यह अव्यवसायिक ब्लॉग/पत्रिका है तथा इसमें लेखक की मौलिक एवं स्वरचित रचनाएं प्रकाशित है और इन रचनाओं को अन्य कहीं प्रकाशन के लिए पूर्व अनुमति लेना जरूरी है। ब्लॉग लेखकों को यह ब्लॉग लिंक करने की अनुमति है। इस पर अध्यात्म विषय पर चिंतन,साहित्यक कहानी, व्यंग्य,कवितायें और सामाजिक विषयों पर आलेख प्रकाशित किये जाते हैं। सभी रचनायें मौलिक हैं तथा उनके सर्वाधिकर लेखक और संपादक के पास सुरक्षित है। लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Wednesday, April 28, 2010
कसूर की सजा मिलती है-हिन्दी शायरी (kasoor ki sajaa-hindi shayari)
तभी आदमी तक डोलता है
जब तक वह सिर चढ़कर नहीं बोलता है।
यह कहना ठीक लगता है कि
जमाना खराब है,
चमक रहा है वही इंसान
जिसके पास शराब और शबाव है,
मगर यह सच भी है कि
सभी लोग नहीं डूबे पाप के समंदर में,
शैतान नहीं है सभी दिलों में अंदर में,
भले इंसान के दिमाग में भी
ख्याल आता है उसूल तोड़ने का
पर कसूर की सजा कभी न कभी मिलती है जरूर
भला इंसान इस सच से अपनी जिंदगी तोलता है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday, April 22, 2010
तरक्की के नाम पर-हिन्दी शायरी (tarakki ke nam par-hindi shayari)
अब परदेस में अपनी दौलत भरने लगे हैं,
कहने को तो अपने ही सगे हैं।
कमाने के नाम पर लूटा,
सारी तिजोरियां भर गयी
फिर अपनों से उनका विश्वास भी रूठा,
कभी कभी अपने होने का
दिखावा वह कर लेते हैं,
दान की दलाली के धंधे में
समाज सेवा करते हुए
कमीशन से अपनी जेब भर लेते हैं,
उनकी अमीरी की चमक के सामने
आसपास की गरीबी दबी है विकास दर के नीचे
मजदूरी में मारे हिस्से से सजे हैं उनके घर के गलीचे
हार गयी है ईमानदारी
तरक्की के नाम पर बेईमानों के भाग्य सजे हैं।
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Tuesday, February 23, 2010
पेशा है अमीरों को गलियां देना-हिन्दी व्यंग्य शायरी (trede of welfare-hindi satire poem)
वाद चलाये जाते हैं,
आतंक वाले उदार दिखने की कोशिश करते
तो लोगों की तरक्की के लिये जूझने वाले
हिंसा को जरूरी बताये जाते हैं।
इस अर्थयुग में जमाने का मुफ्त में भला करने वाले
कहां से आयेंगे,
ख्याल हैं जिनके पुरानी किताबों के गुलाम
कब अपना सोच पायेंगे,
सुना है
बेबसों को इंसाफ दिलाने के नाम पर
बंदूक से गोलियां उगलने वाले भी
अपने बैंक खाते बढ़ाये जाते हैं।
पेशा है अमीरों को गलियां देना
शौक है पुरानी किताबों में सजी
नज़ीरें चलाने के लिये
नई नई गाड़ियां लेना
बहस करने पर
कोई कहे खेत की
तो वह खलिहान की सुनाये जाते हैं।
धोखा है उनका नज़रिया
वह सच से नज़र चुराये जाते हैं।
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Friday, February 19, 2010
देशभक्ति का व्यापार-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (deshbhakti ka vyapar-hindi comic poem)
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Friday, February 12, 2010
वैलेंटाईन डे आ रहा है-हिन्दी हास्य कविता (velantineday-hindi comic poem)
और बहुत दिन से न मिलने का दिया ताना
तब वह बोला
‘गुरुजी क्या बताऊं
खबरों की दुनियां हो गयी है जंग का मैदान
पिछ़ड जाओ एक दिन तो
मिट्टी में मिल जाती है
बरसों से कमाई अपनी शान,
पहले क्रिकेट में जीत पर लिखना था,
क्योंकि देशभक्त दिखना था,
फिर आ गया एक फिल्म का विवाद,
