Friday, December 12, 2008

आंतक तुम्हारे दिल में घर नहीं बनायेगा-तीन क्षणिकायें

आतंक को पंख नहीं है
पर फिर भी हमेशा उड़ता नजर आता
इंसान के दिल में बैठा डर
उसे चुंबक की तरह खींच लाता है
शायद इसलिये इंसानों के
जज्बातों से खिलवाड़ कर
अपने धंधे चलाने वालों को
आतंक की हवा बाजार में बेचने के लिये
सड़क पर असली खून
बहाना जरूरी नजर आता है
...........................
आने से पहले मौत इंसान को
जिंदगी में कितनी बार डराती है
अपना भूत हमेशा उसके पीछे दौड़ाती है
जेहन में जो आदमी के है
वही दहशत उसका सहारा बन जाती है
....................................................

तुम डरो नहीं तो
आतंक कहीं नजर नहीं आयेगा
समझ लो जब तक तय नहीं है
तो मौत का दिन नहीं आयेगा
फिर किसी का आतंक
तुम्हारे दिल में घर नहीं बनायेगा

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

1 comment:

अशोक मधुप said...

तुम डरो नहीं तो
आतंक कहीं नजर नहीं आयेगा
समझ लो जब तक तय नहीं है
तो मौत का दिन नहीं आयेगा
फिर किसी का आतंक
तुम्हारे दिल में घर नहीं बनायेगा
...................................
तीनो क्षणिका बहतु अच्छी है। बधाई

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