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Sunday, March 01, 2009

धर्मात्मा होने का प्रमाण पत्र-हास्य व्यंग्य कविताएँ

रोगियों के लिये निशुल्क चिकित्सा शिविर
बहुत प्रचार कर उन्होंने लगाया
पंजीयन के लिये बस
पचास रुपये का नियम बनाया
खूब आये मरीज
इलाज में बाजार से खरीदने के लिये
एक पर्चा सभी डाक्टर ने थमाया
इस तरह अपने लिये उन्होंने
अपने धर्मात्मा होने का प्रमाण पत्र जुटाया
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ऊपर कमाई करने वालों ने
अपने लेने और देने के दामों को बढ़ाया
इसलिये भ्रष्टाचार विरोधी
पखवाड़े में कोई मामला सामने नहंीं आया
धर्मात्मा हो गये हैं सभी जगह
लोगों ने अपने को समझाया

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लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, February 20, 2009

उम्मीद-कगार और आशा-आशंकाःआलेख

‘एक समय भारत और पाकिस्तान कश्मीर समस्या हल करने के कगार पर पहुंंच गये- यह वाक्य जब अपने ईमेल पर तरकश की तरह लगे समाचारों में पढ़ें तो यह अपने आपको यह समझाना कठिन हो जाता है कि ब्लाग पढ़ रहे हैं या टीवी देख रहे हैं।

अक्सर टीवी पर सुनते हैं कि भारी तूफान में फंसी नौका के डूबने की उम्मीद है या इस मंदी में औद्योगिक वस्तुओं में मूल्य के साथ ही किस्म में भी गिरावट की उम्मीद है। सच बात तो यह है कि टीवी वाले आशंका और भय शब्द का उपयोग वहां नहीं करते जहां जरूरी है। संभव है उनके लिये भय और आशंका वाले विषय चूंकि सनसनी फैलाने वाले होते हैं और उससे ही उनको प्रतिष्ठा
मिलने की संभावना बलवती होती है इसलिये ही उनको उम्मीद शब्द के उपयोग करने की सूझती है। जब वह आशंका और भय की जगह उम्मीद शब्द का उपयोग करते हैं तो हमारा दिल बैठ जाता है पर इसकी परवाह किसे है।

अगर कोई तूफान में डूबेगी तो ही खबर बनेगी और तभी तो उसका बताने का कोई मतलब होगा।
यही हाल कगार का भी है। कई बार द्वार की जगह वह कगार शब्द का उपयोग करते हैं। हां दरवाजा या द्वार चूंकि हल्के भाव वाले इसलिये शायद वह कगार -जो कि डराने वाले होता है-उसका उपयोग करते हैं। कगार शब्द का उपयोग ऐसे होना चाहिये जहां विषय या वाक्य का आशय पतनोन्मुख होता है। जैसै मुंबई धमाकों के बाद भारत और पाकिस्तान युद्ध के कगार पर पहुंच गये थे। जहां समझौते वाली बात हो वहां ‘निकट’, दरवाजे या द्वारा शब्द ही लगता है। अगर भारत और पाकिस्तान कभी कश्मीर पर समझौते के द्वार-वैसे यह खबर पुरानी है पर अब ईमेल दी गयी है-तक पहुंंचे तो इसमें आश्चर्य नहीं हैं। दोनों कई बार आपसी समझौतों के निकट पहुंचते हैं पर युद्ध के कगार पर लौट आते हैं।

