Showing posts with label संपादकीय. Show all posts
Showing posts with label संपादकीय. Show all posts

Wednesday, February 20, 2013

विकास के प्रश्न पर माथापच्ची-हिन्दी चिंत्तन लेख (vikas ka prashna-hindi chinttan lekh or quision of development-thought article)

   ईमानदारी की बात कहें हमें हड़ताल या बंद पसंद नहीं है। किसी भी प्रकार के आंदोलन को सफल बनाने के लिये महात्मा गांधी ने सत्याग्रह, भूखहड़ताल और आमरण अनशन जैसे उपायों की अविष्कार किया  है जिनका उपयोग करना ही पर्याप्त है।  देश में मजदूरों, किसानो और अन्य कमजोर वर्गो के कल्याण के लिये इतने प्रयास किये गये हैं कि अगर उन पर खर्च की गयी राशियां तथा कार्यक्रमों का जोड़ किया जाये तो इस देश में हर आदमी को अमीर होना चाहिये।  न तो सड़क पर ठेला लगाते हुए कोई छोटा व्यवसायी दिखना चाहिये न ही शहरों के विस्तार के लिये जूझते हुए मजदूर सामने हों।
         मजदूरों और किसानों के भले के लिये जूझते अनेक लोग ऊंचाईयां छू रहे हैं पर उनकी कृपा का अब भी जमीन पर बरसने का इंतजार है।  सच बात तो यह है कि समाज कल्याण जब से राज्य का विषय हुआ है तब से अनेक व्यवसायिक सेवक पैदा हो गये हैं।
जब हम देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के किस्से देखते हैं तो हृदय कांप जाता है।  अभी तक यह समझ में नहीं आता कि विकास कहा किसे जाता है।  भूखे को रोटी मिल जाये तो वह उसे विकास समझता है और बेकार को काम मिले तो वह भी सोचता है कि उसका विकास हो गया।  यह निज विकास है।  मूल प्रश्न यह होना चाहिये कि आदमी के विचार और व्यवहार में विकास हुआ कि नहीं।  जिनके पास पांव में नयी चप्पल खरीदने के पैसे नहीं थे अब वह कार में घूमे तो विकास दिखता है।  उसकी समाज से दूरी हो जाती है। लोग उसके पास कम ही जा पाते हैं।  उनको लगता है कि अब वह बड़ा आदमी हो गया है।  मगर जो लोग उसके निकट होते हैं वह मानते है कि वह वाकई बड़ा आदमी है? मुंह पर भले ही निकट रहने वाले लोग प्रशंसा करें पर पीठ पीछे कह ही देते हैं कि भले ही उसके पास धन आया है पर औकात उसकी पुरानी है।
          बात नजरिये की है।  हम काम कर रहे हैं अंग्रेजों की व्यवस्था के अनुसार पर आशा करते हैं कि हमारे देश का रूप पुराना ही रहे।  अंग्रेजों ने हम पर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाकर राज्य किया।  उन्होंने समाज को टुकड़ों में बांटकर राज्य किया और हमने उसे स्वीकार कर लिया। टुकड़ों में बंटा समाज आसानी से राज्य करने लायक हो जाता है।  हमारा मानना है कि राज्य का काम समाज के सहज संचालन में योगदान देने से अधिक नहीं होना चाहिये पर हमारे देश के रणनीतिकार राज्य के दंड से समाज को सुधारना चाहते हैं।  दूसरी बात यह कि राज्य का धन अधिक से अधिक पूंजीगत मदों उत्पादकता बढ़ाने के लिये होना चाहिये न कि कल्याण जैसे अनुत्पादक मदों पर अपना राजस्व नष्ट करना श्रेयस्कर है।   अर्थशास्त्र का विद्यार्थी रहे होने के नाते हमारा मानना है कि इस देश में शुद्ध पेयजल, बिजली, और परिवहन मार्गो (सड़क, वायु तथा जल)  के निर्माण में अधिक से अधिक धन खर्च किया जाना चाहिये था।  दूसरी बात यह कि देश के अपराध रोकने तथा विदेशी से हमले का प्रतिकार करने के लिये पुलिस तथा सेना को पुख्ता करना भी राज्य की प्राथमिकता है यह भी सैद्धांतिक रूप से माना जाता है।  इस पर अधिक माथापच्ची करना आवश्यक नहीं है क्योंकि राज्य की पहचान इन दो विषयों ही होती है।
  जहां तक शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार से संबंधित विषय हैं इन पर राज्य को मार्ग दर्शक सिद्धांत तो तय करना चाहिये पर इसके निजी क्षेत्र को ही कार्यरत देने के अवसर मिल तो ही ठीक है।  उसी तरह जाति, क्षेत्र, भाषा, धर्म तथा लिंग के आधार पर समाज को बांट कर समाज के उद्धार का कल्पनातीत लक्ष्य छोड़ना ही बेहतर है।  अगर लोगों को शुद्ध पेयजल, बाधाहीन सड़कें और बिजली पर्याप्त मात्रा में मिल जाये तो लोग स्वयं ही शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य के साधन जुटा लेंगे  ऐसा हमारा विश्वास है।  शुद्ध पेयजल, सड़क और बिजली की सुविधाओं  का निर्माण केवल शहरों में नहीं होना चाहिये वरन् देश के प्रत्येक गांव में किया जाना चाहियै।  यह हो नहीं रहा। हमारे देश के रणनीतिकार सब चीजें अपने हाथ में लेकर समाज का कल्याण निकलने चल पड़े हैं।  न गरीबी हट रही है न समाज में स्वास्थ्य का स्तर ही अच्छा रह पाया है।  उदारीकरण के नाम पर केवल धनपतियों को ही सुविधा मिल रही है।  मध्यम और निम्न वर्ग के लोग अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है जो अत्यंत चिंताजनक है। 
 लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
5.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.जागरण पत्रिका 
८.हिन्दी सरिता पत्रिका 
९.शब्द पत्रिका

Thursday, January 10, 2013

प्रचार माध्यम (TV News chaianal and news paper)भाव उबारने में सक्षम पर चेतना नहीं ला सकते -हिन्दी चिंत्तन लेख (prachar madhyama bhav ubarne mein saksham par chetna nahin la sakte_hindi thought article akhbar and doordarshan)


        देश में प्रचार माध्यमों की ताकत हमेशा ही रही है।  वैसे इस बात का आभास अब अधिक हो रहा है। देश में किसी भी विषय पर अपने व्यवसायिक हितों के अनुसार आम लोगों में सकारात्मक दृष्टिकोण का निर्माण या विध्वंस करना इन प्रचार माध्यमों के लिये सहज हो गया है।  पहले अखबार हुआ करते थे तब उनका प्रभाव इतना तीव्रतर नहीं था पर अब टीवी चैनलों और एफ एम रेडियो का न केवल तीव्र गति से लोगों के अंदर अपने विचारों को लोगों के दिमाग में समाविष्ट करा देते हैं वरऩ उसके वैचारिक प्रवाह तथा प्रभाव में नियमितता भी बनाये रखते हैं।  अखबार एक बार प्रकाशित होने के बाद चौबीस घंटे के बाद सामने आता है जबकि टीवी चैनल और  एफ एम रेडियो हर पल लोगों से जुड़े रहते हैं। यही नियमितता उनको कई गुना शक्ति देती है।  
       किस विषय को देशभक्ति से जोड़ना है और किसे अलग हटाना है तथा किस  पर संवदेनाओ को भुनाना है और किसमे  निर्लिप्त्ता का भाव रखना है, यह विषय देखकर   प्रचार माध्यम अब बेहिचक अपने हितों के अनुकूल  व्यवसायिक रणनीति बदलते रहते हैं।  ऐसा लगता है कि देश के लोगों को एक समूह में एकत्रित कर अपनी तरफ निरंतर आकर्षित करने के लिये प्रचार माध्यम जीतोड़ प्रयास कर रहे हैं।  अपने व्यवसायिक हितों के अनुसार किसी छोटे आंदोलन को राष्ट्रव्यापी और राष्ट्रव्यापी को सीमित विचार या क्षेत्र का बताने में प्रचार माध्यमों ने महारथ हासिल कर ली है।  जहां सनसनी हो वहां तो यह प्रचार माध्यम खुलकर आक्रामक हो जाते हैं वहीं हादसों पर रुदन का सामूहिक आयोजन करने में भी देर नहीं करते।    
            हमने ऐसी कई खबरें देखी हैं जो पहले भी घटती थीं। पढ़ने पर आम पाठक उत्तेजित होते पर  प्रचार माध्यम उनको छोटी कर छापते थे।  अब ऐसी  स्थिति देखते हैं कि उसी प्रकार की  खबरों से कई दिन तक उत्तेजना फैलाने के लिये यह प्रचार माध्यम तत्पर होते है।  वजह साफ है कि समाचार और बहसों के दौरान विज्ञापन का समय खूब पास होता हैं।
      कुछ लोग कहते हैं कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है। यह एक तर्क है  पर व्यवहार में हम देखें तो यह आजादी प्रचार माध्यमों के केवल व्यवसायिक हितों तक ही सीमित है। स्वतः प्रकट होने वाली खबरों को देना और उन पर परंपरागत रूप से  प्रतिष्ठित विद्वान बुलाकर बहस करना ही केवल अभिव्यक्ति नहीं है।  उनकी इस बहस में विचारों की संकीर्णता अनेक बार देखी जा सकती है। आम लोगों के उत्तेजित बयानों से स्वयं को जिम्मेदारी से प्रथक रखते  हुए समाचार बनाना इस बात का प्रतीक है कि कहीं न कहीं प्रचार माध्यम अपनी व्यवसायिक बाध्यताओं से बंधे हुए है।
    बहरहाल हम प्रचार माध्यमों पर आक्षेप करने के साथ ही  समाज की स्थिति पर भी देखें।  हैरानी इस बात की है कि किसी घटना विशेष  पर लोग अपनी तरफ से अपने मस्तिष्क में विचार निर्माण करने की बजाय इन्हीं प्रचार माध्यमों के विचार या राय से आगे बढ़ते हैं।  जब कोई घटना इन प्रचार माध्यमों की वजह से अधिक चर्चित होती है तब हम आम लोगों की क्या कहें विशिष्ट लोग भी अपनी बात कहने के लिये आतुर होने लगते हैं।  सभी को लगता है कि कहीं उस घटना पर प्रतिक्रिया नहीं दी तो लोग उन्हें समाज या धर्म सेवा से निवृत्त हुआ मान लेंगे और दोबारा छवि निर्माण उनके लिये कठिन है। जिस तरह फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्रियां लगातार फिल्म इसलिये  करते रहना चाहते हैं कि कहीं उनकी दर्शकों में छवि विस्मृत न हो जाये या फिर पत्रकार निरंतर खबरों के साथ सक्रिय रहते हैं कि कहीं उनके स्वामियों में उनकी निष्क्रिय छवि बनी रहे या फिर वकालत करने वाले लोग अपने काम में इस तरह लगे रहते हैं कि कहीं उनके पास मुकदमें कम न हो ताकि कहीं उनके अभ्यास अवरुद्ध  होने पर लोग उनकी योग्यता पर संदेह न करने लगें, उसी तरह समाज, धर्म, कला और बौद्धिक कर्म करने वाले लोग भी हर विषय पर प्रतिक्रिया के लिये  इस उद्देश्य से अपना श्रीमुख तैयार किये रहते हैं कि कहीं उनके अनुयायी उनके स्वास्थ्य या भावना पर संदेह न करने लगें।  यह स्थिति दयनीय है।
          ऐसे में कभी कभी तो यह लगता है कि अगर हम अखबार न पढ़ें या समाचार टीवी चैनल न देखें तो शायद अत्यंत प्रसन्नचित रहेंगे।  एक समय था जब अखबार या टीवी देखकर उनके विषयों से प्रभावित थे।  उनसे अपने अंदर विचारों का निर्माण या विध्वंस होता था मगर तब उनकी सामग्री चिंत्तनपरक थी।  अब वह वह अनर्गल चिंत्तन दर्शकों और पाठकों पर थोपते हैं।  पहले अनेक अखबार अपने संपादकीयों में जनता की आवाज को स्थान देते थे जबकि टीवी चैनल यह मानकर चलते हैं कि इस देश में लोग बाह्य प्रभाव से ही  केवल हंसना या रोना जानते हैं।  उनके पास अपना सोचने के लिये कुछ नहीं है।  हंसने के नाम पर फुहड़पन तो रोने के नाम पर हादसे लोगों के सामने लाये जा रहे हैं।  ऐसा नहीं है कि सभी प्रचार माध्यम  कोई चिंत्तनपरक सामग्री नहीं दे रहे पर मुख्य बात यह है कि वह उसकी प्रस्तुति को हल्का बना देते हैं या फिर उसको स्वयं ही एक महत्वहीन सामग्री बताते हैं।  उससे भी बुरी बात यह कि वह हिन्दी के नाम हिंग्लिश लाद रहे हैं।  उनके लिये शहरों में पढ़ रही युवा पीढ़ी ही उनकी प्रयोक्ता है।  वह उसी से ही कमाना चाहते हैं।  अनावश्यक रूप से अंग्रेजी शब्दों का उपयोग उनके द्वारा प्रकाशित या प्रसारित सामग्री को भद्दा बना रही है यह उनको कोई समझा नहीं सकता।  इस तरह वह भारतीय समाज से अपना आत्मीय भाव खो रहे हैं।  हम जैसे उन पाठकों को जो अपने प्रचार माध्यमों से आत्मीय भाव रखते रहे हैं अब उनसे दूरी अनुभव करने लगे हैं।  यही कारण है कि उनकी देशभक्ति में व्यवसायिकता का पुट दिखने लगा है।  उनका रुदन और हंसना दोनो ही अब हमें प्रभावित नहीं करता।  यही कारण है कि हम अपने जज़्बात अंतर्जाल पर लिखकर भाषा, समाज तथा धर्म के प्रति अपने आत्मीय भाव को जिंदा रखने का प्रयास करते रहते हैं, जो इन्हीं प्रचार माध्यमों ने कभी पैदा किया था।  इन सबके बावजूद एक बात तय है कि इन प्रचार माध्यामों के प्रभाव में पूरा देश है यह अलग बात है कि उसमें सकारात्मक जन चेतना पैदा करने के लिये जो कुशल प्रबंध चाहिये वह उनके पास नहीं है।  वह भाव उभार सकते हैं पर स्थाई चेतना का निर्माण नहीं कर सकते।
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
5.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.जागरण पत्रिका 
८.हिन्दी सरिता पत्रिका 
९.शब्द पत्रिका

Tuesday, November 08, 2011

हरिद्वार के गायत्री महाकुंभ में हादसाःभारतीय अध्यात्म दर्शन को समझने की आवश्कयता-हिन्दी लेख (trezdy in gayatri mahakumbh and in haridwar and hindi indian religion-hindi lekh or article

