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Saturday, June 01, 2013

क्रिकेट में यह क्या हो रहा है-हास्य कविता (cricket mein yah kya ho raha hai-hindi hasya kavita



यह क्या हो रहा है-हास्य कविता
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पोते ने दादा से पूछा
‘‘दादाजी, यह टीवी पर बार बार क्रिकेट का
समाचार आता ह,ै
चलती बहस में कोई मुस्कराता
कोई आस्तीर ऊपर कर गुर्राता,
मगर न बल्ला दिख रहा है
न गेंद नजर आ रही है,
कहीं मैदान पर हरियाली भी
नहीं छा रही है,
बातें मेरी समझ में नहीं आ रही है,
इतना पता है कहीं स्पॉट फिक्ंिसग
कहीं सट्टे की लहर छा रही है,
आप ही समझाओ यह क्या हो रहा है?
दादा ने हंसते हुए कहा
‘‘बेटा,
तेरा आईपीएल का खत्म हो गया खेल,
टीवी से चिपका रहा तू हो गया फेल,
मगर क्रिकेट के धंधे वालों की हो गयी चांदी
तिजोरियां भर गयी उनकी रुपये और सोने से
सट्टे की आई जो आंधी,
अभी चैंपियन ट्राफी शुरु होने में समय बाकी है,
खाली समय में टीवी चैनलों के विज्ञापन का समय
पास होता रहे
यह बहसें उन्होंने इसलिये पर्दे पर टांकी है,
लोग भूल न जायें क्रिकेट को
इसलिये खाली समय में कर रहे फिक्स झगड़ा
इसमें ही मिक्स है इस्तीफों का भी रगड़ा,
अगर देखते रहना है क्रिकेट तो
बंद कर लो अक्ल के दरवाजे,
उसी पर आंख लगाओ जो पर्दे पर विराजे,
इसलिये मत पूछो यह क्या हो रहा है।


लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Wednesday, June 24, 2009

चुभोने के लिये कांटे ढूंढ रहे हैं-व्यंग्य कविता

तुम लड़ना कभी बंद न करना
रुक जायेगी कलम हमारी वरना।
भाषा के तूणीर में तुम शब्द तीर भरकर
कागजी द्वंद्व करते हुए नायक बनना।
बाहर दर्शक बनकर देखेंगे तुम्हारा द्वंद्व
तुम्हारी अदाओं पर करेंगे कभी रचना।।
संकोच की कोई बात नहीं है लड़ने में
हर हालत में गुस्सा अपने अंदर भरना।
दुनियां के सारी सोच बनी है जंग पर
हम तो हैं दर्शक, तुम महायोद्धा बनना।
कुछ लोग रोऐंगे तुम्हारे हाल पर
कुछ हंसेंगे, तुम कभी परवाह न करना।
तलवार युग गया, तुम कलम वैसे चलाओ
लिखो लड़ने की तरह, हमें तो है पढ़ना।।
सच यह है तुमसे ही समझे अमन के फायदे
बीत जाती द्वंद्वों में अपनी जिंदगी भी वरना।
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कुछ नहीं देखा
कुछ नहीं सुना
कुछ नहीं बोला
देखो कितना अमन है।
फंसे हैं जो द्वंद्वों में,
फूलों को लेकर
किसी को तोहफे में देने की बजाय
चुभोने के लिये कांटे ढूंढ रहे है
उनके लिये अस्त्रागार
और हमारे लिये विश्रामगृह यह चमन है।

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Sunday, March 22, 2009

कार्टून अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है-आलेख

अगर विषय और प्रस्तुति दमदार हो तो कार्टूनों को रंग लगाने की आवश्यकता भी नहीं होती। एक बड़ी दुनियां को थोड़े से में समेट लेना ही होता है किसी कार्टूनिस्ट का कमाल। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसे कार्टून आकर्षित न करता हो। पढ़ा लिखा हो या नहीं व्यक्ति को कागज पर बने रेखाचित्र अपनी तरफ बरबस खींच ही लेते है। यही कारण है कि बालकों की पत्र पत्रिकाओं में अधिकतर रेखाचित्रों से बनी सामग्री को अधिक स्थान दिया जाता है।