इस आलेख का उद्देश्य किसी की मजाक उड़ाना नहींं है क्योंकि यह लेखक हिंदी का सिद्ध होने का दावा नहीं करता। एक पाठक के में सहजता से पढ़ने में अड़चन आती है तो पूछना और बताना तो पड़ता ही है। हिंदी ब्लाग जगत में अनेक उत्साही लोग हैं और उनकी हिंदी पर संदेह करना स्वयं को धोखा देना होगा पर यह भी सच है कि इस टीवी ने हमारी भाषा को भ्रमित कर दिया है। अगर बचपन से हिंदी न पढ़ी होती तो शायद इसे पचा जाते। अब सोचा कि लोगों का ध्यान इस तरफ आकर्षित करें। अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी लेखकों का लिखा बहुत लंबे समय तक पढ़ा जाने वाला है। अंतर्जाल पर सक्रिय लोगों को देखें तो बहुत कम ऐसे हैं मिलते हैं जो हमारी तरह सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं और शायद अति उत्साह में उनको इस बात का ध्यान नहीं रहता कि कगार और निकट में अंतर होता है। फिर टीवी पर अक्सर कगार उम्मीद, आशा और आशंका का उपयोग करते हुए उसके भाव का ध्यान नहीं रख पाते। कगार या आशंका हमेशा निराशा का द्योतक होते हैं और उससे हिंदी का श्रोता उसी रूप में लेता है। यह अलग बात है कि पाठकों और श्रोताओं में भी कुछ लोग शायद इस बात को नहीं समझते होंगे। हां, जो हिंदी में बचपन से रचे बसे हैं वह यह देखकर असहज होते हैं और बहुत देर बात उनको समझ में आता है कि लिखने या बोलने वाले का आशय पतनोन्मुख नहीं बल्कि उत्थानोन्मुक था।

हिंदी ब्लाग जगत में कुछ लोग उसके उत्थान के लिये बहुत अच्छे प्रयास कर रहे हैं उनकी प्रशंसा करना चाहिये और हमारी उनको शुभकामनायें है कि वह मातृभाषा को शिखर पर ले जायें पर उसके लिये उनको आशा आशंका और उम्मीद और कगार के भाव को हृदंयगम करना होगा। हालांकि अनेक लोग मात्रा और वाक्यों के निर्माण में भारी त्रुटियां करते हैं पर इस आलेख का आशय उन पर टिप्पणियां करना नहीं है बल्कि शब्दों के भावों के अनुसार उनका उपयोग हो यही संदेश देना है। हालांकि हम इस गलती पर वहां टिप्पणी कर ध्यान दिला सकते थे पर ब्लाग जगत में कोई सिखाने वाली बात कहते हुए यह पता नहीं लगता कि ब्लाग लेखक किस प्रवृति का है दूसरा यह कि ब्लाग पर इस तरह की गलती पहले भी एक दो जगह देखने को मिली है। इसलिये सोचा कि चलो अपने पाठको और मित्रों को सचेत कर दें।
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Sunday, February 08, 2009

मंदी का असर प्यार पर भी पड़ेगा-व्यंग्य आलेख

क्वीसलैंड यूनिवर्सटी आफ टैक्लनालाजी के प्रोफेसर कि अनुसार इस मंदी के दौर में लोगों के दाम्पत्य जीवन पर कुप्रभाव पड़ रहा है। उनके अनुसार पैसा प्यार को मजबूत रखता है और उसकी कमी तनाव को जन्म देती है।
यह एक सच्चाई है। फिल्मों,साहित्यक कहानियों और हिंदी उर्दू शायरियों में जिस इश्क, प्यार या मोहब्बत का गुणगान किया जाता है वह केवल भौतिक साधनों के सहारे ही परवान चढ़ता है। फिल्मों की काल्पनिक कथायें देखते हुए हमारे देश के युवक युवतियां क्षणिक प्यार में जाने क्या क्या करने को तैयार हो जाते हैं और फिर न केवल अपने लिये संकट बुलाते हैं बल्कि परिवार को भी उसमें फंसाते हैं।

हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तो यही कहता है कि प्रेम केवल सर्वशक्तिमान से हो सकता है पर अपने देश में एसी भी विचारधारायें भी प्रचलन में हैं जिनके अनुसार प्रियतम अपनी प्रेयसी को तो कहीं प्रेयसी को उसकी जगह बिठाकर आदमी को प्यार और मोहब्बत के लिये प्रेरित करती हैं। आपने फिल्मों में ऐसे गीत देखे होंगे जिसमें काल्पनिक प्रियतम की याद प्रेयसी और उसकी याद में प्रियतम ऐसे गीत गा रहा होता है जैसे कि भजन गा रहा हो। हम न तो ऐसे प्रेम का विरोध कर रहे हैं न उसका गुणगान कर रहे हैं बल्कि यह बता रहे हैं कि प्रेमी जब गृहस्थ के रूप में बदल जाते हैं तक अपनी दैहिक आवश्यकताओं के लिये धन की जरूरत होती है और तभी तय होता है कि वह कथित प्रेम किस राह चलेगा।

वैसे हमने अपने जीवन में देखा है कि जब को लड़का किसी लडकी की तरफ आकर्षित होता है तो उसे प्रेम पत्र लिखकर या वाणी से बोलकर किसी ऐसी जगह ही आमंत्रित करता है जहां खाने पीने के लिये एकांत वाली जगह हो। वहां डोसा,सांभर बड़ा या समौसे कचैड़ी खाते हुए प्रेम परवान चढ़ता है। वैसे आजकल पब सिस्टम भी शुरु हो गया है। यह बात पहले पता नहीं थी पर आजकल कुछ घटनायें ऐसी हो गयी हैं उससे यह जानकारी मिली है।

यह स्त्री पुरुष का दैहिक प्रेम पश्चिमी विचारधारा पर आयातित है तो तय है कि उसके लिये मार्ग भी वैसे ही बनेंगे जैसे वहां बने हैं। वैसे इस दैहिक प्रेम का विरोध तो सदियों से हर जगह होता आया है पुराने समय में इक्का दुक्का घटनायें होती थीं और प्यार के विरोध में केवल परिवार और रिश्तेदार ही खलनायक की भूमिका अदा करते थे। अब तो सब लोग खुलेआम प्रेम करने लगे हैं और हालत यह है कि परिवार के लोग विरोध करें या नहीं पर बाहर के लोग सामूहिक रूप से इसका प्रतिकार कर उसे प्रचार देते हैं। यह भी होना ही था पहले प्यार एकांत में होता था अब भीड़ में होने लगा है तो फिर विरोध भी वैसा होता है। इस दैहिक प्यार की महिमा जितनी बखान की जाती है उतनी है नहीं पर जब कोई खास दिन होता है तो उसकी चर्चा सारे दिन सुनने को मिलती है।

वैसे तो देखा जाये कोई किससे प्यार करने या न करे उसका संबंध बाहर के लोगों से कतई नहीं है। पर रखने वाले रखते हैं और कहते हैं कि यह संस्कृति के खिलाफ है? आज तक हम उस संस्कृति का नाम नहीं जान पाये जो इसके खिलाफ है। हमारे अनेक सांस्कृतिक प्रतीक पुरुषों ने प्यार किया और अपनी प्रेयसियों से विवाह रचाया। अब यह जरूरी नहीं है कि उनकी विवाह पूर्व की प्रेमलीला कोई लंबी खिंचती या वह गाने गाते हुए इधर उधर फिरते। चूंकि यह व्यंग्य है इसलिये हम उनके नाम नहीं लिखेंगे पर जानते सभी हैं। सच बात तो यह है कि दैहिक प्रेम में आत्मिक भाव तभी ढूंढा जाता है दोनों प्रेमियो का मिलन सामाजिक नियमों के अनुसार हो जाता है। मगर आजकल हालत अजीब है कि कहीं विवाह पूर्व प्रेम ढूंढा जा रहा है तो कही विवाह के पश्चात् सनसनी के कारण से प्रेम पर चर्चा होती है।

