Showing posts with label लेखक. Show all posts
Showing posts with label लेखक. Show all posts

Tuesday, June 16, 2009

हिंदी में लिखना उतना बुरा नहीं-संपादकीय

पाठ पठन/पाठक संख्या पचास हजार पार करने वाला ईपत्रिका इस लेखक का तीसरा ब्लाग/पत्रिका है। इसने हाल ही मैं गूगल के पैज रैंक में च ौथा स्थान प्राप्त किया-जो कि इसकी बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे लेखक के पचास हजार की पाठ पठन/पाठक संख्या पार करने वाले अब तीन ब्लाग हैं-
1. हिंदी पत्रिका
2.शब्द पत्रिका
3.ईपत्रिका
गूगल के पैज रैंक में चार अंक प्राप्त करने वाले अब चार ब्लाग/पत्रिका इस प्रकार हैं-
1. शब्दलेख सारथी
2. हिंदी पत्रिका
3. शब्दलेख पत्रिका
4. ईपत्रिका
आंकड़ों का खेल हमेशा ही दिलचस्प होता है। शब्द पत्रिका ने भी पचास हजार पाठ पठन/पाठक संख्या पार की है पर उसे गूगल की पैज रैंक में तीन अंक प्राप्त हैं जबकि शब्दलेख पत्रिका ने गूगल पैज रैंक में दस में से चार अंक प्राप्त किये हैं पर उसकी संख्या अभी पचास हजार से दूर है। गूगल का पैज रैंक किसी भी ब्लाग की लोकप्रियता को प्रमाणित करने वाला अकेला प्रमाणिक टूल है। हालांकि अन्य कुछ वेबसाईट भी ब्लाग की लोकप्रियता का आंकलन करती हैं पर अनेक ब्लाग लेखक मानते हैं कि उनके साफ्टवेयर अधिक प्रमाणिक नहीं है।
जब ब्लाग लेखन की यात्रा प्रारंभ की थी तब यह लेखक अकेला था पर अंतर्जाल पर बहुत सारे मित्र मिले और जो पहले ही मित्र थे वह अब पाठक भी हो गये हैं। वर्डप्रेस की पाठक संख्या पर वह हमेशा नजर लगाये रहते हैं और यह बताते हैं कि तुम्हारा वह ब्लाग आज पचास हजार पार सकता है। आज तो अच्छा संपादकीय लिखना। मना करने पर कहते हैं कि-नहीं, आजकल वह समय नहीं है कि चुपचाप बैठकर लिखते जाओ। लोगों को यह बताना जरूरी है कि हम भी है नंबर वन की दौड़ में।’
तब बरबस हंसी आती है। सच तो हम जानते हैं कि हिंदी में लेखन कभी आसान नहीं रहा। अपने काम की व्यसततओं से समय निकालकर लिखने में मजा आता है पर समस्या उसके प्रकाशन की आती है।
प्रसंगवश आज एक लेख पर नजर पड़ गयी। उस लेख में बताया गया कि अनेक लेखकों द्वारा अपना पैसा लगाकर पुस्तकें प्रकाशित कराने की प्रवृत्ति से अनेक प्रकाशक जमकर पैसा कमा रहे है।
उस लेख में कहा गया कि आज हिंदी के लेखक की वह छबि नहीं है कि वह रद्दी दिखता हो या गरीब हो। उस पाठ में लिखा गया था कि अनेक अप्रवासी भारतीय भारत आते हैं और अपने पैसे से किताब छपवाकर आकर्षक कार्यक्रम में उसका विमोचन करते हुए चले जाते हैं। उस पाठ के लेखक का मानना था कि ऐसी किताबों की विषय सामग्री कूड़ा हो यह जरूरी नहीं है। आखिर धनी मानी लोगों को भी लिखने का अधिकार है। उसने कुछ पुराने लेखकों के नाम भी गिनाये जो अमीर परिवारों से आये। इसलिये यह जरूरी नहीं कि हिंदी लेखक गरीब हो या जो गरीब है वही अच्छा लिख सकता है।
