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Thursday, September 22, 2011

अपना हौंसला-हिन्दी शायरी (apna honsla-hindi shayari or kavita)

जोश का समंदर दिल में पैदा कर लो।
बहते जाओ नाव की तरह
तेज चलती हवाऐं
उठती हुई ऊंची लहरें
तुम्हें डुबा नहीं सकती
अपने अंदर
मंजिल तक पहुंचने का हौंसला भर लो।
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टूटे लोग
तुम्हारे हौंसलें को जोड़े
यह मुमकिन नहीं हैं,
अपनी इज्जत को तरसा जमाना
बस जानता है पैसा कमाना,
तुम्हारे काम पर कभी दाद देगा
यह मुमकिन नहीं है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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Saturday, May 21, 2011

आम और खास इंसान-हिन्दी व्यंग्य शायरी (aam aur khas insan-hindi vyangya shayari)

कभी आंधी उड़ा जायेगी,
कभी पानी बहा ले जायेगा,
कभी आग जला डालेगी,
आम इंसान सभी का आसान शिकार है
बच जायेगा
तो भी क्या
पता नहीं कब
आम इंसानों की बेईमानी की रीति उसकी
आखिरी उम्मीद भी लूट ले जायेगी।
----------
वह महल में रहें या जेल में
उनके चर्चे ज़माने में होते रहेंगे,
खास इंसानों का
ईमानदारी से बेईमानी तक का सफर
रंगीनियों से सजा रहता है
उनकी अदाओं को आम इंसान
मुफ्त में ढोते रहेंगे।
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लेखक संपादक-दीपक "भारतदीप", ग्वालियर 
writer and editor-Deepak "Bharatdeep" Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, May 14, 2011

फरिश्ते और दरिंदे के भेष में आदमी-हिन्दी कवितायें (farishey aur darinde ke bhesh mein aadmi-hindi poem's)

अपने सामने ही
खुद के काफिले लुटते देखते रहे,
दरिंदों के आगे घुटने टेकते रहे,
इस उम्मीद में कि
सहारा मिल जायेगा
कहीं कोई फरिश्ता भी जिंदा होगा।
मगर हैरान है यह देखकर कि
टूटते रहे हमारे अरमान कांच की तरह
किसी को तरस नहीं आया
फिर भी यकीन नहीं होता
कि यहां हर आदमी दरिंदा होगा।
---------------
हमेशा चारों तरफ
हमारी तन्हाई के घेरे रहे,
अपने ही नजरें फेरे रहे,
लाचारी किसी को लाई हमारे करीब
फिर हो गये लोग दूर
अकेलेपन दूर नहीं हुआ
मतलब के यार भले घेरे रहे।
लेखक संपादक-दीपक "भारतदीप", ग्वालियर 
writer and editor-Deepak "Bharatdeep" Gwalior
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Wednesday, April 20, 2011

अण्णा हज़ारे और बाबा रामदेव की तुलना गलत-हिन्दी लेख (anna hazare aur baba ramdev ki tulna galat-hindi lekh and article)

