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Sunday, November 22, 2009

भारतीय प्रचार माध्यम, तिब्बत और चीन-आलेख (indian media, tibbat and china-hindi artcile)

भारत के बौद्धिक वर्ग में बहुत कम लोग इस बात का अनुमान लगा पाये थे कि विश्वव्यापी मंदी इतने व्यापक रूप से विश्व में अंतर्राष्ट्रीय समीकरण बदल देगी। कुछ विशेषज्ञों ने इस बात से आगाह कर दिया था कि यह मंदी चैंकाने वाले  बदलाव लायेगी क्योंकि विश्व की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र बिंदु में स्थित अमेरिका इसका सबसे बड़ा शिकार बन रहा था।  अमेरिका और चीन के बीच तात्कालिक सद्भाव इसी का मंदी की मार से उपजा परिणाम है।  चार देशों की यात्रा समाप्त कर अपने देश पहुंचे अमेरिकन राष्ट्रपति ने अपने साप्ताहिक उद्बोधन में अपनी जनता को बताया कि वह तो अमेरिकन बेरोजगारों के लिये वहां नौकरी ढूंढने गये थे। 



जिन लोगों को अमेरिका द्वारा तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लेने पर आश्चर्य है उन्हें अब यह बात समझ लेना चाहिये कि वहां अमेरिका अपने लिये अपनी अर्थव्यवस्था की प्राणवायु ढूंढ रहा है।  मुखर भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक-जो अपनी विशेषज्ञताओं के कारण प्रचार माध्यमों में छाये रहते हैं- इसका पहले अनुमान नहीं लगा पाये तो उसमें उनकी चिंतन क्षमता का अभाव ही जिम्मेदार है।  दरअसल भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक लकीर से हटकर नहीं सोचते-हालांकि ऐसा करने से प्रचार माध्यमों द्वारा उनको नकाने जाने का भी भय रहता है।  दूसरी बात यह है कि वह राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक आधारों को अलग अलग देखने के इतने आदी हो चुके हैं कि एक को दूसरे विषय से जोड़ने का उनमें साहस नहीं होता।  अगर आर्थिक विशेषज्ञ है तो वह अन्य आधारों से परे रहकर सोचता है और अगर अन्य विषयों का हो तो  आर्थिक विषयों से परहेज करता है। सच बात तो यह है कि वैश्विक आर्थिक उदारीकरण ने न केवल बाजारोें को दायरा बढ़ाया है वरन् उसने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामरिक विषयों को भी प्रभावित करना शुरु कर दिया है। भारतीय बुद्धिजीवियों और चिंतकों की संकीर्ण सोच के ही कारण है कि भारत आर्थिक रूप से दूसरों के लिये बाजार होते हुए भी अन्य क्षेत्रों में पिछड़ रहा है।  यहंा तक कि भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन चीन भी भारतीय अर्थव्यवस्था का दोहन करने के बावजूद आंख दिखा रहा है। उस दिन अंतर्जाल पर एक ब्लाग पर पढ़ने को मिला कि एक स्थान पर चीन की कंपनी अपने यहां से अनेक कर्मचारी लायी है जो यहां अपने यहां कार्यरत भारतीय कर्मचारियों से अधिक वेतन पाते हैं।  इससे तो यह जाहिर हो रहा है कि चीन के लोगों को भी भारत रोजगार दे रहा है।  चीन बड़ी चालाकी से अन्य विषयों को राजनीति से अलग कर आगे बढ़ा रहा है पर उसने यह सुविधा अमेरिका को नहीं दी।  मंदी की मार से जूझ रहे अमेरिका को अपने देश के बेरोजगारों के साहबी किस्म की नौकरी चाहिये-जहां तक शारीरिक श्रम की बात है तो विश्व भर के गोरे देशों के लोग  उससे दूर रहते हैं और एशियाई देशों के लोग ही वहां पहुंचकर उनकी गुलामी करते हैं।  यह साहबी किस्म की नौकरी अब एशियाई देशों में सुलभ है। इस मामले में भारत से बड़ा बाजार चीन है।  चीन में भी तिब्बत का एक बहुत बड़ा भूभाग है जहां विकास की संभावनाएं हैं और वहां अमेरिका अपनी दृष्टि रख सकता है। संभव है चीन उसकी कंपनियों और लोगों को वहां घुसने का अवसर प्रदान करे ।