अभिव्यक्ति का समर्थक दिखना था निर्विवाद
अब वह भी निपट गया है
इसलिये अब कल मिलने आऊंगा
आपका ख्याल अब आ रहा है।’
गुरुजी बोले
‘ठीक है,
फिर एक सप्ताह बाद आना
अभी तुम्हें प्रेम दिवस पर लिखना है,
इंसानों जैसा दिखना है,
क्योंकि उस पर खड़ा होगा विवाद,
तुम्हें आजादी का पक्षधर दिखना है निर्विवाद,
दो दिन में वैलंटाईन डे आ रहा है।’
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Saturday, February 06, 2010
बखान-हास्य कविता (bakhan-hasya kavita)
समाज सेवक से कहा
‘आ गया है जमकर चंदा
चलेगा अपना जोरदार धंधा
अपने हिस्से का सही अंदाज बतायें
तो शुरु करें अब गरीबों के नाम पर कल्यान।’
समाज सेवक पहले चौंके
फिर बोले-
‘अरे, क्या कहते हो,
भला, क्यों जज़्बात में बहते हो,
अभी तक नब्बे फीसदी था
अब सौ फीसदी कर लो,
अपने ही खातों में भर लो,
कागजी खाना पूरी करना,
प्रचार के लिये कुछ रकम भरना,
फिर शुरु करो अपने काम का बखान।
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Tuesday, February 02, 2010
सौदागर और ढिंढोरची-हिन्दी व्यंग्य कविता (market and media-hindi comic poem)
चिल्लाते जूता लहरायेंगे,
चार लोग नाचते हुए
शांति के लिये सफेद झंडा फहरायेंगे।
चार लोग आकर दर्द के
चार लोग खुशी के गीत गायेंगे।
कुछ लोगों को मिलता है
भीड़ को भेड़ों की तरह चराने की ठेका
वह इंसानो को भ्रम के दरिया में बहायेंगे।
सोच सकते हैं जो अपना,
दर्द में भी नहीं देखते
उधार की दवा का सपना,
सौदागरों और ढिंढोरची के रिश्तों का
सच जो जानते हैं
वही किनारे खड़े रह पायेंगे।
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Saturday, January 30, 2010
ख्वाबों की दुनियां-हिन्दी शायरी (khvabon ki duniya-hindi literature poem)
अपना चेहरा छिपाये रहो तुम,
तुम हो एक सजा सजाया ख्वाब,
कितने भी सवाल करूं
नहीं देना उनका जवाब,
तुम्हारे दिल के स्वर ही
दिमाग की सोच में बजते रहे हैं,
कई शेर कहे हमने यह मानकर
जैसे कि तुमने कहे हैं,
अपने कड़वे सच के घूंट
हमने जहर की तरह पिये हैं,
अभी तक ख्वाबों के
अमृत के सहारे ही जियें हैं,
आंखों सामने आकर अपना सच न दिखाना
जब तक हम भूलें न तुमको
दीवार के पीछे ही खुद को छिपाना,
वरना पल भर में ख्वाबों की दुनियां हो जायेगी गुम।
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Tuesday, December 29, 2009
साहबी संस्कृति-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (boss culture-hindi satire poem)
वह रोज फूल जाते हैं।
मगर उनके ऊपर भी साहब हैं
जिनकी झिड़की पर वह झूल जाते हैं।
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सभी के सिर पर चढ़ा है।
कामयाबी का खिताब
नीचे से ऊपर जाता साहब की तरफ
नाकामी की लानत का आरोप
ऊपर से उतरकर नीचे खड़ा है,
भले ही सभी जगह साहब हैं
बच जाये दंड से, वही बड़ा है
--------
साहबी संस्कृति में डूबे लोग
आम आदमी का दर्द कब समझेंगे।
जब छोटे साहब से बड़े बनने की सीढ़ी
जिंदगी में पूरी तरह चढ़ लेंगे।
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Wednesday, December 23, 2009
गद्दार कदम-हिन्दी साहित्य कविता (gaddar kadam-hindi sahitya kavita)
तब नहीं छाये होते पूरे जमाने के दिल में गम।
अब जज़्बातों के सौदागर सपने बेच रहे हैं
बाजार में लोगों के दर्द पर, करके अपनी आंखें नम।