              हरिद्वार में आयोजित गायत्री महाकुंभ के दौरान मची भगदड़ में अनेक लोगों की मौत होने का समाचार अत्यंत दुःखदायी है। हम यह कामना करते हैं कि परमात्मा मृतकों के परिवारों को पीड़ा सहने की क्षमता और हताहतों को जल्दी स्वास्थ्य प्रदान करे।
            एक योगसाधक, गीता शिष्य और और अध्यात्मिक लेखक होने के नाते इस घटना पर हमारे लिये लिखना अत्यंत द्वंद्वपूर्ण और पीड़ादायक है। एक तरफ भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का भंडार है तो दूसरी तरफ मासूम और भोले लोगों का अज्ञान जो उन्हें कहीं भी इंसान से भीड़ की भेड़ बना देता है। कभी मानसिक शांति तो कभी अपना सांसरिक कार्य सिद्ध होने की कामना उनको धार्मिक कर्मकांडों की तरफ आकर्षित करती है। जिस कार्य को करना उनके हाथ संभव है उसके लिये कोई याचना नहीं करता पर जिसका आधार कोई अन्य व्यक्ति, समय या स्थितियां हैं वहां हर मनुष्य अनकूल परिणाम के लिये अदृश्य शक्ति की तरफ देखता है। चुप बैठ नहीं सकता तो अपने हाथ से हवन, तंत्र मंत्र या दान अपनी सक्रियता से अपने आपको तसल्ली देता है। ऐसे में बरसों से सक्रिय बाज़ार तंत्र उसके सामने अध्यात्म के नाम पर अपना सौदा बेचता है। जिसे आदमी समझ नहीं पाता। संसार के काम तो बनते बिगड़ते रहते हैं जिसका बन गया वह मुरीद बन गया जिसका नहीं बना वह भगवान की मर्जी मानकर बैठ गया। बहरहाल अध्यात्म के नाम मेले लगते हैं और लोग उसमें शामिल होकर अपने आपको धन्य मानते हैं। सब ठीक रहा तो आयोजकों की वाह वाह और कोई हादसा हुआ तो दुर्भाग्य का दोष दिया जाता है।
           हम यहां गायत्री परिवार के संस्थापक श्रीराम आचार्य की जन्मशती के अवसर आयोजित कार्यक्रम में हुई भगदड़ पर न तो आयोजकों से सवाल करेंगे न ही सरकार या पुलिस पर आक्षेप करेंगे। हम तो यह सीधे भारतीय समाज के महानुभावों को संबोधित कर पूंछेंगे कि क्या वह वास्तव में अध्यात्म और धर्म का मतलब समझते हैं? क्या वह पेशेवर गुरुओं और संस्थाओं के शीर्षपुरुषों की सोच को ही अंतिम मानने की बजाय कभी स्वयं धर्म ग्रंथों की विषय सामग्री पर चिंत्तन और मनन करते हैं?
          सवाल किया है पर जवाब नहीं चाहिए। भारतीय समाज की स्थिति यह है कि उसे अध्यात्म ज्ञान की चर्चा और कर्मकांड के के निर्वहन के लिये एक मध्यस्थ चाहिए। लोग सामान्य सांसरिक विषय पर इस तरह ज्ञान बघारते हैं जैसे कि उनका कोई सानी नहीं है पर जब अध्यात्मिक ज्ञान की बात हो तो कहते हैं कि यह तो सन्यासियों और संतों का विषय है। श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि यज्ञ और हवन केवल प्रथ्वी पर उत्पन्न वस्तुओं से ही नही होता वरन् देह में भी वही पदार्थ हैं और पसीने के माध्यम से उनको बाहर लाना भी यज्ञ सम्पन्न करने जैसी प्रक्रिया है। भगवान श्रीकृष्ण ने प्रायायाम और ध्यान को भी यज्ञ कहा है। प्राणायाम से देह में जो ऊर्जा पैदा होती है वह यज्ञ सामग्री ही है। उस समय गायत्री मंत्र का जाप करने का सीधा मतलब यही है कि हम एक महान अध्यात्मिक यज्ञ कर रहे हैं। योगसाधक इस यज्ञ को प्रतिदिन करते हैं और इसके लिये उनको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं होती। दूसरी बात यह है कि अध्यात्मिक कर्म नितांत एकांत में किया जाता है उसके लिये मेले नहीं लगते। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान यज्ञ को श्रेष्ठ माना है। ज्ञानी लोग प्राणायाम आदि के बाद ध्यान तथा मंत्रजाप वही यज्ञ और हवन काम करते हैं जो सामान्य मनुष्य बाहरी पदार्थों से करते हैं। यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वैसे तो मुझे सारे भक्त प्रिय हैं पर ज्ञानी तो मेरा ही रूप है।
        अध्यात्मिक के नाम पर समय पास करने या मनोरंजन के लिये इस तरह के मेले लगते हैं उसमें शामिल होने वाले लोगों को कितना लाभ होता है इस पर बहस करने की आवश्यकता नहीं है पर इतना तय है कि परेशान हाल लोग कुछ समय के लिये अपने घर से बाहर होकर तनाव रहित होते हैं पर फिर वापसी पर वहीं पुरानी स्थिति हो जाती है। एकांत में योग साधना तथा अध्यात्मिक चिंत्तन करने वाले जहां है वहीं प्रतिदिन स्वयं को नवीनता प्रदान करते हैं। दरअसल इस तरह के मेले लगवाने वाले ज्ञानी नहीं हो सकते। यह एक तरह से अपने धर्म का प्रदर्शन है जिसे राजस या तामस कुछ भी समझा जा सकता है पर सात्विक कतई नहीं कहा जाता। ऐसे में समाज के समझदार लोगों को यह देखना चाहिए कि वह अपने आसपास के लोगों को समझायें कि इस तरह के मेले अध्यात्मिक शांति या मानसिक सुख नहीं दे सकते।
--------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
5.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.जागरण पत्रिका 
८.हिन्दी सरिता पत्रिका 
९.शब्द पत्रिका

Friday, July 01, 2011

जनसुविधा केंद्र अधिक बनाने की मांग होनी चाहिए-हिन्दी लेख (jansuvidha kendra adhik banane ki mang hona chahie-hindi lekh)

             यह शर्म की बात है कि एक टीवी चैनल ने दिल्ली में फैली गंदगी के नाम पर वहां के निवासियों के यहां वहां पेशाब करने का स्टिंग ऑपरेशन किया। यह दूसरा ऐसा स्टिंग ऑपरेशन हैं जिसमें पिशाब मुद्दा बना है। इससे पहले पुणे के एक टिकिया बेचने का ठेला चलाने वाले का स्टिंग ऑपरेशन प्रस्तुत किया गया था। उसे उस लोटे में पिशाब करते हुए दिखा गया था जिससे वह अपने ग्राहकों को पानी पिलाता था।
              दिल्ली की गंदगी में जनभागीदारी दिखाने के लिये पेशाब करते हुए पकड़े गये लोगों के बयान दिखाये गये। यह दिखाना अनुचित लग रहा था। कुछ सवाल हुए जिनसे क्षोभ हुआ तो हंसी भी आई।
          एक बुजुर्ग से पूछा गया कि ‘आप तो बुजुर्ग हैं फिर ऐसे खुले में पेशाब क्यों करते हैं।’
          हम तो यह कहेंगे कि जितनी उनकी उम्र थी उसे देखते हुए तो यही कम नहीं था कि वह स्वयं पिशाब कर रहे थे। अपने स्वास्थ्य का स्तर अभी भी स्वयं चलने लायक बनाये रखा था। इसके अलावा वह कैमरे के सामने आकर भी अपने हृदय को मजबूत रख सके, यह बात कम प्रशंसनीय है।
         कैमरे के सामने पकड़े गये लोगों का चेहरा भारी तनाव में था। ऐसा तनाव पैदा करना हमारे हिसाब से अपराध है। यह ठीक है कि कहीं खुले में पिशाब करना ठीक नहीं है पर मुश्किल यह है कि देश का विकास बहुत हुआ है और उसने जनसुविधाओं को लील लिया है। उसके अलावा उसने लोगों की सहनशीलता को भी समाप्त कर दिया है। लोगों को अपनी जीवन की हर आवश्यकता पूरी करने के लिये पहले से अधिक दूर जाना पड़ता है। शहर अब बड़े हो गये हैं और रोजगार की स्थितियों में भारी बदलावा आया है। आदमी के पास साइकिल हो या कार या स्कूटर उसकी दैहिक क्रियायें पहले की तरह हैं। आदमी लोहे पर लोहा खरीदता जा रहा है, पत्थर सजा रहा है पर उसकी देह लोहा की नहीं बनी और न दिल पत्थर की तरह मजबूत हो सकता है। दरअसल मलमूत्र के त्याग से मनुष्य शरीर तनाव मुक्त होता है।
                 आदमी का तो ठीक है स्त्रियों के साथ भी समस्या अधिक विकट होती जा रही है। स्त्रियों पहले से अधिक घर से बाहर निकलने लगी हैं। इसका कारण यह है कि कार्यस्थल और घर की दूरियां बढ़ने से वह पुरुषों की घर की जिम्मेदारी में हिस्सा बंटाने के लिये जहां सामान वगैरह खरीदने जाने लगी हैं तो वहीं कमाने के लिये उनको भी अधिक दूरी वैसे ही तय करनी पड़ती है जैसे पुरुष करते हैं। उनके लिये तो वैसे भी जनसुविधा केंद्र कम बने हैं। स्त्रियों के विकास की बात बहुत करने वो हैं पर उनके लिये अधिक से अधिक जनसुविधा केंद्र बनाने की कोई मांग नहंी करतां।
कहने का अभिप्राय यह है कि जो पहले से ही उपलब्ध जनसुविधा केंद्र थे उनकी संख्या कई गुना बढ़ना चाहिए था पर हो उल्टा हो रहा है। अनेक जगह पुराने जनसुविधा केंद्र लापता हो गये हैं और जो नये बने होंगे वह उनसे कम ही होंगे। मुश्किल यह है कि जनता की चिंता करने वाले जितने भी लोग हैं उनके सामने शायद ऐसी समस्यायें नहीं आती इसलिये वह इसकी चिंता नहंी करते। पत्रकारिता करने वालों को भी शायद इसका आभास नहीं है कि सामान्य आदमी के लिये संघर्ष बहुत आसान नहीं है और ऐसे में उसे जनसुविधा केंद्रों अधिक निर्माण होना चाहिए। एक बात तय है कि जो देश की समस्याओं के बारे में सोचते हैं या प्रचार करते हैं उनमें से सभी के पास पेट्रोल चालित वाहन होंगे। पैदल या साइकिल पर शायद कोई चलता होगा इसलिये उनको नहीं पता शरीर के अधिक संचालन से पसीना और पेशाब शरीर से बाहर अधिक निकलता है। इनमें शायद ही किसी ने जिंदगी में ठेला चलाकर देखा होगा। दोष उनका नहीं है। उनके मस्तिष्क तथा हृदय में संवेदनाओं का प्रवाह केवल अपने स्वार्थों तक ही सीमित है। उनका दोष नहीं है इस पूरे समाज की स्थिति यही है। गरीब और मजदूर की उपस्थिति को यहां मनुष्य की तरह देखा ही कहां जाता है?
             अभी तक हम लोग विकास का सपना अमेरिका जैसा देख रहे हैं। पता नहीं वहां जनसुविधा केंद्रों की स्थिति क्या है? अलबत्ता अमेरिका में आबादी कम है फिर वहां के दृश्य हम टीवी या फिल्मों पर देखते हैं उससे तो लगता है कि शायद वहां जनसुविधा केंद्र पर्याप्त मात्रा में होंगे। मगर हमारे देश में विकास उनको लील रहा है।
हमारे एक दोस्त ने हमसे मजेदार बात कही कि ‘‘मैं जब घर से निकालता हूं तो दो चीजें नहीं भूलता। एक तो पानी की बोतल साथ लेना दूसरा निकलने से पहले अपने जलविकार निष्कासित करना। मार्ग में प्यास और पेशाब का संकट अत्यंत तनाव का कारण बनता है।’’
           इधर हम स्वास्थ्य विशेषज्ञों की इस चेतावनी को अनदेखा कर रहे हैं कि हमारे देश में चालीस प्रतिशत से अधिक लोग उच्चरक्तचाप के शिकार हैं और इनमें से कई तो इसे जानते भी नहीं। दरअसल पेशाब उच्च रक्तचाप को कम करता है। फिर पेशाब करते समय जानवर तक को मारना वर्जित है तो फिर इंसान की बात ही क्या? अगर इस तरह आपॅरेशन करते हुए किसी का पेशाब बंद हो गया तो उसके लिये खतरनाक भी हो सकता है। दूसरा यह भी कि शारीरिक श्रम करने पर जहां बाहर पसीना निकलता है वहीं देह को मौजूद जल भी निकासी की तरफ बढ़ता है। यह बात समझना चाहिए। कुछ लोगों को शायद यह अजीब लगे पर हमारा मानना है कि जनसुविधा केंद्र बनाने का अभियान छेड़ना चाहिए।
---------------


कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
5.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.जागरण पत्रिका 
८.हिन्दी सरिता पत्रिका 
९.शब्द पत्रिका

Wednesday, April 20, 2011

अण्णा हज़ारे और बाबा रामदेव की तुलना गलत-हिन्दी लेख (anna hazare aur baba ramdev ki tulna galat-hindi lekh and article)

          अण्णा हज़ारे और बाबा रामदेव में कोई तुलना नहीं हो सकती मगर लोग करना चाहते हैं। इसका कारण केवल यही है कि दोनों ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान छेड़े हुए हैं और कम से कम एक दिन के लिये दोनों साथ एक मंच पर दिखे। हमारे देश के लोगों की मानसिकता है कि वह व्यक्त्तिवों में द्वंद्व देखना चाहते हैं और अगर वह न हो तो फिर अपने ही मस्तिष्क में दोनों में से किसी एक की श्रेष्ठता पर विचार करते हैं। फिर बहसें करते हैं। एक किसी को श्रेष्ठ तो दूसरा किसी को श्रेष्ठ बताता है।
       जब हम छोटे थे तो अक्सर ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी में से ‘बड़ा कौन’ जैसे विषय पर बुजुर्गों की बहस देखा करते थे। वैसे तो हमारा समाज मानता है कि परब्रह्म परमात्मा का ही तीनों रूप है। ब्रह्मा जन्म, विष्णु जीवन तथा शिव शक्ति प्रदान करने वाले भगवत्रूप माने जाते हैं। इसके बावजूद कुछ लोग विष्णु भगवान को ही श्रेष्ठ मानते हैं-इसका कारण यह भी हो सकता है क्योंकि उनकी पत्नी लक्ष्मी को माना जाता है जिसके भक्त सारे संसार में हैं। प्रसंगवश अवतार केवल भगवान विष्णु के ही माने गये हैं। यह बहस अगर हमारे अंदर मौजूद धार्मिक भावना का प्रमाण है तो अध्यात्मिक ज्ञान से पैदल होना भी दर्शाती है। अब देश में बाबा रामदेव तथा अण्णा हज़ारे को लेकर बहस चल रही है। इसका एक कारण यह भी है कि भ्रष्टाचार से त्रस्त देश को अब यह यकीन दिलाया जा रहा है कि उसे अब ईमानदारी के युग में पहुंचा दिया जायेगा। इसके लिये कितने लोग कितने आन्दोलन  चला रहे हैं पर सभी को एक मान लेना भी गलत होगा। लक्ष्य एक है पर मार्ग प्रथक प्रथक हैं उससे भी अधिक संशय इस बात का है कि उनके उद्देश्य क्या हैं?
       इधर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक खेल बनता जा रहा है। ऐसा खेल जिसमें प्रचार माध्यमों का समय विज्ञापन का प्रसारण के साथ अच्छा बीत जाता है। उससे देखकर तो लगता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी प्रचार के लिये बेचने का साधन बन गया है। यहां हम बाबा रामदेव और अण्णा हज़ारे की प्रशंसा करेंगे कि उन्होंने अपने प्रयासों से समाज में चेतना जगाने का प्रयास किया है पर सवाल यह है कि इसके परिणाम अभी प्रकट नहीं हो रहे।
        बाबा रामदेव ने जब योग शिक्षक के रूप में लोकप्रियता प्राप्त कर ली तो वह उससे प्रथक सांसरिक विषयों पर प्रवचन करने लगे और हमारा मत तो यह है कि योग को छोड़कर सारे विषय राजनीतिक हो चुके हैं। खेल, फिल्म, समाज सेवा, साहित्य, पत्रकारिता, स्वास्थ्य, वकालत, गरीबा का कल्याण, वन तथा पशु संरक्षण तथा ऐसे ढेर सारे विषय हैं जिनमें परिवर्तन बिना राजनीति के नहीं आता। योग सिखाते हुए बाबा रामदेव काला धन तथा भ्रष्टाचार विषय पर बोलने लगे। अब तो वह एक राजनीतिक दल बनाने में जुट गये हैं। बहरहाल उन्होंने भारत स्वाभिमान बचाने के लिये आंदोलन छेड़ा। उससे उनकी लोकप्रियता एक हरफनमौला के रूप में हो गयी जो योग के अलावा सांसरिक विषयों में भी पारंगत हैं। सब ठीक चल रहा था कि महाराष्ट्र के समाज सेवी अण्णा हज़ारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन करने दिल्ली आ गये। उनको विशुद्ध रूप से गैर राजनीतिक व्यक्ति माना जाता है इसीलिये उनके आंदोलन के प्रति भी यही लोगों की धारणा बनी। यहां तक कि इस आंदोलन से राजनीतिक हस्तियों को दूर ही रखा गया। ऐसे में अण्णा हजारे रातोंरात देश के नायक बन गये। यह सब प्रचार माध्यमों का कमाल था। कुछ लोगों ने तो ऐसा दिखाया कि बाबा रामदेव महत्वहीन हो गये हैं। इस समय जब भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की बात होती है तो स्वामी रामदेव से कहीं अधिक अन्ना की लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर दिखता है। अभी भी कुछ लोग मान रहे हैं कि दोनों महानुभाव एक हैं पर वह बात अब नहीं दिखती।