उस लेखक की बात ठीक थी पर कुछ सवाल हमारे सामने थे। जिन धनी मानी परिवारों में पैदा पुराने हिंदी लेखकों की उसने बात की उन्होंने अपने पैसे से किताब छपवाकर विमोचन नहीं किया। दूसरा यह है कि जो धनीमानी लोग किताबें छपवाते हैं उनमें होता क्या है? उनके जीवन के अनुभव जिनमें झूठ के अलावा कुछ भी नहीं होता। उनमें वह यह साबित करने का प्रयास किया जाता है वह वह धनी, उच्च पदस्थ और प्रसिद्ध होने के साथ संवेदनशील लेखक भी हैं। फिर सवाल यह नहीं है कि अमीर आदमी को लिखने या छपने का अधिकार नहीं हैं। हां, उनमें भी बहुत अच्छे लेखक हो सकते हैं। पर अनवरत चलने वाली बहस का निष्कर्ष यह है कि अपना पैसा खर्च किये बिना कोई लेखक प्रसिद्ध नहीं हो सकता। इसे हम यह भी कह सकते हैं कोई भी आदमी अपने लिखने के दम पर प्रसिद्ध नहीं हो सकता।
दूसरा यह है कि जो धनीमानी हैं उनका समय अधिकतर अपने व्यवसायों पर ही रहता है। समाज के उतार चढ़ाव में वह बहते हैं पर वह किस तरह आते हैं और इसके लिये कौनसी प्रवृत्तियां जिम्मेदार हैं यह देखने के पास उनके पास इतना समय नहीं होता जितना अल्प धनिक के पास रहता है। अल्प धनिक के पास ही वह समय होता है कि वह जमीन पर चलते हुए अनेक यथार्थ घटनाओं को एक स्वपनदृष्टा की तरह प्रस्तुत करता है। मुख्य बात यह है कि हिंदी में लिखने की बात आज वही सोच सकता है जिसके पास अपने रोजगार का कोई साधन हो। इससे रोटी पाने की कोई आशा नहीं कर सकता। हिंदी भाषी समाज की यह प्रवृत्ति है कि वह शुद्ध लेखक को पाल नहीं सकता।
ऐसे में यह अंतर्जाल ही एक आशा की किरण है। उसमें भी शर्त यही है कि इंटरनेट कनेक्शन व्यय करने की शक्ति होना चाहिए। इस लेखक ने लिखना तब शुरु किया था जब वह कमाने की सोच भी नहीं सकता था। जीवन संघर्ष के दौरान लिखते हुए कभी यह नहीं लगा कि उसक सहारे धन या प्रतिष्ठा मिलेगी। बस, एक आनंद आता है। इंटरनेट कनेक्शन लेते समय यह विचार भी था कि जब अवसर मिलेगा अपनी रचनायें प्रतिष्ठत समाचार पत्रों में भेज दिया जायेगा। कुछ समय बाद अध्ययन किया तो इस बात का आभास हो गया कि हर क्षेत्र में शिखर पर बैठे लोग कंप्यूटर पर काम करने से इसलिये कतराते हैं क्योंकि उनको लगता है कि यह काम टाईपिस्ट या लिपिक’ का है। इंटरनेट से भेजी गयी रचनाओं का भी वही हाल रहा जो डाक से भेजी गयी रचनाओं का था। ऐसे में स्वतंत्र लेखन के लिये ब्लाग मिला तो लिखना शुरु किया। इस लेखक की कवितायें, व्यंग्य, आलेख और कहानियां अच्छी है या बुरी इस स्वयं कभी नहीं सोचता। लिखते समय इस बात का ध्यान रहता है कि उसका सामाजिक सरोकार और संबंध जरूर होना चाहिये। अपनी कहानी लिखना आसान है पर वह तभी प्रभावी होती है जब उसकी प्रस्तुति ऐसी होना चाहिये कि वह सभी को अपनी लगे।
