Sunday, June 07, 2009

ब्लाग कोई टीवी चैनल और अखबार नहीं है-आलेख

क्या यह जरूरी है कि किसी खास दिन होने पर अपने ब्लाग/पत्रिका पर उससे संबंध विषय पर लिखा जाये? कतई नहीं। आपने देखा होगा कि अखबार और टीवी चैनल अक्सर किसी खास दिन पर विशेष सामग्री प्रकाशित करते हैं। यह सामग्री ऐसी होती है जिसे हम अक्सर सुन और पढ़ चुके होते हैं। उसमें कोई नया चिंतन या विचार नहीं होता जिसे पहले सुना नहीं गया हो।
सभी जानते हैं कि हमारे यहां के प्रचार माध्यम से जुड़े लोग एक निश्चित ढांचे में काम करने के आदी हो चुके हैं। फिल्म, टीवी चैनल, और प्रकाशन संस्थान किसी नये अभिनेता, संपादक या चिंतक खोजने की बजाय अपने आसपास सक्रिय लोगों में ही ऐसे कार्यकर्ता तलाश करते हैं जो केवल उनके प्रदर्शन को नियमित रख सकें न कि उसमें कोई नयापन तलाश करें। यह कोई शिकायत नहीं है बल्कि अंतर्जाल पर पिछले ढाई वर्षों से लिखने पढ़ने से उपजा अनुभव है। यहां अनेक ब्लाग लेखक न बल्कि निर्धारित वैचारिक ढांचे से अलग हटकर अपने विचार लिख रहे हैं बल्कि उनकी भाषा-उसे आक्रामक भी कह सकते हैं और प्रहारात्मक भी-से यह पता लगता है कि उनके मन में जो विद्रोह है वह आम आदमी की वास्तविक अभिव्यक्ति है।
हम यहां ब्लाग की अन्य माध्यमों से तुलना करें तो ब्लाग पर लिखा गया विषय कभी पुराना नहीं पड़ता।
तात्पर्य यह है कि अगर किसी ब्लाग लेखक ने एक बार किसी त्यौहार, दिवस या अवसर पर एक बार अपनी विषय सामग्री लिख ली है और उस पर कोई अलग से सोच उसके पास नहीं है तो दोबारा उसे लिखने की जरूरत नहीं है। अगर लिखें तो फिर नये सोच के साथ लिखें। हां, अगर वह चाहे तो ब्लाग की प्रकाशन सुविधा का लाभ उठाते हुए प्रकाशन का दिन बदल कर वही दिन कर सकता हैै। इसके अलावा वह चाहे तो पुराने की वैसी की वैसी कापी कर दोबारा प्रकाशित कर सकता है ताकि हिंदी के ब्लाग दिखाये जाने वाले फोरमों पर वह दिख सके।
इस लेखक ने देखा है कि रामनवमी, गणेश चतुर्थी, दिवाली, होली, रक्षाबंधन, पर्यावरण दिवस पर ब्लाग पर लिखे गये लेख उस दिन वैसे ही पढ़े जाते हैं जैसे लिखने वाले दिन पढ़े गये थे। होता यह है कि खास विषयों पर पढ़ने की चाहत रखने वाले पाठक सर्च इंजिनों में अपनी पसंद के शब्द से उसे ढूंढ निकालते हैं-कई बार तो एक दिन पहले ही पाठक उसे पढ़ने लगते हैं। इस लेखक ने सभी खास दिन और अवसर पर एक दिन पूर्व अपने ब्लाग/पत्रिकाओं के पाठ पठन/पाठकों की गतिविधियों का अवलोकन करते हुए देखा है कि लोग उन विषयों पर पहले ही पढ़ना प्रारंभ करते हैं। सभी खास दिन और अवसर पर पढ़े जाते ऐसे पाठों को पढ़ा जाता देखकर फिर नया लिखने का मन नहीं होता। इतना ही नहीं कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जितना अच्छा पहले उत्साह में लिख गये अब वैसा नहीं लिख पायेंगे। हालांकि कुछ विषय सदाबहार हैं जिनमें पर्यावरण और योग साधना शामिल हैं।