          अण्णा हज़ारे और बाबा रामदेव में कोई तुलना नहीं हो सकती मगर लोग करना चाहते हैं। इसका कारण केवल यही है कि दोनों ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान छेड़े हुए हैं और कम से कम एक दिन के लिये दोनों साथ एक मंच पर दिखे। हमारे देश के लोगों की मानसिकता है कि वह व्यक्त्तिवों में द्वंद्व देखना चाहते हैं और अगर वह न हो तो फिर अपने ही मस्तिष्क में दोनों में से किसी एक की श्रेष्ठता पर विचार करते हैं। फिर बहसें करते हैं। एक किसी को श्रेष्ठ तो दूसरा किसी को श्रेष्ठ बताता है।
       जब हम छोटे थे तो अक्सर ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी में से ‘बड़ा कौन’ जैसे विषय पर बुजुर्गों की बहस देखा करते थे। वैसे तो हमारा समाज मानता है कि परब्रह्म परमात्मा का ही तीनों रूप है। ब्रह्मा जन्म, विष्णु जीवन तथा शिव शक्ति प्रदान करने वाले भगवत्रूप माने जाते हैं। इसके बावजूद कुछ लोग विष्णु भगवान को ही श्रेष्ठ मानते हैं-इसका कारण यह भी हो सकता है क्योंकि उनकी पत्नी लक्ष्मी को माना जाता है जिसके भक्त सारे संसार में हैं। प्रसंगवश अवतार केवल भगवान विष्णु के ही माने गये हैं। यह बहस अगर हमारे अंदर मौजूद धार्मिक भावना का प्रमाण है तो अध्यात्मिक ज्ञान से पैदल होना भी दर्शाती है। अब देश में बाबा रामदेव तथा अण्णा हज़ारे को लेकर बहस चल रही है। इसका एक कारण यह भी है कि भ्रष्टाचार से त्रस्त देश को अब यह यकीन दिलाया जा रहा है कि उसे अब ईमानदारी के युग में पहुंचा दिया जायेगा। इसके लिये कितने लोग कितने आन्दोलन  चला रहे हैं पर सभी को एक मान लेना भी गलत होगा। लक्ष्य एक है पर मार्ग प्रथक प्रथक हैं उससे भी अधिक संशय इस बात का है कि उनके उद्देश्य क्या हैं?
       इधर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक खेल बनता जा रहा है। ऐसा खेल जिसमें प्रचार माध्यमों का समय विज्ञापन का प्रसारण के साथ अच्छा बीत जाता है। उससे देखकर तो लगता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी प्रचार के लिये बेचने का साधन बन गया है। यहां हम बाबा रामदेव और अण्णा हज़ारे की प्रशंसा करेंगे कि उन्होंने अपने प्रयासों से समाज में चेतना जगाने का प्रयास किया है पर सवाल यह है कि इसके परिणाम अभी प्रकट नहीं हो रहे।
        बाबा रामदेव ने जब योग शिक्षक के रूप में लोकप्रियता प्राप्त कर ली तो वह उससे प्रथक सांसरिक विषयों पर प्रवचन करने लगे और हमारा मत तो यह है कि योग को छोड़कर सारे विषय राजनीतिक हो चुके हैं। खेल, फिल्म, समाज सेवा, साहित्य, पत्रकारिता, स्वास्थ्य, वकालत, गरीबा का कल्याण, वन तथा पशु संरक्षण तथा ऐसे ढेर सारे विषय हैं जिनमें परिवर्तन बिना राजनीति के नहीं आता। योग सिखाते हुए बाबा रामदेव काला धन तथा भ्रष्टाचार विषय पर बोलने लगे। अब तो वह एक राजनीतिक दल बनाने में जुट गये हैं। बहरहाल उन्होंने भारत स्वाभिमान बचाने के लिये आंदोलन छेड़ा। उससे उनकी लोकप्रियता एक हरफनमौला के रूप में हो गयी जो योग के अलावा सांसरिक विषयों में भी पारंगत हैं। सब ठीक चल रहा था कि महाराष्ट्र के समाज सेवी अण्णा हज़ारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन करने दिल्ली आ गये। उनको विशुद्ध रूप से गैर राजनीतिक व्यक्ति माना जाता है इसीलिये उनके आंदोलन के प्रति भी यही लोगों की धारणा बनी। यहां तक कि इस आंदोलन से राजनीतिक हस्तियों को दूर ही रखा गया। ऐसे में अण्णा हजारे रातोंरात देश के नायक बन गये। यह सब प्रचार माध्यमों का कमाल था। कुछ लोगों ने तो ऐसा दिखाया कि बाबा रामदेव महत्वहीन हो गये हैं। इस समय जब भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की बात होती है तो स्वामी रामदेव से कहीं अधिक अन्ना की लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर दिखता है। अभी भी कुछ लोग मान रहे हैं कि दोनों महानुभाव एक हैं पर वह बात अब नहीं दिखती।

