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Friday, February 20, 2009

उम्मीद-कगार और आशा-आशंकाःआलेख

‘एक समय भारत और पाकिस्तान कश्मीर समस्या हल करने के कगार पर पहुंंच गये- यह वाक्य जब अपने ईमेल पर तरकश की तरह लगे समाचारों में पढ़ें तो यह अपने आपको यह समझाना कठिन हो जाता है कि ब्लाग पढ़ रहे हैं या टीवी देख रहे हैं।

अक्सर टीवी पर सुनते हैं कि भारी तूफान में फंसी नौका के डूबने की उम्मीद है या इस मंदी में औद्योगिक वस्तुओं में मूल्य के साथ ही किस्म में भी गिरावट की उम्मीद है। सच बात तो यह है कि टीवी वाले आशंका और भय शब्द का उपयोग वहां नहीं करते जहां जरूरी है। संभव है उनके लिये भय और आशंका वाले विषय चूंकि सनसनी फैलाने वाले होते हैं और उससे ही उनको प्रतिष्ठा
मिलने की संभावना बलवती होती है इसलिये ही उनको उम्मीद शब्द के उपयोग करने की सूझती है। जब वह आशंका और भय की जगह उम्मीद शब्द का उपयोग करते हैं तो हमारा दिल बैठ जाता है पर इसकी परवाह किसे है।

अगर कोई तूफान में डूबेगी तो ही खबर बनेगी और तभी तो उसका बताने का कोई मतलब होगा।
यही हाल कगार का भी है। कई बार द्वार की जगह वह कगार शब्द का उपयोग करते हैं। हां दरवाजा या द्वार चूंकि हल्के भाव वाले इसलिये शायद वह कगार -जो कि डराने वाले होता है-उसका उपयोग करते हैं। कगार शब्द का उपयोग ऐसे होना चाहिये जहां विषय या वाक्य का आशय पतनोन्मुख होता है। जैसै मुंबई धमाकों के बाद भारत और पाकिस्तान युद्ध के कगार पर पहुंच गये थे। जहां समझौते वाली बात हो वहां ‘निकट’, दरवाजे या द्वारा शब्द ही लगता है। अगर भारत और पाकिस्तान कभी कश्मीर पर समझौते के द्वार-वैसे यह खबर पुरानी है पर अब ईमेल दी गयी है-तक पहुंंचे तो इसमें आश्चर्य नहीं हैं। दोनों कई बार आपसी समझौतों के निकट पहुंचते हैं पर युद्ध के कगार पर लौट आते हैं।

इस आलेख का उद्देश्य किसी की मजाक उड़ाना नहींं है क्योंकि यह लेखक हिंदी का सिद्ध होने का दावा नहीं करता। एक पाठक के में सहजता से पढ़ने में अड़चन आती है तो पूछना और बताना तो पड़ता ही है। हिंदी ब्लाग जगत में अनेक उत्साही लोग हैं और उनकी हिंदी पर संदेह करना स्वयं को धोखा देना होगा पर यह भी सच है कि इस टीवी ने हमारी भाषा को भ्रमित कर दिया है। अगर बचपन से हिंदी न पढ़ी होती तो शायद इसे पचा जाते। अब सोचा कि लोगों का ध्यान इस तरफ आकर्षित करें। अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी लेखकों का लिखा बहुत लंबे समय तक पढ़ा जाने वाला है। अंतर्जाल पर सक्रिय लोगों को देखें तो बहुत कम ऐसे हैं मिलते हैं जो हमारी तरह सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं और शायद अति उत्साह में उनको इस बात का ध्यान नहीं रहता कि कगार और निकट में अंतर होता है। फिर टीवी पर अक्सर कगार उम्मीद, आशा और आशंका का उपयोग करते हुए उसके भाव का ध्यान नहीं रख पाते। कगार या आशंका हमेशा निराशा का द्योतक होते हैं और उससे हिंदी का श्रोता उसी रूप में लेता है। यह अलग बात है कि पाठकों और श्रोताओं में भी कुछ लोग शायद इस बात को नहीं समझते होंगे। हां, जो हिंदी में बचपन से रचे बसे हैं वह यह देखकर असहज होते हैं और बहुत देर बात उनको समझ में आता है कि लिखने या बोलने वाले का आशय पतनोन्मुख नहीं बल्कि उत्थानोन्मुक था।