कुछ ब्लाग मित्र अपने पाठों पर ऐसी शिकायतें करने लगे हैं कि अमुक खास दिन कम लोगों ने लिखा या लोग अपनी संस्कृति और दायित्वों से बच रहे हैं। यह बात नहीं है। एक ब्लाग लेखक ने सन 2005 में दिपावाली पर-उस समय लिखने वाले दस या बीस से अधिक संख्या में नहीं रहे होंगे- एक पाठ लिखा था वह सर्च इंजिनों में नंबर एक पर पिछली दिपावली तक बना हुआ था। इस बार उसने उस विषय पर नहीं लिखा तो क्या हुआ उसका पाठ तो निरंतर पढ़ा गया। उस दिन उसका पाठ पढ़ते हुए इस लेखक ने इस बात का अनुभव किया कि अंतर्जाल पर लिखा गया कभी पुराना नहीं पड़ता। हम ब्लाग लेखक चूंकि हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर ही उनको पढ़ने के आदी हैं इसलिये ऐसा लगता है कि खास दिन या अवसर पर पढ़ने के लिये मिल जाये पर आम पाठक को शायद इसका आदी नहीं है। ब्लाग लेखकों के संतोष के लिये प्रकाशन का दिन बदल कर या फिर पुराने पाठ की कापी प्रस्तुत की जा सकती है पर आम पाठक को तो उस विषय पर आपका लिखा पढ़ने को वैसे ही मिल जायेगा।
उस पाठ को पढ़ने के बाद इस लेखक को लगा कि जब ब्लाग पर लिखें तो ऐसा लिखें जो सदाबहार हो। कहानी, कविता, निबंध या व्यंग्य लिखते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि वह पुराना न पड़े। सम सामयिक विषयों पर लिखें तो भी उस पर ऐसा लिखना चाहिये कि तीस वर्ष बाद भी लोग पढ़ें तो एतिहासिक पृष्ठभूमि से अधिक मतलब न होते हुए भी वैचारिक आधार पर वह लेखक या कवि के साथ खड़ा रह सके। टीवी चैनल और प्रकाशन संस्थान व्यवसायिक रूप से सक्षम होते हुए भी इस बात के लिये बाध्य हैं कि वह प्रतिदिन अपने कार्यक्रमों और पृष्ठों को नवीनता प्रदान करें जबकि ब्लाग लेखक आर्थिक और सामाजिक रूप से सामान्य होते हुए भी इस मामले में भाग्यशाली है कि उनका लिखा ‘सदाबहार’ रहेगा और नयापन लाने की बाध्यता से वह मुक्त हैं।
इसी असीमित संभावनाओं का विचार करते हुए लिखने वाले ही आनंद उठा सकते हैं। ब्लाग में हिट या फ्लाप का खेल एक दिन में समाप्त नहीं होने वाला। किसी एक पाठ को चारों फोरमों-नारद, चिट्ठाजगत, ब्लाग वाणी या हिंदी ब्लाग-पर एक ही पाठक ने पढ़ा पर यह निराशा वाली बात नहीं है क्योंकि वह आगे कितने लोगों द्वारा पढ़ा जायेगा इसका अंदाजा तो कोई नहीं लगा सकता। कुल मिलाकर ब्लाग लेखन की यह यात्रा आगे किन किन रूपों के दर्शन करायेगी यह कहना कठिन है पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस पर वैसी मानसिकता के साथ काम नहीं किया जैसी कि अन्य प्रचार माध्यमों में होना जरूरी है। ब्लाग कोई टीवी चैनल या अखबार नहीं है जिसे रोज चमकाने की आवश्यकता या बाध्यता हो। हां, अपने नियमित पाठकों के लिये नित्य कुछ लिखना भी नहीं भूलना चाहिए क्योंकि वही आगे लिखने के लिये मनोबल बनाये रखने में सहायक होते हैं।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

2 comments:

venus kesari said...

आपके कथन से पूर्ण सहमत हूँ
वीनस केसरी

शरद कोकास said...

पर्व विशेष पर ब्लॉग लेखन अनुचित नहीं है किंतु लेखन में उथलापन नहीं होना चाहिये.जिन लेखों मे विषय से सम्बन्धित अनुद्घाटित बातें,महत्वपूर्ण जानकारी और भविष्य के लिये आवश्यक सूचनायें होंगी वे सदैव पढे जायेंगें.

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