इधर इंटरनेट पर अच्छे लेखक भी आ गये हैं। उनका पढ़कर आनंद आता है और उनसे भी लिखने की प्रेरणा मिलती है। सच बात तो यह है कि कई ऐसे स्तरीय पाठ भी सामने आये जो व्यवसायिक पत्र पत्रिकाओं में नहीं दिखते। साहित्य, फिल्म, व्यापार, कला तथा प्रचार माध्यमों में एक परंपरागत ढांचा है जो परिवार, जाति, भाषा और धर्म में ही अपने रचनाकार तथा पात्र ढूंढता है। नयी व्यवस्था के आने की आशंका से यथास्थितिवादी खौफ खाते हैं और इसलिये वह ऐसी योजना बनाते हैं कि वह बदलाव आये ही नहीं और आये तो उसमें उसके मोहरे ही फिट हों। इसका पता तो पहले से ही था पर अंतर्जाल लिखते हुए इसका आभास अच्छी तरह होता जा रहा है।
एक ब्लाग मित्र-उसकी और इस लेखक की मित्रता ब्लाग लिखने के पहले से ही है- से उसी दिन बात हो रही थी। उसकी इंटरनेट पर अनेक ब्लाग लेखकों से चर्चा भी होती है। उसने कहा-’‘वह लोग तुम्हें पंसद करें या नहीं पर जानते सभी हैं। यह तय बात है। वह लोग कहते हैं कि ‘उसके कुछ ब्लाग बहुत अच्छे हैं और कुछ ऐसे ही हैं। मतलब यह कि तुम्हारी पहचान है और इसे कोई मिटा नहीं सकता। सबसे बड़ी बात यह है कि मुझे भी तुम्हारा वह ब्लाग पसंद हैं जो सभी की पसंद है।’
इशारा समझ में आया। मगर यह यात्रा बहुत लंबी है। कोई जल्दी नहीं है। आशा से अधिक जिज्ञासा है कि देखें यथास्थितिवादी किस तरह बदलाव लाने के लिये जूझ रहे लेखकों के सामने प्रतिरोध कर रहे हैं। जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र और परिवार के दायरों से मुक्त रहने का संदेश वाले छद्म लोग वास्तव में यथास्थितिवादी है और बदलाव लाने वाले तो केवल अपने कर्म में लिप्त रहते हैं। इसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होकर देखने का अलग ही मजा है। खुद मैदान में उतरने का अर्थ है अपने लिये अधिक से अधिक विरोधी बनाना। ऐसे अवसरों पर लिखने का केवल एक ही मतलब होता है कि जिन लोगों की हिंदी ब्लाग का विश्लेषण करने वाले ब्लाग लेखकों के लिये अगर कुछ हो तो वह समझ लें। पूर्व में ऐसे ही आलेखों का प्रभाव क्या हुआ है यह इस लेखक ने देखा है। ब्लाग लेखक मित्रों से जो पाया है उनको ही कुछ लौटाया जा सकता है तो वह इसी तरह ताकि वह अगर इससे कोई लाभ उठा सकें तो ठीक, नहीं भी तो पाठकों में यह प्रेरणा तो आ ही सकती है कि अंतर्जाल पर हिंदी में लिखना उतना बुरा नहीं है जितना लगता है।
......................................
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, May 09, 2009

