Wednesday, September 11, 2013

हिन्दी दिवस पर हास्य कविता-कार्यक्रमों की भीड़ में अकेली कविता(hindi satire poem on hindi day,hindi diwas par hasya kavita)



रास्ते में मिला फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू, आप बरसों से
हिन्दी में लिखते हो,
फिर भी फ्लाप दिखते हो,
अब हिन्दी दिवस आया है
कोई कार्यक्रम कर
अपनी पहचान बढ़ाओ,
लोग तुम्हें ऐसे ही पढ़ें
यह तुम भूल जाओ,
आजकल प्रचार का जमाना है,
हाथ पांव मारो अगर नाम कमाना है,
तुम भी करो स्थापित कवियों की चमचागिरी,
अपने से कमतर पर जमाओ नेतागिरी,
वरना लिखना छोड़ दो,
सन्यास से अपना नाता जोड़ लो।’’
सुनकर हंसे दीपक बापू
‘‘हिन्दी दिवस का प्रचार देखकर
तुम्हारा मन भी उछल रहा है,
अपने दोस्त को फ्लाप
दूसरों को हिट देखकर
तुम्हारा दिमाग जल रहा है,
लगता है तुमने ऐसे कार्यक्रमों
कभी गये नहीं हो,
इसलिये ऐसी सलाहें दे रहे हो
भले दोस्त नये नहीं हो,
हिन्दी दिवस पर लिखने के अलावा
हमें कुछ नहीं आता है,
ऐसे कार्यक्रमों में लेखन पर कम
नाश्ते और चाय के इंतजाम पर
ध्यान ज्यादा जाता है,
बाज़ार के इशारे पर नाचता है जमाना,
सौदागरों के रहम के बिना मुश्किल है कमाना,
अंग्रेजी के गुंलाम
हिन्दी से ही कमाते हैं,
यह अलग बात है कि
ज़माने से अलग दिखने के लिये
अंग्रेजी का रौब जमाते हैं,
सच यह है कि
हिन्दी कमाकर देने वाली भाषा है,
इसलिये भविष्य में भी विकास की आशा है,
चीजें बनायें अंग्रेजी जानने वाले
मगर बेचने के लिये हिन्दी में
पापड़ बेलना पड़ते हैं,
यह अलग बात है कि
हिन्दी लेखक होने पर
उपेक्षा के थपेड़े झेलना पड़ते हैं,
कार्यक्रमों की भीड़ में जाकर
हमारी लिखी रचना क्या करेगी,
अकेली आहें भरेगी,
इसलिये तुम्हारी सलाह नहीं मान सकते
भले ही तुम दोस्ती से मुंह मोड़ लो।


लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Thursday, September 05, 2013

जिंदगी में बेख़ौफ़ डटे हैं-हिंदी शायरी (zindagi mein bekhauf date hain-hindi shayri or poem)



सिर पर ताज सजे
यह ख्वाहिश कभी पाली नहीं
क्योंकि जिनके आगे सिर झुके हैं
उनके सिर कटे भी हैं,
रहने के लिये कोई राजमहल हो
इसका सपना कभी देखा नहीं
क्योंकि जिन्होंने ऐशो-ओ-आराम में
बितायी जिंदगी
उनके पांव जेलों में पहुंचकर फटे भी हैं।
कहें दीपक बापू
किसी ने सच कहा है
दाल रोटी खाओ
प्रभु के गुण गाओ
जिनकी चाल ने दिलाया उनको नाम,
चरित्र के लेकर हुए वही बदनाम,
पैसा, पद और प्रतिष्ठा कमाने के लिये लोग
पाखंड का रास्ता सरल मानते हैं,
अपने ही जाल में कभी फंसेंगे
यह कभी नहीं जानते हैं,
ख्वाब है सभी के आकाश में उड़ने के,
सपने हैं अपना नाम सितारों से जुड़ने के,
सभी के हिस्से में आकाश नहीं आता,
जिनके आया
गिरते हैं वह भी जमीन पर
एक दांत भी उनका सलामत  नहीं आता,
अपनी बात कहते रहें,
दर्द अपना यूं ही सहते रहें,
कोई न सुनता है न पहचानता है,
कम अक्लों से बहस करने से बचते हैं
क्योंकि कोई हमें शायर नहीं मानता है,
अपनी कही खुद ही सुनते हैं,
ऊंचाई पर चढ़ने के ख्वाब कभी नहंी बुनते हैं,
इसलिये जिंदगी की जंग में बेखौफ डटे हैं। 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
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Monday, August 12, 2013

जहन्नुम में जन्नत की तलाश-हिन्दी शायरी (jahannum mein zannat ki talash-hindi shayari)