पहले मोटू पतलू और शेख चिल्ली की रेखाचित्रों से सजी हास्य व्यंग्य सामग्री खूब लुभाती थी। कहने को वह पत्रिकायें बच्चों की थी पर उसे पढ़ते बड़े और छोटे सभी थे। यही कारण है कि देश के अधिकतर अखबार अपने प्रथम पृष्ठ पर ही कार्टून छापते हैं भले ही उसके लिये उनके पास विज्ञापन के कारण जगह कम पड़ती हो। वैसे कार्टूनों की बात की जाये तो कुछ वर्ष पहले जनसत्ता में एक कार्टूनिस्ट काफी लोकप्रिय रहे। उनका नाम शायद काक है । उनके कार्टून लोगों को बहुत अच्छे लगते थे। एक आम आदमी के रूप मेेंं वहां जो पात्र गढ़ा गया था वह भारत के आम आदमी के बीच का लगता था।
उनका एक कार्टून बहुत अच्छा लगा था। उन दिनों पानी की तंगी सभी जगह थी। एक औरत ने नल के नीचे बाल्टी रखी थी जिसमें बूंद बूंद कर पानी आ रहा था। वह आम आदमी उसे घूर कर देख रहा था और वह औरत उससे गुस्से मेंे कहती है कि ‘अब नजर न लगा। बूंद बूंद ही सही पानी आ तो रहा है।’

ऐसे बहुत से कार्टून काक साहब ने बनाये। अब तो जनसत्ता देखने का अवसर ही नहीं मिल पाता इसलिये कहना कठिन है कि अब उसमें कार्टून आते हैं कि नहीं बहरहाल हमें काक साहब के कार्टून बहुत अच्छे लगते थे और सच बात तो यह है कि वैसे कार्टून फिर कहीं देखने को नहीं मिले।
कहने को कई कार्टूनिस्ट भारत में हैं पर वह रानजीतिक विषयों पर सीधे सीधे कार्टून बनाने के कारण आम लोगों को वह बहुत कम पसंद आते हैं। कार्टूनों में आम आदमी की समस्याओं और प्रतिक्रियाओं की व्यंजनात्मक अभिव्यक्ति हो तो उसका अलग ही मजा आता है। वैसे यही हाल देश के व्यंग्यकारों का है। वह सीधे राजनीतिक विषयों पर लिखते हैं। देखा जाये तो वह अपने निबंध को व्यंग्य कहते हैं। व्यंग्य का अर्थ ही यह है कि वह व्यंजना विद्या में हो। जिस पर आप व्यंग्य लिख रहे हैं और उसका सीधा नाम ही लिख दिया तो फिर काहे का व्यंग्य? यही स्थिति कार्टूनिस्टों की है। अगर देखा जाये तो किसी भी विषय पर हास्यात्मक या व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति की विद्या ही कार्टून को कार्टून बनाती है। कार्टून को प्रभावी तभी माना जाता है जब उसे देखते ही आदमी के अधरों पर हंसी आ जाये। फिर उसमें जो शब्द हों वह जोर से हंसने को बाध्य कर दें।