        जहां तक दोनों के व्यक्तित्व और कृतित्व की बात करें तो बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के बीच कोई साम्यता नहीं है। 73 वर्षीय अण्णा साहेब बाबा रामदेव से कम से 30 से 35 वर्ष के बीच बड़े होंगे-बाबा रामदेव की सही उम्र का अनुमान नहीं है पर ऐसा लगता है कि वह चालीस से कम ज्यादा होंगे। अण्णा साहेब का योग से कोई वास्ता नहीं है। भले ही वह सामाजिक आंदोलन चलाते रहे हों पर उनके विषय कहीं न कहीं राजनीतिक रूप से प्रभावित रहे हैं। स्वयं वही कहते हैं कि ‘हमने दो सरकारें गिराई हैं।’ उनकी सादगी उनके विरोधियों को राजनीतिक चालाकी भी लग सकती है पर उनके विषय अविवादित हैं। अण्णा साहेब देश में ईमानदारी लाना चाहते हैं और इसके लिये कानून बनवाने का प्रयास कर रहे हैं। बाबा रामदेव भारतीय योग साधना के आधुनिक और प्रसिद्ध शिक्षक हैं जो न केवल व्यक्ति की देह को स्वस्थ रखती है बल्कि चरित्र निर्माण के लिये भी प्रेरित करती है। अगर आप योग साधना की दृष्टि से देखेंगे तो अण्णा हज़ारे तो अनैतिकता से भरे गंदे नाले को बीच में से साफ करने का प्रयास कर रहे हैं जबकि बाबा रामदेव उसी नाले में शुद्ध जल की धारा बहाकर उसमें शुद्ध जल प्रवाहित करना चाहते हैं। सामान्य दृष्टि से देखेंगे तो बाबा रामदेव के प्रयास अधिक सक्रिय नहीं दिखेंगे क्योंकि वह नारे नहीं लगा रहे जिससे लोगों के सामने भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रियता नहीं दिख रही। इसके अलावा बाबा रामदेव अपने विषय में योग भी शामिल करते हैं इसलिये भ्रष्टाचार का विषय मुखर नहीं हो पाता। जबकि अण्णा साहेब केवल इसी विषय पर बोल रहे हैं फिर उनकी धवल छवि के कारण भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा के रूप में दिख रही है।
       अण्णा हज़ारे साहिब सज्जन आदमी हैं पर उनके साथ जुड़े लोगों पर अब प्रश्नचिन्ह लगने लगा है। इसका कारण यह है कि उनके सभी साथी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले हैं या वर्तमान व्यवस्था से जुड़े रहे हैं। ऐसे में अण्णा साहिब का आंदोलन विरोधियों से जुझता दिख रहा है। फिर अण्णा साहेब के पास अपनी धवल छवि के अलावा अन्य कोई हथियार नहीं है जिससे वह समाज में सुधार ला सकें। इसके विपरीत बाबा रामदेव के पास योग जैसा ब्रह्मास्त्र है। अगर बाबा रामदेव का राजनीतिक आंदोलन सफल नहीं भी हुआ तो भी योग के नये सूत्रधार के रूप में उनका नाम सदियों तक पूरी दुनियां में याद रखा जायेगा जबकि आंदोलन का निश्चित परिणाम न मिलने पर अण्णा साहेब की छवि फिर महाराष्ट्र तक ही सिमट जायेगी। अंतिम अंतर यह कि अण्णा साहेब अपने भाषण से अपने अनुयायियों की बुद्धि में चेतना लाकर उसकी देह को संघर्ष के लिये प्रेरित करने वाले व्यक्ति हैं जबकि बाबा रामदेव का प्रयास लोगों को मन और देह की दृष्टि से स्वस्थ बनाकर वैचारिक रूप से शक्तिशाली बनाने का है।
           बाबा रामदेव योग शिक्षक हैं। कहा जाता है कि ‘रमता योगी बहता पानी इनकी माया किसी ने नहीं जानी’। जैसे बाबा रामदेव योग साधना करते रहेंगे वैसे उनका तेज बढ़ता रहेगा। वह आयु को परास्त करेंगे। स्वास्थ की दृष्टि से तो कहना ही क्या? जब कोई उनकी आलोचना करता है तो मन करता है कि उससे पूछा जाये कि ‘क्या, वह वाकई उतना स्वस्थ है जितना रामदेव जी दिखते हैं। क्या वह मधुमेह, कब्ज, हृदय या कमर दर्द के विकार से परेशान नहीं है।’
        कभी कभी तो यह कहने का मन करता है कि जो व्यक्ति स्वस्थ होने के साथ योग साधक भी हों, वही उनको चुनौती दे तो अच्छा रहेगा। विशुद्ध रूप से योग बेचने वाले योगी स्वयं भी महान योगी के पद पर प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं और उनकी शक्तियों को कोई योग साधक ही समझ सकता है। अण्णा हज़ारे के कहे अनुसार कानून बन गया तो उनका कार्य खत्म हो जायेगा जबकि बाबा रामदेव का काम तो लंबे समय तक चलने वाला है। मतलब अण्णा हज़ारे का कार्य क्षणिक प्रभाव वाला है जबकि बाबा रामदेव लंबी लड़ाई लड़ने वाले योग योद्धा हैं। वैसे इन दोनों महानुभावों को देखकर कहना पड़ता है कि हमारी धरती वाकई महान है जो हमेशा ही हीरे के रूप में मनुष्य हमारे समाज को सौंपती हैं। इन हीरों की किस्म अलग अलग हो सकती है और श्रेष्ठता के रूप में किसी को मान्यता देना कठिन है।
        एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हम दोनों पर निरंतर दृष्टि गढ़ाये रहते हैं। हमें इस बात में दिलचस्पी है कि आखिर दोनों कैसे अपने अभियानों के बेहतरीन परिणाम प्राप्त करेंगे?
----------------

लेखक संपादक-दीपक "भारतदीप", ग्वालियर 
writer and editor-Deepak "Bharatdeep" Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-----------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
5.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.जागरण पत्रिका 
८.हिन्दी सरिता पत्रिका 
९.शब्द पत्रिका

Wednesday, April 13, 2011

मन मरा तो आदमी भी, जिम्मेदार कौन-हिन्दी चिंत्तन आलेख (man mara to aadmi bhi-hindi thought aricle)

सोनाली और अनुराधा नाम की दो बहिनों ने छह माह तक अपने घर में स्वयं को बंद रखा। उन्होंने यह कैद खुद चुनी। उन्होंने भूख को चुना, प्यास को चुना यानि स्वयं अपनी मौत खुद चुनी। उसकी जिम्मेदारी किसी पर डालने का प्रयास बेतुका है। भाई जिम्मेदार है या समाज या पड़ौसी या पास में ही कार्यरत कल्याण संस्था के पदाधिकारी, यह सोचना व्यर्थ है। बिना रोए बच्चे को मां भी दूध नहीं पिलाती-क्या यह बात उन दोनों ने नहीं सुनी थी। पढ़ी लिखी थीं, प्रकृति ने उनको सारी इद्रियां कार्यरूप में प्रदान की थी। वह मन को मारकर बैठ गयीं तो उन इंद्रियों से काम कौन लेता? यह मन ही तो इंद्रियों को दौड़ता है, लड़ाता है और बहलाता है।
उनकी कहानी कोई ऐसी नहीं है जिस पर अधिक लिखा जाये। हादसों से गुजरता इंसान कई बार भारी तकलीफ में आ जाता है पर चंचल मन उसे आगे ले जाता है। वह लड़ता है फिर चल पड़ता है। इस संसार में ऐसा कौन है जिसने अपना नहीं खोया और कौन ऐसा है जो अपना नहीं खोएगा। पहले मां खोई फिर पिता! फिर उनका भाई विवाह के बाद अपनी बहिनों को दिल्ली में उनको छोड़कर बैंगलौर चला गया। उनका प्रिय कुत्ता मर गया। पहले तनाव फिर अवसाद के दौर में दोनों बहिनों की इंद्रियों को निष्क्रिय कर दिया। अहंकार बुरा होता है पर उसका भी इस सीमा तक होना जरूरी है कि ‘मेरा पास काम करने वाली देह है और वह बेकार नहीं है।’
इद्रियों की निष्क्रियता और अहंकार की शून्यता के परिणामस्वरूप आंखों से रूप दर्शन, कानों से स्वर श्रवण, नाक से गंध को ग्रहण, मुख से रस का उपभोग और देह से स्पर्श करते हुए भी उसकी अनुभूति से दूर हो गयीं। मन मरा तो मनुष्य देह होते हुए भी मृत हो जाता है। दूर दृश्यों के प्रसारण में उनके चेहरे देखे तो तय करना कठिन हो रहा था कि क्या देख रहे हैं? मानवियां या उनके शव! वह गुणातीत हो जातीं तो योगी कहलातीं पर अवसाद और निराशा ने उनको मनोरोगी बना दिया। देह विकारों की पहचान न करते हुए स्वयं ही विकारमयी हो गयी।
कुछ दिन पहले दूरदूश्यों में एक 80 वर्ष का योगी दिखाया गया जिसने 70 वर्ष तक कुछ खाया पीया नहीं था! मगर वह सक्रिय था पर अनुराधा और सोनाली योगी नहीं थी नतीजा वह शवरूप होती गयीं। योगी होती तो आदर की पात्र होतीं पर शवरूप हो गयीं तो दया उन पर बरसने लगी।
दोनों चार्टेड एकाउंटेंट और कंप्यूटर की जानकार थीं। अवसाद ने अपने कौशल से ही उनको दूर कर दिया। सोनाली ने दूरदृश्यों में कहा ‘किसी ने उनको कालू जादू किया था।’
हैरान करती हैं यह बात! हमारे आधुनिक शिक्षाविद् दावा करते हैं कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के विकास से देश अंधविश्वास से मुक्त हो जायेगा? यह तो उल्टा हो रहा है? पढ़े लिखे लोगों की जीवन से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और ऐसे में दैहिक निष्क्रियता से उनका आत्मविश्वास लुप्त हो जाता है। अपढ़ महिला पुरुष काला जादू पर यकीन करते हैं पर फिर भी जीवन से लड़ते हैं पर पढ़ा लिखा आदमी तो संघर्ष करना ही छोड़ देता है। एक शानदार फ्लैट में रही रहीं थी। सभ्रांत परिवार और वैसा ही आसपास समाज भी बस रहा था। ऐसे में जिंदगी के सामने आत्मसमर्पण करते हुए भूख और प्यास को गले लगाना! यकीनन यह शिक्षित आदमी का काम नहीं लगता पर यह सच्चाई है। इस देश में ऐसी हजारों ऐसी महिलायें हैं जो अकेली होते हुए भी अपना संघर्ष जारी रखती हैं। यकीनन वह कथित रूप से उच्च सभ्रांत परिवार की नहीं होती।
हमारे बुद्धिजीवी समाज पर बरस रहे हैं। आजकल का पूरा समाज ही उनको अब संवेदनहीन दिखाई दे रहा है? समाज यानि क्या? लोगों का समूह ही न! मगर उसकी कोई अपनी सक्रियता नहीं होती। उसमें शामिल लोगों की निजी सक्रियता ही समाज की सक्रियता कहलाती है। फिर हर आदमी की निजता अलग है वैसे ही उसकी गतिविधि भी। बड़े शहर और सभ्रांत निवासघरों की निजता एकांत है जबकि छोटे शहरों और असभ्रांत, गरीब तथा शिक्षित समाज के लोग  निजता परिवार, पड़ौस तथा पैसा तीनों के साथ जोड़ते हैं। जरूरत पड़ने पर अहंकार दिखाते हैं तो फिर विनम्र भी हो जाते हैं। जीवन में लोचदार रुख अपनाने के लिये जरूरी है अतिअहंकार रहित होना और अंग्रेजी शिक्षा मनुष्य को एकांगी तथा अतिअहंकारी बना देती है। अपनी देह को नष्ट करने वालों की सूची अगर देखी जाये तो उसमें आधुनिक शिक्षा के छात्रों की संख्या कहीं अधिक है पर प्राचीन शिक्षा में रचे बसे लोग कम ही दिखेंगे यह अलग बात है कि हम उनको अशिक्षित और गंवार कहते हैं।
सभी बुद्धिजीवी बड़े शहरों में सभ्रांत समाजों में रहते हैं। वह वही समाज देख रहे हैं। देश में असभ्रांत, गरीब, अशिक्षित समाज से जुड़े छोटे शहरों के लोगों का संघर्ष वह नहीं देख पाते। जब हम अपने समाज को देखते हैं तो बड़े शहरों का समाज अपनी देश के छोटे और मझौले शहरों से अलग दिखता है। महात्मा गांधी ने शहरी और ग्रामीण भारत की पहचान की थी। वह अमीर और गरीब के बीच खाई पाटना चाहते थे। गांधी दर्शन इसलिये ही लोकप्रिय नहीं हो सका क्योंकि वह मध्य वर्गीय शहरों और नागरिकों को समझ नहीं पाये । एक मध्य वर्गीय शहरी भारतीय अमीरी का स्वांग करते हुए देश और समाज के लिए लड़ता भी है पर जब टूटता है तो भयानक अवसाद में घिर जाता है। यही वह वर्ग है जो विचाराधाराओं को अपनी प्रयासों से प्रवाहित करता है। गांधी दर्शन भारत में चर्चित बहुत है पर लोकप्रिय नहीं बन सका क्योंकि उसमें मध्य शहरी भारतीय वर्ग के लिये कुछ नहीं है। इस वर्ग ने गांधीजी के स्वतंत्रता को ताकत दी पर पाया कुछ नहीं। इसके विपरीत गरीब के कल्याण का बात करते हुए इसी मध्यम वर्ग की उपेक्षा की गयी।
समाज कोई व्यक्ति नहीं है। जब आप समाज को संबोधित करते हुए कोई बात कर रहे हैं तो समझ लीजिये हवा में उड़ा रहे हैं। समाज से व्यक्ति की पहचान है पर मनुष्य की इंद्रियां समाज के स्वरूप को समझ नहीं सकती। उसके लिये मन और बुद्धि की सक्रियता आवश्यक है। वह लोगों में मरती जा रही है। यह समाज की मौत नहीं है पर व्यक्ति को असहाय कर मौत के मार्ग पर जाने के लिये के प्रेरणादायक है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मतलब यह बिना दूसरे मनुष्य के साथ के जिंदा नहीं रह सकता। मनुष्य का स्वामी उसका मन है और अगर अपने आसपास मरे मन वाले मनुष्य हैं तो उनका होना न होना बराबर है। सोनाली और अनुराधा दोनों का मन मर गया। वह साथ होते हुए भी साथ नहीं थी। यह भयानक एकांत था। यह मार्ग उन्होंने स्वयं चुना था। इसके लिये कौन जिम्मेदार माना जा सकता है।
अनुराधा ने देह त्याग दी पर सोनाली जीवित है। वह अस्पताल में है। भाई आ गया है। भाई का संघर्ष ही सोनाली का मन जिंदा कर सकता है। मनो चिकित्सक इस बात को नहीं समझ पायेंगे कि आखिर हुआ क्या था? कुछ नहीं हुआ था। यह मन चंचल है। चलता रहे तो चलता रहे, मना खड़ा रहा तो जिंदा आदमी को मुर्दा बना देता है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन मन पर नियंत्रण करने के लिये कहता है उसे मारने के लिये नहीं! अपढ़, अशिक्षित, और ग्रामीण भारत के लोग अध्यात्मिक दर्शन के निकट रहते हैं और भले ही मन पर नियंत्रण करने की कला नहीं जानते पर उसे मरने नहीं देते। काले जादू से भी नहीं। सोनाली स्वस्थ हो इसके लिये हमारी उसे हमारी शुभकामनायें हैं क्योंकि आदमी को मारता मन है न कि काला जादू।
लेखक संपादक-दीपक "भारतदीप", ग्वालियर 
writer and editor-Deepak "Bharatdeep" Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-----------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
5.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.जागरण पत्रिका 
८.हिन्दी सरिता पत्रिका 
९.शब्द पत्रिका

Friday, October 15, 2010

आम और खास वर्ग की हिन्दी अलग अलग दिखती है-हिन्दी लेख (aam aur khas varg ki hindi-hindi lekh)