दौलत की दौड़ में बदहवास है पूरा जमाना
या धोखा है हमारे नजरिये में
यह हमें भी पता नहीं है,
कभी लोगो की चाल पर
कभी अपने ख्याल पर
शक होता है
दुनियां चल रही अपने दस्तूर से दूर
सवाल उठाओ
जवाब में होता यही दावा
किसी की भी खता नहीं है।
कहें दीपक बापू
शैतान धरती के नीचे उगते हैं,
या आकाश से ज़मीन पर झुकते हैं,
सभी चेहरे सफेद दिखते हैं,
चमकते मुखौटे बाजार में बिकते हैं,
उंगली उठायें किसकी तरफ
सिलसिलेवार होते कसूर पर
इंसानियत की दलीलों से जहन्नुम में
जन्नत की तलाश करते लोगों की नज़र में
पहरेदार की तलाशी होना चाहिये पहले
कहीं अस्मत लुटी,
कहीं किस्मत की गर्दन घुटी,
लुटेरों की खता नही है।
--------------


लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
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Tuesday, July 23, 2013

जिंदगी का दर्शन-हिन्दी कविता (zindagi ka darshan-hindi kavita)



जिंदगी का यही दर्शन है
दोस्त अगर दगा नहीं करते
गद्दारी और वफादारी की
पहचान करन मुमकिन नहीं होता है,
जिनको बख्शा प्यार
वह चोट नहीं करते दिल पर
यकीन और धोखे की पहचान में
इंसान अपना दिमाग कभी नहीं खोता है।
कहें दीपक बापू
जुबां पर ताला लगा लें हम
ज़माना खामोशी पर चिल्लाता है,
नज़रअंदाज करें किसी की अदायें
वह आगे पीछे घूमकर दिखलाता है,
किसी की तारीफ करो
फिर भी वह खुश नहीं होता है,
सच हो किसी के सामने
                                                              वह झूठ बात कहकर रोता है।

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Thursday, July 04, 2013

समझदारी बन गयी बीमारी-हिन्दी कविता (samajhadar ban gayi bimari-hindi kavita)



 जिनको नहीं चलने का तरीका
दौड़ने में मजा वही बताते हैं,
कभी दिल का हाल जाना नहीं
इश्क के गीत वही गाते हैं।
कहें दीपक बापू
ज़माने की समझदारी,
बन गयी  है एक बीमारी,
खाने का सामान लेकर
पहुचंते उद्यानों में
जीभ के स्वाद में लोग डूबते,
पेट भरकर जल्दी ऊबते,
गंदगी छोड़कर चल देते अपने घर,
शीतल हवाओं में विष घोलते उसके दर,
सुख के लिये इधर उधर दौड़ते हुए
ऐसे लोग मरे जाते हैं,
दूसरों की आंखों और सांसों में
करते हैं दर्द पैदा
स्वयं भी तनावों से नहीं परे रह पाते हैं।
............................................

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Saturday, June 01, 2013

क्रिकेट में यह क्या हो रहा है-हास्य कविता (cricket mein yah kya ho raha hai-hindi hasya kavita



यह क्या हो रहा है-हास्य कविता
---------------------
पोते ने दादा से पूछा
‘‘दादाजी, यह टीवी पर बार बार क्रिकेट का
समाचार आता ह,ै
चलती बहस में कोई मुस्कराता
कोई आस्तीर ऊपर कर गुर्राता,
मगर न बल्ला दिख रहा है
न गेंद नजर आ रही है,
कहीं मैदान पर हरियाली भी
नहीं छा रही है,
बातें मेरी समझ में नहीं आ रही है,
इतना पता है कहीं स्पॉट फिक्ंिसग
कहीं सट्टे की लहर छा रही है,
आप ही समझाओ यह क्या हो रहा है?
दादा ने हंसते हुए कहा
‘‘बेटा,
तेरा आईपीएल का खत्म हो गया खेल,
टीवी से चिपका रहा तू हो गया फेल,
मगर क्रिकेट के धंधे वालों की हो गयी चांदी
तिजोरियां भर गयी उनकी रुपये और सोने से
सट्टे की आई जो आंधी,
अभी चैंपियन ट्राफी शुरु होने में समय बाकी है,
खाली समय में टीवी चैनलों के विज्ञापन का समय
पास होता रहे
यह बहसें उन्होंने इसलिये पर्दे पर टांकी है,
लोग भूल न जायें क्रिकेट को
इसलिये खाली समय में कर रहे फिक्स झगड़ा
इसमें ही मिक्स है इस्तीफों का भी रगड़ा,
अगर देखते रहना है क्रिकेट तो
बंद कर लो अक्ल के दरवाजे,
उसी पर आंख लगाओ जो पर्दे पर विराजे,
इसलिये मत पूछो यह क्या हो रहा है।


लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
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Sunday, May 12, 2013

मंदिरों का भारतीय समाज में महत्व समझना चाहिये-विशेष हिन्दी रविवारीय लेख (mandiron ka bhartiya samaj mein mahatva samjhana chahiye-vishesh hindi ravivariy lekh.special hindi article on importance hindu temple)



         भारत में रविवार का दिन अब आधुनिक समाज के अनेक लोगों के लिये अध्यात्म का दिन हो गया है। हालांकि भारत में  हर दिन ही अध्यात्म का दिन है। सोमवार शिवजी, मंगलवार जी, बुधवार गणेश जी, गुरुवार सांईबाबा, शुक्रवार माता और शनिवार नवग्रहों का दिन माना जाता है।  वैसे सांईबाबा के भक्तों ने गुरुवार का दिन शायद इसलिये चुना क्योंकि इस दिन भगवान के किसी खास स्वरूप की पूजा या स्मरण नहीं किया जाता वरन् बृहस्पति अपने आप में ही भगवत्स्वरूप माने जाते हैं। इस दिन कुछ लोग मांस मदिरा लेना ठीक नहीं मानते।   बृहज्ञनति  बुद्धि के देवता हैं और गुरुवार का दिन वैसे ही भारतीय जनमानस पवित्र मानता है।  आधुनिक समय में सांईबाबा को कथित रूप से सभी धर्मों के लिये पूज्यनीय प्रचारित कैसे और क्यों किया गया, यह अलग से बहस का विषय है।
          सांईबाबा के नाम पर भारत के अनेक क्षेत्रों में मंदिर बन गये हैं। जिनको बचपन से ही किसी आराध्य देव मानने का ज्ञान नहीं मिला वह अंततः मन के खालीपन को भरने के लिये संाई के चमत्कारी स्वरूप की तरफ आकर्षित हो ही जाता है। सांईबाबा के  सभी धर्मों के लिये पूज्यनीय इसलिये भी प्रचारित जाता है क्योंकि उनके साथ चमत्कार जुड़े हैं और किसी भी धर्म का आदमी हो वह अपने जीवन में ऐसा होता देखना चाहता है जो वह स्वयं नहंी कर सकता। शिर्डी के सांईबाबा के मंदिर में करोड़ों का चढ़ावा आता है।  इससे एक बात तो प्रमाणित होती है कि चमत्कारों के नाम पर आज भी लोगों का आकर्षित किया जा सकता है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक सांई बाबा के भक्त हिन्दू धर्म के देवी देवताओं की पूजा को अंधविश्वास जरूर बताते हैं पर सच यह है कि सबसे ज्यादा अब अधंविश्वास सांई बाबा के मंदिरों पर ही दिखने लगा है।  लोग अपने नये वाहन लाकर सांईबाबा के मंदिर के बाहर  खड़ा उसकी पूजा करवाते हैं। ऐसा किसी दूसरे मंदिर पर देखने को नहीं मिलता।  सांईाबाबा की प्रसिद्धि के पीछे  बाज़ार तथा प्रचार समूहों का प्रयास इसलिये भी दिखता है क्योंकि आधुनिक सामानों की पूजा की सुविधा शायद भारतीय धर्म के स्मरणीय महापुरुषों के मंदिरों में नहीं मिलती। बाज़ार को अपने उत्पाद धर्म के साथ जोड़े रखने हैं इसलिये संाईबाबा के मंदिर के बाहर इस तरह उनके उत्पादों की पूजा प्रचार का ही काम करती है।  हमने बचपन में सांई बाबा का नाम सुना था पर लंबे समय  तक  उनके मंदिर में नहंी गये।  बाज़ार के बदलते स्वरूप के साथ उनका प्रचार बढ़ा है इसलिये लगता है कि उनकी प्रसिद्धि बढ़ाने के पीछे आर्थिक कारण भी रहे होंगे।  शिर्डी में उनके मूल मंदिर हम कभी नहीं गये पर विभिन्न शहरों में उनके मंदिरों पर भीड़ देखकर हमें यह लगता है कि हमारे समाज में एक ऐसा वर्ग हमेशा रहा है जिसेे परमात्मा के भी नये स्वरूपों की जरूरत होती है और इसी कारण हमारे आर्थिक तथा सामाजिक रणनीतिकार कभी कभी नये भगवान भी गढ़ लेते है।  उनके अनेक मंदिरों पर बहुत सारा चढ़ावा आता होगा ऐसा माना जा सकता है।