जनसत्ता जब अपने चरम पर था तब उसमें काक साहब के कार्टूनों की लोकप्रियता का भी योगदान था। हालांकि उस समय देश के एक अंग्रेजी दैनिक के कार्टूनिस्ट को ही सबसे अधिक प्रसिद्ध माना जाता था पर सच बात तो यह है कि उनके जो कार्टून हिंदी में देखे वह कभी इतने प्रभावशाली नहीं लगे। तब से यह बात लगने लगी है कि भारत में हिंदी को लेकर हिंदी के प्रचार माध्यमों मेंे ही पूर्वाग्रह है। काक साहब के कार्टून उस समय बहुत प्रभावशाली थे पर हिंदी के अखबार गाते अंग्रेजी के कार्टूनिस्ट के थे। हालांकि अब भी अनेक कार्टूनिस्ट हैं पर उनका प्रभाव वैसा नहीं है। इसका कारण यह है कि वह एक तो राजनीतिक विषयों पर ही अधिक कार्टून बनाते हैं और वह भी सीधे ही अपनी बात कहते हैं। दूसरे आम आदमी और समाज के विषयों पर बहुत कार्टूनिस्ट अपनी रचना कम ही करते हैं। इसके बावजूद लोग उनको पढ़ते हैं क्योंकि हर आदमी की यह चाहत होती है कि कहीं हंसाने के लिये कुछ मिले। हम तो कार्टून को देखते ही लपककर देखने लगते हैं और यह एक सच्चाई है कि बहुत कम कार्टूनिस्ट प्रभावी रचनायें कर रहे हैं। हमें कार्टून बनाना नहीं आता वरना क्यों व्यंग्य कवितायें लिखते। कार्टून के माध्यम से जो बात कही जा सकती है उसका कोई मुकाबला नहीं है। जिस तरह व्यंग्यकार व्यंग्य लिख सकते हैं पर कार्टून नहीं बना सकते वैसे ही सभी कार्टूनिस्ट रेखाचित्र तो बना सकते हैं पर उसमें व्यंग्य पैदा नहीं कर सकते। संभवतः अखबारों में काम करने वाले कार्टूनिस्ट इसलिये अधिक लोकप्रिय होते हैं क्योंकि वह अपने साथ कम करने वाले विद्वानों से विभिन्न विषयों पर निरंतर चर्चा करते हैं रहते हैं जिसके कारण उनके लिखने में भी धार आती है। बहरहाल इसमें कोई संदेह नहीं है कि कार्टून अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं।
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Sunday, February 08, 2009

मंदी का असर प्यार पर भी पड़ेगा-व्यंग्य आलेख

क्वीसलैंड यूनिवर्सटी आफ टैक्लनालाजी के प्रोफेसर कि अनुसार इस मंदी के दौर में लोगों के दाम्पत्य जीवन पर कुप्रभाव पड़ रहा है। उनके अनुसार पैसा प्यार को मजबूत रखता है और उसकी कमी तनाव को जन्म देती है।
यह एक सच्चाई है। फिल्मों,साहित्यक कहानियों और हिंदी उर्दू शायरियों में जिस इश्क, प्यार या मोहब्बत का गुणगान किया जाता है वह केवल भौतिक साधनों के सहारे ही परवान चढ़ता है। फिल्मों की काल्पनिक कथायें देखते हुए हमारे देश के युवक युवतियां क्षणिक प्यार में जाने क्या क्या करने को तैयार हो जाते हैं और फिर न केवल अपने लिये संकट बुलाते हैं बल्कि परिवार को भी उसमें फंसाते हैं।

हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तो यही कहता है कि प्रेम केवल सर्वशक्तिमान से हो सकता है पर अपने देश में एसी भी विचारधारायें भी प्रचलन में हैं जिनके अनुसार प्रियतम अपनी प्रेयसी को तो कहीं प्रेयसी को उसकी जगह बिठाकर आदमी को प्यार और मोहब्बत के लिये प्रेरित करती हैं। आपने फिल्मों में ऐसे गीत देखे होंगे जिसमें काल्पनिक प्रियतम की याद प्रेयसी और उसकी याद में प्रियतम ऐसे गीत गा रहा होता है जैसे कि भजन गा रहा हो। हम न तो ऐसे प्रेम का विरोध कर रहे हैं न उसका गुणगान कर रहे हैं बल्कि यह बता रहे हैं कि प्रेमी जब गृहस्थ के रूप में बदल जाते हैं तक अपनी दैहिक आवश्यकताओं के लिये धन की जरूरत होती है और तभी तय होता है कि वह कथित प्रेम किस राह चलेगा।

