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Monday, June 13, 2011

बदलाव-हिन्दी शायरी (badlav-hindi shayri)

जमाने को बदल देंगे
यह ख्याल अच्छा है
पर कोई चाबुक नहीं
किसी इंसान के पास
जिससे दूसरे का ख्याल बदल दे।
अमीरी खूंखार ख्याल लाती है,
कहर बरपाने के कदमों में
ताकत का सबूत पाती है,
गरीबी मदद के लिये
भटकाती है इधर से उधर,
दरियादिली के इंतजार में खड़े टूटे घर,
न बदलती किस्मत
न होती हिम्मत
बस उम्मीद जिंदा रहती है कि
शायद कोई हालात बदल दे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Sunday, July 18, 2010

झगड़ा जैसे रबड़-हिन्दी हास्य कविताएँ (hasya kavitaen in hindi)

दुनियां के लोग जिस तरह
र्दौलत और शौहरत के दीवाने हैं
उसे देखकर नहीं लगता कि
जाति, धर्म और भाषा के लिये होने वाले
झगड़े सच में हो पाते हैं,
कई चेहरे नकाब पहनकर
इधर भी लड़ते हैं तो उधर भी,
अमन के लिये जंग लड़ते हैं सभी
आम आदमी पहले उनमें मिक्स हो जाते हैं,
पर फिर उसी झगड़े को फिक्स पाते हैं।
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खबरची ने ऊंची आवाज में कहा
‘‘कल रात बहुत झगड़ा हुआ
कई लोग पिटे,
कई शीशे के सामान गिरकर मिटे,
पत्थर चले जमकर,
गालियां दी गयी तनकर,
आओ सुनो, मेरे पास पूरी खबर है।’’
आम आदमी ने कहा
‘‘पहले यह बताओ
इस झगड़े को किसने किया था प्रायोजित,
फिर बताना कहां और कब हुआ आयोजित,
आजकल के लोगों के इतनी दम कहां है कि
बिना पैसे खींच पायें झगड़ा जैसे रबड़।’’
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Wednesday, April 28, 2010

कसूर की सजा मिलती है-हिन्दी शायरी (kasoor ki sajaa-hindi shayari)

अपराध की कामयाबी से
तभी आदमी तक डोलता है
जब तक वह सिर चढ़कर नहीं बोलता है।
यह कहना ठीक लगता है कि
जमाना खराब है,
चमक रहा है वही इंसान
जिसके पास शराब और शबाव है,
मगर यह सच भी है कि
सभी लोग नहीं डूबे पाप के समंदर में,
शैतान नहीं है सभी दिलों में अंदर में,
भले इंसान के दिमाग में भी
ख्याल आता है उसूल तोड़ने का
पर कसूर की सजा कभी न कभी मिलती है जरूर
भला इंसान इस सच से अपनी जिंदगी तोलता है।
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Monday, March 29, 2010

नायक और खलनायक-व्यंग्य कवितायें (nayak aur khalnayak-hindi vyangya kavitaen)

धोखे, चाल और बेईमानी का
अपने दिमाग में लिये
बढ़ा रहे हैं वह अपना हर कदम,
अपनी जुबान से निकले लफ्ज़ों
और आंखों के इशारो से
जमाने का भला करने का पैदा कर रहे वहम।
भले वह सोचते हों मूर्ख लोगों को
पर हम तोलने में लगे हैं यह कि
कौन होगा उनमें से बुरा कम,
किसे लूटने दें खजाना
कौन पूरा लूटेगा
कौन कुछ छोड़ने के लिये
कम लगायेगा दम।
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अपने को नायक दिखाने के लिये
उन्होंने बहुत सारे जुटा लिये
किराये पर खलनायक,
अपने गीत गंवाने के लिये
खरीद लिये हैं गायक।
यकीन अब उन पर नहीं होता
जो जमाने का खैरख्वाह
होने का दावा करते हैं
अपनी ताकत दिखाने के लिये
बनते हैं मुसीबतों को लाने में वही सहायक।
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Thursday, March 25, 2010

ख्यालों के खेल में-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (khyalon ke khel men-hindi satire poem)