वर्डप्रेस के दूसरे ब्लाग ने छू लिया 50 हजार का आंकड़ा-आलेख

ब्लाग पत्रिका लेखक अपने उस पाठक का इंतजार कर रहा था जो वर्डप्रेस के शब्द-पत्रिका ब्लाग की पाठ पठन/पाठक संख्या पचास हजार की संख्या पार कराने वाला था। चाहे तो लेखक यह काम स्वयं भी कर सकता था। कौन देखने वाला था पर अपने साथ बेईमानी करना किसी भी मौलिक लेखक के लिये कठिन होता है। इसलिये पहले ही यह संपादकीय लिखना प्रारंभ कर दिया । इस लेखक का यह दूसरा ब्लाग है जो अभी अभी पचास हजार पाठ पठन/पाठक संख्या पार कर गया-प्रसंगवश यह वर्डप्रेस का ही ब्लाग है। पचास हजार की संख्या पार कराने वाला पाठक कोई जबलपुर से था।
वैसे अंतर्जाल पर कोई बात दावे से कहना कठिन है क्योंकि कई बार ब्लाग की पाठ पठन और पाठक संख्या अनेक स्थानों पर देखने से भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। हो सकता है यह तकनीकी गड़बड़ी के कारण होता हो। आज सुबह इस ब्लाग पर 49982 पाठ पठन/पाठक संख्या का आंकड़ा दर्ज था। उसके हिसाब से अट्ठारह जुड़ने पर पचास हजार हो जाना चाहिऐ था। मगर स्टेटकाउंटर पर इतनी संख्या से एक अधिक होने पर भी इस ब्लाग का डेशबोर्ड 49999 दिखा रहा था। स्टेटकांउटर पर कई बार ऐसा होता है कि ब्लाग पर प्रकाशित त्वरित पाठ पर फोरमों से आई संख्या चार होती है पर हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरमों पर वह संख्या आठ या दस दिखाई देती है। तब सवाल आता है कि इस तरह के काउंटर सही गणना नहीं करते या वह उनके हिसाब से कोई गणना आवास्तविक है जिसे दिखाने का प्रावधान उसमें नहीं है।
पचास हजार की संख्या पार कराने वाले जबलपुर के उस पाठक का धन्यवाद क्योंकि उसे शायद नहीं मालुम होगा कि वह एक ब्लाग की पाठ पठन/पाठक संख्या का पचास हजार के पार पहुंचा रहा है। ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर वर्डप्रेस की अपेक्षा नगण्य पाठ पठन/पाठक संख्या है पर उन पर लिखने का एक अलग ही मजा है।

इस लेखक के 22 ब्लाग में यह ब्लाग चौथे नंबर पर बना था पर हिंदी पत्रिका के बाद सफलता के क्रम में इसका नंबर दूसरा है और इससे पहले बने तीनों ब्लाग अभी बहुत पीछे है जिनमें दो ब्लाग अनंत शब्दयोग और चिंतन हैं और एक वर्डप्रेस का दीपकबापू कहिन है। इसको चुनौती देता एक अन्य ब्लाग ईपत्रिका इसके पीछे चला आ रहा है और हो सकता है कि वह आने वाले दिनों में सफलता के क्रम में पहला स्थान प्राप्त कर ले।
यहां गूगल पेज रैंक की निर्णय क्षमता पर भी सवाल उठाना पड़ रहा है। इस ब्लाग को वहां 3 का अंक प्राप्त है और इसको पीछे छोड़ने वाले ब्लाग शब्दलेख सारथी, हिंदी पत्रिका और शब्दलेख पत्रिका 4 अंकों के साथ इस पर बढ़त बनाये हुए हैं। हिंदी पत्रिका के मुकाबले गूगल पेज रैंक में इसका पिछड़ना पाठों और पाठ पठन/पाठक संख्या को देखते हुए समझा जा सकता है पर शब्दलेख सारथी और शब्दलेख पत्रिका के मुकाबले विचारणीय विषय है। उन दोनों ब्लाग पर न तो पाठ इतने हैं और न ही पाठक संख्या। कहने का तात्पर्य यह है कि यह सब बातें अजीब हैं-आप अंतर्जाल पर कितने भी जानकार हो जायें पर यह नहीं कह सकते कि पूरी तरह से समझ गये हैं।
संभव है कि गूगल पेज रैंक के साफ्टवेयर में कोई कमी नहीं हो पर इस ब्लाग को 3 की रैंक होने पर कुछ ऐसे आंकड़े हैं जो ऐसे प्रश्न उठाते हैं और शायद यही प्रश्न इस अंतर्जाल के लिये दिलचस्पी बढ़ाने का कारण भी हैं।
इस लेखक ने बुधवार को ही यह अनुमान लगाया था कि यह ब्लाग शनिवार दोपहर तक पचास हजार की पाठ पठन/पाठक संख्या पार करेगा क्योंकि शनिवार और रविवार को इस ब्लाग पर आवागमन अधिक होता है और बाकी दिन उसके मुकाबले आधा या उससे थोड़ा अधिक देखने को मिलता है। इसके कुछ ज्ञात कारण है जिनके बारे में दावे से लिखना कठिन है तो कुछ अज्ञात भी हो सकते हैं।