        जहां तक दोनों के व्यक्तित्व और कृतित्व की बात करें तो बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के बीच कोई साम्यता नहीं है। 73 वर्षीय अण्णा साहेब बाबा रामदेव से कम से 30 से 35 वर्ष के बीच बड़े होंगे-बाबा रामदेव की सही उम्र का अनुमान नहीं है पर ऐसा लगता है कि वह चालीस से कम ज्यादा होंगे। अण्णा साहेब का योग से कोई वास्ता नहीं है। भले ही वह सामाजिक आंदोलन चलाते रहे हों पर उनके विषय कहीं न कहीं राजनीतिक रूप से प्रभावित रहे हैं। स्वयं वही कहते हैं कि ‘हमने दो सरकारें गिराई हैं।’ उनकी सादगी उनके विरोधियों को राजनीतिक चालाकी भी लग सकती है पर उनके विषय अविवादित हैं। अण्णा साहेब देश में ईमानदारी लाना चाहते हैं और इसके लिये कानून बनवाने का प्रयास कर रहे हैं। बाबा रामदेव भारतीय योग साधना के आधुनिक और प्रसिद्ध शिक्षक हैं जो न केवल व्यक्ति की देह को स्वस्थ रखती है बल्कि चरित्र निर्माण के लिये भी प्रेरित करती है। अगर आप योग साधना की दृष्टि से देखेंगे तो अण्णा हज़ारे तो अनैतिकता से भरे गंदे नाले को बीच में से साफ करने का प्रयास कर रहे हैं जबकि बाबा रामदेव उसी नाले में शुद्ध जल की धारा बहाकर उसमें शुद्ध जल प्रवाहित करना चाहते हैं। सामान्य दृष्टि से देखेंगे तो बाबा रामदेव के प्रयास अधिक सक्रिय नहीं दिखेंगे क्योंकि वह नारे नहीं लगा रहे जिससे लोगों के सामने भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रियता नहीं दिख रही। इसके अलावा बाबा रामदेव अपने विषय में योग भी शामिल करते हैं इसलिये भ्रष्टाचार का विषय मुखर नहीं हो पाता। जबकि अण्णा साहेब केवल इसी विषय पर बोल रहे हैं फिर उनकी धवल छवि के कारण भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा के रूप में दिख रही है।
       अण्णा हज़ारे साहिब सज्जन आदमी हैं पर उनके साथ जुड़े लोगों पर अब प्रश्नचिन्ह लगने लगा है। इसका कारण यह है कि उनके सभी साथी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले हैं या वर्तमान व्यवस्था से जुड़े रहे हैं। ऐसे में अण्णा साहिब का आंदोलन विरोधियों से जुझता दिख रहा है। फिर अण्णा साहेब के पास अपनी धवल छवि के अलावा अन्य कोई हथियार नहीं है जिससे वह समाज में सुधार ला सकें। इसके विपरीत बाबा रामदेव के पास योग जैसा ब्रह्मास्त्र है। अगर बाबा रामदेव का राजनीतिक आंदोलन सफल नहीं भी हुआ तो भी योग के नये सूत्रधार के रूप में उनका नाम सदियों तक पूरी दुनियां में याद रखा जायेगा जबकि आंदोलन का निश्चित परिणाम न मिलने पर अण्णा साहेब की छवि फिर महाराष्ट्र तक ही सिमट जायेगी। अंतिम अंतर यह कि अण्णा साहेब अपने भाषण से अपने अनुयायियों की बुद्धि में चेतना लाकर उसकी देह को संघर्ष के लिये प्रेरित करने वाले व्यक्ति हैं जबकि बाबा रामदेव का प्रयास लोगों को मन और देह की दृष्टि से स्वस्थ बनाकर वैचारिक रूप से शक्तिशाली बनाने का है।
           बाबा रामदेव योग शिक्षक हैं। कहा जाता है कि ‘रमता योगी बहता पानी इनकी माया किसी ने नहीं जानी’। जैसे बाबा रामदेव योग साधना करते रहेंगे वैसे उनका तेज बढ़ता रहेगा। वह आयु को परास्त करेंगे। स्वास्थ की दृष्टि से तो कहना ही क्या? जब कोई उनकी आलोचना करता है तो मन करता है कि उससे पूछा जाये कि ‘क्या, वह वाकई उतना स्वस्थ है जितना रामदेव जी दिखते हैं। क्या वह मधुमेह, कब्ज, हृदय या कमर दर्द के विकार से परेशान नहीं है।’
        कभी कभी तो यह कहने का मन करता है कि जो व्यक्ति स्वस्थ होने के साथ योग साधक भी हों, वही उनको चुनौती दे तो अच्छा रहेगा। विशुद्ध रूप से योग बेचने वाले योगी स्वयं भी महान योगी के पद पर प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं और उनकी शक्तियों को कोई योग साधक ही समझ सकता है। अण्णा हज़ारे के कहे अनुसार कानून बन गया तो उनका कार्य खत्म हो जायेगा जबकि बाबा रामदेव का काम तो लंबे समय तक चलने वाला है। मतलब अण्णा हज़ारे का कार्य क्षणिक प्रभाव वाला है जबकि बाबा रामदेव लंबी लड़ाई लड़ने वाले योग योद्धा हैं। वैसे इन दोनों महानुभावों को देखकर कहना पड़ता है कि हमारी धरती वाकई महान है जो हमेशा ही हीरे के रूप में मनुष्य हमारे समाज को सौंपती हैं। इन हीरों की किस्म अलग अलग हो सकती है और श्रेष्ठता के रूप में किसी को मान्यता देना कठिन है।
        एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हम दोनों पर निरंतर दृष्टि गढ़ाये रहते हैं। हमें इस बात में दिलचस्पी है कि आखिर दोनों कैसे अपने अभियानों के बेहतरीन परिणाम प्राप्त करेंगे?
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लेखक संपादक-दीपक "भारतदीप", ग्वालियर 
writer and editor-Deepak "Bharatdeep" Gwalior
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Tuesday, November 23, 2010

इंसानी मुखौटे-हिन्द व्यंग्य कविता (insani mukhaute-hindi shayari)

मुखौटे कभी शब्द बोलते नहीं है
शब्दों को तोलते नहीं नहीं है,
कातिल का राज खोलते नहीं हैं।
दौलत मंद और शोहरत वाले
अपने चेहरे पर दाग लगाना
पसंद नहीं करते,
ज़माने पर काबू करने का
दंभ भी भरते
इसलिये सिंहासन में बिठा देते हैं
इंसानी मुखौटे
चढ़ा देते हैं शिखर पर उन इंसानों को
जो उनके इशारों के बिना
डोलते नहीं हैं।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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Sunday, September 26, 2010

ज़हर और अमृत-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (zahar aur amrit-hindi vangya kavitaen)

सुनते हैं हर शहर में
दूध, दही और सब्जी के साथ
ज़हर बिक रहा है,
फिर भी मरने वालों से अधिक
जिंदा लोग घूमते दिखाई दे रहे हैं,
सच कहते हैं कि
पैसे में बहुत ताकत है
इसलिये नोटों से भरा है दिल जिनका
बिगड़ा नहीं उनका तिनका
बेशर्म पेट में जहर भी अमृत की तरह टिक रहा है।
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हलवाई कभी अपनी मिठाई नहीं खाते
फिर भी तरोताजा नज़र आते हैं।
बेच रहे हैं जो सामान शहर में
उनकी दवा और सब्जी शामिल हैं जहर में
कहीं न उनके मुंह में भी जाता है
मग़र गज़ब है उनका हाज़मा
ज़हर को अमृत की तरह पचा जाते हैं।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Sunday, September 19, 2010

जांच और बहस-हिन्दी कविता (janch aur bahas-hindi kavita)

बेरहम कातिलों ने कर दिया
आम इंसान का सरेराह कत्ल
उसकी जांच जारी है,
पहरेदार ढूंढ रहे चेहरे
मगर अक्लमंदों की बहस बंद है,
वह खड़े इंतजार में जानने के लिये
कातिलों के नकाब का क्या रंग है
जब चल जायेगा तब ही तय होगा कि
चिल्लाने की अब किसकी बारी है।
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Sunday, September 12, 2010

पैसा जैसा नचायेगा-हिन्दी व्यंग्य कविता (paisa jaisa nachayega-hindi vyangya kavita)