खुद रहे जो जिंदगी में नाकाम
दूसरों को कामयाबी का
पाठ पढ़ा रहे हैं।
सभी को देते सलीके से काम करने की सलाह,
हर कोई कर रहा है वाह वाह,
इसलिये कागज पर दिखता है विकास,
पर अक्ल का हो गया विनाश,
एक दूसरे का मुंह ताक रहे सभी
काम करने के लिये
जो करने निकले कोई
उसकी टांग में टांग अड़ा रहे हैं।
ऐसे कर
वैसे कर
सभी समझा रहे हैं।
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अपने अपने मसलों पर
चर्चा के लिये उन्होंने बैठक बुलाई,
सभी ने अपनी अपनी कथा सुनाई।
निर्णय लेने पर हुआ झगड़ा
पर तब सुलह हो गयी,
जब नाश्ते पर आने के लिये
आयोजक ने अपनी घोषणा सुनाई।
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तंग सोच के लोग
करते हैं नये जमाने की बात,
बाहर बहती हवाओं को
अपने घर के अंदर आने से रोकते,
नये ख्यालों पर बेबात टोकते,
ख्यालों के खेल में
कर रहे केवल एक दूसरे की शह और मात।
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Monday, March 01, 2010

चरित्र की कालिख-होली पर हिन्दी लघुकथा तथा हंसिकायें (chartra par kalikh-hindi short story and comic poem on happy holi)

वह दो नंबर की कमाई के कारण बदनाम हो गये थे। तमाम तरह की जांचें चल रही थी। अखबार में बहुत सारी बातें अक्सर उनके बारे में छपती रहती हैं। इस बार होली पर लोग उनके घर पर पहुुंचे। लोगों का क्या है? वह तो जिसके पास भी दौलत होती है उसके बारे में यही कहते हैं कि ‘बदनाम हुआ तो क्या नाम तो है?’
इस कारण उनसे फायदा उठाने वाले सेठ, झूठन पर पलने वाले चमचे और काली कमाई से वेतन पाने वाले कर्मचारियों का समूह उनके घर एकत्रित हो गया। साहब अंदर थे और इधर बाहर बैठे लोग उनका इंतजार कर रहे थे।
साहब थे कि बाहर नहीं आ रहे थे। इधर उनके चाहने वालों का धीरज टूटा जा रहा था। तब एक चपरासी अंदर गया और साहब से बोला-‘साहब बाहर आईये। लोग होली पर आपको रंग लगाने आये हैं। सभी आपके साथ पिछली बार मनाई गयी होली को याद कर रहे हैं।’
साहब ने कहा-‘जाओ, उनसे कहो। इस बार रंग नहीं केवल गुलाल लगायेंगे क्योंकि पानी की कमी है। उसे बचाने के लिये इस बार सूखी होली मनायेंगे।
चपरासी बाहर आया। उसने लोगोें से कहा कि ‘साहब ने कहा है कि इस बार सूखी होली खेलेंगे। देश में पानी की कमी है इसलिये उसे बचाना है। साहब जब बाहर आयें तो आप केवल गुलाल लगाना।’
सब ने हामी भरी। चपरासी अंदर गया। तब एक सेठ ने दूसरे से कहा-‘पर पानी बचाने की बात तो पिछले साल थी। तब तो खूब होली खेली थी। इस बार यह क्या हुआ?’
दूसरे सेठ ने कहा-‘धीरे बोलो यार। इस बार इनके नाम पर अखबारे के काले अक्षरों में जाने क्या क्या छपा है? सुना है काले रंग से ही वह डरने लगे हैं। पिछली बार लोगों ने काले रंग से मुंह पोत दिया था। वह फोटो अखबारों में भी छपा था। अब उनको डर है कि कहीं वही फोटो अखबार वाले निकाल न लायें। ऐसे में अगर किसी ने उन पर काला रंग पोता और उसकी फोटो अखबारे में छपी तो कितना बुरा लगेगा।’
तीसरा एक इस बात को सुना रहा था। उसने कहा-‘एक बात याद रखना! गुलाल भी माथे पर ही लगाना। मुंह पर पोता तो गुस्सा हो जायेंगे। आजकल वह अपना चेहरा उजला दिखाने का प्रयास करने लगे हैं।’
पहले सेठ ने कहा-‘हां, भई अपने पाप पीछा नहीं छोड़ते। चेहरा सभी अपना चेहरा उजला देखना चाहते हैं पर चरित्र की कालिख कोई साफ नहीं करना चाहता।’
यहां दो क्षणिकायें भी प्रस्तुत हैं।
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(1)
वह पानी बचाने के लिये
सूखी होली मना रहे थे,
दरअसल पानी से मनाते तो
उनके कुओं की पोल खुल जाती
जो केवल कागजों पर खुदवा रहे थे।
(2)
लोग पहुंचे उनके घर पर
तो पहले ही वह अपना मुंह काला किये बैठे थे
सेवक ने पूछा तो बोले
‘कोई दूसरा मुंह काला कर हंसे
इसलिये हमने पहले ही कर लिया है,
दुश्मनों ने लगा दिया है
चरित्र पर दाग
दोस्त रंग लगाकर ताना कसें
इसलिये अपने चेहरे पर
काला रंग कर लिया है।

