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Monday, January 16, 2017

विशेष हिन्दी क्षणिकायें तथा हास्य कवितायें (Special Hindi Short poem And comedy)

जमाना बजा रहा ताली
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बाज़ार में सपने बिकते देखे।
खरीददार घुटने टेकते देखे।।
आत्मसम्मान मिट्टी में मिला
आजाद भेष में गुलाम देखे।।
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लालच के बने गुलाम-हिन्दी कविता
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देसी लोग
लिखपढ़कर विदेसी जैसे  हो जाते हैं।

अपनी ज़मीन नहीं दिखती
विदेशी सोच में खो जाते है।

देखा नहीं लंदन
लगा रहे  अंग्रेजी का चंदन
समझी नहीं गीता
गड़बड़ चिंत्तन से
अज्ञान का वाङ्मय ढो जाते हैं।

उठाते प्रश्न शोर मचाकर
फिर सो जाते हैं।

कहें दीपकबापू विचार के खजाने
खाली कर चुके अक्लमंद
हर हादसे पर
हमदर्दी में बस रो जाते हैं।
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हमसे वह बहुत बड़े हैं
हम ढूंढ रहे सफेद धन
बाहर लगी कतार में
करचारों के घर
लूटे बंडल पड़े हैं।
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Wednesday, July 20, 2016

दिल बेकरार है-हिन्दी कविता (Dil Bekarar hai-Hindi Poem)

पहाड़ पर बर्फ
गिरती देखने के लिये
दिल बेकरार है।

समंदर में लहरें
उठती देखने के लिये
दिल बेकरार है।


कहें दीपकबापू जिंदगी में
 हर किस्म के बंदे
चाहे अनचाहे मिलते हैं
मतलब निकलने के लिये
हमेशा सभी का
दिल बेकरार है।
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Saturday, July 09, 2016

नयी चाहत-हिन्दी कविता (Nayi Chahat-HindiPoem)

जीवन पथ पर
सहयात्री की खोज
आंखे करती हैं।

बहुत नरमुंड मिलते
उनकी इच्छायें ही साथी
हमेशा आहें भरती हैं।

कहें दीपकबापू याद में
किसे बसाकर
अपना दिल बहलाते
हृदय की भावनायें
नयी चाहत पर मरती है।
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Saturday, June 18, 2016

कांचघर के निवासी-हिन्दी कविता (Men Of GlassHouse-Hindi Poem)


देवता बनने की के प्रयास में
इंसान बड़े अपराध भी
कर जाते हैं।

भय के प्रसाद बांटकर
पुण्य के सागर में
तर जाते हैं।

कहें दीपकबापू नये जमाने में
पहरेदारों के आसरे
कांचघर के निवासी
राहगीरों पर फैंकते पत्थर
घायल मौन पीड़ा लेकर
घर जाते हैं।
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