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Monday, January 16, 2017
विशेष हिन्दी क्षणिकायें तथा हास्य कवितायें (Special Hindi Short poem And comedy)
Sunday, September 25, 2016
ऐ दिल तुझे समझाना मुश्किल है-दीपकबापूवाणी (A Dil tujhe samjahan mushkil hai-DeepakBapuWani)
Wednesday, July 20, 2016
दिल बेकरार है-हिन्दी कविता (Dil Bekarar hai-Hindi Poem)
Saturday, June 18, 2016
कांचघर के निवासी-हिन्दी कविता (Men Of GlassHouse-Hindi Poem)
देवता बनने की के प्रयास में
इंसान बड़े अपराध भी
कर जाते हैं।
भय के प्रसाद बांटकर
पुण्य के सागर में
तर जाते हैं।
कहें दीपकबापू नये जमाने में
पहरेदारों के आसरे
कांचघर के निवासी
राहगीरों पर फैंकते पत्थर
घायल मौन पीड़ा लेकर
घर जाते हैं।
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Sunday, February 26, 2012
इंसान और साँप-हिन्दी कविता (insan aur saanp-hindi kavita ,snack and men-hindi poem)
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Thursday, March 25, 2010
ख्यालों के खेल में-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (khyalon ke khel men-hindi satire poem)
दूसरों को कामयाबी का
पाठ पढ़ा रहे हैं।
सभी को देते सलीके से काम करने की सलाह,
हर कोई कर रहा है वाह वाह,
इसलिये कागज पर दिखता है विकास,
पर अक्ल का हो गया विनाश,
एक दूसरे का मुंह ताक रहे सभी
काम करने के लिये
जो करने निकले कोई
उसकी टांग में टांग अड़ा रहे हैं।
ऐसे कर
वैसे कर
सभी समझा रहे हैं।
--------
अपने अपने मसलों पर
चर्चा के लिये उन्होंने बैठक बुलाई,
सभी ने अपनी अपनी कथा सुनाई।
निर्णय लेने पर हुआ झगड़ा
पर तब सुलह हो गयी,
जब नाश्ते पर आने के लिये
आयोजक ने अपनी घोषणा सुनाई।
---------
तंग सोच के लोग
करते हैं नये जमाने की बात,
बाहर बहती हवाओं को
अपने घर के अंदर आने से रोकते,
नये ख्यालों पर बेबात टोकते,
ख्यालों के खेल में
कर रहे केवल एक दूसरे की शह और मात।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Monday, March 01, 2010
चरित्र की कालिख-होली पर हिन्दी लघुकथा तथा हंसिकायें (chartra par kalikh-hindi short story and comic poem on happy holi)
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(1)
वह पानी बचाने के लिये
सूखी होली मना रहे थे,
दरअसल पानी से मनाते तो
उनके कुओं की पोल खुल जाती
जो केवल कागजों पर खुदवा रहे थे।
(2)
लोग पहुंचे उनके घर पर
तो पहले ही वह अपना मुंह काला किये बैठे थे
सेवक ने पूछा तो बोले
‘कोई दूसरा मुंह काला कर हंसे
इसलिये हमने पहले ही कर लिया है,
दुश्मनों ने लगा दिया है
चरित्र पर दाग
दोस्त रंग लगाकर ताना कसें
इसलिये अपने चेहरे पर
काला रंग कर लिया है।
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Monday, February 15, 2010
सच बोलने पर इनाम नहीं होता-हिन्दी व्यंग्य शायरी (sach bolen par inam-hindi vyangya shayri)
पर सच बोलने पर कोई इनाम नहीं होता।
कितना भी हो जाये कोई अमीर,
पीछा नहीं छोड़ता उसका जमीर,
कैसे दे सकते हैं इनाम, उस शख्स को
बोलता है हमेशा सच जो,
खड़ी है दौलत की इमारत उनकी झूठ पर
चाटुकारों को लेते हैं, अपनी बाहों में भर
क्योंकि सच बोलने वालो से उनका काम नहीं होता।
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Friday, February 12, 2010
वैलेंटाईन डे आ रहा है-हिन्दी हास्य कविता (velantineday-hindi comic poem)
और बहुत दिन से न मिलने का दिया ताना
तब वह बोला
‘गुरुजी क्या बताऊं
खबरों की दुनियां हो गयी है जंग का मैदान