लोगों को जो धर्म के नाम पर बहलाये
वह धर्म गुरु बन जायेगा,
अपनी कमर को चाहे जैसे लचकाये
वह अभिनेता बन जायेगा,
मुखौटा लगाये बुत की तरह कुर्सी पर सज जाये
वह शासक बन जायेगा,
बशर्ते किसी दौलतमंद को यह बताये
कि उसका बंदर बन जायेगा,
वैसे नाचेगा, उसका पैसा जैसा नचायेगा।
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Thursday, August 12, 2010

ईमानदारी का धब्बा-व्यंग्य कवितायें (imandari ka dhabba-satire poems in hindi)

अज़गर करे ना चाकरी
पंछी करे न काम
सबके दाता जो ठहरे राम,
असली खिलाड़ी कभी न खेले खेल,
निकाल लेते कमीशन में ही तेल
प्रतियोगिता के ठेके में कमाकर ही करते नाम।
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अपने ज़मीर में कभी
ईमान को नहीं पालना,
वरना उसे बेच नहीं पाओगे,
धोखे में बेच देना उसका नाम लेकर,
बेईमान कहलाने से बच जाओगे।
सच तो यह है कि
तरक्की की राह बहुत कठिन है,
न रहती रात याद, न रहता दिन है,
फिर बिना दौलत के कौन देता इज्जत,
अपने ईमान पर यकीन हो तो
अपने अंदर मूर्तिमान बनाकर रख लेना,
अपनी जरूरतों को भी कम कर देना,
तब बाज़ार में नहीं बिकेगा ज़मीर
मगर दुनियां और खुद को धोखा देने से बच जाओगे,
यह अलग बात है कि
ज़माने की नज़र में
ईमानदारी का धब्बा अपने नाम के आगे लगा पाओगे।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Sunday, July 18, 2010

झगड़ा जैसे रबड़-हिन्दी हास्य कविताएँ (hasya kavitaen in hindi)

दुनियां के लोग जिस तरह
र्दौलत और शौहरत के दीवाने हैं
उसे देखकर नहीं लगता कि
जाति, धर्म और भाषा के लिये होने वाले
झगड़े सच में हो पाते हैं,
कई चेहरे नकाब पहनकर
इधर भी लड़ते हैं तो उधर भी,
अमन के लिये जंग लड़ते हैं सभी
आम आदमी पहले उनमें मिक्स हो जाते हैं,
पर फिर उसी झगड़े को फिक्स पाते हैं।
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खबरची ने ऊंची आवाज में कहा
‘‘कल रात बहुत झगड़ा हुआ
कई लोग पिटे,
कई शीशे के सामान गिरकर मिटे,
पत्थर चले जमकर,
गालियां दी गयी तनकर,
आओ सुनो, मेरे पास पूरी खबर है।’’
आम आदमी ने कहा
‘‘पहले यह बताओ
इस झगड़े को किसने किया था प्रायोजित,
फिर बताना कहां और कब हुआ आयोजित,
आजकल के लोगों के इतनी दम कहां है कि
बिना पैसे खींच पायें झगड़ा जैसे रबड़।’’
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Saturday, July 03, 2010

कलंक-हास्य कविता

समाज सेवक ने अपने पुराने चमचे को बुलाया
और कहा
‘क्या बात है
इतने दिनों से लापता हो
कभी अपना चेहरा नहीं दिखाया,
भूल गये वह समय जो हमने
तुम्हारे साथ बिताया,
अरे, कुछ इज्जत करो हमारी
तो बन जायेगी जिंदगी तुम्हारी
वरना जिंदगी में कुछ हाथ नहीं आयेगा।’
चमचे ने कहा
‘हुजूर छोटे के अगाड़ी
बड़े के पिछाड़ी नहीं चलना चाहिये
आपकी संगत में यही बात समझ में आयी
जब तक नहीं जमी थी
आपकी समाज सेवा की दुकान
तब तक ही पाते रहे सम्मान
जब मिलने लगा आपको ढेर सारा चंदा,
हमें भूल कर याद रहा बस आपको धंधा,
घर से बाहर निकले कार में,
अपने कुनबे को ही लगा लिया
ज़़माने की भलाई के व्यापार में,
सुना है किसी प्रकरण में
आपकी चर्चा भी अखबार में आई,
सिमट सकती है आपकी दुकान
शायद इसलिये आपको मेरी याद आई,
मगर हमें माफ करियेगा
अब नहीं निभेगी आपके साथ
हमने पाया आपकी संगत से बुरा अहसास,
नहीं करना चाहिए बड़े इंसानों से कोई आस,
सारे दाग मिट जायेंगे किसी भी साबुन से
पर किसी के चमचे बने तो
ऐसा कलंक कभी नहीं मिट पायेगा।’
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Wednesday, January 27, 2010

धोती और टोपी-हिन्दी हास्य व्यंग्य (dhoti aur topi-hindi hasya vyangya)