अमेरिका भारत से पूरा फायदा बिना किसी राजनीतिक सुविधा के ले रहा है इसलिये परवाह नहीं करता है पर चीन बहुत चालाक है। इसके अलावा तिब्बत का बहुत बड़ा भूभाग जहां अभी विदेशियों का जाना कठिन है वह भी अमेरिका के लिये सहज सुलभ हो सकता है।  दूसरी बात यह है कि अमेरिका हथियारों को बहुत बड़ा सौदागर है और तिब्बती हिंसक नहीं है।  इतने बरसों से वह अपनी आजादी के लिये जूझ रहे हैं पर उन्होंने हिंसा के लिये कोई हथियार खरीदने की मुहिम नहीं चलाई जिससे वह किसी पश्चिम देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकें।  यही कारण है कि पश्चिमी देशों की तिब्बतियों से केवल शाब्दिक सहानुभूति रही है वह भी इसलिये कि कभी कभी चीन की राजनीतिक रूप से बांह मरोड़ सकें। अब जबकि पश्चिमी देश लाचार हो गये हैं इसलिये उसका बाजार पाने के लिये उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि वह तिब्बत को उसका हिस्सा माने।

अब समस्या भारतीय बुद्धिजीवियों और चिंतकों के सामने है। वह यह कि अभी तक यहां के चिंतक इस बात से आश्वस्त थे कि अमेरिका और पश्चिमी देशों का तिब्बत को लेकर चीन से हमेशा लड़ते रहेंगेे। इस तरह वह चीन विरोध मंच पर हमारे साथ हमेशा खड़े मिलेंगे।  ऐसे में चीन से सीधे टकराव की बात सोचने वह बचते रहे। अब स्थिति बदल गयी है। चीन के लिये तिब्बत की समस्या बहुत गंभीर है और दलाई लामा भारत में ही रहते हैं।  पश्चिम का जो सुरक्षित वैचारिक आवरण था जिसके सहारे भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक अपने वक्तव्य सुरक्षित अनुभव करते हुए देते थे, अब वह नहीं रहा।  स्पष्टतः चीन के साथ सीधा टकराव करते हुए लिखना और बोलना पड़ेगा, शायद यही बात भारतीय बुद्धिजीवियों को परेशान किये हुए है। वैसे एक बात तय है कि अगर चीन पर भारत आर्थिक दबाव डाले तो वह भी उसी तरह कई विषयों से पीछ हट सकता है। एक बात याद रहे चीन का बना सामान हमारे यहां बिकता है पर उसका खुद का बाजार कोरियो और जापानी सामानों से वैसे ही पटा पड़ा है जैसा उसके सामानो को हमारे यहां-ऐसे समाचार आये दिन अखबार तथा अंतर्जाल पर पढ़ने को मिल जाते हैं। सबसे आश्चर्य तो इस बात का है कि जब भारत ने तिब्बत विवाद से स्वयं पीछे हटने का निर्णय लिया तब उससे अरुणांचल पर ही ऐसी राय रखने के लिये बाध्य क्यों नहीं किया? चीन की सामरिक ताकत बहुत है पर भारत कोई कम नहीं है। अगर उससे हमें तबाही का भय है तो वह भी हमारी शक्ति को देखते हुए कोई उससे मुक्त नहीं है। मुख्य विषय है आर्थिक आधार जिसके संदर्भ देते हुए उससे भारतीय बुद्धिजीवी और चिंतक प्रचार माध्यमों के द्वारा उसे चेताते रहें।