भारत की खिल्ली उड़ाने वाले विदेशी लोग इसे ‘‘साधुओं और सपेरों का देश कहा करते थे। भारत के बाहर प्रचार माध्यम इसी पहचान को बहुत समय आगे बढ़ाते रहे पर जिन विदेशियों ने उस समय भी भारत देखा तो पाया कि यह केवल एक दुष्प्रचार मात्र था। हालांकि अब ऐसा नहीं है पर अतीत की छबि अभी कई जगह वर्तमान स्वरूप में विद्यमान दिखाई देती है। इससे एक बात तो मानी जा सकती कि आधुनिक प्रचार माध्यमों के -टीवी, समाचार पत्र पत्रिकाऐं- अधिकतर कार्यकर्ता जनमानस में अपनी बात स्थापित करने में बहुत सक्षम है। इसी क्षमता का लाभ उठाकर वह अनेक तरह के भ्रम मी सत्य के रूप में स्थापित कर सकते हैं और अनेक लोग तो करते ही हैं। इस साधु और सपेरों की छबि से देश मुक्त हुआ कि पता नहीं पर वर्तमान में भी भारत की छबि को लेकर अनेक प्रकार के अन्य भ्रम यही प्रचार माध्यम फैलाते हैं और जिनका प्रतिकार करना आवश्यक है।
अगर हम इस पर बहस करेंगे तो पता नहीं कितना लंबा लिखना पड़ेगा फिर यह भी तय नहीं है कि बहस खत्म होगी कि नहीं। दूसरा प्रश्न यह भी है कि यह प्रचार माध्यम कार्यकर्ता कहीं स्वयं ही तो मुगालतों में नहीं रहते। पता नहीं बड़े शहरों में सक्रिय यह प्रचार माध्यम कर्मी इस देश की छबि अपने मन की आंखों से कैसी देखते हैं? मगर इतना तय है कि यह सब अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से संपन्न है और यहां की अध्यात्मिक ताकत को नहीं जानते इसलिये अध्यात्म की सबसे मज़बूत भाषा हिन्दी का एक तरह से मज़ाक बना रहे हैं और यह मानकर चल रहे हैं कि उनके पाठक, दर्शक तथा श्रोता केवल कान्वेंट पढ़े बच्चे ही हैं या फिर केवल वही उनके अभिव्यक्त साधनों के प्रयोक्ता हैं। मज़दूर गरीब, और ग्रामीण परिवेश के साथ ही शहर में हिन्दी में शिक्षित लोगों को तो केवल एक निर्जीव प्रयोक्ता मानकर उस पर अंग्रेजी शब्दों का बोझ लादा जा रहा है।
अनेक समाचार पत्र पत्रिकाऐं अंग्रेजी भाषा के शब्द देवनागरी लिपि के शब्द धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं-कहीं तो कहीं तो शीर्षक के रूप में पूरा वाक्य ही लिख दिया जाता है। यह सब किसी योजना के तहत हो रहा है इसमें संशय नहीं है और यह भी इस तरह की योजना संभवत तीन साल पहले ही तैयार की गयी लगती है जिसे अब कार्यरूप में परिवर्तित होते देखा जा रहा है।
अंतर्जाल पर करीब तीन साल पहले एक लेख पढ़ने में आया था। जिसमें किसी संस्था द्वारा रोमन लिपि में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को लिखने के लिये प्रोत्साहन देने की बात कही गयी थी। उसका अनेक ब्लाग लेखकों ने विरोध किया था। उसके बाद हिन्दी भाषा में विदेशी शब्द जोड़ने की बात कही गयी थी तो कुछ ने समर्थन तो कुछ ने विरोध किया था। उस समय यह नहीं लगा था कि ऐसी योजनायें बनाने वाली संस्थायें हिन्दी में इतनी ताकत रखती हैं कि एक न एक दिन उनकी योजना ज़मीन पर रैंगती नज़र आती हैं। अब यह बात तो साफ नज़र आ रही है कि इन संस्थाओं में व्यवसायिक लोग रहते हैं जो कहीं न कहीं से आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक शक्ति प्राप्त कर ही आगे बढ़ते हैं। प्रत्यक्षः वह बनते तो हिन्दी के भाग्य विधाता हैं पर वह उनका इससे केवल इतना ही संबंध रहता है कि वह अपने प्रयोजको को सबसे अधिक कमा कर देने वाली इस भाषा में निरंतर सक्रिय बनाये रखें। यह उन लोगों के भगवान पिता या गॉड फादर बन जाते हैं जो हिन्दी से कमाने आते हैं। यह उनको सिफारिशें कर अपने प्रायोजकों के साथ जोड़ते हैं-आशय यह है कि टीवी, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा रेडियो में काम दिलाते होंगे। हिन्दी भाषा से उनका कोई लेना देना नहीं है अलबत्ता कान्वेंट मे शिक्षित  लोगों को वह हिन्दी में रोजगार तो दिला ही देते होंगे ऐसा लगता है। यही कारण है कि इतने विरोध के बावजूद देश के पूरे प्रचार माध्यम धड़ल्ले से इस कदर अंग्रेजी के शब्द जोड़ रहे हैं कि भाषा का कबाड़ा हुए जा रहा है। अब हिन्दी दो भागों में बंटती नज़र आ रही है एक आम आदमी की दूसरी खास लोगों की भाषा।
हिन्दी के अखबार पढ़ते हुए तो अपने ही भाषा ज्ञान पर रोना आता है। ऐसा लगता है कि हिन्दी भाषी होने का अपमान झेल रहे हैं। इससे भी ज्यादा इस बात की हैरानी कि आम आदमी के प्रति ऐसी उपेक्षा का भाव यह व्यवसायिक संस्थान कैसे रख रहे हैं। सीधी बात कहें तो देश का खास वर्ग और उसके वेतनभोगी लोग समाज से बहुत दूर हो गये हैं। यह तो उनका मुगालता ही है कि वह समाज या हिन्दी को अपने अनुरूप बना लेंगें क्योंकि इस देश का आधार अब भी गरीब, मज़दूर और आम व्यवसायी है जिसके सहारे हिन्दी भाषा जीवीत है। जिस विकास की बात कर रहे हैं वह विश्व को दिखाने तक ही ठीक हैं। उस विकास को लेकर देश के प्रचार माध्यम झूम रहे हैं उसकी अनुभूति इस देश का आम आदमी कितनी करता है यह देखने की कोशिश नहंी करते। उनसे यह अपेक्षा करना भी बेकार है क्योंकि उनकीभाषा आम आदमी के भाव से मेल नहीं खाती। वह साधु सपेरों वाले देश को दृष्टि तथा वाणी से हीन बनाना चाहते हैं। अपनी भाषा के विलुप्तीकरण में अपना हित तलाश रहे लोगों से अपेक्षा करना ही बेकार है कि वह हिन्दी भाषा के सभ्य रूप को बने रहने देंगे।
हिन्दी के कथित विकास के लिये बनी संस्थाओं में सक्रिय बुद्धिजीवी भाषा की दृष्टि से कितने ज्ञाता हैं यह कहना कठिन है अलबत्ता कहीं न कहीं अंग्रेजी के समकक्ष लाने के दावे वह जरूर करते हैं। दरअसल ऐसे बुद्धिजीवी कई जगह सक्रिय हैं और हिन्दी भाषा के लिये गुरु की पदवी भी धारण कर लेते हैं। उनकी कीर्ति या संपन्नता से हमें कोई शिकायत नहीं है पर इतना तय है कि व्यवसायिक संस्थानों के प्रबंधक उनकी मौजूदगी इसलिये बनाये रखना चाहते हैं कि उनको अपने लिये हिन्दी कार्यकर्ता मिलते रहें। मतलब हिन्दी के भाग्य विधाता हिन्दी के व्यववायिक जगत और आम प्रयोक्ता के बीच मध्यस्थ का कार्य करते हैं। इससे अधिक उनकी भूमिका नहीं है। ऐसे में नवीन हिन्दी कार्यकर्ता रोजगार की अपेक्षा में उनको अपना गुरु बना लेते हैं।
ऐसे प्रयासों से हिन्दी का रूप बिगड़ेगा पर उसका शुद्ध रूप भी बना रहेगा क्योंकि साधु और सपेरे तो वही हिन्दी बोलेंगे और लिखेंगे जो आम आदमी जानता हो। हिन्दी आध्यात्म या अध्यात्म की भाषा है। अनेक साधु और संत अपनी पत्रिकायें निकालते हैं। उनके आलेख पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है क्योंकि उसमें हिन्दी का साफ सुथरा रूप दिखाई देता है। अब तो ऐसा लगने लगा है हिन्द समाचार पत्र पत्रिकाऐं पढ़ने से तो अच्छा है कि अध्यात्म पत्रिकायें पढ़कर ही अपने हिन्दी भाषी होने का गर्व महसूस किया जाये। अखबार में भी वही खबरें पढ़ने लायक दिखती हैं जो भाषा और वार्ता जैसी समाचार एजेंसियों से लेकर प्रस्तुत की जाती है। स्थानीय समाचारों के लिये क्योंकि स्थानीय पत्रकार होते हैं इसलिये उनकी हिन्दी भी ठीक रहती है मगर आलेख तथा अन्य प्रस्तुतियां जो कि साहित्य का स्त्रोत होती हैं अब अंग्रेजीगामी हो रही हैं और ऐसे पृष्ठ देखने का भी अब मन नहीं करता। एक बात तो पता लग गयी है कि हिन्दी भाषा के लिये सक्रिय एक समूह ऐसा भी है जो दावा तो हिन्दी के हितैषी होने का है पर वह मन ही मन झल्लाता भी है कि अंग्रेजी में छपकर भी वह आम आदमी से दूर है इसलिये वह हिन्दी भाषा प्रचार माध्यमों में छद्म रूप लेकर घुस आया है। अंग्रेजी की तरह हिन्दी को वैश्विक भाषा बनाने का उसका इरादा केवल तात्कालिक आर्थिक हित प्राप्त करना ही है। वह हिन्दी का महत्व नहींजानता क्योकि आध्यात्मिक ज्ञान से परे हैं। हिन्दी वैश्विक स्तर पर अपने अध्यात्मिक ज्ञान शक्ति के कारण ही बढ़ेगी न कि सतही साहित्य के सहारे। ऐसे में हिन्दी की चिंदी करने वालों को केवल इंटरनेट के लेखक ही चुनौती दे सकते हैं पर मुश्किल यह है कि उनके पास आम पाठक का समर्थन नहीं है। 
-----------
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

-------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, August 18, 2010

असुंदर सर्वशक्तिमान-हिन्दी लेख (asunder sarvashaktiman-hindi article)

कोई व्यक्ति कद काठी में ऊंचा हो, अपनी मांसपेशियों से शक्तिशाली दिखता हो, उसने सुंदर वस्त्र पहन रखे हों पर अगर उसके चेहरे पर काले धब्बे हैं आंखों में हमेशा ही निराशा झलकती है और बातचीत में निर्बुद्धि हो तो लोग उसके सामने आलोचनात्म्क बात न कहें पर पीठ पीछे उसके दुर्गुणों की व्याख्या करते है। तय बात है कि उसके शक्तिशाली होने के बावजूद लोग उसे पंसद नहंी करते। यही स्थिति समाजों, समूहों और राष्ट्रों की होती है।
न्यूज वीक पत्रिका के अनुसार दुनियां का सर्वशक्तिमान अमेरिका अब सर्वश्रेष्ठता में 11 वें स्थान पर खिसक गया है। भारत इस मामले में 78 वें नंबर पर है इसलिये उस पर हम हंस नहीं सकते पर जिन लोगों के लिये अमेरिका सपनों की दुनियां की बस्ती है उनके लिये यह खबर निराशाजनक हो सकती है। इस तरह की गणना शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर तथा राजनीतिक वातावरण के आधार पर की गयी है। यकीनन यह सभी क्षेत्र किसी भी देश के विकास का प्रतिबिम्ब होते हैं। हम जब अपने देश की स्थिति पर नज़र डालते हैं तो उसमें प्रशंसा जैसा कुछ नज़र नहीं आता। घोषित और अघोषित रूप से करोड़पति बढ़े हैं पर समाज के स्वरूप में कोई अधिक बदलाव नहीं दिखता।
सड़क पर कारें देखकर जब हम विकास होने का दावा करते हैं तो उबड़ खाबड़ गड्ढों में नाचती हुईं उनकी मुद्रा उसकी पोल खोल देती है। स्वास्थ्य का हाल देखें, अस्पताल बहुत खुल गये हैं पर आम इंसान के लिये वह कितने उपयोगी हैं उसे देखकर निराशा हाथ लगती है। आम इंसान को बीमार होने या घायल होने से इतना डर नहीं लगता जितना कि ऐसी स्थिति में चिकित्सा सहायता न मिल पाने की चिंता उसमें रहती है।
कहने का अभिप्राय यह है कि विकास का स्वरूप हथियारों के जखीरे या आधुनिक सुविधा के सामानों की बढ़ोतरी से नहीं है। दुनियां का शक्तिशाली देश होने का दावा करने वाला अमेरिका दिन ब दिन आर्थिक रूप से संकटों की तरफ बढ़ता दिखाई देता है मगर शायद उसके भारतीय समर्थक उसे समझ नहीं पा रहे। दूसरी बात हम यह भी देखें कि अधिकतर भारतीयों ने अपनी वहां बसाहट ऐसी जगहों पर की है जहां उनके लिये व्यापार या नौकरी के अवसरों की बहुतायत है। यह स्थान ऐसे क्षेत्रों में हैं जहां अर्थव्यवस्था और शिक्षा के आधुनिक केंद्र है। अमेरिका भारत से क्षेत्रफल में बढ़ा है इसलिये अगर कोई भारतीय यह दावा करता है कि वह पूरे अमेरिका के बारे जानता है तो धोखा दे रहा है और खा भी रहा है, क्योंकि यह लोग यहां रहते हुए भी पूरे भारत को ही लोग नहीं जान पाते और ऐसे ही दूरस्थ स्थानों के बारे में टिप्पणियां करते हैं तब अमेरिका के बारे में उनका ज्ञान कैसे प्रमाणिक माना जा सकता है।
इसके बावजूद कुछ भारतीय हैं जिनका दूरस्थ स्थानों मे जाना होता है और वह अपनी बातों के इस बात का उल्लेख करते हैं कि अमेरिका में कई ऐसे स्थान हैं जहां भारत जैसी गरीबी और पिछड़ेपन के दर्शन होते हैं। फिर एक बात दूसरी भी है कि जब हमारे देश में किसी अमेरिकन की चर्चा होती है तो वह शिक्षा, चिकित्सा, राजनीति, व्यापार या खेल क्षेत्र में शीर्ष स्तर पर होता है। वहां के आम आदमी की स्थिति का उल्लेख भारतीय बुद्धिजीवी कभी नहीं करते। जबकि सत्य यह है अपने यहां आकर संपन्न हुए विदेशियों से अमेरिकी नागरिक बहुत चिढ़ते हैं और उन पर हमले भी होते हैं इसके समाचार कभी कभार ही मिलते हैं।
इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय बुद्धिजीवी अमेरिका को स्वर्ग वैसे ही दिखाया जाता रहा है जैसे कि धार्मिक लोग अपने अपने समूहों को दिखाते हैं।
अमेरिका के साथ कनाडा का भी बहुत आकर्षण भारत में दिखाया जाता है जबकि यह दोनों इतने विशाल देश है कि इनके कुछ ही इलाकों में भारतीय अधिक तादाद में हैं और जहां उनकी बसाहट है उसके बारे में ही आकर्षण जानकारी मिल पाती है। जहां गरीबी, भ्रष्टाचार, अशिक्षा, स्वास्थ्य चिकित्साओं का अभाव तथा बेरोजगारी है उनकी चर्चा बहुत कम होती है।
इस विषय पर एक जोरदार चर्चा देखने को मिली।
अमेरिका से लौटे एक आदमी ने अपने मित्र को बताया कि ‘मैं अपने अमेरिका के एक गांव में गया था और वहां भारत की याद आ रही थी। वहां भी बच्चे ऐसे ही घूम रहे थे जैसे यहां घूमते हैं। वह भी शिक्षा का अभाव नज़र आ रहा था।’
मित्र ने पूछा-‘पर वह लोग तो अंग्रेजी में बोलते होंगे।’
मित्र ने कहा-‘हां, उनकी तो मातृभाषा ही अंग्रेजी है।’
तब वह आदमी बोला-‘अरे, यार जब उनको अंग्रेजी आती है तो अशिक्षित कैसे कहे जा सकते हैं।’
दूर के ढोल सुहावने होते हैं और मनुष्य की संकीर्णता और अज्ञान ही इसका कारण होता है। अमेरिका हो या भारत मुख्य समस्या प्रचार माध्यमों के रवैये से है जो आम आदमी को परिदृश्य से बाहर रखकर चर्चा करना पसंद करते हैं। अनेक लोग अमेरिकी व्यवस्था पर ही भारत को चलाना चाहते हैं और चल भी रहा है, ऐसे में जिन बुराईयों को अपने यहां देख रहे हैं वह वहां न हो यह संभव नहीं है। कुछ सामाजिक विशेषज्ञ तो सीधे तौर पर भौतिक विकास को अपराध की बढ़ती संख्या से जोड़ते हैं। हम भारत में जब विकास की बात करते हैं तो यह विषय भी देखा जाना चाहिये।
आखिरी बात यह कि दुनियां का सर्वशक्तिमान कहलाने वाला अमेरिका जब सामाजिक विकास के स्तंभ कहलाने वाले क्षेत्रों में पिछड़ गया है तो हम भारत को जब अगला सर्वशक्तिमान बनाने की तरफ बढ़ रहे हैं तो यकीनन इस 78 वें स्थान से भी गिरने के लिये तैयार होना चाहिए।
--------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