दीपक बापू जल्दी जल्दी सड़क पर जा रहे थे, सामने से थोड़ी दूरी पर स्कूटर पर सवार फंदेबाज आता दिखा। उनका दिल बैठ गया वह सोचने लगे कि ‘यह अब समय खराब करेगा। इससे बचने का उपाय भी तो नहीं है।’ फिर उन्होंने देखा कि वह तिराहे से गुजर रहे हैं और तत्काल अपने बायें तरफ मुड़कर दूसरे रास्ते पर चलें तो बच जायेंगे। उन्होंने यही किया पर स्कूटर पर सवार फंदेबाज उसी तिराहे से मुड़कर पीछे से आया और बोला-‘क्या बात है दीपक बापू! यह कैसे सोच लिया कि अपने इस आजीवन प्रशंसक से बचकर निकल जाओगे।’
दीपक बापू बोले-‘नहीं, यार, ऐसा नहीं है। दरअसल हमने अपने लिये एक टोपी खरीदी थी, वह उसी दुकान पर छोड़ आये। इधर कहीं शादी पर जाना है। इसलिये वही लेने जा रहे है। चलो, तुम मिल गये तो उस दुकान तक छोड़ दो।’
फंदेबाज ने ना में सिर हिलाते हुए कहा-‘अगर आपको अपनी टोपी बचानी है तो उसके लिये आपको स्वदेशी ढंग से ही प्रयास करना चाहिये। यह स्कूटर और पैट्रोल तो पाश्चात्य सभ्यता की देन है।’
दीपक बापू बोले-‘अच्छा, ठीक है! वैसे तुम्हें हमने अपने पीछे आने की दावत को नहीं दी थी। हम अपने मार्ग पर पैदल ही जा रहे थे।’
फंदेबाज ने कहा-‘हमने सोचा कोई दूसरी परेशानी है पर यह टोपी बचाने की समस्या ऐसी नहीं है कि हम आपके उसूलों के खिलाफ जाकर मदद करें। हां, आप चलते रहिये पीछे से हम स्कूटर पर धीरे धीरे आते रहेंगे। जब आप दूरे होंगे तो स्कूटर चलाते हुए आयेंगे। फिर रुक जायेंगे पर लौटते हुए जरूर वापस लायेंगे क्योंकि टोपी बचाने जैसा अहम विषय तब नहीं रहेगा।’
दीपक बापू फिर अपनी राह चले। रास्ते में ही उन्होंने देखा कि आलोचक महाराज एक पान की दुकान पर खड़े थे। वहां रास्ता बदलने की गुंजायश नहीं थी। तब उन्होंने दायें चलने की बजाय बायें किनारे से चलने का निर्णय लिया, मगर आलोचक महाराज की नज़र उन पर पड़ ही गयी। वह ऊं ऊं कर उनको बुलाते रहे पर दीपक बापू अनसुनी कर आगे बढ़ गये मगर पीछे से आ रहे फंदेबाज ने आगे स्कूटर खड़ा कर दिया और कहा-‘अरे, आलोचक महाराज आपको बुला रहे हैं। उनसे मिला करो, हो सकता है कि आपकी कुछ कवितायें अखबारों में छपवा दें। उनकी बहुत जान पहचान बहुत है। हो सकता है कभी कोई सम्मान वगैरह भी दिलवा दें।’
दीपक बापू ने आखें तरेरी-‘तुम्हें सब मालुम है फिर काहे आकर हमें उनसे मजाक में उलझा रहे हो।’
फंदेबाज ने भी उनकी बात को अनसुना कर दिया, बल्कि वह आलोचक महाराज की तरफ हाथ उठाकर इशारा कर बताने लगा कि उसने उनका संदेश उनके शिकार तक पहुंचा दिया है। दीपक बापू ने आलोचक महाराज को देखा और फिर पीछे लौटकर उनके पास गये और बड़े आदर से बोले-‘आलोचक महाराज नमस्कार! बड़े भाग्य जो आपके दर्शन हुए।’
आलोचक महाराज ने उंगली से रुकने का इशारा किया और थूकने के लिये थोड़ी दूर गये और फिर लौटे और बोले-‘मालुम है कि तुम हमारी कितनी इज्जत करते हो! हमारी पीठ पीछे तुम्हारी बयानीबाजी भी हम तक पहुंच जाती है। अगर हमारी इज्जत कर रहे होते तो तुम इस कदर फ्लाप नहीं हुए होते। इतने साल हो गये लिखते हुए पर इतनी अक्ल नहीं आयी कि जब तक हम जैसों की सेवा नहीं करोगे तब लेखन जगत में अपना नाम नहीं कमा सकते। घिसो अपनी उंगलियां, देखते हैं कब तक घिसते हो?’
दीपक बापू बोले-‘‘आपका कहना सही है पर अपनी रोटी की जुगाड़ के पास इतना समय भी बड़ा मुश्किल से मिल पाता है कि लिखें। अब या तो हम लिखें नहीं या फिर पुराने लिखे को लेकर इधर उधर डोलते फिरें कि ‘भईये, हमारा लिखा हुआ पढ़ो और छापो, नहीं पढ़ते तो हमसे सुनो’। आपकी सेवा का सुअवसर हमें कभी कभार ही मिल पाता है। अब आप ही बताईये कि क्या करें कि हमारा जीवन धन्य हो जाये!’