वैसे हमने अपने जीवन में देखा है कि जब को लड़का किसी लडकी की तरफ आकर्षित होता है तो उसे प्रेम पत्र लिखकर या वाणी से बोलकर किसी ऐसी जगह ही आमंत्रित करता है जहां खाने पीने के लिये एकांत वाली जगह हो। वहां डोसा,सांभर बड़ा या समौसे कचैड़ी खाते हुए प्रेम परवान चढ़ता है। वैसे आजकल पब सिस्टम भी शुरु हो गया है। यह बात पहले पता नहीं थी पर आजकल कुछ घटनायें ऐसी हो गयी हैं उससे यह जानकारी मिली है।

यह स्त्री पुरुष का दैहिक प्रेम पश्चिमी विचारधारा पर आयातित है तो तय है कि उसके लिये मार्ग भी वैसे ही बनेंगे जैसे वहां बने हैं। वैसे इस दैहिक प्रेम का विरोध तो सदियों से हर जगह होता आया है पुराने समय में इक्का दुक्का घटनायें होती थीं और प्यार के विरोध में केवल परिवार और रिश्तेदार ही खलनायक की भूमिका अदा करते थे। अब तो सब लोग खुलेआम प्रेम करने लगे हैं और हालत यह है कि परिवार के लोग विरोध करें या नहीं पर बाहर के लोग सामूहिक रूप से इसका प्रतिकार कर उसे प्रचार देते हैं। यह भी होना ही था पहले प्यार एकांत में होता था अब भीड़ में होने लगा है तो फिर विरोध भी वैसा होता है। इस दैहिक प्यार की महिमा जितनी बखान की जाती है उतनी है नहीं पर जब कोई खास दिन होता है तो उसकी चर्चा सारे दिन सुनने को मिलती है।

वैसे तो देखा जाये कोई किससे प्यार करने या न करे उसका संबंध बाहर के लोगों से कतई नहीं है। पर रखने वाले रखते हैं और कहते हैं कि यह संस्कृति के खिलाफ है? आज तक हम उस संस्कृति का नाम नहीं जान पाये जो इसके खिलाफ है। हमारे अनेक सांस्कृतिक प्रतीक पुरुषों ने प्यार किया और अपनी प्रेयसियों से विवाह रचाया। अब यह जरूरी नहीं है कि उनकी विवाह पूर्व की प्रेमलीला कोई लंबी खिंचती या वह गाने गाते हुए इधर उधर फिरते। चूंकि यह व्यंग्य है इसलिये हम उनके नाम नहीं लिखेंगे पर जानते सभी हैं। सच बात तो यह है कि दैहिक प्रेम में आत्मिक भाव तभी ढूंढा जाता है दोनों प्रेमियो का मिलन सामाजिक नियमों के अनुसार हो जाता है। मगर आजकल हालत अजीब है कि कहीं विवाह पूर्व प्रेम ढूंढा जा रहा है तो कही विवाह के पश्चात् सनसनी के कारण से प्रेम पर चर्चा होती है।

बहरहाल हमारा मानना है कि चाहे जो भी हो जो लोग सावैजनिक जगहों पर प्रेम करने पर आमदा होते हैं उनकी तरफ अधिक ध्यान देना ही नहीं चाहिये। पिछले कुछ वर्षों से समाज में कामकाजी महिलाओंं की संख्या बढ़ती जा रही है-यह अलग बात है कि उसके बावजूद गृहस्थ महिलाओं की संख्या बहुत अधिक हैं। ऐसे में अगर वह अविवाहित हैं तो उनके संपर्क अपने कार्यस्थल पर काम कर रहे या कार्य के कारण पासं आने वाले युवकों से हो जाते हैं। लड़कियां क्योंकि कामाकाजी होती हैं इसलिये वह विवाह से पहले अपने मित्रों को पूरी तरह परखना चाहती हैं। ऐसे में कुंछ युवतियां अपने परिवार में संकोच के कारण नहीं बताती क्योंकि उनको लगता है कि इससे माता पिता और भाई नाराज हो जायेंगे। फिर क्या पता लड़का हमें ही न जमें। कुछ मामलों में तो देखा गया है कि कामकाजी लड़कियों के माता पिता पहले कहीं अपनी कामकाजी लड़की के रिश्ते की बात चलाते हैं फिर लड़की से कहा जाता है कि वह लड़का देख कर अपना विचार बताये-तय बात है कि यह मिलने लड़की और लड़के का अकेले ही होता है और उस समय कोई उनका परिचित देख ले तो यही कहेगा कि कोई चक्कर है।