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Tuesday, February 23, 2010

पेशा है अमीरों को गलियां देना-हिन्दी व्यंग्य शायरी (trede of welfare-hindi satire poem)

 नारे लगाकर हुई कमाई से
वाद चलाये जाते हैं,
आतंक वाले उदार दिखने की कोशिश करते
तो लोगों की तरक्की के लिये जूझने वाले
हिंसा को जरूरी बताये जाते हैं।
इस अर्थयुग में जमाने का मुफ्त में भला करने वाले
कहां से आयेंगे,
ख्याल हैं जिनके पुरानी किताबों के गुलाम
कब अपना सोच पायेंगे,
सुना है
बेबसों को इंसाफ दिलाने के नाम पर
बंदूक से गोलियां उगलने वाले भी
अपने बैंक खाते बढ़ाये जाते हैं।
पेशा है अमीरों को गलियां देना
शौक है पुरानी किताबों में सजी
नज़ीरें चलाने के लिये
नई नई गाड़ियां लेना
बहस करने पर
कोई कहे खेत की
तो वह खलिहान की सुनाये जाते हैं।
धोखा है उनका नज़रिया
वह सच से नज़र चुराये जाते हैं।
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Friday, February 19, 2010

देशभक्ति का व्यापार-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (deshbhakti ka vyapar-hindi comic poem)

आदर्श पुरुषों ने अपनी दरबार में
देशभक्ति का नारा बड़े तामझाम के साथ सजाया।
बाजार को बेचनी थी मोमबत्तियों
शहीदों के नाम पर,
इसलिये प्रचारकों से नारे को संगीत देने के लिये
शोक संगीत भी बजवाया।
भेजे आदर्श पुरुषों के नाम से
रुपयों से भरे लिफाफे
जिनकी समाज सेवा से आम इंसान हमेशा कांपे
दिल में न था भाव फिर भी
आदर्श पुरुषों के खौफ से
सभी ने देशभक्ति का गीत गाया।
---------
उनकी देशभक्ति की दुहाई,
कभी नहीं सुहाई,
मुखौटे हैं वह बाजार के सौदागरों के
जो जज़्बात बेचने आते हैं,
उनकी जुबां कभी बोलती नहीं
पर पर्दे के पीछे
वही संवाद लिखकर लाते हैं,
खरीदे देशभक्तों ने बस उनकी बात हमेशा दोहराई।
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Monday, February 15, 2010

सच बोलने पर इनाम नहीं होता-हिन्दी व्यंग्य शायरी (sach bolen par inam-hindi vyangya shayri)

इंसान की हर अदा पर मिलते हैं

पर सच बोलने पर कोई इनाम नहीं होता।

कितना भी हो जाये कोई अमीर,

पीछा नहीं छोड़ता उसका जमीर,

कैसे दे सकते हैं इनाम, उस शख्स को

बोलता है हमेशा सच जो,

खड़ी है दौलत की इमारत उनकी झूठ पर

चाटुकारों को लेते हैं, अपनी बाहों में भर

क्योंकि सच बोलने वालो से उनका काम नहीं होता।

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Friday, February 12, 2010

वैलेंटाईन डे आ रहा है-हिन्दी हास्य कविता (velantineday-hindi comic poem)

खबरची को किया उसके गुरु ने फोन

और बहुत दिन से न मिलने का दिया ताना

तब वह बोला

‘गुरुजी क्या बताऊं

खबरों की दुनियां हो गयी है जंग का मैदान

पिछ़ड जाओ एक दिन तो

मिट्टी में मिल जाती है

बरसों से कमाई अपनी शान,

पहले क्रिकेट में जीत पर लिखना था,

क्योंकि देशभक्त दिखना था,

फिर आ गया एक फिल्म का विवाद,

अभिव्यक्ति का समर्थक दिखना था निर्विवाद

अब वह भी निपट गया है

इसलिये अब कल मिलने आऊंगा

आपका ख्याल अब आ रहा है।’

