नहीं बनी है।

बहस करते शब्द नहीं होते सामने
अच्छा लगता है सोचकर कि
अक्लमंदों में कहीं भी नहीं ठनी है।

डरावने चित्र आंखों से परे होते
तब होती है दिल को तसल्ली
कहीं फैली नहीं सनसनी है।

कहें दीपक बापू इंद्रियों का मौन
रखने के लिये
शायद इसलिये कहा जाता है
वरना स्मृतियों में तो
बस दर्द ही सहा जाता है,
लौटते हैं जब खबर
पढ़ने के विराम से
टूटी खबरें कराती अहसास
ज़माने में कहीं नहीं शांति
सभी जगह तनातनी है।
------------

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
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Friday, July 18, 2014

हार्दिक हमदर्दी नहीं आयेगी-हिन्दी कविता(hardik hamdardi nahin ayegi-hindi poem)



आज कार खरीदी है
कुछ समय तक तेल पीयेगी
फिर पुरानी लगेगी
तब कोई नयी आयेगी।

आज टीवी खरीदा है
कुछ समय तक आंखों में
दिखेंगे रंगीन दृश्य
एक दिन उसकी भी
तस्वीर धुधली हो जायेगी।

आज मोबाइल खरीदा है
 कानों से चिपका रहेगा
लोग करेंगे दूर से बात
उनके पास न होने की कमी सतायेगी,

कहें दीपक बापू सामानोें के बाज़ार में
खो गया हर इंसान
हृदय में नहीं बची संवेदना
किसी  गम हल्का करने  के लिये
बाहर से हार्दिक हमदर्दी नहीं आयेगी
-----------

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Tuesday, July 08, 2014

कचड़ा और सफाई-हिन्दी व्यंग्य कविता(kachada aur safai-hindi satire poem's)



जमीन पर चलते हुए लोग
आकाश की तरफ देखकर सोचते हैं
घर की छत पर सितारे सजाने का देखते सपना,
साफ न नीयत है न आंगन
मनोरंजन के गुलाम हो चुके सभी
क्या प्यार करेंगे कुदरत के तोहफे से
पल पल में बदलते ख्याल अपना।
कहें दीपक बापू अपने हाथ से कचड़ा फैलाकर
दूसरे पर डालते सफाई की जिम्मेदारी,
बीमार आदतों के मालिक
क्या करेंगे बदतर हालत के शिकार की तीमारदारी,
चलते फिरते सभी पर टांगों को तमीज नहीं,
सफेदपोश काले कारनामों से करते नहीं परहेज
फिक्र उनको भी है कि मैली न हो जाये कमीज कहीं,
अपने मतलब में मस्त है जमाना
लालच के अलावा कोई नहीं किसी का अपना।
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Monday, June 30, 2014

तमाशाबीनों की भीड़ में-हिन्दी व्यंग्य कविता(tamasshabinon ki bhid mein-hindi vyangya kavita)




तमाशा करने वाले इस जहान में हो जाते हैं मशहूर,
तमाशाबीनों की भीड़ लगती अक्लमंद हो जाते दूर।
कभी चेहरे बदलते कभी तमाशा करने का बदलता ढंग,
सच्चाई बनी रहती अपनी जगह ऊपर से  बदलता रंग,
अपनी बुरी हालात सुनाओ हमदर्द भी बहुत मिल जाते हैं,
मगर उनकी रस्म अदायगी के शब्दों से कान हिल जाते हैं,
कोई अक्ल का हुनरमंद गरीब के लिये डुगडुगी बजा रहा है
कोई बीमार के लिये कागजों पर दवा सजा रहा है,
कोई ज़माने को तरक्की का सपना दिखाता है,
कोई नई जिंदगी के तरीके से सिखाता है,
कहें दीपक बापू बातों के शेर हो जाते काम में ढेर
पर्दे के तमाशों पर बेकार है खर्च करना अपने नूर।
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Thursday, June 19, 2014

कब तक हिन्दी विरोध करेंगे-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(kab tak hindi virodh karenge-hindi satire poem)