-------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, May 05, 2010

प्रेम जीवन और गृहस्थ जीवन में अंतर होता है-हिन्दी आलेख (love life and home life-hindi editorial)

वह लड़की एक पत्रकार थी और अपने परिवार से दूर रहती थी। उसने अपनी जाति से इतर एक युवक से प्रेम किया किया था। वह प्रेम विवाह करने की इच्छुक थी पर उसके परिवार के लोग इसके लिये तैयार नहीं थे। अंततः वह लड़की अपने प्रेमी को छोड़कर अपने घर आयी और वहां उसकी संदिग्ध हालतों में मौत हो गयी-अभी यह तय होना बाकी है कि आत्महत्या थी कि हत्या। यहंा प्रेम भी है और समाज की रीतियां भी और साथ में मौत का विषय तो बहस तो होनी ही थी। फिर अब तो आधुनिक प्रचार माध्यमों में हर छोटे विषय को बड़ा बनाकर बहस चलती है ताकि व्यवसायिक संगठित प्रचार माध्यमों का समय पास हो सके-यानि विज्ञापनों से कमाई हो सके-तब तो इस विषय पर लंबे समय तक विचार चलना ही है।
समाज पर ताना कसते लोग! स्त्री की विवशता पर शिकायतें दर्ज करते विद्वान! नारीवादी और इश्कवादी बुद्धिजीवियों को लिये यह बेहतर अवसर है अपनी बात कहने के लिये। वह लड़की गर्भवती थी और इसे अनदेखा कर औरत की आजादी और विवशता पर परंपरागत ढंग से टिप्पणियां हो रही है।
पता नहीं भारत के विद्वानों का विदेशी अनुभव कैसा है पर हमने संगठित प्रचार माध्यमों-टीवी, चैनल, रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाऐं-में समाचार और विचारों का अध्ययन किया है और जहां तक हमारी जानकारी है पश्चिम में भी बिन ब्याही मां बनना कोई अच्छी बात नहीं समझी जाती। यह सही है कि पश्चिम में बिना विवाह साथ रहने की परंपरा भी जोर पकड़ी रही है पर अगर पिता जिम्मेदारी लायक न हो तो मां बच्चे को जन्म देने को तैयार नहीं होती। ऐसे समाचार भी आते रहे है कि अमेरिका और ब्रिटेन के सामाजिक विशेषज्ञ बिना मां बनने की घटनाओं से चिंतित हैं जबकि यह देश तो आधुनिक सभ्यता के देवता माने जाते हैं।
दरअसल ऐसी घटनायें नयी नहीं है पर जिस तरह इन घटनाओं को लेकर पूरे समाज की सोच पर सवाल किये जाते हैं पर कभी कभी हास्यप्रद लगता है। असफल प्रेम या सफल जीवन दांपत्य एकदम नितांत निजी विषय है और इससे कोई सामाजिक अर्थ नहीं निकलते। इतना बड़ा देश है पर कितनी लड़कियां बिना मां बनने के लिये तैयार होती हैं? यकीनन लड़कियों को एकदम बददिमाग मानना अपने मूर्खता का प्रमाण देना है क्योंकि इतनी समझ सभी में है कि शादी करना और गृहस्थी अच्छी तरह चलाने में अंतर है। बच्चे का जन्म होने पर उसके लालन पालन की समस्या रहती है और इसके लिये जिम्मेदार मां के साथ पिता का होना भी जरूरी है।
वह लड़की अब इस संसार में नहीं है। एक खूबसूरत प्रतिभाशाली लड़की का इस तरह जीवन त्यागना दुःख का विषय है पर यह इतने बड़े समाज में यह एक घटना है। अब आरोप उसके माता पिता तथा भाई पर लग रहे हैं।
अपने से दूर रहने वाली अपनी पुत्री को अंतर्जातीय विवाह से रोकने के लिये पिता ने एक पत्र लिखा था। अब पत्र की भाषा को एक धमकी माना जा रहा है। अफसोस होता है यह सब देखकर! संभव है कि माता पिता तथा भाई ने मारा हो पर वह यह पत्र इस बात की गवाही नहीं देता। पिता ने जो लिखा था वह कोई ज्ञानी ही लिख सकता है। आखिर उस पिता ने अपनी बाईस वर्षीय पुत्री को लिखा क्या था!
बेटी अभी तुमने पाठयक्रमों की किताबें पढ़ी हैं, जीवन का अनुभव तुम्हें नहीं है।
यह फिल्मों में होता है पर जीवन अलग तरह का है।
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
उच्च जातीय युवती को निम्न जातीय युवक से शादी करना अनिष्टकारी होता है।
तुम्हारे ग्रहों में राहु की दशा खराब चल रही है जो तुम्हारा विवेक नष्ट कर रहा है जिससे तुम्हारा अनिष्ट होगा-इससे पता लगता है कि उन्होंने ज्योतिष का ज्ञान होगा या फिर किसी ज्योतिषी से पूछा होगा।
बहुत बहसें सुनी पर उस लड़की के गर्भवती होने का प्रसंग बहुत अधिक महत्वपूर्ण है जिसे शायद अनदेखा किया जा रहा है। कह रहे हैं कि लड़की ने विद्रोह किया था इसलिये उसे जान देनी पड़ी, मगर यह तो अर्द्धविद्रोह था। एक पांव इधर एक उधर। पूर्ण विद्रोह और पलायन के बीच की स्थिति होने के कारण इसे अर्द्धविद्रोह कहना ही ठीक है।
नारीवादी और इश्कवादी बुद्धिजीवी आज तक यह नहीं समझा पाये कि अगर किसी जोड़े को परिवार और समाज से विद्रोह करना ही है तो वह फिर शादी जैसी पंरपरा की तरफ जाता ही क्यों है? आखिर यह समाज की ही तो प्रवृत्ति है। फिर अपने देश में बिना विवाह साथ रहने और बच्चे पैदा करने की छूट मिल गयी है। इधर गर्भनिरोध के हजारों प्रकार के उपाय मौजूद हैं तब उस विद्रोही लड़की ने उसे क्यों नहीं अपना सकती?
वह प्रेमी के मना करने के बावजूद अपने माता पिता से मिलने क्यों गयी? माता पिता समाज का ही हिस्सा हैं और उन्होंने अपने घर से बाहर निकलकर उसको पकड़ा नहीं  था। वह आखिर उनकी परवाह क्यों कर रही थी! वह क्यों इजाजत चाहती थी अपने परिवार वालों से! स्वयं को अच्छी बेटी साबित करने के लिये न! समाज को दोष देने वाले बतायें कि ऐसे कमजोर विद्रोही किस काम से जो आगे निकलकर फिर पीछे मुड़कर देखते हैं। विवाह की तिथि तय की गयी पर किया नहीं गया। विद्रोह से पीछे हटा कौन! कौन रोक रहा था? फिर समाज को चुनौती देने का यह प्रयास किस लिये!
कहना कठिन है कि सच क्या है, उस लड़की और उसके प्रेमियों के अपने अन्य युवक युवतियों के मित्रों के साथ फोटो देखने से पता लगता है कि महानगर के स्वच्छंद जीवन ने उसे अपने परिवार और समाज की शक्ति को भूलने को विवश कर दिया था। बस मस्ती करो जैसे फिल्मों में देखते हैं। ढाबों पर जाकर खाना खाओ और ठंडा पीयो और उन लम्हों को कैमरे में कैद करो।
मगर इन अवसर पर पर खर्च किये जाने वाले हजार या दो हजार रुपयों से इतने बृहद जीवन के कुछ पल ही खरीदे जा सकते हैं। जब पेट में भ्रुण हो तो औरत की मनस्थिति बदल जाती है। एक सामान्य औरत और गर्भवती स्त्री की मनस्थिति पर अधिक लिखने या बताने की जरूरत नहीं है। एक तरफ उसके सामने अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के लिये रोमांच होता है तो दूसरी तरफ उसके पैदा होने तथा उसके बाद उसके पालन होने की चिंता भी होती है और यकीनन वह इसे अपने पति, पिता तथा प्रेमी तक पर भी जाहिर नहीं  करती।
यही भ्रुण उसकी चिंता का विषय रहा होगा। अगर वह जीवित होती तो महानगर में दिन ब दिन ऐसी समस्याओं का सामना करना होता जो प्रेम जीवन से एकदम अलग होती हैं। जैसे जैसे गर्भ दृढ़ होता है औरत चाहती है कि कोई अपना रक्त संबंधी उसके पास रहे और उस समय मां उसका सबसे बड़ा आसरा होती है। दूसरी बात ऐसी औरत की दिनचर्या बदल जाती है। ऐसे में नियमित काम करने में भी परेशानी होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि उस समय धन का होना जरूरी लगता है। अब सवाल यह है कि क्या उसके प्रेमी की यह हैसियत थी कि वह प्रेम जीवन को गृहस्थ जीवन में बदलने के लिये व्यय कर सकता था। क्या वह वैसी सुविधाऐं उसे दिला सकता था जैसी उसके माता पिता देते थे। दूसरी बात यह कि क्या कमतर सुविधाओं में वह लड़की रहने की क्षमता रखती थी।
उसे प्रेमी की आर्थिक स्थिति पर शायद संदेह हो! इसलिये वह अपने माता पिता और भाई का समर्थन चाहती हो। तय तारीख पर विवाह न होना फिर उसका वहां माता पिता को मनाने जाना इस बात का संकेत देता है कि कहीं न कहीं वह उनसे भौतिक सहयोग की अपेक्षा कर रही होगी। उसका प्रेमी भले ही दावा करता है वह उसे बहुत अच्छी तरह जानता था पर वह प्रेम रस में डूबी एक सुंदर अविवाहित युवती से परिचित था न कि एक गर्भवती युवती की मनस्थिति जो अपने भ्रुण के साथ ही अनेक बातें भी पेट में रखती है-यह बात बुजुर्ग महिलाओं की चर्चा के आधार पर लिखी जा रही है।
जब धन संबंधी बात चली है तो अब पिता की बातें करें। हम यहां जाति की बात न भी करें तो कम से कम एक बात मान लेना चाहिये कि अमीर परिवार की लड़की गरीब परिवार में ब्याह नहीं करे तो ही ठीक है। अगर करे तो अपनी सुविधा और सुख मोह त्याग करने के लिये उसे तैयार होना चाहिए। बुजुर्ग कहते हैं कि लड़की हमेशा बड़े घर में देना चाहिये और बहुत हमेशा छोटे घर से लाना चाहिये। किसलिये! शादी कोई सन्यास के लिये नहीं की जाती है बल्कि इस भौतिक जीवन को संबल देने के लिये की जाती है जिसमें अर्थ की महत्ता को नकारना कठिन है। प्रेम जीवन कोमलता और गृहस्थ जीवन की कठोरता को सभी जानते हैं, यह अलग बात है कि कहंी अपने विचार व्यक्त करना हो तो उसे भुलाना ठीक लगता है। बहरहाल पिता अगर कोई समझाइश दे रहा था तो वह जीवन के अनुभव के आधार पर दे रहा था।
उस प्रतिभाशाली लड़की की मौत एक ऐसा हादसा है जिस पर दावे के साथ कुछ लिखना कठिन है। इसका कोई सामाजिक सरोकार भी नहीं दिखता। यह एक नितांत एकांकी घटना है। देश भर की लड़कियों की फिक्र करते हुए लोग केवल दिखावा कर रहे हैं। वह एक लड़की दुर्भाग्य का शिकार बनी पर इस समय करोड़ो लड़कियां हैं जो जिंदा है और सामान्य सामाजिक जीवन व्यतीत कर रही हैं। हो सकता है आगे भी ऐसी अनेक धटनायें हों पर तब भी यह देखना होगा कि कितनी उनमें शामिल नहीं है। बहरहाल यह शादी और प्रेम तो ऐसी घटनायें हैं जो सभी के जीवन में आती हैं पर सभी की स्थितियां अलग होती हैं। अलबत्ता भावावेश में इस तरह की घटना में युवा मौत से दिल दुःखता तो है। भगवान उस युवती की आत्मा को शांति प्रदान करे-यही कामना हम भी करते हैं। बाकी ऐसे मसले तो चलते रही रहेंगे। इतना जरूर है कि ऐसे हादसे उन लोगों को डरा देते हैं जिनके घर में अविवाहित पुत्रियाँ हैं।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

-------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Friday, March 12, 2010

गरीब के कल्याण का सवाल-व्यंग्य चिंतन (welfare of poor man-hindi satire article)