पिछ़ड जाओ एक दिन तो
मिट्टी में मिल जाती है
बरसों से कमाई अपनी शान,
पहले क्रिकेट में जीत पर लिखना था,
क्योंकि देशभक्त दिखना था,
फिर आ गया एक फिल्म का विवाद,
अभिव्यक्ति का समर्थक दिखना था निर्विवाद
अब वह भी निपट गया है
इसलिये अब कल मिलने आऊंगा
आपका ख्याल अब आ रहा है।’
गुरुजी बोले
‘ठीक है,
फिर एक सप्ताह बाद आना
अभी तुम्हें प्रेम दिवस पर लिखना है,
इंसानों जैसा दिखना है,
क्योंकि उस पर खड़ा होगा विवाद,
तुम्हें आजादी का पक्षधर दिखना है निर्विवाद,
दो दिन में वैलंटाईन डे आ रहा है।’
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Saturday, February 06, 2010
बखान-हास्य कविता (bakhan-hasya kavita)
समाज सेवक से कहा
‘आ गया है जमकर चंदा
चलेगा अपना जोरदार धंधा
अपने हिस्से का सही अंदाज बतायें
तो शुरु करें अब गरीबों के नाम पर कल्यान।’
समाज सेवक पहले चौंके
फिर बोले-
‘अरे, क्या कहते हो,
भला, क्यों जज़्बात में बहते हो,
अभी तक नब्बे फीसदी था
अब सौ फीसदी कर लो,
अपने ही खातों में भर लो,
कागजी खाना पूरी करना,
प्रचार के लिये कुछ रकम भरना,
फिर शुरु करो अपने काम का बखान।
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Tuesday, February 02, 2010
सौदागर और ढिंढोरची-हिन्दी व्यंग्य कविता (market and media-hindi comic poem)
चिल्लाते जूता लहरायेंगे,
चार लोग नाचते हुए
शांति के लिये सफेद झंडा फहरायेंगे।
चार लोग आकर दर्द के
चार लोग खुशी के गीत गायेंगे।
कुछ लोगों को मिलता है
भीड़ को भेड़ों की तरह चराने की ठेका
वह इंसानो को भ्रम के दरिया में बहायेंगे।
सोच सकते हैं जो अपना,
दर्द में भी नहीं देखते
उधार की दवा का सपना,
सौदागरों और ढिंढोरची के रिश्तों का
सच जो जानते हैं
वही किनारे खड़े रह पायेंगे।
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Sunday, January 24, 2010
दहेज का मामला-हिन्दी व्यंग्य कविता
‘पापा, मेरी शादी में आप दहेज की
मांग नहीं करना
यह बुरा माना जाता है
देश के समाज की हालत सुधारने का
श्रेय भी मिल जायेगा
हम पर कभी ‘दहेज एक्ट’ भी
नहीं लग पायेगा
उससे बचने का यही उपाय मुझे नजर आता है।’
वकील पिता ने कहा
‘बेटा, कैसी शिक्षा तुमने पायी
कानून की बात तुम्हारी समझ नहीं आयी।
‘दहेज एक्ट’ का दहेज से कोई संबंध नहीं
लेना और देना दोनों अपराध हैं
पर देने वाला बच जाता है
दहेज न लिया न लिया हो लड़के वालों
फिर भी लड़की का बाप लगाता है।
कानून से नहीं शर्माता है।
अगर दहेज एक्ट का डर होता तो
समाज में रोज इसकी रकम न बढ़ जाती,
नई चीजें शादी के मंडप में नहीं सज पाती,
तुम सभी देखते रहो
कानून की विषय है पेचीदा
हर किसी की समझ में नहीं आता है।’
नोट-यह कविता काल्पनिक है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
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Monday, January 18, 2010
इंसान की बुनियाद-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (insan ki buniyad-hindi vyangya kavitaen)
सड़कों को सिकुड़ते देखा,
इंसानों की जिंदगी में
बढ़ते हुए दर्द के साथ
हमदर्दी को कम होते देखा।
.......................
आसमान छूने की चाहत में
कई लोगों को जमीन पर
औंधे मुंह गिरते देखा,
बार बार खाया धोखा
फिर भी हर नये ठग की
चालों में उनको घिरते देखा।
..........................
हिन्दी में पैदा हुए
अंग्रेजी के बने दीवाने
पढ़े लिखे लोगों की
जुबां को लड़खड़ाते देखा।
भाषा और संस्कार
इंसान की बुनियाद होती है
मगर अपने अंदर बनाने की बजाय
लोगों को बाजार से खरीदते देखा
...........................