आत्ममुग्ध होकर अपने लिखे की तारीफ करना ठीक नहीं है पर इस ब्लाग की पाठ पठन/पाठक संख्या 50 हजार पार करने के आंकड़े में उन लोगों की जरूर दिलचस्पी होगी जो हिंदी ब्लाग जगत में एक लक्ष्य के साथ सक्रिय हैं। शायद उनके लिये इसमें कोई जानकारी हो। इस पर स्टेटकाउंटर अभी पंद्रह दिन पहले ही लगाया गया है क्योंकि उसे वर्डप्रेस पर लगाना नहीं आ रहा था। ब्लागस्पाट के ब्लाग जहां आसानी से से तकनीकी जानकारी उपलब्ध है वहां तो सभी सैटिंग आसानी से सीखी जा सकती है। फिर अनेक ब्लाग लेखक ब्लाग स्पाट की तकनीकी जानकारी लिखते रहते हैं मगर वर्डप्रेस को समझना इसलिये भी कठिन है क्योकि उसके बारे में लिखने और बताने वाले बहुत कम लिखते हैं। इस पर प्रतिदिन आने वाले पाठकों की संख्या साठ से पचहत्तर नियमित रूप से है पर पाठ पठन की संख्या कभी अधिक और कम होती रहती है। अभी हाल ही में एक ही दिन में 238 की पाठ पठन संख्या आठ अप्रैल 2009 को पार की। 351 पाठों से सजे इस ब्लाग के निरंतर आगे बढ़ने की संभावना है।

अभी एक सर्वे आया था जिससे पता चला कि करीब 95 प्रतिशत ब्लाग लेखक ब्लाग स्पाट और 15 प्रतिशत वर्डप्रेस पर लिखना पसंद करते हैं। इसका मतलब साफ है कि अगर आपका वर्डप्रेस का ब्लाग, हिंदी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरमों पर नहंी दिखता और अगर उस पर लिखते हैं तो अपने मित्रों से दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि इस लेखक ने ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस के ब्लागों पर अलग अलग दृष्टिकोण अपनाया है। पहले पाठ लिखकर ब्लागस्पाट के ब्लाग पर प्रकाशित किया जाता है फिर उसे वर्डप्रेस के ब्लाग पर रखा जाता है। इस लेखक के ब्लाग स्पाट के सारे ब्लाग उन फोरमों पर रहते हैं और ब्लाग लेखक मित्रों से संपर्क का वही जरिया भी है। एसा नहीं है कि ब्लागस्पाट के ब्लाग बेकार है-कम से कम गूगल पेज रैंक में उनकी स्थिति देखकर तो यही लगता है कि उनकी अपनी उपयोगिता है। इस लेखक का शब्दलेख सारथी ब्लाग स्पाट पर ही है जिसे 4 का अंक प्राप्त है। इस लेखक के कम से दस ब्लाग ऐसे हैं जिनको गूगल पेज रैंक में तीन की वरीयता प्राप्त हैं इसका मतलब यह है कि वह इस ब्लाग की अपेक्षा कम पाठ और पाठ पठन/पाठक संख्या होने के बावजूद इसे गूगल पेज रैंक में तीन का अंक प्राप्त कर उसे बराबरी की चुनौती दे रहे हैं। बाकी अंतर्जाल पर जो पाठ पठन/पाठक संख्या में कितना भ्रम है और कितना सच यह तो कोई विशेषज्ञ ही बता सकता है। इस पर मित्र ब्लाग लेखकों और पाठकों द्वारा इस लेखक को निरंतर प्रोत्साहन देने के लिये हार्दिक आभार प्रदर्शन इस विश्वास के साथ कि वह आगे भी अपना समर्थन जारी रखेंगे।
................................
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, December 29, 2008