एक बाद यह भी तय करना चाहिये कि आर्थिक रूप से परेशान अमेरिका अब किसी भी आधार पर भारत को वैचारिक समर्थन नहीं देगा। आपको याद होगा उसने बाहर के लोगों को अमेरिका में नौकरी कम देने का फैसला किया तो उसके आर्थिक विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया क्योंकि अनेक प्रकार की ऐसी नौकरियां ऐसी हैं जो अमेरिकन करते ही नहीं और करते हैं तो उनका वेतन अधिक होता है।   इस पर भारत और चीन में साहबी किस्म की नौकरियों के लिये ब्रिटेन और अमेरिका दोनों ही हाथ पंाव मार रहे हैं।  उनके राजनीतिक हित आर्थिक लाभ के आसपास ही घूमते हैं।   अब वह अपने ही गुलाम रहे इन दो देशों में-चीन और भारत-साहबी किस्म की नौकरियों के लिये अपने लोग भेजना चाहते हैं।  बदले में अपनी गुलामी किस्म की नौकरियों के लिये वह अपने यहां इन्हीं देशों से लोग बुलाते भी हैं। ऐसे में अगर भारत के बुद्धिजीवी और चिंतक आक्रामक ढंग से प्रचार माध्यमों में अपने आर्थिक आधार पर अन्य विषयों को भी जोड़कर रखें तो संभव है कि चीन थोड़ा सतर्क रहे। कम से कम भारतीय प्रचार माध्यमों की ताकत इतनी तो है कि चीन भी उनसे परेशान रहता है।  वैसे आजकल प्रचार माध्यमों से जो कहा जाता है उसका प्रभाव रहता ही इससे इंकार करना कठिन है। एक बात निश्चित है कि तिब्बत चीन का हिस्सा नहीं है और वह अपनी सम्राज्यवादी नीति के कारण वह जमा हुआ है जो उसने पश्चिम से उधार ली है।






कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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Monday, March 09, 2009

पाकिस्तान में अमेरिका की नयी रणनीति-आलेख

आखिर अमेरिका ने तालिबान से बातचीत करने का फैसला कर लिया है। नये राष्ट्रपति के आते ही इस बात की संभावना बन रही थी। कहने को तो यह कहा गया है कि उदारवादी तालिबानों के बातचीत की जायेगी पर इसका कोई अर्थ नहीं है क्योंकि तालिबान में इस तरह का भेद करना कठिन है। वैसे तालिबान का जो चरित्र अभी तक रहा है उससे तो लगता है कि पैसा लेकर वह अपनी वफादारी अमेरिका से भी निभा सकता है। दरअसल अमेरिका का लक्ष्य अलकायदा को समाप्त करना है और वह ऐसी अपेक्षा कर रहा है कि इसमें तालिबान उसकी सहायता कर सकता है।

स्वात घाटी में कथित उदारवादी तालिबानों को मनमानी करने की छूट पाकिस्तान सरकार ने दी थी तब उसका विरोध अमेरिका ने दिखाने के लिये जरूर किया था पर सभी जानते थे कि अमेरिका के प्यादे राष्ट्रपति जरदारी के लिये यह संभव नहीं है कि वह उनके इशारे के बिना कोई इतना बड़ा निर्णय करे। अमेरिका ने पहले यही यह संकेत दिया था कि तालिबान उसका दुश्मन नहीं है इसलिये अलकायदा से उसे अलग करने का प्रयास करेगा।
पाकिस्तान में तालिबान के बढ़ते वर्चस्व से भारत को परेशानी होगी पर पाकिस्तान का सभ्रांत तबका और अमेरिकी रणनीतिकार उससे बेफिक्र नजर आ रहे हैं। उनको लगता है कि वह तो हर तरह से सुरक्षित रहेंगे।
अमेरिका जहां अफगानिस्तान और इराक से हटने की तैयारी करता दिख रहा है वहीं अफगानिस्तान में अपनी सेना भी बढ़ा रहा है। इराक की तेल और अफगानिस्तान की प्राकृतिक संपदा को वह इतनी आसानी से अमेरिका छोड़ देगा यह लगता नहीं है। हां, वह कूटनीतिक ढंग से दोनों जगह स्थानीय गुटों को अपने सहयोग के लिये तैयार कर रहा है-इसका सीधा आशय यह है कि वह धन देकर उनको खरीदेगा।