अमेरिका में एक गोरी महिला पर आनलाईन आतंकवादी भर्ती करने का मुकदमा दर्ज हुआ है। बताया गया है कि वह लोगों को मीठी बातों में फंसाकर अपने जाल में फंसाती थी। दुनियां भर के गरीबों का भला करने की बात करती थी! भर्ती करने वालों को धन का प्रलोभन भी देती थी! वगैरह वगैरह! उस अमेरिकन ने अपना अंग्रेजी नाम बदल भी लिया था ताकि वह धर्म के नाम पर गैर अमेरिकन लोगों में अपनी पहचान बना सके।
यह आलेख केवल उस महिला पर ही नहीं है बल्कि उसकी प्रकटतः प्रकृत्तियों पर है जो अनेक जगह अनेक लोगों में देखने को मिलती है। जिसमें सबसे अधिक है गरीबों का भला करने की बात! इसलिये हिंसा कर महामानव के रूप में प्रतिष्ठत होने का एक ख्वाब जो एक हर चालाक बुद्धिमान देखता है।
गरीबों के भले की बात करते देखकर बुद्धिमानों पर कोई हंसता नहीं है क्योंकि लोगों की सोच स्वतंत्र नहीं रही। हम यहां भारत की क्या बात करें अमेरिका और ब्रिटेन में यही हालत हैं-आखिर उनकी शिक्षा पद्धति ही हमारे समाज ने अपनायी है।
गरीब का भला! मेहनतकश के साथ न्याय! दुनियां के उस आखिर आदमी के लिये लड़ने की बात जिसे दो समय की बात क्या एक समय के लिये भी खाना नहीं मिलता। इसके लिये जंग करने वाले बताते हैं कि दुनियां का पूरा पैसा कुछ व्यक्तियों, समाजों या राष्ट्रों के पास जा रहा है जिनको परास्त करना आवश्यक है ताकि दुनियां से गरीबी और भुखमरी मिट सके। इसके लिये वह बंदूकें, गोलियां और बम जुटाते हैं जैसे कि उनसे खाना बना रहे हों।
कुछ ऐसे भी हैं जो यह सब नहीं करते पर पर्दे के पीछे बैठकर फिल्में, टीवी धारावाहिक या रेडियों पर उनकी जंग का प्रचार करते हैं। अखबारों में लेख वगैरह लिखते हैं। दुनियां की पंक्ति में सबसे आखिर में खड़े भूखे, नंगे और बेकार आदमी का भला करने का यह ख्वाब खूब चलता है। कहते हैं कि आदमी अपनी विपरीत स्थितियों में मनोरंजन ढूंढता है। अमेरिका की सभ्यता धनाढ़य, गौरवर्ण तथा आधुनिक शिक्षित वर्ग की भीड़ से सजी है इसलिये उनको गरीब-भूखे-नंगे, निम्न वर्ग तथा अशिक्षित वर्ग के विषयों में मनोरंजन मिलता है जबकि हमारे भारत में सभी गरीब और भूखे नहीं है पर यहां उनके सामने ऐसा दृश्य प्रस्तुत करने वाला वर्ग प्रतिदिन विचरता है इसलिये उनको धनाढ्य तथा गौरवर्ण कथानकों में आनंद मिलता है। हम भारत ही क्या अधिकांश एशियाई देशों में यह दोष या गुण देखते हैं। यही कारण है कि इस इलाके में आतंकवाद जमकर पनपा है। मजे की बात यह है कि पूरे विश्व के लिये अध्यात्मिक ज्ञान का सृजन भी एशियाई देशों के नेता भारत में ही हुआ है। कहते हैं कि गुलाब कांटों में तो कमल कीचड़ में पनपता है। भारत का अध्यात्मिक ज्ञान इतना प्रभावी इसलिये है क्योंकि यहां अज्ञान अधिक फलताफूलता रहा है। गरीब का भला और बेसहारों को सहारा देने के नाम पर एशिया के लोग बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं।
अमेरिका की उस महिला ने भी आखिर क्या प्रचार किया होगा? यही कि गरीबों का भला करने के लिये चंद लोगों का मरना जरूरी है या गोली और बम के धमाकों से भूखे के लिये रोटी पकेगी तो गरीब की गरीबी दूर हो जायेगी।
पंच तत्वों से बनी इस देह में जो मन रहता है उसे समझना कठिन है और जो समझ ले वही ज्ञानी है। आम इंसान अपना पूरा जीवन अपने स्वार्थों में लगाता है पर उसका मन कहीं न कहीं परमार्थी की उपाधि पाने के लिये भटकता है। अनेक ऐसे लोग हैं जिन्होंने पूरी जिंदगी में किसी का भला नहीं किया पर ऐसे किस्से सुनाकर अपना दिल बहलाते हैं कि ‘हमने अमुक का भला किया’ या ‘अमुक को बचाया’। उनको गरीबों का भला करना तथा भूखे को रोटी खिलाना एक अच्छी बात लगती है बशर्ते स्वयं यह काम न करना पड़े। ऐसे में अगर कुछ लोग यह काम करते हैं तो वह उनकी प्रशंसा करते हैं पर अगर कोई ऐसा करने का दावा करने लगे तो उसे भी प्रशंसनीय मान लेते हैं। कुछ युवा क्रांतिकारी होने का सपना लेकर गरीबों का भला करने के लिये उपदेशकों की बातों में हिंसा भी करने को तैयार हो जाते हैं बशर्ते कि उनको सारी दुनियावी सुविधायें उपलब्ध करायी जायें और जिनके लिये पैसा खर्च होता है। मूल बात इसी पैसे पर आकर टिकती है जो धनपतियों के पास ही है जिनके विरुद्ध गरीबों के कथित मसीहा बोलते रहते हैं-इनमें बहुत कम ऐसे है जो अपनी जान देने निकलते हैं बल्कि अपनी बातों से दूसरे को अपनी जान देने को तैयार करते हैं-जन्नत में स्थाई सदस्यता दिलाने के वाद के साथ! ऐसे बहुत सारे मसीहा जिंदा हैं पर उनके बहुत सारे शगिर्द काल कलवित हो गये-और इन गुरुओं को इसकी बिल्कुल चिंता नहीं है क्योंकि उनके प्रायोजित विद्यालय निरंतर नये लड़कों का सृजन करते रहते हैं। मूल प्रश्न का उत्तर आज तक किसी ने नहीं दिया कि पैसा कहां से आता है?
कहते हैं कि दुनियां के सारे धर्म गरीबों का भला करना सिखाते हैं। यह एक मजाक के अलावा कुछ नहीं है। सारे धर्म के मतावलंबियों और सर्वशक्तिमान के बीच एक मध्यस्थ होता है जो उसका परिचय अपने समूह के लोगों से कराता है। सभी की भाषायें है और पहचान के लिये वस्त्रों के रंग भी तय हैं-गेरुआ, हरा, सफेल और अन्य रंग। नाम भी अब स्थानीय भाषा के नाम पर नहीं बल्कि धर्म की भाषा के आधार पर रखते जाते हैं। एक आदमी जब धर्म बदलता है तो नाम भी बदल देता है। अनेक लोग पैसा लेकर या भविष्य में विकास का वादा करने पर धर्म बदल देते हैं। यह एक क्रांतिकारी मजाक है जो अक्सर अनेक देशों में दिखाइ्र्र देता है। अभी तक धार्मिक मध्यस्थ केवल सर्वशक्तिमान और इंसान के बची की कड़ी थी पर ऐसा लगता है कि जैसे कि उन्होंने अमीरों और गरीबों के बीच में भी अपना पुल बना लिया है। गरीबों को आतंक फैलाने तो अमीरों को उससे फैलते देखनें के मनोरंजन में व्यस्त रखने के लिये आतंक उनके लिये एक व्यापार हो गया है जिसे वह अपने ढंग से धर्म फैलाने या बचाने का संघर्ष भी कहते हैं कई जगह गरीबों के उद्धार की भी बात की जाती है। यकीनन अमीरों से उनको पैसा मिलता है। यह पैसा अमीर अपने एक नंबर के धंधे को बचाने या दो नंबर के धंधे को चलाने के लिये देते होंगे। दुनियां के सारे भाषाई, जातीय, धार्मिक तथा क्षेत्रीय समूहों पर ऐसी ही अदृश्य ताकतों की पकड़ है जिसमें मौलिक तथा स्वतंत्र सोच रखने वाले पागल या अयथार्थी समझे जाते हैं। इस बात का पूरा इंतजाम है कि हर व्यवस्था में तय प्रारूप में ही बहसें हों, विवाद हों और प्रचार तंत्र उनके इर्दगिर्द ही घूमता रहे। दो विचारों के बीच दुनियां के लोग भटकें-गरीब का भला और विकास-जिसमें अमीरों का वर्चस्व रहता है। इस दुनियां में दो प्रकार के लोग हैं एक तो वह जो गरीबों का भला होते देखना चाहते है-स्वयं कितना करते है यह एक अलग प्रश्न है-दूसरा वह वर्ग है जो विकास चाहता है। बीच बीच में भाषा, धर्म,जाति तथा क्षेत्रीय पहचान को लेकर भी बहसें और विवाद होते हैं पर उनमें भी गरीबों का भला या विकास का मुद्दा कहीं न कहीं होता है भले ही उसका नंबर दूसरा हो।
टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में चलने वाली इन बहसों से अलग होकर जब हम सड़क पर देखते हैं तो सारा दृश्य बदल जाता है। पेट्रोल का धुंआ उगलते विलासिता के प्रतीक वाहनों में सवार अमीर लोग अपनी राह चले जा रहे हैं। गरीब आदमी ठेले पर अपना सामान बेचने जा रहा है। अमीर चीज का भाव पूछता है गरीब बताता है। अमीर भाव कम करने के लिये कहता है। वह करता है कभी नहीं भी करता है। अस्पतालों में गरीब इलाज के लिये ठोकरें खाता नज़र आता है। सबसे बड़ी बात यह कि हम जैसे लेखक जब एक आदमी के रूप में धक्का खाते है तब अपने आप से सवाल पूछते हैं कि आखिर हमारा भला चाहता कौन है?
ऐसे ढेर सारे प्रश्नों से जूझते हुए जब कोई अखबार पढ़ते या टीवी देखते हुए गरीबों के कल्याण और मेहनतकश के न्याय पर बहस देखता और सुनता है तो उसे वह निरर्थक, अयथार्थ तथा काल्पनिक लगती है। शायद ऐसी बहसें बौद्धिक विलासिता का हिस्सा हैं पर इनके आयोजक इसका फोकट में नहीं करते। मुख्य बात यह कि पैसा कहां से आता है! शायद वहीं से आता होगा जहां से गोलियां, बम और बंदूकें खरीदने के लिये दिया जाता है। संभव है यह सब भयानक सामान बनाने वाले दलालों को अपना सामान बिकवाने के लिये पैसे देते हों। पहले आतंकी खरीदेगा तो फिर उससे बचने के लिये पहरेदार भी खरीदेगा। आतंकी एक, दो, तीन या चार होते है पर पहरेदार तो हजारों हैं। पूरी दुनियां में लाखों हैं। सब कुछ सोचते हुए आखिर वहीं खड़े हो जाते हैं और अपने आप से ही कहते हैं कि ‘कहां चक्कर में पड़ गये यार’। कुछ बेकार कवितायें लिखो या कोई चुटकुला लिखो। दिल बहलाने के लिये इससे अच्छा साधन क्या हो सकता है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

-------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, January 06, 2010

हिन्दी ब्लाग लेखकों के साथ यह धोखाधड़ी रोकनी होगी-आलेख (cheeting with hindi blogger-hindi blog)

आज समीरलाल जी से ने हिन्दी ब्लाग जगत से दूसरों की पोस्ट उठाकर अपने ब्लाग चमकाने वाले एक शातिर खिलाड़ी को पकड़ा। कहना चाहिये कि सात दिन से उसे पकड़ा है और उसे तब से टिप्पणियों के माध्यम से नोटिस भी पकड़ायें हैं। उसने हम दोनों की रचनाओं का जमकर उपयोग किया। एक जगह तो हिन्दी ब्लाग जगत की लेखिका संगीता पुरी जी ने उसे लिखा है भी है कि यह रचना कहीं पढ़ी हुई लग रही है।
आज समीरलाल जी ने हमारे दीपक बापू बहिन से उठाये गये पाठ की सूचना दी और हमने जाकर वह ब्लाग देखा।
New comment on your post #636 "ब्लाग लिखने में शेयर बाजार जैसा ही मजा-व्यंग्य आलेख"
Author : sameerlal (IP: 76.70.64.181 , bas2-oshawa95-1279672501.dsl.bell.ca)
E-mail : dupe-2-sameer.lal@gmail.com
URL : http://sameerlal.wordpress.com/
Whois : http://ws.arin.net/cgi-bin/whois.pl?queryinput=76.70.64.181
Comment:
दीपक भाई

आपका यह आलेख इस साइट पर बिना आपका संदर्भ दिये दिखा. आश्चर्य हुआ:

http://hindireader.blogspot.com/2008/10/blog-post_481.html
कृपया ध्यान दें. आपकी अन्य रचनाएँ भी वहाँ दिखाई पड़ रही हैं.

वाह क्या गजब किया है? हमारे पाठ उसने ऐसे सजायें हैं जैसे कि कोई भारी भरकम लेखक हो। हमने अपनी प्रतिक्रिया में उससे प्रति पाठ दो हजार मांगे हैं। हमने देखा है कि धमकी वगैरह की बात से लोग खौफ नहीं खाते जितना पैसे का दंड उनको सताता है। सच यह है कि हमारे एक कंप्यूटर विशेषज्ञ मित्र का कहना है कि आपको किसी का भी फोन नंबर उसके आई डी से पकड़ना है तो मुझे बताओ। वह टेलीफोन कंपनी से भी जुड़ा हुआ है।
पता नहीं लोगों को यह क्यों लगता है कि उनकी पकड़ कोई नहीं कर सकता जबकि उनको शायद मालुम नहीं है कि आजकल अपराध की जांच एजेंसियों का काम मोबाइल और कंप्यूटर से इसलिये कम हो गया है क्योंकि अपराधी इन्हीं चीजों का इस्तेमाल करते हैं।
हम झगड़ा नहीं करेंगे। गाली गलौच नहीं देंगे। सीधे कानून की शरण लेंगे, मय प्रमाण के। इस बारे में समीरलाल जी से चर्चा हुई है वह गूगल को शिकायत कर रहे हैं। जरूरत पड़ी तो हम भी करेंगे।
अरे, चेत जाओ मुफ्तखोरों! हमें यहां एक पैसा नहीं मिलता और न आशा करते हैं पर ऐसी हरकत हमें क्रोध दिलाती है। आप पूंछेंगे कि ज्ञानी होकर भी गुस्सा क्यों?
हम दृष्टा की तरह जीवन को देखते हैं। वह देहधारी जिसने हम आत्मा को धारण किया है उसे परिश्रम करते देख हम खुश होते हैं पर उसका कोई इस तरह दोहन करे तो क्रोध तो आयेगा ही न! भले ही हम आत्मा को धारण करने वाला चुप बैठा रहे पर हम उसकी उंगलियों को अगर रचना के लिये प्रेरित कर सकते हैं तो विध्वंस के लिये भी तैयार कर सकते हैं। वह हिंसा नहीं करेगा, गाली गलौच नहीं करेगा पर उसके साथ के लोग हैं जो ऐसे अवसर पर उसकी मदद करने को आयेंगे। इसलिये रास्ते दो ही हैं कि हर पाठ दो हजार भुगतान करो या ब्लाग से सारे पाठ हटा दो। अब नाम देने से भी कोई फायदा नहीं है। ऐसे दुष्टों से संगत भी कष्ट का कारण बनती है। बाकी लोग भी ऐसे लोगों से सतर्क रहें जो अंतर्जाल पर हिन्दी में नाम केवल दूसरों से धोखा कर चमकाना चाहते हैं।  अंतर्जाल पर लिखने में यही समस्या है कि कुछ लोग ब्लाग लेखकों को फालतु का आदमी समझकर उसके पाठों का इस तरह उपयोग करते हैं।
ऐसे लोगों से भी जूझना पड़ेगा तो फिर कौन हिन्दी में लिखने को तैयार होगा? सच तो यह है कि इस लेखक के अनेक मित्र इसलिये ही अंतर्जाल पर लिखने से कतराते हैं कि उनको चोरी का खतरा सताता है और हिन्दी अंतर्जाल पर लिखे जाने का यह भी एक कारण है। इससे निजात पाये बिना हिन्दी की अंतर्जाल पर पूर्णता से स्थापना एक कठिन काम होगा।
उस ब्लाग का पता यह है।
http://hindireader.blogspot.com

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

-------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, November 22, 2009

भारतीय प्रचार माध्यम, तिब्बत और चीन-आलेख (indian media, tibbat and china-hindi artcile)

भारत के बौद्धिक वर्ग में बहुत कम लोग इस बात का अनुमान लगा पाये थे कि विश्वव्यापी मंदी इतने व्यापक रूप से विश्व में अंतर्राष्ट्रीय समीकरण बदल देगी। कुछ विशेषज्ञों ने इस बात से आगाह कर दिया था कि यह मंदी चैंकाने वाले  बदलाव लायेगी क्योंकि विश्व की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र बिंदु में स्थित अमेरिका इसका सबसे बड़ा शिकार बन रहा था।  अमेरिका और चीन के बीच तात्कालिक सद्भाव इसी का मंदी की मार से उपजा परिणाम है।  चार देशों की यात्रा समाप्त कर अपने देश पहुंचे अमेरिकन राष्ट्रपति ने अपने साप्ताहिक उद्बोधन में अपनी जनता को बताया कि वह तो अमेरिकन बेरोजगारों के लिये वहां नौकरी ढूंढने गये थे। 