गुरुजी बोले

‘ठीक है,

फिर एक सप्ताह बाद आना

अभी तुम्हें प्रेम दिवस पर लिखना है,

इंसानों जैसा दिखना है,

क्योंकि उस पर खड़ा होगा विवाद,

तुम्हें आजादी का पक्षधर दिखना है निर्विवाद,

दो दिन में वैलंटाईन डे आ रहा है।’

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Saturday, February 06, 2010

बखान-हास्य कविता (bakhan-hasya kavita)

सचिव ने कहा

समाज सेवक से कहा

‘आ गया है जमकर चंदा

चलेगा अपना जोरदार धंधा

अपने हिस्से का सही अंदाज बतायें

तो शुरु करें अब गरीबों के नाम पर कल्यान।’

समाज सेवक पहले चौंके

फिर बोले-

‘अरे, क्या कहते हो,

भला, क्यों जज़्बात में बहते हो,

अभी तक नब्बे फीसदी था

अब सौ फीसदी कर लो,

अपने ही खातों में भर लो,

कागजी खाना पूरी करना,

प्रचार के लिये कुछ रकम भरना,

फिर शुरु करो अपने काम का बखान।



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Tuesday, February 02, 2010

सौदागर और ढिंढोरची-हिन्दी व्यंग्य कविता (market and media-hindi comic poem)

चौराहे पर चार लोग आकर

चिल्लाते जूता लहरायेंगे,

चार लोग नाचते हुए

शांति के लिये सफेद झंडा फहरायेंगे।

चार लोग आकर दर्द के

चार लोग खुशी के गीत गायेंगे।

कुछ लोगों को मिलता है

भीड़ को भेड़ों की तरह चराने की ठेका

वह इंसानो को भ्रम के दरिया में बहायेंगे।

सोच सकते हैं जो अपना,

दर्द में भी नहीं देखते

उधार की दवा का सपना,

सौदागरों और ढिंढोरची के रिश्तों का

सच जो जानते हैं

वही किनारे खड़े रह पायेंगे।

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Saturday, January 30, 2010

ख्वाबों की दुनियां-हिन्दी शायरी (khvabon ki duniya-hindi literature poem)

दीवार के पीछे ही

अपना चेहरा छिपाये रहो तुम,

तुम हो एक सजा सजाया ख्वाब,

कितने भी सवाल करूं

नहीं देना उनका जवाब,

तुम्हारे दिल के स्वर ही

दिमाग की सोच में बजते रहे हैं,

कई  शेर कहे हमने यह मानकर

जैसे कि तुमने कहे हैं,

अपने कड़वे सच के घूंट

हमने जहर की तरह पिये हैं,

अभी तक ख्वाबों के

अमृत के सहारे ही जियें हैं,

आंखों सामने आकर  अपना सच न दिखाना

जब तक हम भूलें न तुमको

दीवार के पीछे ही खुद को छिपाना,

वरना पल भर में ख्वाबों की दुनियां हो जायेगी गुम।

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Sunday, January 24, 2010

दहेज का मामला-हिन्दी व्यंग्य कविता

शिक्षक पुत्र ने वकील पिता से कहा
‘पापा, मेरी शादी में आप दहेज की
मांग नहीं करना
यह बुरा माना जाता है
देश के समाज की हालत सुधारने का
श्रेय भी मिल जायेगा
हम पर कभी ‘दहेज एक्ट’ भी
नहीं लग पायेगा
उससे बचने का यही उपाय मुझे नजर आता है।’
वकील पिता ने कहा
‘बेटा, कैसी शिक्षा तुमने पायी
कानून की बात तुम्हारी समझ नहीं आयी।
‘दहेज एक्ट’ का दहेज से कोई संबंध नहीं
लेना और देना दोनों अपराध हैं
पर देने वाला बच जाता है
दहेज न लिया न लिया हो लड़के वालों
फिर भी लड़की का बाप लगाता है।
कानून से नहीं शर्माता है।
अगर दहेज एक्ट का डर होता तो
समाज में रोज इसकी रकम न बढ़ जाती,
नई चीजें शादी के मंडप में नहीं सज पाती,
तुम सभी देखते रहो
कानून की विषय है पेचीदा
हर किसी की समझ में नहीं आता है।’
नोट-यह कविता काल्पनिक है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।


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Monday, January 18, 2010

इंसान की बुनियाद-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (insan ki buniyad-hindi vyangya kavitaen)

शहर को बढ़ते देखा

सड़कों को सिकुड़ते देखा,

इंसानों की जिंदगी में

बढ़ते हुए दर्द के साथ

हमदर्दी को कम होते देखा।

.......................