हिन्दी भाषा का विरोध वह हमेशा जमकर करेंगे,
अंग्रेजी की गुलामी करते हुए सीना चौड़ा करेंगे।
कहें दीपक बापू रस्सी जलती पर ऐंठन नहीं जाती
कब तक ऐसे लोग राष्ट्रभाषा से पूरी ताकत से लड़ेंगे।
-------------------
अंग्रेजी में अपने कारनामों का वह काला रंग भरते हैं,
हिन्दी भाषा में उनका सच न आये इसलिये वह डरते हैं।
कहें दीपक बापू देश पर अंग्रेजी के वकालत करने वाले बहुत
अपने पाखंड पर हिन्दी में अभद्र शब्दों के प्रहार से कंपते हैं।
-----------
वह हिन्दी से मूंह चुराकर अंग्रेजी के साथ डोलेंगे,
पेट भरे अंग्रेजी से उनके इसलिये हिन्दी में जुबान नहीं खोलेंगे।
कहें दीपक बापू अंग्रेजी में सीना तना रहा जिनका
उतर जायेगा जब अहंकार हिन्दी में ही रोते हुए बोलेंगे।
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Sunday, June 08, 2014

अंतर्जाल पर स्वांत सुखाय लिख लिया समझ लो अच्छा दिन है-हिन्दी लेख(interne par swant sukhay likh liya samajh lo achchha din hai-hindi lekh)




          देश में राजनीतिक परिवर्तन के साथ ही इस बात पर भी बहस एक टीवी चैनल पर चली कि क्या हिन्दी के भी अच्छे दिन आने वाले हैं? दरअसल इस बहस का आधार यह था कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार के एक बहुत समर्थक  भी हैं।  वह भविष्य में  विदेशी नेताओं से हिन्दी में बात करेंगे।  इसे लेकर हिन्दी के कुछ विद्वान उत्साहित हैं।  उनका मानना है कि जिस तरह देश के आर्थिक विकास की लहर पूरे देश के अच्छे दिन आने के नारे को बहाकर लायी है उसी तरह हिन्दी भी अब अंतराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानजनक स्थान प्राप्त करेगी।  हमारा मानना है कि हिन्दी भाषा अंततः भविष्य में वैश्विक भाषा बनेगी पर इसके लिये भारत के सामान्य जनमानस में यह विश्वास जगाना आवश्यक है कि भविष्य में उसका काम बिना हिन्दी के चलने वाला नहीं है।
         इसमें कोई संदेह नहीं है कि नये प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रभाव से ओतप्रोत हैं पर यह भी सच है कि देश में आर्थिक विकास करने के साथ ही संास्कृतिक उत्थान बिना सामान्य जन के बिना  संभव नहीं है।  हम यहां केवल हिन्दी भाषा की चर्चा कर रहे हैं इसलिये यह कहने में संकोच नहीं है कि इस संबंध में आम भारतीय का रवैया भी वही है जो उसका अपने जीवन को लेकर है।  जिस तरह वह यह आशा करता है कि उसके जीवन का उद्धार कोई अवतारी पुरुष करेगा वही हिन्दी के संबंध में भी उसकी धारणा है।  