जिन लोगों को अमेरिका द्वारा तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लेने पर आश्चर्य है उन्हें अब यह बात समझ लेना चाहिये कि वहां अमेरिका अपने लिये अपनी अर्थव्यवस्था की प्राणवायु ढूंढ रहा है।  मुखर भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक-जो अपनी विशेषज्ञताओं के कारण प्रचार माध्यमों में छाये रहते हैं- इसका पहले अनुमान नहीं लगा पाये तो उसमें उनकी चिंतन क्षमता का अभाव ही जिम्मेदार है।  दरअसल भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक लकीर से हटकर नहीं सोचते-हालांकि ऐसा करने से प्रचार माध्यमों द्वारा उनको नकाने जाने का भी भय रहता है।  दूसरी बात यह है कि वह राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक आधारों को अलग अलग देखने के इतने आदी हो चुके हैं कि एक को दूसरे विषय से जोड़ने का उनमें साहस नहीं होता।  अगर आर्थिक विशेषज्ञ है तो वह अन्य आधारों से परे रहकर सोचता है और अगर अन्य विषयों का हो तो  आर्थिक विषयों से परहेज करता है। सच बात तो यह है कि वैश्विक आर्थिक उदारीकरण ने न केवल बाजारोें को दायरा बढ़ाया है वरन् उसने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामरिक विषयों को भी प्रभावित करना शुरु कर दिया है। भारतीय बुद्धिजीवियों और चिंतकों की संकीर्ण सोच के ही कारण है कि भारत आर्थिक रूप से दूसरों के लिये बाजार होते हुए भी अन्य क्षेत्रों में पिछड़ रहा है।  यहंा तक कि भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन चीन भी भारतीय अर्थव्यवस्था का दोहन करने के बावजूद आंख दिखा रहा है। उस दिन अंतर्जाल पर एक ब्लाग पर पढ़ने को मिला कि एक स्थान पर चीन की कंपनी अपने यहां से अनेक कर्मचारी लायी है जो यहां अपने यहां कार्यरत भारतीय कर्मचारियों से अधिक वेतन पाते हैं।  इससे तो यह जाहिर हो रहा है कि चीन के लोगों को भी भारत रोजगार दे रहा है।  चीन बड़ी चालाकी से अन्य विषयों को राजनीति से अलग कर आगे बढ़ा रहा है पर उसने यह सुविधा अमेरिका को नहीं दी।  मंदी की मार से जूझ रहे अमेरिका को अपने देश के बेरोजगारों के साहबी किस्म की नौकरी चाहिये-जहां तक शारीरिक श्रम की बात है तो विश्व भर के गोरे देशों के लोग  उससे दूर रहते हैं और एशियाई देशों के लोग ही वहां पहुंचकर उनकी गुलामी करते हैं।  यह साहबी किस्म की नौकरी अब एशियाई देशों में सुलभ है। इस मामले में भारत से बड़ा बाजार चीन है।  चीन में भी तिब्बत का एक बहुत बड़ा भूभाग है जहां विकास की संभावनाएं हैं और वहां अमेरिका अपनी दृष्टि रख सकता है। संभव है चीन उसकी कंपनियों और लोगों को वहां घुसने का अवसर प्रदान करे ।

अमेरिका भारत से पूरा फायदा बिना किसी राजनीतिक सुविधा के ले रहा है इसलिये परवाह नहीं करता है पर चीन बहुत चालाक है। इसके अलावा तिब्बत का बहुत बड़ा भूभाग जहां अभी विदेशियों का जाना कठिन है वह भी अमेरिका के लिये सहज सुलभ हो सकता है।  दूसरी बात यह है कि अमेरिका हथियारों को बहुत बड़ा सौदागर है और तिब्बती हिंसक नहीं है।  इतने बरसों से वह अपनी आजादी के लिये जूझ रहे हैं पर उन्होंने हिंसा के लिये कोई हथियार खरीदने की मुहिम नहीं चलाई जिससे वह किसी पश्चिम देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकें।  यही कारण है कि पश्चिमी देशों की तिब्बतियों से केवल शाब्दिक सहानुभूति रही है वह भी इसलिये कि कभी कभी चीन की राजनीतिक रूप से बांह मरोड़ सकें। अब जबकि पश्चिमी देश लाचार हो गये हैं इसलिये उसका बाजार पाने के लिये उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि वह तिब्बत को उसका हिस्सा माने।

अब समस्या भारतीय बुद्धिजीवियों और चिंतकों के सामने है। वह यह कि अभी तक यहां के चिंतक इस बात से आश्वस्त थे कि अमेरिका और पश्चिमी देशों का तिब्बत को लेकर चीन से हमेशा लड़ते रहेंगेे। इस तरह वह चीन विरोध मंच पर हमारे साथ हमेशा खड़े मिलेंगे।  ऐसे में चीन से सीधे टकराव की बात सोचने वह बचते रहे। अब स्थिति बदल गयी है। चीन के लिये तिब्बत की समस्या बहुत गंभीर है और दलाई लामा भारत में ही रहते हैं।  पश्चिम का जो सुरक्षित वैचारिक आवरण था जिसके सहारे भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक अपने वक्तव्य सुरक्षित अनुभव करते हुए देते थे, अब वह नहीं रहा।  स्पष्टतः चीन के साथ सीधा टकराव करते हुए लिखना और बोलना पड़ेगा, शायद यही बात भारतीय बुद्धिजीवियों को परेशान किये हुए है। वैसे एक बात तय है कि अगर चीन पर भारत आर्थिक दबाव डाले तो वह भी उसी तरह कई विषयों से पीछ हट सकता है। एक बात याद रहे चीन का बना सामान हमारे यहां बिकता है पर उसका खुद का बाजार कोरियो और जापानी सामानों से वैसे ही पटा पड़ा है जैसा उसके सामानो को हमारे यहां-ऐसे समाचार आये दिन अखबार तथा अंतर्जाल पर पढ़ने को मिल जाते हैं। सबसे आश्चर्य तो इस बात का है कि जब भारत ने तिब्बत विवाद से स्वयं पीछे हटने का निर्णय लिया तब उससे अरुणांचल पर ही ऐसी राय रखने के लिये बाध्य क्यों नहीं किया? चीन की सामरिक ताकत बहुत है पर भारत कोई कम नहीं है। अगर उससे हमें तबाही का भय है तो वह भी हमारी शक्ति को देखते हुए कोई उससे मुक्त नहीं है। मुख्य विषय है आर्थिक आधार जिसके संदर्भ देते हुए उससे भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक प्रचार माध्यमों के द्वारा उसे चेताते रहें।

एक बाद यह भी तय करना चाहिये कि आर्थिक रूप से परेशान अमेरिका अब किसी भी आधार पर भारत को वैचारिक समर्थन नहीं देगा। आपको याद होगा उसने बाहर के लोगों को अमेरिका में नौकरी कम देने का फैसला किया तो उसके आर्थिक विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया क्योंकि अनेक प्रकार की ऐसी नौकरियां ऐसी हैं जो अमेरिकन करते ही नहीं और करते हैं तो उनका वेतन अधिक होता है।   इस पर भारत और चीन में साहबी किस्म की नौकरियों के लिये ब्रिटेन और अमेरिका दोनों ही हाथ पंाव मार रहे हैं।  उनके राजनीतिक हित आर्थिक लाभ के आसपास ही घूमते हैं।   अब वह अपने ही गुलाम रहे इन दो देशों में-चीन और भारत-साहबी किस्म की नौकरियों के लिये अपने लोग भेजना चाहते हैं।  बदले में अपनी गुलामी किस्म की नौकरियों के लिये वह अपने यहां इन्हीं देशों से लोग बुलाते भी हैं। ऐसे में अगर भारत के बुद्धिजीवी और चिंतक आक्रामक ढंग से प्रचार माध्यमों में अपने आर्थिक आधार पर अन्य विषयों को भी जोड़कर रखें तो संभव है कि चीन थोड़ा सतर्क रहे। कम से कम भारतीय प्रचार माध्यमों की ताकत इतनी तो है कि चीन भी उनसे परेशान रहता है।  वैसे आजकल प्रचार माध्यमों से जो कहा जाता है उसका प्रभाव रहता ही इससे इंकार करना कठिन है। एक बात निश्चित है कि तिब्बत चीन का हिस्सा नहीं है और वह अपनी सम्राज्यवादी नीति के कारण वह जमा हुआ है जो उसने पश्चिम से उधार ली है।






कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

-------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, November 14, 2009

भूखे पेट न भजन होता न बंदूक चलती- काव्य चिंतन (bhookh ar banddook-hindi kavita aur lekh)

भूखे पेट भजन नहीं होते-यह सच है पर साथ ही यह भी एक तथ्य है कि भूखे पेट गोलियां या तलवार नहीं चलती। देश में कुछ स्थानों-खासतौर से पूर्व क्षेत्र-में व्याप्त हिंसा में अपनी वैचारिक जमीन तलाश रहे कुछ विकासवादी देश के बुद्धिजीवियों को ललकार रहे हैं कि ‘तुम उस इलाके की हकीकत नहीं जानते।’
यह कहना कठिन है कि वह स्वयं उन इलाकों को कितना जानते हैं पर उनके पाठ हिंसा का समर्थन करने वाले बदलाव की जमीन पर लिखे जाते हैं। अपने ढोंग और पाखंड को वह इस तरह पेश करते हैं गोया कि जैसे कि सत्य केवल उनके आसपास ही घूमता हो। दूसरी समस्या यह है कि उनके सामने खड़े परंपरावादी लेखक कोई ठोस तर्क प्रस्तुत कर उनका प्रतिवाद नहीं करते। बस, सभी हिंसा और अहिंसा के नारे लगाते हुए द्वैरथ करने में व्यस्त है।
इन हिंसा समर्थकों से सवाल करने से पहले हम यह स्वीकार करते हैं कि गरीब, आदिवासी तथा मजदूरों को शोषण सभी जगह होता है। इसे रुकना चाहिये पर इसका उपाय केवल राजकीय प्रयासों के साथ इसके लिये अमीर और गरीब वर्ग में चेतना लाने का काम भी होना चाहिये। हमारे अध्यात्मिक ग्रंथ यही संदेश देते हैं कि अमीर आदमी हमेशा ही गरीब की मदद करे। किसी भी काम या उसे करने वाले को छोटा न समझे। सभी को समदर्शिता के भाव से देखें। इस प्रचार के लिये किसी प्रकार की लाल या पीली किताब की आवश्यकता नहीं है। कम से कम विदेशी विचार की तो सोचना भी बेकार है।
अब आते हैं असली बात पर। वह लोग भूखे हैं, उनका शोषण हो रहा है, और बरसों से उनके साथ न्याय नहीं हुआ इसलिये उन्होंने हथियार उठा लिये। यह तर्क विकासवादी बड़ी शान से देते हैं। जरा यह भी बतायें कि जंगलों में अनाज या फलों की खेती होती है न कि बंदूक और गोलियों की। वन्य और धन संपदा का हिस्सा अगर उसके मजदूरों को नहीं मिला तो उन्होंने हथियार कैसे उठा लिये? क्या वह भी पेड़ पर उगते हैं?
अब तर्क देंगे कि-‘सभी नहीं हथियार खरीदते कोई एकाध या कुछ जागरुक आदमी उनको न्याय दिलाने के लिये खरीद ही लेते हैं।’
वह कितनों को न्याय दिलाने के लिये हथियार खरीद कर चलाते हैं। एक, दो, दस, सौ या हजार लोगों के लिये? एक बंदूक कोई पांच या दस रुपये में नहीं आती। उतनी रकम से तो वह कई भूखे लोगों को खाना खिला सकते हैं। फिर जंगल में उनको बंदूक इतनी सहज सुलभ कैसे हो जाती है। इन कथित योद्धाओं के पास केवल बंदूक ही नहीं आधुनिक सुख सुविधा के भी ढेर सारे साधन भी होते हैं। कम से कम व गरीब, मजदूर या शोषित नहीं होते बल्कि उनके आर्थिक स्त्रोत ही संदिग्ध होते हैं।
विकासवादियों का तर्क है कि पूर्वी इलाके में खनिज और वन्य संपदा के लिये देश का पूंजीपति वर्ग राज्य की मदद से लूट मचा रहा है उसके खिलाफ स्थानीय लोगों का असंतोष ही हिंसा का कारण है। अगर विकास वादियों का यह तर्क मान लिया जाये तो उनसे यह भी पूछा जाना चाहिये कि क्या हिंसक तत्व वाकई इसलिये संघर्षरत हैं? वह तमाम तरह के वाद सुनायेंगे पर सिवाय झूठ या भ्रम के अलावा उनके पास कुछ नहीं है। अखबार में एक खबर छपी है जिसे पता नहीं विकासवादियों ने पढ़ा कि नहीं । एक खास और मशहूर आदमी के विरुद्ध आयकर विभाग आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच कर रहा है। उसमें यह बात सामने आयी है कि उन्होंने पद पर रहते हुए ऐसी कंपनियों में भी निवेश किया जिनका संचालन कथित रूप से इन्हीं पूर्वी क्षेत्र के हिंसक तत्वों के हाथ में प्रत्यक्ष रूप से था। यानि यह हिंसक संगठन स्वयं भी वहां की संपत्तियों के दोहन में रत हैं। अब इसका यह तर्क भी दिया जा सकता है क्योंकि भूख और गरीबी से लड़ने के लिये पैसा चाहिये इसलिये यह सब करते हैं। यह एक महाढोंग जताने वाला तर्क होगा क्योंकि आपने इसके लिये उसी प्रकार के बड़े लोगों से साथ लिया जिन पर आप शोषण का आरोप लगाते हैं। हम यहां किसी का न नाम लेना चाहते हैं न सुनना क्योंकि हमारा लिखने का मुख्य उद्देश्य केवल बहस में अपनी बात रखना हैं।
इन पंक्तियों के लेखक के इस पाठ का आधार समाचार पत्र, टीवी और अंतर्जाल पर इस संबंध में उपलब्ध जानकारी ही है। एक सामान्य आदमी के पास यही साधन होते हैं जिनसे वह कुछ जान और समझ पाता है। इनसे इतर की गतिविधियों के बारे में तो कोई जानकारी ही समझ सकता है।
इन हिंसक संगठनों ने अनेक जगह बम विस्फोट कर यह सबित करने का प्रयास किया कि वह क्रांतिकारी हैं। उनमें मारे गये पुलिस और सुरक्षा बलों के सामान्य कर्मचारी और अधिकारी। एक बार में तीस से पचास तक लोगों की इन्होंने जान ली। इनसे पूछिये कि अपनी रोजी रोटी की तलाश में आये सामान्य जनों की जान लेने पर उनके परिवारों का क्या हश्र होता है वह जानते हैं? सच तो यह है कि यह हिंसक संगठन कहीं न कहीं उन्हीं लोगों के शोषक भी हो सकते हैं जिनके भले का यह दावा करते हैं। जब तक गोलियों और बारुद प्राप्त करने के आर्थिक स्त्रोतों का यह प्रमाणिक रूप से उजागर नहीं करते तब उनकी विचारधारा के आधार पर बहस बेकार है। इन पर तब यही आरोप भी लगता है कि हिंसक तत्व ही इनको प्रायोजित कर रहे हैं।
भारत में शोषण और अनाचार कहां नहीं है। यह संगठन केवल उन्हीं जगहों पर एकत्रित होते हैं जहां पर जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रीय आधार पर लोगों को एकजुट करना आसान होता है। यह आसानी वहीं अधिक होती है जहां बाहर से अन्य लोग नहीं पहुंच पाते। जहां लोग बंटे हुए हैं वहां यह संगठन काम नहीं कर पाते अलबत्ता वहां चर्चाएं कर यह अपने वैचारिक आधार का प्रचार अवश्य करते हैं। बहरहाल चाहे कोई भी कितना दावा कर ले। हिंसा से कोई मार्ग नहीं निकलता। वर्तमान सभ्यता में अपने विरुद्ध अन्याय, शोषण तथा दगा के खिलाफ गांधी का अहिंसक आंदोलन ही प्रभावी है। हिंसा करते हुए बंदूक उठाने का मतलब है कि आप उन्हीं पश्चिम देशों का साथ दे रहे हैं जो इनके निर्यातक हैं और जिनके आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सम्राज्य के खिलाफ युद्ध का दावा करते हैं। यह वैचारिक बहस केवल दिखावे की और प्रायोजित लगती है। जब तक हथियारों के खरीदने के लिये जुटाये धन के स्त्रोत नहीं बताये जाते। जहां तक पूर्वी इलाकों को जानने या न जानने की बात है तो शोषण, अन्याय और धोखे की प्रवृत्ति सभी जगह है और उसे कहीं बैठकर समझा जा सकता है। आईये
इस पर इस लेखक की कुछ पंक्तियां
यह सत्य है कि
भूखे पेट भजन नहीं होता।
मगर याद रहे
जिसे दाना अन्न का न मिले
उसमें बंदूक चलाने का भी माद्दा भी नहीं होता।
अरे, हिंसा में वैचारिक आधार ढूंढने वालों!
अगर गोली से
रुक जाता अन्याय, शोषण और गरीबी तो
पहरेदारों का
अमीरों के घर पहरा न होता।
तुम शोर कर रहे हो जिस तरह
सोच रहे सारा जमाना बहरा होता।
कौन करेगा तुम्हारे इस झूठ पर यकीन कि
अन्न और धन नहीं मिलता गरीबों और भूखों को
पर उनको बंदूक और गोली देने के लिये
कोई न कोई मेहरबान जरूर होता।
---------------
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

-------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Thursday, October 29, 2009

समाज में ‘हिंदी’ का उपयोग सामान्य आदत बने-आलेख (hindi ek adat bane-hindi lekh)