ख्वाहिशें पूरी करने के लिये
आंखों से ताक रहे हैं,
बोलते ज्यादा, सुनते कम
लोग सोच से भाग रहे हैं
समझदार को भी
चिल्लाते हुए देखा।
सभ्य शब्द का उच्चारण
बन गया है कायरता का प्रमाण
बहादुरी दिखाने के लिये
लोगों को गाली लिखते देखा।
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Tuesday, December 29, 2009
साहबी संस्कृति-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (boss culture-hindi satire poem)
वह रोज फूल जाते हैं।
मगर उनके ऊपर भी साहब हैं
जिनकी झिड़की पर वह झूल जाते हैं।
--------------------
सभी के सिर पर चढ़ा है।
कामयाबी का खिताब
नीचे से ऊपर जाता साहब की तरफ
नाकामी की लानत का आरोप
ऊपर से उतरकर नीचे खड़ा है,
भले ही सभी जगह साहब हैं
बच जाये दंड से, वही बड़ा है
--------
साहबी संस्कृति में डूबे लोग
आम आदमी का दर्द कब समझेंगे।
जब छोटे साहब से बड़े बनने की सीढ़ी
जिंदगी में पूरी तरह चढ़ लेंगे।
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Wednesday, December 23, 2009
गद्दार कदम-हिन्दी साहित्य कविता (gaddar kadam-hindi sahitya kavita)
तब नहीं छाये होते पूरे जमाने के दिल में गम।
अब जज़्बातों के सौदागर सपने बेच रहे हैं
बाजार में लोगों के दर्द पर, करके अपनी आंखें नम।
अपने नाम के पैसों खाता देखकर, खुश हो रहे अमीर
बढ़ते आंकड़ों में देख रहे जिंदगी का पूरा दम।
वतन से प्यार के नाम पर कर रहे चमन से धोखा
कुचल रहे फूल सी वफा, माली के गद्दार कदम।
नहीं सोचते जब जमाना टूट कर बिखर जायेगा
उनके घरों की तरफ भी बढ़ेंगे, कातिलों के कदम।।
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Saturday, December 19, 2009
कमीशन की नीति-हिन्दी साहित्य कवितायें (policy of commision-hindi sahitya kavita)
इतने वर्षों से बहुत दान किया है
कि इस देश से पीढ़ियों तक
गरीबी मिट जाती।
अगर कमबख्त
यह कमीशन की रीति
दान बांटने वालों की नीति न बन जाती।
---------
नया बनाने के लिये
पुराना समाज टुकड़े टुकड़े
किये जा रहे हैं।
कुछ नया नहीं बन पा रहा है
इसलिये हर टुकड़े को समाज बता रहे हैं।
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Tuesday, December 08, 2009
आंसुओं का हिसाब-हिन्दी व्यंग्य कविता (ansuon ka hisab-hindi sahitya kavita)
शानदार इमारतों के नीचे
दबे पड़े हैं, बुनियाद में जो पत्थर
वह चमकदार नहीं होते।
अमीर इंसानों की दौलत के आंकड़े
खातों में लिखे होते
पर उसको बढ़ाने वाले मेहनतकशों के
पसीने की बूंदों के हिसाब नहीं होते।
रौशनी फैली है जहां तक
वहां तक पूरा जहां चमक रहा है
उसे देखने वालों को
अंधेरों के अहसास नहीं होते।
जितने लोग जमीन पर चलते हैं
आकाश में उतने परिंदे नहीं होते।
नजर और अहसास सभी के अलग हैं
कोई जुटा कर भी दौलत
खुशी के लिये भटकता है
जो मोहताज हैं
वह भी रुपयों के हिसाब में अटकता है
तमाशों में करते हैं
लोग अपनी दौलत बरबाद
पर नहीं कर सकते
किसी गरीब का घर आबाद
घूम रही है अमीरी जिनके चारो ओर
नहीं पाते चैन तब तक
जब तक गरीब के आंसु
गाल पर बहते नहीं होते।
-------
अभावों में जीते हैं जो लोग
उनके आंसुओं का हिसाब
कौन रखता है।
अमीर की तरफ ताक रहे हैं सभी
कब उसकी आंखों में दर्द दिखे
तो उसे हमदर्दी दिखायें
वही तो है जो
दर्द का रुपयों में हिसाब करता है।
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Friday, November 06, 2009
क्या नया रचेंगे-काव्य चिंतन (kya naya rachenge-kavya chintan)
एक कवि से एक आदमी ने कहा-‘यार, तुम कवितायें लिखना बंद कर दो।’
कवि ने कहा-‘एक शर्त पर कि तुम अपनी जिंदगी में कभी स्वयं दुःखी नहीं अनुभव करोगे।’
उस आदमी ने कहा-‘यह संभव नहीं है क्योंकि मैं अपने को कभी दुःखी अनुभव न करने का वादा नहीं कर सकता। वह तो मैं तब से अनुभव कर रहा हूं जब से पैदा होने के बाद होश संभाला है। अरे, इस संसार में कोई सुखी रह सकता है क्या? कैसे कवि हो? इतनी अक्ल भी नहीं है।’