हर सभ्रांत व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चे को अंग्रेजी में महारथ हासिल करना चाहिये और हिन्दी का सम्मान दूसरे लोग करें।  स्थिति यह है कि अनेक कलाकारों, विद्वानों, तथा लेखकों का जीवन हिन्दी भाषा के दम पर चल रहा है पर वह अपनी बात कहने के लिये अंग्रेजी का सहारा लेते हैं।  सबसे बड़ी बात यह है कि सभ्रांत वर्ग जो कि भाषा, संस्कृति, संस्कार तथा ज्ञान की रक्षा में सबसे ज्यादा योगदान देता है उसमें आत्मविश्वास का अभाव है। उसे नहीं लगता कि हिन्दी के सहारे आर्थिक विकास किया जा सकता है। उसका दूसरा संकट यह भी है कि वह पूरी तरह से अंग्रेंजी का आत्मसात भी नहीं कर पाया है। हमने अनेक कलाकारों, विद्वानों, तथा लेखकों को हिन्दी की खाते और अंग्रेजी की बजाते देखा है पर यह पता ही नहीं लग पाता कि वह अंग्रेजी में ही सोचते हैं या हिन्दी में सोचकर अंग्रेजी में बोलते हैं।  हिन्दी विद्वानों में भी भारी अंतर्द्वंद्व है। वह हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने के लिये उसमें जमकर अंग्रेजी शब्द ठूंसने की बात करता है। परिणाम यह हो रहा है कि एक हिंग्लििश भाषा का निर्माण हो रहा है जो भविष्य में किसी काम की नहीं है। भाषा की रक्षा साहित्य से होती है और हिंग्लिश वाले किसी साहित्य रचना योग्य नहीं लगते।  जिनकी हिन्दी लेखन में रुचि है वह अपनी भाषा में शब्दों का प्रयोग सावधानी से करते हैं।
     बाज़ार हिन्दी भाषियों को उपभोक्ता से अधिक स्तर प्रदान नहीं करता।  अंतर्जाल पर भी यही हाल है। अंग्रेजी पर टीका टिप्पणी करने वालों को प्रचार माध्यम महत्व देते हैं।  किसी के हिन्दी वाक्य अगर प्रचारित होते हैं तो वह कोई बड़ा धनी, पदवान या कलाकार होता है।  सामान्य लोगों को अपने फेसबुक या ट्विटर पर आने वालों को यह प्रचार माध्यम दिखाते हैं पर किसी खास विषय पर लिखे गये किसी ब्लॉग या फेसबुक के ऐसे पाठ की चर्चा कभी नहीं देखी गयी जो किसी सामान्य लेखक ने लिखा हो।
     हिन्दी के अच्छे दिन आयेंगे या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता पर हिन्दी में लेखन करने वालों को यह कदापि आशा नहीं करना चाहिये कि उन्हें कोई सम्मान या पुरस्कार  चमचागिरी या संगठित ठेकेदारों की चरणवंदना किये बिना मिल जायेगा। हिन्दी लेखन तो स्वांत सुखाय ही हो सकता है।  अगर आप लेखक हैं तो अपनी कोई रचना लिख लें तो समझिये वही अच्छा दिन है। पिछले सात वर्षों से अंतर्जाल पर लिखते हुए हमने यही अनुभव किया है।