अपने नाम के पैसों खाता देखकर, खुश हो रहे अमीर
बढ़ते आंकड़ों में देख रहे जिंदगी का पूरा दम।
वतन से प्यार के नाम पर कर रहे चमन से धोखा
कुचल रहे फूल सी वफा, माली के गद्दार कदम।
नहीं सोचते जब जमाना टूट कर बिखर जायेगा
उनके घरों की तरफ भी बढ़ेंगे, कातिलों के कदम।।
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Saturday, December 19, 2009
कमीशन की नीति-हिन्दी साहित्य कवितायें (policy of commision-hindi sahitya kavita)
इतने वर्षों से बहुत दान किया है
कि इस देश से पीढ़ियों तक
गरीबी मिट जाती।
अगर कमबख्त
यह कमीशन की रीति
दान बांटने वालों की नीति न बन जाती।
---------
नया बनाने के लिये
पुराना समाज टुकड़े टुकड़े
किये जा रहे हैं।
कुछ नया नहीं बन पा रहा है
इसलिये हर टुकड़े को समाज बता रहे हैं।
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Tuesday, December 08, 2009
आंसुओं का हिसाब-हिन्दी व्यंग्य कविता (ansuon ka hisab-hindi sahitya kavita)
शानदार इमारतों के नीचे
दबे पड़े हैं, बुनियाद में जो पत्थर
वह चमकदार नहीं होते।
अमीर इंसानों की दौलत के आंकड़े
खातों में लिखे होते
पर उसको बढ़ाने वाले मेहनतकशों के
पसीने की बूंदों के हिसाब नहीं होते।
रौशनी फैली है जहां तक
वहां तक पूरा जहां चमक रहा है
उसे देखने वालों को
अंधेरों के अहसास नहीं होते।
जितने लोग जमीन पर चलते हैं
आकाश में उतने परिंदे नहीं होते।
नजर और अहसास सभी के अलग हैं
कोई जुटा कर भी दौलत
खुशी के लिये भटकता है
जो मोहताज हैं
वह भी रुपयों के हिसाब में अटकता है
तमाशों में करते हैं
लोग अपनी दौलत बरबाद
पर नहीं कर सकते
किसी गरीब का घर आबाद
घूम रही है अमीरी जिनके चारो ओर
नहीं पाते चैन तब तक
जब तक गरीब के आंसु
गाल पर बहते नहीं होते।
-------
अभावों में जीते हैं जो लोग
उनके आंसुओं का हिसाब
कौन रखता है।
अमीर की तरफ ताक रहे हैं सभी
कब उसकी आंखों में दर्द दिखे
तो उसे हमदर्दी दिखायें
वही तो है जो
दर्द का रुपयों में हिसाब करता है।
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Friday, November 06, 2009
क्या नया रचेंगे-काव्य चिंतन (kya naya rachenge-kavya chintan)
एक कवि से एक आदमी ने कहा-‘यार, तुम कवितायें लिखना बंद कर दो।’
कवि ने कहा-‘एक शर्त पर कि तुम अपनी जिंदगी में कभी स्वयं दुःखी नहीं अनुभव करोगे।’
उस आदमी ने कहा-‘यह संभव नहीं है क्योंकि मैं अपने को कभी दुःखी अनुभव न करने का वादा नहीं कर सकता। वह तो मैं तब से अनुभव कर रहा हूं जब से पैदा होने के बाद होश संभाला है। अरे, इस संसार में कोई सुखी रह सकता है क्या? कैसे कवि हो? इतनी अक्ल भी नहीं है।’
कवि ने कहा-‘बस, यही बात है। जब तक जमाने में दर्द रहेगा कोई न कोई उस पर अपने अल्फाज कहेगा। सभी अगर अंदर ही अंदर रोयेंगे या बाहर केवल चीखेंगे तो फिर दर्द को अल्फाज कौन देगा? यही काम कवि का होता है।’
बहरहाल अब तो कवि ही नहीं दर्द कहते बल्कि गद्यकार भी दर्द का बयां करते हैं। तलवार, तीर या बंदूक की आवाज हो तो उसमें भी वह भूख और गरीबी का दर्द ढूंढा करते हैं। जो आदमी धन और अन्न से मजबूर होता है भला वह कहीं हथियार उठाता है? मगर साहब हमारे देश में इस विश्वास के साथ जीने वाले भी हैं पर उनको यह पता नहीं कि आखिर उन समस्याओं का क्या हल है? वह तो बस अपने दर्द के साथ ऐसा यकीन बयान करते हैं जिसको जमीन पर ढूंढना मुश्किल काम है।