आलोचक महाराज बोले-‘अभी तो हमारी सेवा नहीं करनी पर एक सम्मेलन हो रहा है। तीन दिन तक चलेगा। अब तुम तो जानते हो कि आजकल धूल कितनी है। इसलिये हर दिन कुर्सियों की झाड़ पौंछ के लिये कपड़ा चाहिये। हमने सोचा तुम्हारे यहां पुरानी धोतियां होंगी। वह जरा भिजवा देना।’
इससे पहले दीपक बापू कुछ बोलते, बीच में फंदेबाज बोल पड़ा-‘महाराज, कुछ सम्मेलन की इज्जत का ख्याल भी करो। यह धोती पहनते हुए उसका कचूमर निकाल देते हैं। वह इतनी पुरानी है कि धूल के कण क्या हटेंगे, बल्कि उनकी मार से इनकी धोती के टुकड़े होकर गिरने लगेंगे।’
आलोचक महाराज ने फंदेबाज की तरफ गुस्से में देखा और कहा-‘देखो, हम तुम्हारे बारे में इतना ही जातने हैं कि तुम इसके ऐसे दोस्त हो जो अनेक बार इनकी टोपी उछालते हो जिससे व्यथित होकर यह हास्य कवितायें लिखते हैं। यह धोती खींचने वाला काम हमारे सामने मत करो। यह काम केवल हमारा है।’’
दीपक बापू बोले-‘महाराज, अब आप इसे छोड़े। मैं आपको एक नहंी पंद्रह धोतियां भिजवा दूंगा। कुछ पुरानी टोपियां भी रखी हैं। वह इस काम में लेना।’
आलोचक महाराज बोले-‘‘‘फिर तुमने हमारे साथ चालाकी की! धोती को देखकर कोई नहीं पूछेगा कि वह कहां से आयी? टोपी देख कर कोई भी सवाल कर सकता है तब तुम्हारा नाम पता चल जायेगा। इस तरह तुम अपना नाम कराना चाहते हो।’
दीपक बापू हंसकर बोले-‘क्या बात करते हैं महाराज! हमने कभी आपके साथ क्या किसी के साथ भी चालाकी की है? आपके पास प्रमाण हो तो बता दें। कब है सम्मेलन?’’
आलोचक महाराज बोले-तीन बाद है! पर तुम क्यों पूछ रहे हो? क्या वहां आकर लोगों कों बताओगे कि तुम्हारी पुरानी धोतियां झाड़ने पौंछने के लिये यहां लायी गयी हैं। ऐ भईये, तुम उधर झांकना भी मत, चाहे धोतियां दो या नहीं। भई, हमने तो यह सोचा कि चलो सम्मेलन वालों का भी काम हो जाये और तुम्हारे घर का सामान भी ठिकाने लग जाये। वैसे पुरानी धोतियों का होता भी क्या है? उन पर तो पुराने कपड़े लेने वाले कोई सामान भी नहीं देते। इस तरह तुम्हारे घर की भी सफाई हो जायेगी।’
फंदेबाज को अपना अपमान बहुत बुरा लगा था और बाद में दीपक बापू उसकी हंसी न उड़ायें इसलिये आलोचक महाराज से प्रशंसा पाने की गरज से बोला-’आप कहें तो वहां अपनी पुराने पैंट शर्ट भी भिजवा दूं।’
आलोचक महाराज ने कहा-‘तुमसे कहा था न कि चुप रहो! अरे, यह पैंट शर्ट सामा्रज्यवाद की पहचान है, जिसे अंग्रेज यहां छोड़ गये। हम तो कुर्ता पायजामा वाले ठेठ सभ्य भारतीय हैं। तुम मसखरी मत करो।’
इधर दीपक बापू ने उनसे कहा-‘मसखरी तो आप हमसे कर रहे है। हमने भला उस सम्मेलन में आने की बात कब कही? अरे ऐसे सम्मेलन थकेले, बुझेले, अकड़ेले और अठखेले लोगों के मिलन को ही कहा जाता हैं। हम इस श्रेणी में नहीं आते। लेखन हमारा व्यवसाय नहीं शौक है! आपको पुरानी धोतियां भिजवा देंगे। नमस्कार, अब चलता हूं।’
दीपक बापू चल पड़े तो पींछे से फंदेबाज भी आ गया और बोला-‘चलो, दीपक बापू। उन आलोचक महाराज ने आपको दुःखी किया इसलिये मेरा दायित्व बनता है कि आपको स्कूटर बिठाकर ले चलूं।’
दीपक बापू बोले-‘उन आलोचक महाराज ने हमारी टोपी बख्श दी, यही हमारे लिये बहुत है। अब तुम भी रास्ता नापो। अपनी टोपी हम खुद बचा लेंगे।’
फंदेबाज बोला-‘ठीक है, पर यह थकेले, बुझेले, अकड़ेले, और अठखेले लोगों से क्या आशय था?
‘नहीं मालुम!’यह कहते हुए दीपक बापू आगे बढ गये-‘अब यह कभी अगली किश्त में बतायेंगे जब तुम हमारी टोपी पर संकट पैदा करोंगे?’
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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Thursday, September 17, 2009