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Wednesday, May 28, 2014

सपने और सच का खेल-हिन्दी क्षणिकायें(sapne aur sach ka khel-three short poem's)



नींद में देखे सपने जागते ही हवा हो जाते हैं,
कभी आंखों से देखे सच भी जल्द सपना हो जाते हैं।
कहें दीपक बापू मिलते हैं रोज लोग इस जिंदगी में
उनके बिछड़ते ही  हम फिर अकेले हो जाते हैं।
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कुछ वादे उन्होंने कुछ हमने किये फिर अलग हो गये,
जिंदगी  के सफर में कई चेहरे मिले और खो गये।
कहें दीपक कौनसे दृश्य यादगार में संजोते
हम तो चलते चलते दिल से ही यायावर हो गये।
----------
किसी के लिये आंसू बहायें तो लोग हंसते हैं,
दिल में रखें बात तो गम के जाल में फंसते हैं।
कहें दीपक बापू वक्त के साथ मुलाकात बन जाती यादं
ज्यादा सोचें उनके बारे में ख्यालों के गड्ढे में धंसते हैं।
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Monday, May 12, 2014

लोकसभा चुनाव २०१४ के परिणामों की प्रतीक्षा-हिंदी लेख(wait for result of loksabha election 2014-hindi article



      इस लेखक को 17 अप्रेल 2014 को लोकसभा चुनाव में भिंड क्षेत्र में सूक्ष्म प्रेक्षक के रूप में कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। आमतौर से शहर में रहते हुए अखबार पढ़ने तथा टीवी पर समाचार देखते हुए अनेक प्रकार के विचारों का क्रम चलता है पर जब चुनाव में काम करने का अवसर आता है तो सारी चौकड़ी हवा हो जाती है।  कहते हैं कि चुनाव अधिकारी को निष्पक्ष होना चाहिये। हमने अनुभव किया है कि वहां निष्पक्ष तो हर अधिकारी स्वतः ही हो जाता है क्योंकि वह पूरा समय इस बात का प्रयास करता है कि चुनाव शांतिपूर्ण हो जायें-इसलिये वह न केवल निष्पक्ष दिखता है बल्कि होता भी है।
      12 मई को नौवें दौर का चुनाव समाप्त हो गया।  अब तो परिणामों की प्रतीक्षा है।  हमारे अंदर चुनाव के दौरान तो कोई हलचल नहीं थी पर परिणामों की एक महीने की प्रतीक्षा ने उदासीनता अवश्य ला दी थी। अब अंतिम दौर समाप्त होने पर  टीवी चैनलों पर चुनाव विश्लेषण आ रहे हैं पर इनकी विश्वसीयता पर इनसे जुड़े लोग ही उठा रहे हैं।  अनेक एजेसियों ने चुनाव परिणामों के संकेत प्रचारित किये हैं पर सबसे ज्यादा सट्टेबाजों के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। क्रिकेट के बाद अब चुनाव के विषय पर उनकी सक्रियता अनेक प्रकार के प्रश्न खड़े कर रही है।  बहरहाल प्रचार माध्यम सट्टेबाजों के आंकड़े भी उपयोग कर रहे हैं यह बात असहजता पैदा करने वाली है।
      चार दिनों के इस इंतजार में टीवी चैनल अपने विज्ञापनों के बीच तमाम तरह के समाचार प्रसारित करने के साथ ही  उन पर बहसें करेंगे।  देखा जाये तो चुनाव के लंबे दौर ने टीवी चैनलों के लिये विज्ञापन प्रसारित करने का ऐसा अवसर प्रदान किया कि वह आईपीएल पर कम ही ध्यान दे सके। इन चैनलों ने इस दौरान विवादास्पद बयानों का प्रसारण तथा उन पर चर्चा कर अपने विज्ञापनों का समय जमकर  पास किया।  महत्वपूर्ण बात यह कि इसमें शामिल विद्वान कहते थे कि देश के मुद्दों पर चर्चा नहीं हो रही है पर सवाल यह है कि जिन नेताओं ने मुद्दों पर बयान दिये उसे अखबार तथा टीवी वालों ने महत्व भी कहां दिया? वह तो सनसनी और विवादों के बीच अपनी कमाई का रास्ता ढूंढते रहे।
      एक बात तय रही कि इस बार के चुनाव परिणाम कैसे भी रहें, उनसे  इस  बार  के प्रचार माध्यमोें का लोगों पर जो उनके प्रसारणों का होता है उसका अध्ययन सामाजिकं विशेषज्ञों  को अध्ययन अवश्य करना चाहिये। यह प्रचार माध्यम किस तरह मतदाओं के सामने  नायक और खलनायक गढ़कर उस पर प्रभाव डालते  हैं इस बार के चुनाव परिणामों में इसकी झलक देखने का प्रयास होना चाहिये। 16 मई को चुनाव परिणाम आने वाले हैं। हमें उनके राजनीति के सामाजिक प्रभावों का अध्ययन भी करना चाहिये।  इस बात मतदान पहले की अपेक्षा अधिक हुआ है और यकीनन इसमें आधुनिक संचार माध्यमों के प्रचार का भी योगदान है ऐसे में यह सोच अवश्य पैदा होती है कि यह प्रचार माध्यम किसी का खेल बनाने और बिगाड़ने में बहुत सक्षम है। कहने का आशय यह है कि लोकसभा चुनाव 2014 के परिणाम जहां पांच साल के लिये भारत के शासक का निर्णय करेंगे वरन् उनसे यह भी निष्कर्ष ढूंढने का प्रयास होना चाहिये कि  प्रचार माध्यम किस हद तक समाज को प्रभावित कर सकते हैं।