ओबामा के निर्णयों को लेकर भारत आश्वस्त नहीं रह सकता। हालांकि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भारत के प्रचार माध्यमों ने उनको हीरो बनाकर यह प्रचारित किया पर अब उनकी राह यह संदेह पैदा करती है कि बहुत लंबे समय तक उनकी यह छबि यहां रह पायेगी। अपनी तरक्की,संस्कृति,विज्ञान और ज्ञान को कमतर मानने वालों की इस देश में कमी नहीं है और उनके लिये अमेरिका एक स्वर्ग की तरह है। शायद बहुत कम लोगों ने इस बात पर ध्यान दिया था कि भारत के चंद्रयान -1 के प्रक्षेपण पर ओबामा ने बहुत चिंता जताई थी। विश्व के हालत बदल रहे हैं और इससे अनेक देशों की रणनीति में भी बदलाव आयेंगे। सबसे बड़ी है आर्थिक मंदी का प्रकोप। शुद्ध रूप से औद्योगिक अर्थव्यवस्था पर आधारित देशों के लिये यह संकट का समय है-अनेक आतंकवादी संगठन भी इसका शिकार होंगे क्योंकि भले ही वह धर्म,जाति,भाषा और क्षेत्र का नाम लेकर संघर्ष करते दिखते हैं पर उनका लक्ष्य अपनी शक्ति से केवल धनार्जन करना ही होता है। प्रचार माध्यमों के समाचारों को देखें तो आतंकवादी संगठनों ने औद्योगिक संस्थानों में भी विनिवेश किया था और मंदी के प्रकोप ने जरूर कहीं न कहीं आर्थिक रूप से उनको कमजोर किया होगा। ऐसे में उनके आक्रमण कम होते जायें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

अलकायदा के साथ तालिबान इसलिये बना रहा है क्योंकि धन और तकनीकी के मामले में उसको उससे बहुत आश्रय मिला। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अलकायदा के अपने लोग संख्या की दृष्टि से अधिक नहीं है पर धन और तकनीकी की वजह से वह नेतृत्व करते हैं। अलकायदा के लोग मध्य एशिया से आये हैं और भाषा तथा संस्कृति की दृष्टि से उनकी वहां के लोगों से एक दूरी हमेशा रही होगी। ऐसे में धन की कमी से उनकी पकड़ कमजोर होना स्वाभाविक है और अमेरिका को इसका लाभ मिल सकता है। मुख्य बात यह है कि अमेरिका अपनी रणनीति बदल सकता है पर लक्ष्य नहीं। कुछ लोगों का कहना है कि अफगानिस्तान में बहुत अधिक प्राकृतिक संपदा तो है साथ ही तेल और प्राकृतिक गैस भंडारों के प्रचुर मात्रा मेें होने की संभावना है और यकीनन अभी भी अमेरिका उस पर नियंत्रण रखना चाहेगा। वहां उसकी तैयारी लंबे समय तक टिकने की है और हो सकता है कि वह पाकिस्तान में तालिबानों के वर्चस्व को स्वीकार कर ले। तालिबान उसके पुराने मित्र हैं और अमेरिका से उनका बैर अलकायदा की वजह से है।

ऐसे में भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है। वैसे सामरिक दृष्टि से भारत कोई इराक या अफगानिस्तान नहीं है कि अमेरिका भारत पर सीधे हमला कर सके या कश्मीर हाल से निकाल सके। हां, वह पहले की तरह ही पाकिस्तान को सहायता देकर भारत में आतंकवादी घटनाओं के लिये प्रोत्साहित कर सकता है। यह भी तय है कि अगर तालिबान की भूमिका अगर पाकिस्तान में बनती है तो वह केवल भारत विरोध पर ही चलेगा। हालंाकि यह संभावनायें ही हैं। अलकायदा एक विश्वव्यापी संगठन है और फिलहाल उसकी सक्रियता अधिक नहीं दिखाई देती क्योंकि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों पर कोई बड़ा हमला बहुत दिनों से नहीं कर सका है। ऐसे में तालिबानों का जिस तरह पाकिस्तान में वर्चस्व बढ़ रहा है उससे भारत के पास आगे एक ही उपाय बचेगा वह यह कि पाकिस्तान से हर तरह का नाता तोड़ ले। यही एक उपाय है जिससे भारत पाकिस्तान को विचलित कर सकता है। समस्या यहीं से शुरु होगी क्योंकि पाकिस्तान के फिल्मी अभिनेताओं,हास्य कलाकारों,गायकों,संगीतकारों क्रिकेट खिलाडि़यों,पुराने सैन्य अधिकारियों और नेताओं के प्रति जो यहां के एक खास वर्ग का रुझान है वह ऐसा नहीं करने देगा। यह खास वर्ग आतंकवाद की बड़ी घटना होने पर पाकिस्तान को कोसता जरूर है पर तब भी वह अपने पाकिस्तानी मोह को तिलांजलि नहीं देता और वहां के माडलों का भारतीय बाजार प्रचार माध्यमों में उपयोग करता है। वैसे पाकिस्तान के हालत बता रहे हैं कि वहां लोकतंत्र अब अधिक दिन का मेहमान नहीं हैं। पहले तो तालिबानों को बढ़ाया जायेगा फिर उनको रोकने के नाम पर सैन्य शासन आयेगा। अमेरिका थोड़ा बहुत विरोध कर चुप बैठ जायेगा क्योंकि चाहे कोई भी सेनाध्यक्ष हो वह अमेरिका का ही चेला होगा। वैसे अधिकतर विशेषज्ञ अमेरिका की नयी रणनीति का विश्लेषण कर रहे हैं और हो सकता है कि यह दांव कहीं उसको उल्टा न पड़ जाये क्योंकि इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका की जो किरकिरी हुई उससे उसका संभलना आसान नहीं है। अभी अमेरिका का बहुचर्चित विमान इन्हीं तालिबानों ने मार गिराया जो कि इस बात का प्रमाण है कि उनके पास आधुनिक हथियार भी हैं।
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Thursday, December 18, 2008