हिंदी ब्लाग जगत में कुछ लोग उसके उत्थान के लिये बहुत अच्छे प्रयास कर रहे हैं उनकी प्रशंसा करना चाहिये और हमारी उनको शुभकामनायें है कि वह मातृभाषा को शिखर पर ले जायें पर उसके लिये उनको आशा आशंका और उम्मीद और कगार के भाव को हृदंयगम करना होगा। हालांकि अनेक लोग मात्रा और वाक्यों के निर्माण में भारी त्रुटियां करते हैं पर इस आलेख का आशय उन पर टिप्पणियां करना नहीं है बल्कि शब्दों के भावों के अनुसार उनका उपयोग हो यही संदेश देना है। हालांकि हम इस गलती पर वहां टिप्पणी कर ध्यान दिला सकते थे पर ब्लाग जगत में कोई सिखाने वाली बात कहते हुए यह पता नहीं लगता कि ब्लाग लेखक किस प्रवृति का है दूसरा यह कि ब्लाग पर इस तरह की गलती पहले भी एक दो जगह देखने को मिली है। इसलिये सोचा कि चलो अपने पाठको और मित्रों को सचेत कर दें।
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1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, February 03, 2009

असली परीक्षा सर्च इंजिनों पर होनी है-आलेख

अगर मेरे ब्लाग केवल ब्लागस्पाट के ही होते तो शायद कम पाठक संख्या देखकर मैं भी बहुत दुखी होता पर वर्डप्रेस के ब्लाग मुझे हमेशा व्यस्त रखते हैं। एक तरह से देखा जाये तो ब्लाग स्पाट पर लिखे गये ब्लाग ऐसे ही हैं जैसे कि अपनी डायरी लिख रहे हों जिसे अपने ही मित्र पढ़ सकें और सर्च इंजिनों पर अगर पकड़ा जाये तो अन्य पाठक भी पढ़ सकें। इसके विपरीत वर्डप्रेस के ब्लाग ऐसे लगते हैं जैसे कि स्वयं की पत्रिका हो जहां पाठक निरंतर आते हैं। यही कारण है कि अधिकतर निराशा वाली बातें केवल ब्लागस्पाट पर लिखने वाले ही ब्लाग लेखक और लेखिकायें करते हैं जबकि वर्डप्रेस वाले अपने ब्लाग के उतार चढ़ाव देखकर उसका सुख अनुभव करते हैं।

अंतर्जाल पर बहुत सारी वेबसाईटें और फोरम हैं जो हमारे ब्लाग के लिंक लगाते हैं। वहां से भी बहुत सारे पाठक आते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि वहां से आये अधिकतर पाठक वर्डप्रेस के ब्लाग पर ही आते हैं। कुछ अंतर्जाल लेखकों को बहुत दुख होता है जिनको विभिन्न फोरमों पर अन्य के मुकाबले अपने ब्लाग के पाठ पर व्यूज कम लगते हैं। मुझे चारों फोरमों पर-नारद ब्लागवाणी,चिट्ठाजगत और हिंदी ब्लाग-व्यूज और कमेंट कम ही मिलते हैं पर मित्रों के ब्लाग पढ़ने और उनके सामने अपनी रचनायें प्रस्तुत करने का मोह इससे कम नहीं होता। मेरा मुख्य लक्ष्य है अंतर्जाल पर सच इंजिनों पर अपनी रचनायें पहुंचाना। इसके लिये मुझे वर्डप्रेस के ब्लाग बहुत सारी सुविधायें मिलती हैं। सबसे अधिक यह कि वहां अधिक टैग लगाने की सुविधा। वैसे शायद यह सुविधा ब्लागस्पाट पर भी है क्योंकि अनेक लोग 200 वर्णों से अधिक के टैग लगाते हैं पर पता नहीं वह बताते क्यों नहीं?
विभिन्न फोरमों पर अपने ब्लाग पर लिखी गयी पोस्ट त्वरित रूप से दिखाई देती है और जब तक वह ऊपर है उसको पढ़ा जा सकता है तब तक पाठक आते हैं मगर बाद में वह कम हो जाते है। फोरमों पर कम व्यूज देखा जाये तो मुझे स्वयं को फ्लाप ब्लाग लेखक मानने में संकोच नहीं होता। वैसे वहां के व्यूज देखकर किसी भी ब्लाग लेखक को निराश नहीं होना चाहिये। उनको मुख्य रूप से यह देखना चाहिये कि सर्च इंजिनों से कितने व्यूज आ रहे हैं।
सर्च इंजिनों से लोग अपनी रुचि के अनुसार हिंदी व अंग्रेजी में शब्द लिखकर विषय सामग्री ढूंढते हैं और अगर हमारा ब्लाग में वह सामग्री है तो वह उसके सामने आती है। मेरे ब्लाग स्पाट के ब्लाग तो ब्लागवाणी पर दिखते हैं पर वर्डप्रेस के ब्लाग वहां से मैने हटवा लिये क्योंकि मैं उन पर अब ब्लाग स्पाट पर लिखी गये चुनींदा पाठ ही वहां प्रकाशित करता हूं और चूंकि अधिकतर ब्लाग लेखक वहां रहते हैं इसलिये उनको मेरे ब्लाग के पाठों का दोहराव न दिखे। फिर भी एक बार मैंने चर्चित विषय पर एक नवीन पाठ वर्डप्रेस के ब्लाग पर लिखा तो उस पर दो दिन में सौ पाठक आये। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि ब्लाग स्पाट पर लिखे गये पाठ को अधिक पाठक नहीं मिले पर वही पाठ वर्डप्रेस पर प्रकाशित किया तो वहां पंद्रह दिन में तीन सौ पाठक पढ़ने के लिये आये।