बहरहाल प्रस्तुत हैं इस पर दो पद्य रचनाएं-
दायें चलें कि बायें
वह बताते नहीं।
चलने का नारा देते हैं
वाद सुनाते हैं ढेर सारे
मंजिल का पता खुद नहीं जानते
झंडे उठाये चलते हैं
राहों पर
जमाने का भला करने का
मकसद बताते हैं
अपनी अपनी कहते अघाते नहीं।।
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कहीं पूरब का बखान करेंगे
कहीं पश्चिम का गान करेंगे।
अपनी जमीन पर खड़ी फसलों को
जलाकर
नयी फसल करने का करते दावा
जमाने से करते छलावा
तलवार, तीर और बंदूक से
मचा रहे शोर
इस जहां में बने स्वर्ग को
जलाकर वह बना रहे नरक
भला क्या नया रचेंगे।
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Monday, November 02, 2009
कुदरत का खेल जुआ नहीं-व्यंग्य कविताएं (kudrat ka khel-hindi vyangya kavita)
दिन भर पूरे जमाने का
फिर भी दिल साफ हुआ नहीं।
इतने अल्फाज मुफ्त में खर्च किये
फिर भी चैन न मिला
दिल के गुब्बारों का बोझ कम हुआ नहीं।
इंसान समझता है
पर कुदरत का खेल कोई जुआ नहीं।
-----------------
उन्होंने चमन सजाने का वादा किया
नये फूलों से सजाने का
पता नहीं कब पूरा करेंगे।
अभी तो उजाड़ कर
बना दिया है कचड़े का ढेर
उसे भी हटाने का वादा
करते जा रहै हैं
पता नहीं कब पूरा करेंगे।
इंतजार तो रहेगा
उनके घर का पेट अभी खाली है
पहले उसे जरूर भरेंगे।
तभी शायद कुछ करेंगे।
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Tuesday, October 20, 2009
किसका हुआ कभी कोहिनूर-व्यंग्य कविता (kiska hua kohinoor-vyangya kavita)
पूरा घर का सामान बिखेर डाला
मिले पलंग के नीचे गिरे हुए
पहले तो खुशी मिली, फिर हुई काफूर।
बिखरी हुई शयों को समेटने के
ख्याल ने कर दिया बदन पहले ही चूर।
खोये पाये के हिसाब में
पूरी जिंदगी हो जाती है बेनूर।
सिक्के इतने जमा कर लिये संभाले नहीं जाते
गिनती में भूल जायें
तो देखते हैं उनको घूर।
सोचते कौन कम हुआ चश्मेबद्दूर।
खोये हुए सिक्के मिल गये
पर चले जायेंगे हाथ से
बनेंगे किसी दूसरे हाथ का नूर।
जिंदगी में गमों का सिलसिला भी आता है
खुशियां भी साथ चलती थोड़ी दूर।
अपना कितनों ने माना होगा
पर किसका हुआ कभी कोहिनूर।
.........................
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Wednesday, October 14, 2009
तुम यह क्यों नहीं समझ पाते-व्यंग्य कविता (yah kyon nahin samajh pate-vyangya kavita)
निष्क्रिय बना देती है
बाहर जलती आग पर
दिल को ठंडा रखने की सोच
घर को राख बना देती है.
खामोशी से जीती जा सकती हैं दुनिया
पर जीतती है वही बांह
जो जंग में हथियार लेती है.
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जिन के पेट भरे हैं
उनके घर भी बहुत बड़े हैं
अय्याशी की चीजों पर वह फ़िदा हो जाते.
भूख का मतलब वह क्या समझें
रोटी को जो पेट तरसे
उनकी निहारती आँखों को अमीर नहीं पढ़ते
बगावत के इन्तजार में उनके पल भी गुजर जाते.
मौके पर टूटे लोग ही
अपने हाथों से जलाकर चिंगारी
अपनी आग को इतिहास की धारा से बुझाते.
ऐ, दौलतमंदों तुम यह क्यों नहीं समझ पाते.
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Friday, September 25, 2009
दीवारों के पीछे छिपकर-व्यंग्य कविताएं (deevar ke piche chipakar-vyangya kavitaen)
वह सामने चले आते
उनकी बहादुरी पर क्या भरोसा करें
जो अपने पहचाने जाने का खौफ
हमेशा अपने साथ लाते।
..................