अपना लेखक घर पर ही टांगकर सम्मलेन में जायें-व्यंग्य

अक्सर कुछ लेखक जब कहीं बड़े लेखकों की साहित्य से संबंधित ऐसी बात सुनते हैं जो उनको अरुचिकर लगे तो उस पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया कहीं अखबार में पत्र संपादक में लिखते हैं-उनको अखबार अन्य कहीं जगह दे भी नहीं सकते क्योंकि बड़े साहित्यकारों के लिये सभी जगह सुरक्षित है। आजकल अंतर्जाल पर भी ऐसी ही प्रतिक्रियायें पढ़ने को मिल रही हैं।

हिंदी में कुछ ऐसे लेखक हैं जो मशहूर नहीं है पर साहित्य में रुचि होने के कारण लिखते भी हैं और अवसर मिल जाये तो ऐसे सम्मेलनों मे जाते हें जहां साहित्य या उससे जुड़ी किसी विद्या पर चर्चा होती है । कहा जाये तो ऐसे सम्मेलनों में अंशकालिक लेखक आम श्रोता और वक्ता के रूप में जाते हैं। वहां कुछ कथित बड़े साहित्यकार आते हैं जो प्रसिद्धि के शिखर पर होने के कारण वहां वह भाषण वगैरह करते हैं। हिंदी साहित्य में दो तरह के लेखक हैं एक तो वह जो केवल पूर्णकालिक लेखक हैं उन्हें बड़ा साहित्यकार इसलिये माना जाता है कि वह केवल लिखते हैं और उनके संबंध इस तरह बन जाते हैं कि उनको पुरस्कार भी मिलते हें। अंशकालिक लेखक वह हैं जो अपनी रोजी रोटी अन्य काम कर चलाते हैं और लिखना उनके के लिये एक स्वांत सुखाय विधा है। तय बात है साहित्येत्तर सक्रियता न होने के कारण उनको इनाम या सम्मान नहीं मिलता इसलिये वह छोटे साहित्यकार कहलाते हैं। इन अंशकालिक लेखकों की बड़े साहित्यकारों की नजर में कोई अहमियत नहीं होती।

बहरहाल अंशकालिक साहित्यकार होने के बावजूद इस लेखक ने देखा है कि अनेक कथित बड़े साहित्यकार अपनी रचनाओं की वजह से कम वक्तव्यों की वजह से अधिक जाने जाते हैं। दरअसल ऐसे बड़े साहित्यकारों को यह अहंकार है कि वह समाज का मार्गदर्शन कर रहे हैं पर अगर समाज की वर्र्तमान हालत देखें तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि इन साहित्यकारों ने अपनी सारहीन और काल्पनिक रचनाओं के अलावा कुछ नहीं दिया। ऐसे अनेक कथित बड़े साहित्यकार हैं जिनका नाम आम आदमी नहीं जानता। उनके चेले चपाटे गाहे बगाहे उनकी प्रशंसा में गुणगान अवश्य करते हैं पर हिंदी भाषा का पाठक वर्ग उनको नहीं जानता। आम पाठक की बात ही क्या अनेक लेखक तक उनको नहीं पढ़ पाये। आखिर ऐसा क्यों हैं कि हिंदी में मूर्धन्य साहित्यकार हैं पर हिंदी भाषी लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ा।