इस तरह अपमान करना कोई कठिन काम नहीं था-आलेख

अमेरिका के राष्ट्रपति पर इराक के एक पत्रकार द्वारा जूता फैंके जाने की घटना को लेकर कुछ लोग जिस तरह उसकी प्रशंसा कर रहे हैं वह हास्यास्पद है। सबसे अजीब बात यह है कि अनेक देशों के पत्रकार उसका समर्थन कर रहे हैं। वह यह भूल रहे हैं कि उसने अपने ही देश के लोगो को धोखा दिया है। वह एक पत्रकार के रूप में उस जगह पर गया था किसी आंदोलनकारी के रूप में नहीं। इतना ही नहीं वहां इराक के प्रधानमंत्री भी उपस्थित थे और वह पत्रकार किसी स्वतंत्रता आंदोलन का प्रवर्तक नहीं था। अगर वह पत्रकार नहीं होता तो शायद इराक के सुरक्षाकर्मी ही उसे अंदर नहीं जाने देते जो कि उसके देश के ही थे।
आज के सभ्य युग में प्रचार माध्यमों में अपना नाम पाने के लिये उससे जुड़+े लोगों को सभी जगह महत्व दिया जाता है और इस पर कोई विवाद नहीं है। टीवी चैनलों के पत्रकार हों या अखबारों के उन जगहों पर सम्मान से बुलाये जाते हैं जहां कहीं विशिष्ट अतिथि इस उद्देश्य से एकत्रित होते हैं कि उनका संदेश आम आदमी तक पहुंचे। कहीं कोई विशेष घटना होती है तो वहां पत्रकार सूचना मिलने पर स्वयं ही पहुंचते हैं। कहीं आपात स्थिति होती है तो उनको रोकने का प्रयास होता है पर वैसा नहीं जैसे कि आदमी के साथ होता है। पत्रकार लोग भी अपने दायित्व का पालन करते हैं और विशिष्ट और आम लोगों के बीच एक सेतु की तरह खड़ होते हैंं। ऐसे में पत्रकारों का दायित्व बृहद है पर अधिकार सीमित होते हैं। सबसे बडी बात यह है कि उनको अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से परे होना होता है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो भी वह दिखावा तो कर ही सकते है। अमेरिका के राष्ट्रपति का विरोध करने के उस पत्रकार के पास अनेक साधन थे। उसका खुद का टीवी चैनल जिससे वह स्वयं जुड़ा है और अनेक अखबार भी इसके लिये मौजूद हैं।