    वैसे देखा जाये तो अध्यात्म शांति के लिये किसी मंदिर या मूर्ति की आवश्यकता नहीं होती। कहीं आश्रम जाकर अपने दिल को यह तसल्ली देने की आवश्यकता नहीं होती कि हम भगवान के दर पर आये हैं। वैसे भी हमारे यहां प्रातःकाल धर्म का माना गया है बाकी तो पूरा दिन तो अर्थ के लिये होता है।  अगर प्रतिदिन प्रातःकाल ही धर्म के लिये व्यतीत किया जाये तो फिर किसी खास दिन की आवश्यकता नहीं होती।  अनेक आधुनिक ज्ञान साधक तो सुबह पार्क में एक घंटा भ्रमण करना भी धर्म का हिस्सा मानने लगे हैं। शरीर शुद्ध तो मन शुद्ध और मन शुद्ध तो भगवान के साथ आत्मा का साक्षात्कार स्वतः होता है।  कुछ लोग योगसाधना के समय आसन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्र जाप करने की क्रिया को ही धर्म निर्वाह मानकर तृप्त हो जाते हैं। उनकी यह तृप्ति उन्हें कहीं दूसरी जगह जाकर परमात्मा की आराधना के लिये भटकने नहीं देती।
            नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि अगर हृदय से पूजा की जाये तो पत्थर में भी भगवान का अनुभव होता हैं। उन जैसे महान लोगों के प्रयासों से जहां हमारा अध्यात्म समृद्ध हुआ वहीं भक्ति की हर प्रक्रिया को समाज ने स्वीकार किया।  अनेक भक्त निष्काम से मंदिर जाते हैं तो अनेक कामना लेकर जाते है।  हमारे देश में मंदिरों का महत्व समय के साथ बढ़ता रहा है।  आखिर मंदिरों में जाने से शांति क्यों मिलती है? इस प्रश्न का उत्तर हम  तभी समझ सकते हैं जब वहां के शांत, स्वच्छ तथा एकांत वातावरण का अध्ययन करें। हम गौर करें कि अधिकतर मंदिरों में चढ़ावा आता है। इस धन का उपयोग व्यवस्थापक अपने यहां सफाई, स्वच्छता तथा पेयजल सुविधा निर्माण के लिये करते हैं ताकि भक्त आते रहें।  उनका उद्देश्य व्यवसायिक  होता है या भावनात्मक यह अलग से विचार का विषय है।  बहरहाल वहां प्रवेश करते ही लगता है कि किसी अच्छी जगह पर आ गये।  यही अनुभूति ऐसी नवीनता देती है कि मनुष्य का मन प्रसन्न हो जाता हैं।  इसके अलावा राह चलते हुए कहीं बैठने या रुकने के लिये जगह नहंी है तो मंदिर में जाकर विश्राम कर सकते है। मंदिर ऐसी जगह है जहां प्रवेश करने पर कोई आने के संबंध में सवाल नहीं करता।  मूल बात यह कि वहां हर कोई आदमी पवित्र हृदय वाला हो जाता है और उनको देखकर एक सहज अनुभूति होती है।
    रविवार के दिन ही रोजगार की परीक्षाऐं भी होती हैं।  हमने रविवार के दिन एक बड़े मंदिर में देखा तो वहां अनेक युवक विराजमान थे। कोई कही बैंचों पर ं बैठा तो कहीं चबूतरे पर सो रहा था। अनेक लड़के लंबी सीढियों पर ही बैठे थे। कोई परीक्षा की किताब पढ़ रहा था तो कोई ऐसे ही बैठा इधर उधर देख रहा था। उनका सामान देखकर लगा कि यकीनन बाहर से आये हैं।  कोई बस से आया होगा तो कोई रेल से आकर वहां विश्राम कर रहा था। उनके चेहरे पर थकावट साफ देखी जा सकती है।  रोजगार के लिये संघर्ष हमारे देश के युवकों के लिये अत्यंत कठिन है।  वह मंदिर में विश्राम करने के लिये इसलिये आये होंगे क्योंकि उनकी परीक्षा प्रारंभ में समय होगा।  मंदिर में भी उनका मन भगवान में कम होगा जितना अपने भविष्य की चिंतायें या संभावनायें उनके मस्तिष्क को घेरे होंगी।  एक बुजुर्ग भक्त ने उनकी तरफ इशारा करते हुए दूसरे से टिप्पणी की कि-‘‘भगवान इन सबका भविष्य उज्जवल करे।’’
         ऐसी बातें मंदिरों में ही सुनी जा सकती हैं। जो लोग यह समझते हैं कि  देश के युवाओं का यह संघर्ष उनका निजी है तो गलती पर हैं।  यह हमारे समाज की विकट समस्या है। देश के आर्थिक रणनीतिकारों को इस पर विचार करना चाहिये।  बहरहाल इस रविवार के विशेष लेख के रूप में इतना ही।

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