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Tuesday, May 06, 2014

वफादारी का मोल-हिन्दी कवितायें(vafadari ka mol-hindi kavitaen)



हमारे मुख से निकले शब्दों का भाव सिक्कों में वह तोलते रहे,
उलझन में थे मतलब समझे नहीं, अर्थ में उदासीनता घोलते रहे।
दुनियां मे मोहब्बत के सौदागर वफा  के मायने नहीं जानते,
शूल की तरह चुभाते अपनी बात, खफा होगा कोई नहीं मानते,
अपने मतलब के लिये गैर भी सगे बनकर साथ आये,
काम बनते ही अपनी नज़रें फेरने में थोड़ा भी  नहीं शर्माये,
कहें दीपक बापू न हमने उम्मीद की न कुछ मांगा किसी से
हंसी आती है उन पर जो हमें छोडकर अपनी असलियत खोलते रहे।
-------------
यकीन नहीं था उनका हम पर
हम भी कोई भरोसा उन पर नहीं टिकाते थे,
सबसे ज्यादा धोखा दिया उन्होंने
साथ निभाने के जो तरीके सिखाते थे।
कहें दीपक बापू सभी लोग तोलकर बात नहीं करते हैं,
रिश्तों में सिक्कों के मोल का भाव भरते हैं,
भटकते देखा है हमने ऐसे लोगों को भी
जो दूसरों को जिंदगी के रास्ते दिखाते थे।
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Tuesday, April 22, 2014

पेशेवर बुद्धिमानों की मजबूरी-हिन्दी हास्य कविता(peshewar buddhimanon ki mazboori-hindi comedy poem)



आया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू बड़े बड़े लफ्फाज
प्रचार पाकर मशहूर हो गये,
एक तुम हो जो ज्ञान होते हुए भी
लोगों की नज़रों से दूर हो गये,
कोई ऐसी कविता लिखो जिससे
ज़माने में तहलका मच जाये,
तुम्हारी वाह वाह करने से कोई न बच पाये,
नित लिखो शब्द नये।
सुनकर पहले चौंके फिर
हंसते हुए बोले दीपक बापू
‘‘लोगों को प्रभावित करने के लिये
ज्ञान हो या न हो विज्ञापन देना जरूरी है,
पहले कुछ खर्च करो
फिर लोगों से निकलवाओं पैसा
इस चालाकी पर चलना पेशेवर बुद्धिमानों की  मजबूरी है,
ज्ञान हो तो उस पर चलें या नहीं
बघार कर तालियां लोगों से बजवा सकते हैं,
चिंत्तन कोई नहीं पढ़ता
चुटकुलों को लोग तकते हैं,
लेखक बहुत हैं पर हिन्दी साहित्य में
लेखन के अकाल पर लोग रोते हैं,
गरीब के सुंदर शब्द लिखने पर भी लोग बोर होते हैं,
अमीर और उच्च पदस्थ चाहे जैसा भी लिखे
कूड़े भी हो तो बोझ  सिर पर सभी ढोते हैं,
लिखने को हम लिख लेते हैं
प्रसिद्धि का प्रबंध करना नहीं आता,
शब्दों मे झौंक देते पूरी ताकत
दंदफंद करना नहीं भाता,
पहले प्रसिद्ध होने की चाहत होती थी,
तब उपेक्षा पर हमारी भावना रोती थी,
अंतर्जाल पर आने पर पता लगा
टूटा बिखरा समाज है,
देखता दूसरे का दोष
छिपाता अपने राज है,
खौफ में जी रहे हैं बड़े बड़े लोग,
कुछ खो जाने का डर बन गया
उनका स्थाई रोग,
स्वांत सुखाय लिखने में अलग मजा है
दूसरों के विषय हम उठा कर लिखें
वह दिन अब गये,
मशहूरी के बोझ तले रचनाधर्मिता के दबने का रहता खतरा
नहीं मिली वाह वाह कोई बात नहीं
अपने लिये बने रहते हैं हम सदा नये।
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