दीवारों के पीछे छिपकर
वह पत्थर हम पर उछालते हैं
भीड़ हंसती है
हम भी बदले का इरादा पालते हैं।
दीवारों के पीछे हम नहीं जा सकते
अपनी पहचान छिपाते
डर के साये में जीते वह लोग
मर मर कर जीते होंगे
अपने ही प्रति प्रहार वापस हमारी तरफ लौट आयें
जमाने को मुफ्त में फिर क्यों हंसायें
यही सोचकर चुप रह जाते हैं।
.....................................
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
Thursday, September 10, 2009
शब्दों की जंग महंगी बिकती-हिंदी व्यंग्य कविता (shabdon ke jang-hindi vyangya kavita)
बड़ा पाव की तरह बाजार में बिकती।
अमन के आदी लोगों में चैन कहां
कहीं शोर देखने की चाहत उनमें दिखती।
इसलिये लिख वह चीज जो
बाजार में बड़े दाम पर बिकती।
अठखेलियां करती कवितायें
मन भाती कहानियां और
अमन के गीत लिखना है तो
अपने दिल के सुकूल के लिये लिख
शोर से दूर एक अजूबा दिख
दुनियां में उनके चाहने वाले
गुणीजनों की अधिक नहीं गिनती।
अमन का पैगाम लिखकर क्या करेगा
जब तक उसमें शोर नहीं भरेगा
सौदागरों ने रची है तयशुदा जंग
उस पर रख अपने ख्याल
जिससे बचे बवाल
सजा दिया है उन्होंने बाजार
वहां शब्दों की जंग महंगी बिकती।
सोचता है अपना
दूसरा ही है तेरा सपना
नहीं बहना विचारों की सतही धारा में
तो तू अपना ही लिख
गहरे में डूबकर नहीं ढूंढ सके मोती
वही नकली ख्याल बहा रहे हैं
सब तरफ बवाल मचा रहे हैं
अपनी सोच की गहराई में उतर जा
कभी न कभी तेरे नाम का भी बजेगा डंका
सच्चे मोती की माला
कोई यूं ही नहीं फिंकती।
....................................
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
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4.अनंत शब्दयोग
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Friday, September 04, 2009
कल्पनातीत-हिंदी शायरी (Unthinkable - Hindi poetry)
जब पानी से भरे छोटे छोटे समंदर
और कीचड़ के पहाड़ों से गिरता टकराता हूं।
तब याद आती है
सुबह अखबार में छपी तरक्की की खबरें
और उसे सभी में बांटने के लिये
शोर करते लोगों के जूलूस की फोटो याद
तब बरबस हंसी आ जाती है
उनको कल्पनातीत पाता हूं।
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Saturday, August 29, 2009
अमन और प्यार का पैगाम-हास्य व्यंग्य कविता (aman aur pyar ka paigam-vyangya kavita)
पत्थर के बुतों को तोड़कर
किताबों में शब्दों के झुंड जोड़कर
अपनी छड़ी के सहारे
पूरी दुनियां में
अमन और प्यार का पैगाम
कुछ इंसानों ने सुनाया।
मां के पेट से पैदा हुए सभी
पर कुछ लोग ऐसे जताते हैं
जैसे धरती ने उनको बुलाया।
अपने लिखे शब्दों को
सर्वशक्तिमान का बताते
आम इंसान होकर उसका दूत जताते
आलोचना करने पर सजा
बिना सोचे हां करने पर ही आया उनको मजा
खूनी इतिहासों में
सर्वशक्तिमान के लफ्ज ढूंढने वालों!
उसने सभी को एक जैसा बनाया
न सुनो उनकी
जिन्होंने खुद को खास कहकर
दुनियां के गुरु होने के अहसास को भुनाया।
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दूसरे के ईमान पर किया
हथियार लेकर हमला।
फिर बनाया अपने ईमान का गमला।
अच्छी बाते कह गये
पर नीयत हमेशा शक में रही
झूठ पर लगी ताकत के सहारे मोहर
गर्दन कटी उसकी, जिसने सच बात कही
ईमान परस्त होना अच्छा है
पर बेईमान हैं वह लोग जो
उसको बढ़ाने के लिये जुटाते अमला।
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