थोड़ा विचार करें तों स्वतंत्रता के बाद इस देश में अव्यवस्थित विकास के साथ हिंदी का प्रचार बढ़ा। एक प्रगतिशील विचाराधारा के लोगों ने सभी जगह अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। उसके लेखक पश्चिमी विचाराधाराओं से प्रभावित हो। यहां हम अगर देखें तो राष्ट्रवादी और प्रगतिशील विचाराधारा दोनों ही पश्चिम से आयातित है। भारत में व्यक्ति,परिवार, समाज और राष्ट्र के ं क्रम चलता है जबकि पश्चिम में इसके विपरीत है। प्रगतिशील तो इससे भी आगे हैं वह सभी को टुकड़ों में बांटकर चलते हैं। भारतीय विचार कहता है कि किसी एक व्यक्ति का कल्याण करो तो वह उसका लाभ अपने परिवार को भी देता है। इस तरह परिवार, परिवार से समाज और समाज राष्ट्र का कल्याण होता है। पश्चिमी विचार धारा कहती है कि राष्ट्र का कल्याण करो तो व्यक्ति का कल्याण होगा। प्रगतिशील विचार धारा हर जगह व्यक्ति,परिवार,समाज, और राष्ट्र में भेद करती हुई चलती है। इसी प्रगतिशील विचारधारा ने एकछत्र राज्य किया। दरअसल इसके लेखक पश्चिम के लेखकों और दार्शनिकों के विचारों को यहां प्रस्तुत करते और उसे आधुनिक कहकर बताते और अपनी रचनाये करते गये। उनकी रचनाओं में पात्र या क्षेत्र भारत के हैं पर उस पर उनकी लेखकीय दृष्टि पश्चिमी ढंग की है। बांटकर खाओ का नारा लगता है तो पहले व्यक्ति ओर शय दोनों को ही अलग कर देखना पड़ता है। बांटने के लिये काटना पड़ता है और इस तरह शुरु हो जाता है नकारात्मक विचाराधारा।

शिक्षा,कला,फिल्म,पत्रकारिता तथा साहित्य में इस विचाराधारा के लोगों का वर्चस्व रहा। रचनाऐं खूब हुईं पर भारतीय पुट नदारद रहा। लेखक प्रसिद्ध होकर इनाम और सम्मान प्राप्त करते गये पर पाठक का प्रेम उनको कभी नहंीं मिला। इनका शिक्षा जगत पर प्रभाव इतना रहा कि राष्ट्रवादी विचारा धारा के लेखक भी उसमें बहते गये। अब राष्ट्रवादी लेखक भी प्रगतिशीलों से अलग होने का दावा करते हैं पर कार्यशैली के बारे में वह कोई उनसे अलग नहीं है। दोनों की नारों और वाद की लय में चलते हैं पर समाज की वास्तविकताओं को दोनों ने नजरअंदाज किया।

जब कुछ अंशकालिक लेखक इन बड़ लेखकों की बात सुनकर दुःखी होते हैं तो उनके पास कोई चारा नहीं होता कि तत्काल इसका प्रतिवाद करें। वह अखबारों में पाठकों के पत्र पर अपना विरोध करते हैं। आजकल अंंतर्जाल पर ब्लाग लिखने वाले भी अपना दुःख व्यक्त करने लगे हैं। दरअसल उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि इतने बड़े साहित्यकार कैसी बेतुकी बातें कर रहे हैं पर बड़े यानि क्या? सबसे ज्यादा छपते हैं तो यहां अगर संबंध हों तो कोई भी छप सकता है। वैसे भी आजकल साहित्यक पत्र पत्रिकाओंं में जो लोग छप रहे हैं वह प्रसिद्ध लोग हैं। आम आदमी के लिये तो लेखन एक विलासिता बन गयी है और यह सब इ्रन्हीं प्रगतिशील लोगों द्वारा बनायी गयी वैचारिक व्यवस्था का परिणाम है।