बहरहाल संस्कृति और संस्कार के रक्षकों के सामने अपने विचारों का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता बस नारे लगाते हुए चले जाते हैं। उनको लगता है कि सार्वजनिक जगहों पर अविवाहित युवक युवतियों का उठना बैठना संस्कृति को नष्ट कर देगा। यह हास्यास्पद है। हम बात कर रहे थे मंदी से प्रेम के बाजार में मंदी आने की। इस समय रोजगार के अवसरों में कमी हो रही है और ऐसे में इस समय जो कामकाजी जोड़े हैं वह प्यार कर कभी न कभी विवाह में बंधन में बंध जायेंगे। नये जोड़ों के सामने तो केवल नौकरी ढूंढने का ही संकट बना रहने वाला है। उनको अपना वक्त नौकरी ढूंढने में ही नष्ट करना होगा तो प्यार क्या खाक करेंगे? यह संकट निम्न मध्यम वर्ग के लोगों में ही अधिक है और इस वर्ग के सामने रोजगार के नये अवसरों का संकट आता दिख रहा है। कुछ अर्थशास्त्रियेां का मानना है कि अगले चार साल तक यह मंदी रहने वाली है और इसमें ऐसे अनेक व्यवसायिक स्थान संकट में फंस सकते हैं जो जोड़ों को मिलने मिलाने के सुगम और एकांत अवसर प्रदान करते हैंं। फिर रोजगार के संकट के साथ कम वेतन भी एक कारण हो सकता है जो प्रेम के अवसर कम ही प्रदान करे।

अपने देश में देशी विद्वानों की बात तो मानी नहीं जाती। इसलिये यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह कथन एक विदेशी विद्वान का ही है कि पैसे से ही प्यार मजबूत होता है और मंदी का यही हाल रहा तो प्यार का असर कम हो जो जायेगा। यह अलग बात है कि प्रचार बनाये रखने के लिये कुछ प्रेम कहानियंा फिक्स कर दिखायी जायें पर जब मंदी की मार प्रचार माध्यमों पर पड़ेगी तो वह कितनी ऐसी कहानियां बनवायेंगे? सो संस्कार और संस्कृति रक्षकों को चादर तानकर सो जाना चाहिये। आज नहीं तो कल दैहिक प्रेम-जो कि पैसे के कारण ही परवान चढ़ता है-अपना अस्तित्व खो बैठेगा। तब उनके विचारों के कल्पित समाज अपनी राह पर फिर संस्कारों और संस्कृति के सााि चलेगा।
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Tuesday, September 23, 2008

जब फिक्र ही कयामत लायी-हिंदी शायरी

पूरी उम्र फिक्र करते रहे
कयामत के खौफ और इंतजार की
पर वह नहीं आयी
आंखें तब खुलीं जब
फिक्र ही कयामत लायी
.................................
उनका ‘बेफिक्र रहो’ कहने से ही

अपनी फिक्र बढ़ जाती है

क्योंकि फिर उनको हमारी याद नहीं आती

उनकी बेफिक्री बहुत डराती है

उनके लिये यह दो लफ्ज हैं

जिसकी जगह उनके दिल में ही नहीं होती

ऐसे में फिर फिक्र कहां दूर हो पाती है

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यह कविता इस ब्लॉग
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