ऐसा लगता है कि अभी विश्व के अनेक देशों के लोगों को सभ्यता का बोध नहीं है भले ही अर्थ के प्रचुर मात्रा में होने के कारण उनको आधुनिक साधन उपलब्ध हो गये हों। जब इराक मेंे तानाशाही थी तब क्या वह पत्रकार ऐसा कर सकता था और करने पर क्या जिंदा रह सकता था? कतई नहीं! इसी इराक में तानाशाही के पतन पर जश्न मनाये गये और तानाशाह के पुतलों पर जूते मारे गयेै। यह जार्ज बुश ही थे जिन्होंने यह कारनामा किया। जहां तक वहां पर अमेरिका परस्त सरकार होने का सवाल है तो अनेक रक्षा विद्वान मानते हैं कि अभी भी वहां अमेरिकी हस्तक्षेप की जरूरत है। अगर अमेरिका वहां से हट जाये तो वहां सभी गुट आपस मेंे लड़ने लगेंगे और शायद इराक के टुकड़े टुकड़े हो जाये। अगर उनके पास तेल संपदा न होती तो शायद अमेरिका वहां से कभी का हट जाता और इराक में आये दिन जंग के समाचार आते।
अमेरिका के राष्ट्रपति जार्जबुश कुछ दिन बाद अपने पद से हटने वाले हैं और इस घटना का तात्कालिक प्रचार की दृष्टि से एतिहासिक महत्व अवश्य दिखाई देता है पर भविष्य में लोग इसे भुला देंगे। इतिहास में जाने कितनी घटनायें हैं जो अब याद नहीं की जाती। वह एक ऐसा कूड़ेदान है जिसमें से खुशबू तो कभी आती ही नहीं इसलिये लोग उसमें कम ही दिलचस्पी लेते हैं और जो पढ़ते है उनके पास बहुत कुछ होता है उसके लिये। घटना वही एतिहासिक होती है जो किसी राष्ट्र, समाज, व्यक्ति या साहित्य में परिवर्तन लाती है। इस घटना से कोई परिवर्तन आयेगा यह सोचना ही मूर्खता है। कम से कम उन बुद्धिजीवियों को यह बात तो समझ ही लेना चाहिये जो इस पर ऐसे उछल रहे हें जैसे कि यहां से इस विश्व की कोई नयी शुरुआत होने वाली है।

चाहे कोई भी लाख कहे एक पत्रकार का इस तरह जूता फैंकना उचित नहींं कहा जा सकता जब वह वाकई पत्रकार हो। अगर कोई आंदोलनकारी या असंतुष्ट व्यक्ति पत्रकार के रूप में घूसकर ऐसा करता तो उसकी भी निंदा होती पर ऐसे में कुछ लोग उनकी प्रशंसा करते तो थोड़ा समझा जा सकता था।

पत्रकार के परिवार सीना तानकर अपने बेटे के बारे में जिस तरह बता रहे थे उससे लगता है कि उनको समाज ने भी समर्थन दिया है और यह इस बात का प्रमाण है कि वहां के समाज में अभी सभ्य और आधुनिक विचारों का प्रवेश होना शेष है। समाचारों के अनुसार मध्य ऐशिया के एक धनी ने उस जूते की जोडी की कीमत पचास करोड लगायी है पर उसका नाम नहीं बताया गया। शायद उस धनी को यह बात नहीं मालुम कि पत्रकार ने अपने ही लोगों के साथ धोखा किया है। वैसे भी कोई धनी अमेरिका प्रकोप को झेल सकता है यह फिलहाल संभव नहीं लगता। अमेरिका इन घटनाओं पर आगे चलकर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करता है यह अलग बात है पर कुछ दिनों में उसी पत्रकार को अपने देश में ही इस विषय पर समर्थन मिलना कम हो जायेगा। अभी तो अनेक लोग इस पर खुश हो रहे हैं देर से ही सही उनके समझ में आयेगी कि इस तरह जूता फैंकना कोई बहादुरी नहीं है। किसी भी व्यक्ति के लिये प्रचार माध्यम से जुड़कर काम के द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त करने कोई कठिन काम नहीं है इसलिये उसे धोखा देकर ऐसा हल्का काम करने की आवश्यकता नहीं है। कुछ समय बाद क्या स्थिति बनती है यह तो पत्रकार और उसके समर्थकों को बाद में ही पता चलेगा। मेहमान पर इस तरह आक्रमण करना तो सभी समाजों में वर्जित है और समय के साथ ही लोग इसका अनुभव भी करेंगे।
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