मुझे हैरानी इस बात की है कि फोरमों पर एक दूसरे के हिट देखकर परेशान होने या आरोप प्रत्यारोप लगाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसा लगता है कि इन फोरमों पर को ही सब कुछ मानकर वहां हिट पाने के लिये लोग ललायित हैं और इसी प्रयास में उनकी रचनाओं की धार कुंठित हो जाती हैं। एक बात याद रखने वाली है कि मेरा अनुभव तो यही कहता है कि जब तक आम पाठकों की रुचि के विषयों पर नहीं लिखेंगे तब तक स्थाई रूप से सफलता नहीं मिल सकती। मेरे कुछ निजी मित्र जब अखबारों में ब्लाग लेखकों में मेरा नाम न देखकर आश्चर्य से पूछते हैं कि ‘क्या अंतर्जाल पर तुम्हारा कोई मित्र नहीं है जो अखबारों में तुम्हारा नाम छाप सके।’
कुछ मित्र मेरे ब्लाग के ही माध्यम से विभिनन फोरमों पर गये तो उन्होंने टिप्पणी की कि ‘वहां भी वैसा ही सब कुछ चल रहा है जैसे कि हिंदी के साहित्य के प्रकाशन में चलता है। वहां तुम्हें वैसे ही कोई महत्व नहीं देगा जैसे कि बाहर नहीं दिया।’

अवसर मिलते ही मैं लिखता हूं और पूरे मजे लेता हूं और वह इतने होते हैं कि किसी पाठ का हिट होना मुझे प्रसन्न नहीं करता और फ्लाप हो जाना चिंता में नहीं डालता।
ब्लागिंग का मजा तभी है जब अपना पाठ लिखो और उसकी शक्ल तक किसी फोरम पर मत देखों बल्कि वहां एक पाठक की तरह दूसरों के पाठ पढ़ो। उनको पढ़कर उन पर अपनी राय कायम करो। टिप्पणियों की चिंता तो यहां करना भी नहीं। अगर आप बढ़े लेखक बन गये तो आम पाठक अपने आप ही टिप्पणियां करेंगे और नहीं तो आपके मित्र ब्लाग लेखक ही करेंगे और वह भी जितनी उनकी क्षमता होगी। तय बात है कि यह क्षमता भी उतनी ही होगी जितनी आप टिप्पणियां करेंगे।

वैसे ब्लाग का एक उद्देश्य यह है कि आप वहां संदेश रखें और दूसरा उसे पढ़कर रखे पर अपने यहां इसका उपयोग चूंकि एक पत्रिका की तरह भी हो रहा है तो फिर यह जरूरी नहीं है कि सभी आपके पाठों पर टिप्पणी करें। एक बात है कि जब आप अपने लिखे पर वाह वाही सुनना चाहते हैं तो इसका आशय यह कि आपने लिखने का मजा ही नहीं लिया और अगर आपको आपने लिखने के बाद वाह वाही की चिंता नहीं है तो समझ लीजिये कि आपने पूरा मजा लिया। हां, अंतर्जाल पर लिखते हुए त्वरित पाठक या टिप्पणियों से सफलता का आधार नहीं है बल्कि हिंदी का बृहद स्वरूप सर्च इंजिनों से आये पाठक ही निर्धारित करेंगे। इसलिये सर्च इंजिनों तक पहुंचने का लक्ष्य तय करना चाहिये क्योंकि असली परीक्षा वहीं होनी है।
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