कवि ने कहा-‘बस, यही बात है। जब तक जमाने में दर्द रहेगा कोई न कोई उस पर अपने अल्फाज कहेगा। सभी अगर अंदर ही अंदर रोयेंगे या बाहर केवल चीखेंगे तो फिर दर्द को अल्फाज कौन देगा? यही काम कवि का होता है।’
बहरहाल अब तो कवि ही नहीं दर्द कहते बल्कि गद्यकार भी दर्द का बयां करते हैं। तलवार, तीर या बंदूक की आवाज हो तो उसमें भी वह भूख और गरीबी का दर्द ढूंढा करते हैं। जो आदमी धन और अन्न से मजबूर होता है भला वह कहीं हथियार उठाता है? मगर साहब हमारे देश में इस विश्वास के साथ जीने वाले भी हैं पर उनको यह पता नहीं कि आखिर उन समस्याओं का क्या हल है? वह तो बस अपने दर्द के साथ ऐसा यकीन बयान करते हैं जिसको जमीन पर ढूंढना मुश्किल काम है।
बहरहाल प्रस्तुत हैं इस पर दो पद्य रचनाएं-
दायें चलें कि बायें
वह बताते नहीं।
चलने का नारा देते हैं
वाद सुनाते हैं ढेर सारे
मंजिल का पता खुद नहीं जानते
झंडे उठाये चलते हैं
राहों पर
जमाने का भला करने का
मकसद बताते हैं
अपनी अपनी कहते अघाते नहीं।।
-------------------
कहीं पूरब का बखान करेंगे
कहीं पश्चिम का गान करेंगे।
अपनी जमीन पर खड़ी फसलों को
जलाकर
नयी फसल करने का करते दावा
जमाने से करते छलावा
तलवार, तीर और बंदूक से
मचा रहे शोर
इस जहां में बने स्वर्ग को
जलाकर वह बना रहे नरक
भला क्या नया रचेंगे।
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Monday, November 02, 2009
कुदरत का खेल जुआ नहीं-व्यंग्य कविताएं (kudrat ka khel-hindi vyangya kavita)
दिन भर पूरे जमाने का
फिर भी दिल साफ हुआ नहीं।
इतने अल्फाज मुफ्त में खर्च किये
फिर भी चैन न मिला
दिल के गुब्बारों का बोझ कम हुआ नहीं।
इंसान समझता है
पर कुदरत का खेल कोई जुआ नहीं।
-----------------
उन्होंने चमन सजाने का वादा किया
नये फूलों से सजाने का
पता नहीं कब पूरा करेंगे।
अभी तो उजाड़ कर
बना दिया है कचड़े का ढेर
उसे भी हटाने का वादा
करते जा रहै हैं
पता नहीं कब पूरा करेंगे।
इंतजार तो रहेगा
उनके घर का पेट अभी खाली है
पहले उसे जरूर भरेंगे।
तभी शायद कुछ करेंगे।
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Tuesday, October 20, 2009
किसका हुआ कभी कोहिनूर-व्यंग्य कविता (kiska hua kohinoor-vyangya kavita)
पूरा घर का सामान बिखेर डाला
मिले पलंग के नीचे गिरे हुए
पहले तो खुशी मिली, फिर हुई काफूर।
बिखरी हुई शयों को समेटने के
ख्याल ने कर दिया बदन पहले ही चूर।
खोये पाये के हिसाब में
पूरी जिंदगी हो जाती है बेनूर।
सिक्के इतने जमा कर लिये संभाले नहीं जाते
गिनती में भूल जायें
तो देखते हैं उनको घूर।
सोचते कौन कम हुआ चश्मेबद्दूर।
खोये हुए सिक्के मिल गये
पर चले जायेंगे हाथ से
बनेंगे किसी दूसरे हाथ का नूर।
जिंदगी में गमों का सिलसिला भी आता है
खुशियां भी साथ चलती थोड़ी दूर।
अपना कितनों ने माना होगा
पर किसका हुआ कभी कोहिनूर।
.........................
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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आनंद उठाने का सबसे अच्छी तरीका यह है कि आप एकांत में जाकर ध्यान लगायें-चिंत्तन (Anand Uthane ka tareeka-Chinttan) - रोकड़ संकट बढ़ाओ ताकि मुद्रा का सम्मान भी बढ़ सके। --- हम वृंदावन में अनेक संत देखते हैं जो भल...8 years ago
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रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते-दीपक बापू कहिन (Rank ka naam jaapte bhi raja ban jate-DeepakBapuKahin) - *रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते, भलाई के दावे से ही मजे बन आते।* *‘दीपकबापू’ जाने राम करें सबका भला, ठगों के महल भी मुफ्त में तन जाते।।* *-----* *रुपये से...7 years ago
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जयश्रीराम का राजनीतिकरण कौन कर रहा है-हिन्दी संपादकीय - जब देश में रामजन्मभूमि आंदोलन चल रहा था तब ‘जयश्रीराम’ नारे का जिस तरह चुनावी राजनीतिकरण हुआ उसकी अनेक मिसाल...9 years ago