खामोशी-हिंदी शायरी (khamoshi-hindi shayri)

बिकते हैं सपने बीच बाजार
कहीं नकदी कहीं उधार
खरीदने वाले भी कम नहीं हैं।
नारे सुनकर करते अपना काम
चुकाते जाते अपनी जेब से दाम
कामयाबी मिल जाये तो
सौदागरों की तारीफ में गीत गाते
नाकाम होने वाले भी कम नहीं हैं।


अपने सपने टूटने के साथ ही
लोग भी टूट जाते
गैर क्या अपनों को ही दूर पाते
आंसु बहा नहीं पाती उनकी लाचार आंखें
पत्थर जैसे चेहरे पर छायी खामोशी
देखकर लगता
जैसे उनको कोई गम नहीं है।
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Monday, September 07, 2009

फिल्में नहीं देखोगे तो बहादुर बनोगे-हास्य व्यंग्य (hindi film and breveness-hindi hasya vyangya)

पिछले दो तीन दिनों से टीवी पर बच्चों की बहादुरी के किस्से आ रहे हैं। एक लड़की अपहर्ताओं को चकमा देकर भाग निकली। चलती ट्रेन में डकैती करने वालों को बच्चों ने भागने के लिये बाध्य किया। कुछ और भी घटनायें सामने आ रही हैं। आगे भी ऐसी ही घटनायें आयेंगी और आप देखना वह समय आने वाला है जब भ्रष्टाचारी और अनाचारी लोगों को हमारी कौम के युवा ही सबक सिखायेंगे बस जरूरत इस बात की है कि उनको नैतिक समर्थन मिलना चाहिये।

यह सोचकर लोग सोच रहे होंगे कि आखिर इस निराशाजनक वातावरण के बीच यह आशा की किरण कौन निरर्थक जगा रहा है? सोचने का अपना तरीका होता है पर कोई बात है जो मन में होती है पर हम उसे स्वयं नहीं देख पाते। दरअसल आज की नयी पीढ़ी मनोरंजन के लिये हिंदी फिल्मों पर निर्भर नहीं है। आजकल के सभी बच्चे-जो कभी युवा तो होंगे-हिंदी फिल्में नहीं देखते और यकीनन जो नहीं देखेंगे वह बहादुर बनेंगे, यह हमारा दावा है। अगर आज की सक्रिय पीढ़ी को देखें तो वह कायरों जैसी लगती है और इसका कारण है फिल्में। इसने उस दौर की फिल्में देखी हैं जब मनोंरजन का वह इकलौता साधन था और जो कायरता का बीच बो रही थीं। सामने कोई भी हो पर इनके पीछे के प्रायोजक सही नीयत के लोग नहीं थे और उनका हित समाज को कायर बनाने में था। यहां तक कि कलात्मक फिल्मों के नाम पर ऐसी कायरता समाज में बोई गयी।
एक फिल्म में नायिका को निर्वस्त्र किया गया और बाकी लोग हतप्रभ होकर देख रहे थे। दृश्य मुंबई के किसी मोहल्ले का था। कहने को निर्देशक कह रहे थे कि हम तो वही दिखा रहे हैं जो समाज में होता है पर यह सरासर झूठ था। उस समय तक यह संभव नहीं था कि किसी छोटे शहर में कोई शोहदा ऐसी हरकत करे और सभी लोग उसे नकारा होकर देखें।
अनेक फिल्मों में ईमानदारी पुलिस इंस्पेक्टर का पूरा का पूरा परिवार का सफाया होते दिखाया गया। आज आप जिस शोले, दीवार और जंजीर फिल्मो की बात सोचें तो वह मनोरंजन से अधिक समाज को कायर बनाने के लिये बनायी गयीं। संदेश यह दिया गया कि अगर आप एक आम आदमी हो तो चुपचाप सभी झेलते जाओ। नायक बनना है तो फिर परिवार के सफाये के लिये मन बनाओ।
सच बात तो यह है कि सभी पुलिस वाले भी ऐसे नहीं थे जैसे इन फिल्मों में दिखाये गये। पुलिस हो या प्रशासन आदमी तो आदमी होता है जब समाज के अन्य लोगों पर बुरा प्रभाव पड़े तो वह इससे बच जाये यह संभव नहीं है। इसलिये उस समय जो बच्चे थे वह जब सक्रिय जीवन में आये तो कायरता उनके साथी थी।