आसमान छूने की चाहत में

कई लोगों को जमीन पर

औंधे मुंह गिरते देखा,

बार बार खाया धोखा

फिर भी हर नये ठग की

चालों में उनको घिरते देखा।

..........................


हिन्दी में पैदा हुए

अंग्रेजी के बने दीवाने

पढ़े लिखे लोगों की

जुबां को लड़खड़ाते देखा।

भाषा और संस्कार

इंसान की बुनियाद होती है

मगर अपने अंदर बनाने की बजाय

लोगों को बाजार से खरीदते देखा

...........................


ख्वाहिशें पूरी करने के लिये

आंखों से ताक रहे हैं,

बोलते ज्यादा, सुनते कम

लोग सोच से भाग रहे हैं

समझदार को भी

चिल्लाते हुए देखा।

सभ्य शब्द का उच्चारण

बन गया है कायरता का प्रमाण

बहादुरी दिखाने के लिये

लोगों को गाली लिखते देखा।

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Tuesday, December 29, 2009

साहबी संस्कृति-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (boss culture-hindi satire poem)

 दिन भर अपने लिए साहब शब्द सुनकर

वह रोज फूल जाते हैं।

मगर उनके ऊपर भी साहब हैं

जिनकी झिड़की पर वह झूल जाते हैं।
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नयी दुनियां में पुजने का रोग

सभी के सिर पर चढ़ा है।

कामयाबी का खिताब

नीचे से ऊपर जाता साहब की तरफ

नाकामी की लानत का आरोप

ऊपर से उतरकर नीचे खड़ा है,

भले ही सभी जगह साहब हैं

बच जाये दंड से, वही बड़ा है

--------

साहबी संस्कृति में डूबे लोग

आम आदमी का दर्द कब समझेंगे।

जब छोटे साहब से बड़े बनने की सीढ़ी

जिंदगी में पूरी तरह चढ़ लेंगे।
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Wednesday, December 23, 2009

गद्दार कदम-हिन्दी साहित्य कविता (gaddar kadam-hindi sahitya kavita)

 अपनी खुशियां मिलकर बांटते होते हम।

तब नहीं छाये होते पूरे जमाने के दिल में गम।

अब जज़्बातों के सौदागर सपने बेच रहे हैं

बाजार में लोगों के दर्द पर, करके अपनी आंखें नम।

अपने नाम के पैसों खाता देखकर,  खुश हो रहे अमीर

बढ़ते आंकड़ों में देख रहे जिंदगी का  पूरा दम।

वतन से प्यार के नाम पर कर रहे चमन से धोखा

कुचल रहे फूल सी वफा, माली के  गद्दार कदम।

नहीं सोचते जब जमाना टूट कर बिखर जायेगा

उनके घरों की तरफ भी बढ़ेंगे, कातिलों के कदम।।


 
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Saturday, December 19, 2009

कमीशन की नीति-हिन्दी साहित्य कवितायें (policy of commision-hindi sahitya kavita)

 सरकार और साहुकारों ने

इतने वर्षों से बहुत दान किया है

कि इस देश से पीढ़ियों तक

गरीबी मिट जाती।

अगर कमबख्त

यह कमीशन की रीति

दान बांटने वालों की नीति न बन जाती।

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नया बनाने के लिये

पुराना समाज टुकड़े टुकड़े

किये जा रहे हैं।

कुछ नया नहीं बन पा रहा है

इसलिये हर टुकड़े को समाज बता रहे हैं।


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Tuesday, December 08, 2009

आंसुओं का हिसाब-हिन्दी व्यंग्य कविता (ansuon ka hisab-hindi sahitya kavita)