बहरहाल हमारा मानना है कि चाहे जो भी हो जो लोग सावैजनिक जगहों पर प्रेम करने पर आमदा होते हैं उनकी तरफ अधिक ध्यान देना ही नहीं चाहिये। पिछले कुछ वर्षों से समाज में कामकाजी महिलाओंं की संख्या बढ़ती जा रही है-यह अलग बात है कि उसके बावजूद गृहस्थ महिलाओं की संख्या बहुत अधिक हैं। ऐसे में अगर वह अविवाहित हैं तो उनके संपर्क अपने कार्यस्थल पर काम कर रहे या कार्य के कारण पासं आने वाले युवकों से हो जाते हैं। लड़कियां क्योंकि कामाकाजी होती हैं इसलिये वह विवाह से पहले अपने मित्रों को पूरी तरह परखना चाहती हैं। ऐसे में कुंछ युवतियां अपने परिवार में संकोच के कारण नहीं बताती क्योंकि उनको लगता है कि इससे माता पिता और भाई नाराज हो जायेंगे। फिर क्या पता लड़का हमें ही न जमें। कुछ मामलों में तो देखा गया है कि कामकाजी लड़कियों के माता पिता पहले कहीं अपनी कामकाजी लड़की के रिश्ते की बात चलाते हैं फिर लड़की से कहा जाता है कि वह लड़का देख कर अपना विचार बताये-तय बात है कि यह मिलने लड़की और लड़के का अकेले ही होता है और उस समय कोई उनका परिचित देख ले तो यही कहेगा कि कोई चक्कर है।

बहरहाल संस्कृति और संस्कार के रक्षकों के सामने अपने विचारों का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता बस नारे लगाते हुए चले जाते हैं। उनको लगता है कि सार्वजनिक जगहों पर अविवाहित युवक युवतियों का उठना बैठना संस्कृति को नष्ट कर देगा। यह हास्यास्पद है। हम बात कर रहे थे मंदी से प्रेम के बाजार में मंदी आने की। इस समय रोजगार के अवसरों में कमी हो रही है और ऐसे में इस समय जो कामकाजी जोड़े हैं वह प्यार कर कभी न कभी विवाह में बंधन में बंध जायेंगे। नये जोड़ों के सामने तो केवल नौकरी ढूंढने का ही संकट बना रहने वाला है। उनको अपना वक्त नौकरी ढूंढने में ही नष्ट करना होगा तो प्यार क्या खाक करेंगे? यह संकट निम्न मध्यम वर्ग के लोगों में ही अधिक है और इस वर्ग के सामने रोजगार के नये अवसरों का संकट आता दिख रहा है। कुछ अर्थशास्त्रियेां का मानना है कि अगले चार साल तक यह मंदी रहने वाली है और इसमें ऐसे अनेक व्यवसायिक स्थान संकट में फंस सकते हैं जो जोड़ों को मिलने मिलाने के सुगम और एकांत अवसर प्रदान करते हैंं। फिर रोजगार के संकट के साथ कम वेतन भी एक कारण हो सकता है जो प्रेम के अवसर कम ही प्रदान करे।

अपने देश में देशी विद्वानों की बात तो मानी नहीं जाती। इसलिये यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह कथन एक विदेशी विद्वान का ही है कि पैसे से ही प्यार मजबूत होता है और मंदी का यही हाल रहा तो प्यार का असर कम हो जो जायेगा। यह अलग बात है कि प्रचार बनाये रखने के लिये कुछ प्रेम कहानियंा फिक्स कर दिखायी जायें पर जब मंदी की मार प्रचार माध्यमों पर पड़ेगी तो वह कितनी ऐसी कहानियां बनवायेंगे? सो संस्कार और संस्कृति रक्षकों को चादर तानकर सो जाना चाहिये। आज नहीं तो कल दैहिक प्रेम-जो कि पैसे के कारण ही परवान चढ़ता है-अपना अस्तित्व खो बैठेगा। तब उनके विचारों के कल्पित समाज अपनी राह पर फिर संस्कारों और संस्कृति के सााि चलेगा।
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