इस संबंध में पिछले साल की टीवी पर ही दिखायी गयी एक घटना याद आ रही है जब बिहार में एक स्त्री को निर्वस्त्र किया जा रहा था तब लोग नकारा होकर देख रहे थे। तब लगने लगा कि समाज पर हिंदी फिल्मों ने अपना रंग दिखा दिया है। इधर हमारे टीवी चैनल वाले भी इन फिल्मों के रंग में रंगे हैं और वह ऐसे अवसरों पर ‘हमारा क्या काम’ कर अपने फोटो खींचते रहते हैं।
आजकल की सक्रिय पीढ़ी बहुत डरपोक है। फिल्म के एक हादसे से ही उस पर इतना प्रभाव पड़ता रहा है कि हजारों लोग भय के साये में जीते हैं कहीं किसी खलनायक से लड़ने का विचार भी उनके मन में नहीं आता।
सच बात तो यह है कि इन फिल्मों का हमारे लोगों के दिमाग पर बहुत प्रभाव पड़ता रहा है और आज की पीढ़ी के सक्रिय विद्वान अगर यह नहीं मानते तो इसका मतलब यह है कि वह समाज का विश्लेषण नहीं करते। फिल्मों के इसी व्यापाक प्रभाव का उनसे जुड़े लोगों ने अध्ययन किया इसलिये वह इसके माध्यम से अपने ऐजंेडे प्रस्तुत करते रहे हैं। अगर आप थोड़ा बहुत अर्थशास्त्र जानते हैं और किसी व्यवसाय में रहे हों तो इस बात को समझ लीजिये कि इसका प्रायोजक फिल्मों से पैसा कमाने के साथ ही अपने ऐजेंडे इस तरह प्रस्तुत करता है कि समाज पर उसका प्रभाव उसके अनुकूल हो। आपको याद होगा जब देश आजाद हुआ तो देशभक्ति के वही गाने लोकप्रिय हुए जो फिल्मों में थे। फिर तो यह आलम हो गया कि हर फिल्में एक गाना देशभक्ति का होने लगा था। फिर होली, दिवाली तथा राखी के गाने भी इसमें शामिल हुए और उसका प्रभाव पड़ा।
अगर आप कोई फिल्म में देखें तो उसका विषय देखकर ही आप समझ जायेंगे कि उसके पीछे कौनसा आर्थिक तत्व है। हमने तो यही आंकलन किया है कि जहां से पैसा आ रहा है उसकी हर कोई बजा रहा है। आजकल के संचार माध्यमों में तमाम तरह के प्रसारण देखकर इस बात को समझ लेते हैं कि उनके आर्थिक स्त्रोत कहां हैं। यह जरूरी नहीं है कि किसी को प्रत्यक्ष सहायता दी जाये बल्कि इसका एक तरीका है ‘विज्ञापन’। इधर आप देखें तो अनेक धनपतियों -जिनको हम आज के महानायक भी कहते सकते हैं-के अनेक व्यवसाय हैं। वह क्रिकेट और फिल्मों से जुड़े हैं तो उनको इस बात की आवश्यकता नहीं कि आत्मप्रचार के लिये सीधे पैसा दें बल्कि उनसे अप्रत्यक्ष रूप से विज्ञापन पाने वाले उनका प्रचार स्वतः करेंगे। उनका जन्म दिन और मंदिर में जाने के दृश्य और समाचार स्वतः ही प्रस्तुत संचार माध्यमों में चमकने लगते हैं। फिर उनके किसी एक व्यवसाय के विज्ञापन से मिलने वाली राशि बहुत अच्छी हो तो उनके दूसरे व्यवसाय का भी प्रचार हो जायेगा।
हमने तो आत्मंथन किया है और अपने मित्रों से भी कई बार इस बात पर चर्चा की और सभी इस बात पर सहमत थे कि इन फिल्मों के माध्यम से समाज को कायर, लालची और अहंकारी बनाया गया है। वह इस बात को भी मानते हैं कि हो सकता है कि यह ऐजेंडा समाज को अपने चंगुल में रखने के प्रयास के उद्देश्य से ही हुआ हो। बहरहाल बच्चों की बहादुरी देखकर यह मन में आया कि यकीनन अब फिल्मों का इतना प्रभाव नहीं है और यकीनन उन बच्चों में हिंदी फिल्मों द्वारा पैदा किया जाने वाला कायरता का भाव उनमें नहीं जम पाया है। यह भाव इस तरह पैदा होता है कि एक चाकू पकड़े बदमाश भी इतना खतरनाक ढंग से पेशा आता है कि बाकी सभी लोग सांस थामें उसे देखते हैं तब तक, जब तक कोइ नायक नहीं आ जाता। इन फिल्मों पर यह आरोप इसलिये भी लगता है कि क्योंकि अधिकतर फिल्मों में खलनायक को लोगों का गोलियों से सीना छलनी करते दिखाने के बाद जब नायक से उसकी मुठभेड़ होती है तो वह लात घूंसों में दिखती है-कभी ऐसा नहीं दिखाया गया कि नायक पिस्तौल लेकर पहुंचा हो और पीछे से खलनायक को मारा हो। अपराधी खतरनाक, चालाक और अजेय होते हैं पर उतने नही जितने फिल्मों में दिखाया गया। ऐसे बहादुर बच्चों को सलाम। आजकल के बच्चों को तो बस हमारी यही शिक्षा है कि सब देखो। श्लील हो या अश्लीन वेबसाईट या फिल्म! सब चलेगा! मगर यह हिन्दी फिल्में मत देखना वरना कायरों की तरह जियोगे। जिन माता पिता को अपने बच्चे बहादुर बनाने हैं वह फिल्मों से अपने बच्चों को बचायें चाहे वह अंग्रेजी की हों-आखिर हिंदी फिल्में भी उनकी नकल होती हैं।
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Monday, August 31, 2009

गमों के शेर-हिंदी कविता (gamon ke sher-hindi sahityak kavita)

बेजान चीजों के इश्क ने
अपने ही रिश्तों में गैर का अहसास
घोल दिया है।
किसी से दिल लगाना बेकार लगता है
दोस्ती को मतलब से तोल दिया है।
हर तरफ चलती है मोहब्बत की बात
आती नहीं कभी चाहने की रात
सुबह से शाम तक
तन्हा गुजारता इंसान
तड़ता है अमन के पलों के लिये
जिसने शायरों के लिये
गमों के शेर लिखकर
वाह वाही लूटने का रास्ता खोल दिया है।

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Wednesday, May 06, 2009

बेकद्रों की महफिल में मत जाना-हिंदी शायरी

बेकद्रों की महफिल में मत जाना
बहस के नाम पर वहां बस कोहराम मचेगा
पर कौन, किसकी कद्र करेगा।
मुस्कराहट का मुखौटा लगाये सभी
हर शहर में घूम रहे हैं
जो मिल नहीं पाती खुशी उसे
ढूंढते हुए झूम रहे हैं
दूसरे के पसीने में तलाश रहे हैं
अपने लिये चैन की जिंदगी
उनके लिये अपना खून अमृत है
दूसरे का है गंदगी
तुम बेकद्रों को दूर से देखते रहकर
उनकी हंसी के पीछे के कड़वे सच को देखना
दिल से टूटे बिखरे लोग
अपने आपसे भागते नजर आते हैं
शोर मचाकर उसे छिपाते हैं
उनकी मजाक पर सहम मत जाना
अपने शरीर से बहते पसीने को सहलाना
दूसरा कोई इज्जत से उसकी कीमत
कभी तय नहीं करेगा।

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