शानदार इमारतों के नीचे

दबे पड़े हैं, बुनियाद में जो पत्थर

वह चमकदार नहीं होते।

अमीर इंसानों की दौलत के आंकड़े

खातों में लिखे होते 

पर उसको बढ़ाने वाले मेहनतकशों के

पसीने की बूंदों के हिसाब नहीं होते।

रौशनी फैली है जहां तक

वहां तक पूरा जहां चमक रहा है

उसे देखने वालों को 

अंधेरों के अहसास नहीं होते।

जितने लोग जमीन पर चलते हैं

आकाश में उतने परिंदे नहीं होते।

नजर और अहसास सभी के अलग हैं

कोई जुटा कर भी दौलत

खुशी के लिये भटकता है

जो मोहताज हैं

वह भी रुपयों के हिसाब में अटकता है

तमाशों में करते हैं

लोग अपनी दौलत बरबाद

पर नहीं कर सकते

किसी गरीब का घर आबाद

घूम रही है अमीरी जिनके चारो ओर

नहीं पाते चैन तब तक

जब तक गरीब के आंसु

गाल पर बहते नहीं होते।

-------

अभावों में जीते हैं जो लोग

उनके आंसुओं का हिसाब

कौन रखता है।

अमीर की तरफ ताक रहे हैं सभी

कब उसकी आंखों में दर्द दिखे

तो उसे हमदर्दी दिखायें

वही तो है जो

दर्द का रुपयों में हिसाब करता है।

 

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Friday, November 06, 2009

क्या नया रचेंगे-काव्य चिंतन (kya naya rachenge-kavya chintan)

देश के बुरे हालतों पर बोलने और लिखने वाले बहुत हैं। आम आदमी का दर्द बयान करने वाले ढेर सारी तालियां बटोर जाते हैं। ऐसी अनेक किताबें लिखी जाती हैं जिनमें पात्रों का दर्दनाक चित्रण कई लेखकों को अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार दिला चुके हैं। समाज की पीड़ाओं को दिखाते हुए अमीरों को कोसने वालों की तो हमेशा पौबारह रही है। इतना सब लिखे जाने के बावजूद समाज का नैतिक और वैचारिक पतन हुआ है। इसका कारण यह है कि दर्द का बयान सभी करते हैं पर उसके इलाज का नुस्खा कोई नहीं लिखता।
एक कवि से एक आदमी ने कहा-‘यार, तुम कवितायें लिखना बंद कर दो।’
कवि ने कहा-‘एक शर्त पर कि तुम अपनी जिंदगी में कभी स्वयं दुःखी नहीं अनुभव करोगे।’
उस आदमी ने कहा-‘यह संभव नहीं है क्योंकि मैं अपने को कभी दुःखी अनुभव न करने का वादा नहीं कर सकता। वह तो मैं तब से अनुभव कर रहा हूं जब से पैदा होने के बाद होश संभाला है। अरे, इस संसार में कोई सुखी रह सकता है क्या? कैसे कवि हो? इतनी अक्ल भी नहीं है।’
कवि ने कहा-‘बस, यही बात है। जब तक जमाने में दर्द रहेगा कोई न कोई उस पर अपने अल्फाज कहेगा। सभी अगर अंदर ही अंदर रोयेंगे या बाहर केवल चीखेंगे तो फिर दर्द को अल्फाज कौन देगा? यही काम कवि का होता है।’
बहरहाल अब तो कवि ही नहीं दर्द कहते बल्कि गद्यकार भी दर्द का बयां करते हैं। तलवार, तीर या बंदूक की आवाज हो तो उसमें भी वह भूख और गरीबी का दर्द ढूंढा करते हैं। जो आदमी धन और अन्न से मजबूर होता है भला वह कहीं हथियार उठाता है? मगर साहब हमारे देश में इस विश्वास के साथ जीने वाले भी हैं पर उनको यह पता नहीं कि आखिर उन समस्याओं का क्या हल है? वह तो बस अपने दर्द के साथ ऐसा यकीन बयान करते हैं जिसको जमीन पर ढूंढना मुश्किल काम है।
बहरहाल प्रस्तुत हैं इस पर दो पद्य रचनाएं-

दायें चलें कि बायें
वह बताते नहीं।
चलने का नारा देते हैं
वाद सुनाते हैं ढेर सारे
मंजिल का पता खुद नहीं जानते
झंडे उठाये चलते हैं
राहों पर
जमाने का भला करने का
मकसद बताते हैं
अपनी अपनी कहते अघाते नहीं।।
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कहीं पूरब का बखान करेंगे
कहीं पश्चिम का गान करेंगे।
अपनी जमीन पर खड़ी फसलों को
जलाकर
नयी फसल करने का करते दावा
जमाने से करते छलावा
तलवार, तीर और बंदूक से
मचा रहे शोर
इस जहां में बने स्वर्ग को
जलाकर वह बना रहे नरक
भला क्या नया रचेंगे।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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