यह लेखक इतने बड़े हैं और क्रांति करने वाली रचनायें करते हैं तो समाज इतना कायर कैसे हो गया? जवाब है कि फिल्मों ने कायर बनाया। एक हीरो सारे खलनायकों का नाश करता है उसे कहीं आम आदमी की भीड़ लगाते हुए देखा नहीं जाता। जनता की एकता का सपना देखने वाले किसी प्रगतिशील ने इसका कभी विरोधी नहीं किया जबकि वह जानते थे कि समाज कायरता की तरफ जा रहा हैं। ऐसे कई दृश्य फिल्मों में दिखाये गये जिसमे ईमानदारी पुलिस कर्मी के परिवार का खलनायक ने बर्बाद किया। इन फिल्मों से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ पर आदमी डरता चला गया। कई फिल्मों में गवाह को डराते हुए दिखाया गया। ऐसे अनेक दृश्य हैं जिन्हें देखते हुए अन्याय के खिलाफ लड़ने पर उसका दुष्परिणाम देखकर किसी के अंदर साहस नहीं हो सकता। ऐसे में इन बड़े लेखकों ने आंखें मूंद रखीं। एक और दिलचस्प बात यह है कि विदेश से पुरस्कार प्राप्त लोगों को सिर पर उठाया गया। इसके बारे में विख्यात साहित्यकार नरेंद्र कोहली जी का कहना कि वह एक साजिश के तरह भारत विरोधियों को दिये जाते हैं। हां, इस देश में कायरता के बीज बोने वालों को ही प्रोत्साहित किया गया ताकि उनके झंडे तले ही भीड़ आये कहीं स्वतंत्र रूप से कार्यवाही न करे।

इन कथित बड़े लेखकों ने रहीम और कबीर का मजाक उड़ाया। जानते हैं क्यों? उन जैसा कोई सच लिख नहीं सकता। इन्होंने पूज्यनीय धार्मिक पात्रों को मिथक बताकर प्रचार किया। जानते हैं क्यों? ताकि लोग उनको भूल जायें और उनके द्वारा सुझाये गये नये भगवानों को पूजें। उनके अधिकतर पात्र विदेशों में राज्य कर रहे नेता ही रहे हैं? उनका बयान इस तरह करते हैं जैसे कि उनमें कोई दोष नहीं था। उनकी जनता उनसे बहुत खुश रही थी। भारत में पूज्यनीय धार्मिक पात्रों के दोष गिनाते हैं पर उनके विदेशी पात्रों के दोष कौन देखने बाहर जाये?

पहली बात तो यह है कि अंशकालिक लेखकों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिये कि वह किसी बड़े लेखक को सुनने जा रहे हैं। ऐसे सम्मेलनों में जाना चाहिये क्योंकि व्यंग्य लिखने के लिये वहां अच्छी सामग्री मिल जाती है। लेखक कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। उसकी रचना कितनी प्रभावी है यह महत्वपूर्ण है और यकीनन इस समय देश में उंगलियों पर गिनने लायक ही ऐसे कुछ लेखक हैं जिनका वाकई हिंदी के आम पाठक पर प्रभाव है पर उनको कोई बड़े इनाम नहीं मिले। इसलिए ऐसे सम्मेलनों में बड़े आराम से जायें पर अपना लेखक घर पर ही टांग जायें तो कोई अफसोस नहीं होगा।
..........................................................
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

लोकप्रिय पत्रिकाएँ

विशिष्ट पत्रिकाएँ