सुना है अब इंटरनेट में लैटिन के साथ ही देवनागरी में भी खोज सुगम होने वाली है। यह एक अच्छी खबर है मगर इससे हिंदी भाषा के पढ़ने और लिखने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ जायेगी, यह आशा करना एकदम गलत होगा। सच तो यह है कि अगर देवनागरी में खोज सुगम हुई भी तो भी इसी मंथर गति से ही हिंदी लेखन और पठन में बढ़ोतरी होगी जैसे अब हो रही है। हिंदी को लेकर जितनी उछलकूल दिखती है उतनी वास्तविकता जमीन पर नहीं है। सच कहें तो कभी कभी तो लगता है कि हम हिंदी में इसलिये लिख पढ़े रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी हमारे समझ में नहीं आती। हम हिंदी में लिख पढ़ते भी इसलिये भी है ताकि जैसा लेखक ने लिखा है वैसा ही समझ में आये। वरना तो जिनको थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती है उनको तो हिंदी में लिखा दोयम दर्जे का लगता है। वैसे अंतर्जाल पर हम लोगों की अंग्रेजी देखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि लोगों की अंग्रेजी भी कोई परिपक्व है इस पर विश्वास नहीं करना चाहिए-क्योंकि बात समझ में आ गयी तो फिर कौन उसका व्याकरण देखता है और अगर दूसरे ढंग से भी समझा तो कौन परख सकता है कि उसने वैसा ही पढ़ा जैसा लिखा गया था। बहरहाल अंग्रेजी के प्रति मोह लोगों का इसलिये अधिक नहीं है कि उसमें बहुत कुछ लिखा गया है बल्कि वह दिखाते हैं ताकि लोग उनको पढ़ालिखा इंसान समझें।
‘आप इतना पढ़ें लिखें हैं फिर भी आपको अंग्रेजी नहीं आती-‘’हिंदी में पढ़े लिखे एक सज्जन से उनके पहचान वाले लड़के ने कहा’‘-हमें तो आती है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं न!’
मध्यम वर्ग की यह नयी पीढ़ी हिंदी के प्रति रुझान दिखाने की बजाय उसकी उपेक्षा में आधुनिकता का बोध इस तरह कराती है जैसे कि ‘नयी भारतीय सभ्यता’ का यह एक एक प्रतीक हो।
जैसे जैसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है-निजी क्षेत्र में अंग्रेजी की शिक्षा का प्रसार बढ़ा है। एक दौर था जब सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पाना ही एक विजय समझा जाता था-उस समय निजी क्षेत्र के छात्रों को फुरसतिया समझा जाता था। उस समय के दौर के विद्यार्थियों ने हिंदी का अध्ययन अच्छी तरह किया। शायद उनमें से ही अब ऐसे लोग हैं जो हिंदी में लेखन बेहतर ढंग से करते हैं। अब अगर हिंदी अच्छे लिखेंगे तो वही लोग जिनके माता पिता फीस के कारण अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों में नहीं पढ़ा सकते और सरकारी विद्यालयों में ही जो अपना भविष्य बनाने जाते हैं।
एक समय इस लेखक ने अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध स्तंभकार श्री खुशवंत सिंह के इस बयान पर विरोध करते हुए एक अखबार में पत्र तक लिख डाला‘जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदी गरीब भाषा है।’
बाद में पता लगा कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा बल्कि उनका आशय था कि ‘हिन्दुस्तान में हिंदी गरीबों की भाषा है’। तब अखबार वालों पर भरोसा था इसलिये मानते थे कि उन्होंने ऐसा कहा होगा पर अब जब अपनी आंखों के सामने बयानों की तोड़मोड़ देख रहे हैं तो मानना पड़ता है कि ऐसा ही हुआ होगा। बहरहाल यह लेखक उनकी आलोचना के लिये अब क्षमाप्रार्थी है क्योंकि अब यह लगने लगा है कि वाकई हिंदी गरीबों की भाषा है। इन्हीं अल्पधनी परिवारों में ही हिंदी का अब भविष्य निर्भर है इसमें संदेह नहीं और यह आशा करना भी बुरा नहीं कि आगे इसका प्रसार अंतर्जाल पर बढ़ेगा, क्योंकि यही वर्ग हमारे देश में सबसे बड़ा है।

समस्या यह है कि इस समय कितने लोग हैं जो अब तक विलासिता की शय समझे जा रहे अंतर्जाल पर सक्रिय होंगे या उसका खर्च वहन कर सकते हैं। इस समय तो धनी, उच्च मध्यम, सामान्य मध्यम वर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिये ही यह एक ऐसी सुविधा है जिसका वह प्रयोग कर रहे हैं और इनमें अधिकतर की नयी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित है। जब हम अंतर्जाल की बात करते हैं तो इन्हीं वर्गों में सक्रिय प्रयोक्ताओं से अभी वास्ता पड़ता है और उनके लिये अभी भी अंग्रेजी पढ़ना ही एक ‘फैशनेबल’ बात है। ऐसे में भले ही सर्च इंजिनों में भले ही देवनागरी करण हो जाये पर लोगों की आदत ऐसे नहीं जायेगी। अभी क्या गूगल हिंदी के लिये कम सुविधा दे रहा है। उसके ईमेल पर भी हिंदी की सुविधा है। ब्लाग स्पाट पर हिंदी लिखने की सुविधा का उपयेाग करते हुए अनेक लोगों को तीन साल का समय हो गया है। अगर हिंदी में लिखने की इच्छा वाले पूरा समाज होता तो क्या इतने कम ब्लाग लेखक होते? पढ़ने वालों का आंकड़ा भी कोई गुणात्मक वुद्धि नहीं दर्शा रहा।
गूगल के ईमेल पर हिंदी लिखने की सुविधा की चर्चा करने पर एक नवयौवना का जवाब बड़ा अच्छा था-‘अंकल हम उसका यूज (उपयोग) नहीं करते, हमारे मोस्टली (अधिकतर) फ्रैंड्स हिंदी नहीं समझते। हिंदी भी उनको इंग्लिश (रोमन लिपि) में लिखना पसंद है। सभी अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं। जो हिंदी वाले भी हैं वह भी इससे नहीं लिखते।’
ऐसे लोगों को समझाना कठिन है। कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी की कितनी भी सुविधा अंतर्जाल पर आ जाये उसका लाभ तब तक नहीं है जब तक उसे सामान्य समाज की आदत नहीं बनाया जाता। इसका दूसरा मार्ग यह है कि इंटरनेट कनेक्शन सस्ते हो जायें तो अल्प धन वाला वर्ग भी इससे जुड़ेे जिसके बच्चों को हिंदी माध्यम में शिक्षा मजबूरीवश लेनी पड़ रही है। यकीनन इसी वर्ग के हिंदी भाषा का भविष्य को समृद्ध करेगा। ऐसा नहीं कि उच्च वर्ग में हिंदी प्रेम करने वाले नहीं है-अगर ऐसा होता तो इस समय इतने लिखने वाले नहीं होते-पर उनकी संख्या कम है। ऐसा लिखने वाले निरंकार भाव से लिख रहे हैं पर उनके सामने जो समाज है वह अहंकार भाव से फैशन की राह पर चलकर अपने को श्रेष्ठ समझता है जिसमे हिंदी से मूंह फेरना एक प्रतीक माना जाता है।
----------------------

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

-------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, September 28, 2009

ब्लागवाणी के बंद होने से परेशान न हों-आलेख (closing of blogvani-hindi lekh)

यह पुराने और फ्लाप हिंदी ब्लाग लेखक का पाठ है। यह स्पष्ट करना इसलिये जरूरी है क्योंकि यह पाठ अपने शीर्षक के कारण वह नये ब्लाग लेखक भी पढ़ सकते हैं जिन्होंने इसका नाम तक नहीं सुना हो-हालांकि वह ऐसा करेंगे इसकी आशा नहीं है क्योंकि हिट ब्लाग लेखकों को पढ़ने की आदत जो हो गयी है। ब्लागवाणी बंद हो गया है, इसका दुःख है क्योंकि उसे इस लेखक के दो ऐसे मित्र चला रहे थे जो उसे पसंद करते थे हालांकि ब्लागवाणी पर भले ही इसके पाठ को अधिक समर्थन न मिलता हो।
ब्लागवाणी दो यशस्वी ब्लाग लेखकों का सृजन है (अभी शुरु होने की संभावना है इसलिये था नहीं कर रहे)। इनमें एक तो धुरविरोधीजी नाम से ब्लाग चलाते रहे बाद में उसे बंद कर दिया। उनकी विदाई में दुःख भरे गीत भी गाये गये। हमें भी अफसोस हुआ पर हैरानी तब हुई जब एक ब्लाग मित्र ने प्रथम मुलाकात में ही बताया कि धुरविरोधीजी तो ब्लागवाणी के संचालक हैं। तब हमारा दुःख कम हुआ।
अब इस ब्लागवाणी के अभ्युदय की चर्चा कर लें। ब्लागवाणी का निर्माण तो पहले ही हो गया था पर नारद की वजह से उस पर ब्लाग लेखक कम ही जाते थे जैसे अभी चिट्ठाजगत पर कम जाते हैं। उस समय नारद पर भी पसंद को लेकर ऐसी धमाचैकड़ी मची हुई थी। उस समय धुरविरोधी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी जैसे हमारे ब्लाग की ब्लागवाणी पर होती है-वहां हमारे पाठ पर दो तीन संख्या ही रहती है हालांकि इससे धुरविरोधी जी के ब्लाग की कुछ अच्छी थी। वह इससे बहुत नाराज थे। इस पर उन्होंने विद्रोह कर दिया। जिसकी परिणति ब्लागवाणी के रूप में हुई। फिर भी उस पर ब्लाग लेखक कम ही जाते थे। एक बार नारद की स्थिति तीन दिन के लिये डांवाडोल हुई तो हमारी हालत भी ऐसे ही बनी जैसी आज मौलिक और स्वतंत्र ब्लाग लेखकों की है। तब ब्लागवाणी पर इस लेखक की नजर पड़ी और एक पाठ लिखा कि नारद में प्रति मोह तो ठीक है पर अन्य फोरमों पर भी जायें। इस पाठ का असर हुआ और ब्लागवाणी पर लोग पहुंच गये। हम भी नारद पर फ्लाप थे पर ब्लागवाणी पर हिट मिलने लगे पर फिर वही ढाक के तीन पात। हम यही सोचते रहे कि केवल इन्हीं फोरमों से पाठक मिलते हैं पर बाद में अपने लिये काउंटर लगाये तो पता लगा कि इन फोरमों से अधिक तो अन्य स्थानों से भी पाठक आते हैं। दरअसल यह समस्या ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर ही नजर आती है जबकि वर्डप्रेस के डेशबोर्ड पर पाठक और पढ़े गये पाठों की संख्या का समूचा विवरण दृष्टिगोचर हो जाता है। आप अगर ध्यान करें तो किसी भी वर्डप्रेस वाले ब्लाग लेखक ने ब्लागवाणी के बंद होने पर ऐसा आर्तनाद नहीं किया जितना केवल ब्लाग स्पाट के ब्लाग लेखकों ने किया है।
मौलिक और स्वतंत्र लेखकों को यह जानकर हैरानी होगी कि हमने वर्डप्रेस के सारे ब्लाग अपने दम पर सफल बनाने के विश्वास में ब्लाग वाणी से हटवा लिया थे। आज भी वह यथावत अपनी पाठक संख्या बनाये हुए हैं। हां, एक बात है कि हम लिखते तो ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर ही क्योंकि वह ब्लागवाणी पर दिखते हैं और तत्काल प्रतिकिया मिलती है। बाद में उसको वर्डप्रेस के ब्लाग पर रखते हैं और वह अधिक हिट दिलाते हैं।
स्वतंत्र और मौलिक ब्लाग लेखक तकनीक रूप से अधिक सक्षम नहीं होते पर उन ब्लाग लेखकों के पाठ भी नहीं पढ़ते जो इस संबंध में जानकारी देते हैं। उनको हिट देखकर टिप्पणियां दे तो आते हैं पर उनसे सीखते नहीं है। जो स्वतंत्र एवं मौलिक ब्लाग लेखक इन तकनीक से सक्षम ब्लाग लेखकों के पाठ पढ़ेगा वह सीखता जायेगा। इन्हीं ब्लाग लेखकों के ब्लाग से ही इस लेखक ने पाठ पठनपाठक संख्या बताने वाले काउंटर लिये हैं जिनसे अपने ब्लाग का स्तर पता लग जाता है।
जो छोटे शहरों के ब्लाग लेखक हैं उनको हिंदी ब्लाग जगत में चल रहे झगड़ों का सही पता नहीं लगता सिवाय इसके कि दो ग्रुप हैं जो हमेशा ही आपस में द्वंद्वरत रहते हैं। मुश्किल यह है कि दोनों तरफ ही हमारे मित्र हैं वह इस कारण क्योंकि अंतर्जाल पर शुरुआती दौर में उनसे संपर्क हो गया और उनसे हम सीखे। जब यह लोग आपस में टकराते हैं तो जो जानकारी हमारे सामने आती है वह हैरान कर देती है। छद्म नाम से ब्लाग लिखते हैं पर जब एक दूसरे की पोल खोलते हैं तो यह देखकर सन्न रह जाते हैं कि क्या वाकई अमुक ब्लागर छद्म नाम से भी लिखता है। हम जब नाम पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है कि पूरा का पूरा मित्र समूह ही ऐसा है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हिंदी ब्लाग की सेवाओं को लेकर हम उन पर कोई आक्षेप नहीं करते भले ही उनको थोड़ा बहुत पैसा मिलता हो। बल्कि उनको पैसा मिलने पर हमें खुशी होती है। कभी कभी तो लगता है कि फिक्सिंग वार चल रहा है। इसके बावजूद एक बात सत्य है कि नारद समूह और ब्लागवाणी की आपस में पटरी नहीं बैठ सकती है। अब यह व्यवसायिक वजह से है या विचारों की वजह से इसे जानन को प्रयास करनां अपना समय बरबाद करना है। इसलिये जो रचनाकर्म और अभिव्यक्ति की वजह से ब्लाग लिख रहे हैं वह किसी एग्रीगेटर के बंद होने से इस तरह कभी निराश न हों। अपने ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर कोई काउंटर लगा लें यही श्रेयस्कर होगा। नारद समूह के लोग काफी तेज हैं और वह छिपकर नहीं बल्कि सामने आकर ब्लागवाणी के लोगों का सामना करते हैं-यह अलग बात है कि यही लोग पाठकों के लोभ में आकर वहां अपने ब्लाग का पंजीयन कराने से बाज नहीं आते। अगर ब्लागवाणी लिंक नहीं देता तो अपने ब्लाग पर पाठ ही डाल देते हैं फिर उसका लिंक उस ब्लाग पर दिखाते हैं जो ब्लागवाणी पर है। बहरहाल यह ऐसा द्वंद्व ऐसा है जिसमें हम छोटे शहरों के मौलिक तथा स्वतंत्र ब्लाग कोई भूमिका नहीं निभा सकते। जहां तक ब्लागवाणी के संचालकों का सवाल है तो धुरविरोधी जी ऐसे चुप बैठने वालों में नहीं है वह कुछ नया जरूर करेंगे ताकि उनका प्रभाव हिंदी ब्लाग जगत पर बना रहे। यह पाठ हमने इसलिये लिखा क्योंकि कुछ नये तथा पुराने स्वतंत्र मौलिक ब्लागरों को इस पर परेशान होते देखा तो सोचा कि चलो उनसे अपनी बात कही जाये। हमने धुरविरोधी जी नाम इसलिये लिखा क्योंकि उनसे इसी रूप में परिचय है और हम उनके वैचारिक रूप को इसी रूप में पसंद करते हैं। वैसे उनके विरोधी भी उनके उसी रूप को नहीं भूलते और यह बताने से बाज नहीं आ रहे कि हमने तो नारद पर उनके आक्रमण को खूब झेला था वह क्यों अपना एग्रीगेटर बंद कर गये? हमारी धुरविरोधी जी को उनके अगले कदम के लिये शुभकामनायें। उनके विरोधियों को भी शुभकामनायें कि अभी वह कुछ दिन चैन से बैठ लें फिर आयेगा धुरविरोधीजी का कोई नया स्वरूप उनको व्यस्त रखने के लिये। हमारे तो सभी मित्र हो और दशहरे की दोबारा शुभकामनायें। सुबह का पाठ तो ब्लागवाणी के बंद होने के कारण फ्लाप हो गया न!
....................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

लोकप्रिय पत्रिकाएँ

विशिष्ट पत्रिकाएँ