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Wednesday, May 26, 2010

आधुनिक युग का मूलमंत्र-हिन्दी शायरी (adhunik yug ka mulmantra-hindi shayari)

गरीबी हटाओ,
धर्म बचाओ
और चेतना लाओ
जैसे नारों से गुंजायमान है
पूरा का पूरा प्रचार तंत्र।
चिंतन से परे,
सुनहरी शब्दों से नारे भरे,
और वातानुकूलित कक्ष में
वक्ता कर रहे बहस नोट लेकर हरे,
खाली चर्चा,
निष्कर्ष के नाम पर काले शब्दों से सजा पर्चा,
प्रचार के लिये बजट ठिकाने के लिये
करना जरूरी है खर्चा,
भले ही आम आदमी हाथ मलता रहे,
मगर बाज़ार का काम चलता रहे,
सौदागर का खाता फलता रहे,
नयी सभ्यता का यही है अर्थतंत्र।
पैसे के लिये जीना,
पैसे लेकर पीना,
पैसा चाहिए बिना बहाऐ पसीना,
आधुनिक युग का यही है मूलमंत्र।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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Sunday, April 25, 2010

गरीब देश की पहचान मिटाने का विकल्प-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (gareeb desh ki pahachan mitane ka sankalp-hindi vyangya kavitaen)

देश की गरीबी ऐसी पहेली है
जिसे वह बूझ रहे हैं।
इसलिये वह बना रहे हैं नये राजा महाराजा,
बजायेंगे शराब पीकर और जुआ खेलकर
जो दुनियां के सामने तरक्की का बाजा,
उनके रहने के वास्ते
मशहूर जगहों पर
महल बनाने की तैयारी में
गरीबों को अपनी झौंपड़ियों समेत
दूरदराज इलाके में
खदेड़ने के लिये जूझ रहे हैं।
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देश की गरीबी मिटाने के लिये
उन्होंने लिया है संकल्प,
इसलिये चुना है गरीब को उजाड़कर
अमीर को चौराहे पर बसाने का विकल्प।
गरीब जनसंख्या में ज्यादा है, कहां तक उनको बचायेंगे,
फिर अहसान मानने के अलावा
वह भला किस काम आयेंगे,
जिनके महल बनने से शहर चमके
रहेगी देश की पहचान अमीर बनके,
जो चढ़ावें हर सौदे पर चढ़ावा,
मुफ्त में काम करने का न होने देते पछतावा,
सभी समाजसेवकों की है
ऐसे अमीरों के साथ की चाहत
जो संख्या में हों भले ही होते अल्प।
क्योंकि वही हैं गरीब देश की
पहचान मिटाने का विकल्प।
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Monday, March 29, 2010

नायक और खलनायक-व्यंग्य कवितायें (nayak aur khalnayak-hindi vyangya kavitaen)

धोखे, चाल और बेईमानी का
अपने दिमाग में लिये
बढ़ा रहे हैं वह अपना हर कदम,
अपनी जुबान से निकले लफ्ज़ों
और आंखों के इशारो से
जमाने का भला करने का पैदा कर रहे वहम।
भले वह सोचते हों मूर्ख लोगों को
पर हम तोलने में लगे हैं यह कि
कौन होगा उनमें से बुरा कम,
किसे लूटने दें खजाना
कौन पूरा लूटेगा
कौन कुछ छोड़ने के लिये
कम लगायेगा दम।
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अपने को नायक दिखाने के लिये
उन्होंने बहुत सारे जुटा लिये
किराये पर खलनायक,
अपने गीत गंवाने के लिये
खरीद लिये हैं गायक।
यकीन अब उन पर नहीं होता
जो जमाने का खैरख्वाह
होने का दावा करते हैं
अपनी ताकत दिखाने के लिये
बनते हैं मुसीबतों को लाने में वही सहायक।
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Thursday, March 25, 2010

ख्यालों के खेल में-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (khyalon ke khel men-hindi satire poem)

खुद रहे जो जिंदगी में नाकाम
दूसरों को कामयाबी का
पाठ पढ़ा रहे हैं।
सभी को देते सलीके से काम करने की सलाह,
हर कोई कर रहा है वाह वाह,
इसलिये कागज पर दिखता है विकास,
पर अक्ल का हो गया विनाश,
एक दूसरे का मुंह ताक रहे सभी
काम करने के लिये
जो करने निकले कोई
उसकी टांग में टांग अड़ा रहे हैं।
ऐसे कर
वैसे कर
सभी समझा रहे हैं।
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अपने अपने मसलों पर
चर्चा के लिये उन्होंने बैठक बुलाई,
सभी ने अपनी अपनी कथा सुनाई।
निर्णय लेने पर हुआ झगड़ा
पर तब सुलह हो गयी,
जब नाश्ते पर आने के लिये
आयोजक ने अपनी घोषणा सुनाई।
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तंग सोच के लोग
करते हैं नये जमाने की बात,
बाहर बहती हवाओं को
अपने घर के अंदर आने से रोकते,
नये ख्यालों पर बेबात टोकते,
ख्यालों के खेल में
कर रहे केवल एक दूसरे की शह और मात।
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Friday, July 31, 2009

कोई फरिश्ता आयेगा-हिंदी शायरी (koi farishta ayega-hindi shayri)

अपनी सुरक्षा स्वयं नहीं की तो
कोई दूसरा आकर क्यों करेगा।
अपने घाव पर मरहम नहीं लगाया तो
दूसरा कौन आकर दर्द दूर करेगा।
भलाई के नारे सुनकर मत बहकना
बिकती है बाजार में
मिलेगी तभी जब उसके दाम भरेगा।
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जब बाजार में ख्याल
सच बनकर बिक जाते हों
वहां खरीददार पर तरस तो आयेगा।
टूटते बिखरते जज्बात
अन्याय और आंतक की सहते लात
लोग झेल रहे हैं इस इंतजार में
उनका बचाने कोई आकाश से आयेगा।
हाथ पांव होते लाचार
बुद्धि होते हुए भी नहीं आता विचार
आकाश की तरफ ताक रहे खिलौने की तरह
इस उम्मीद में कि
उनको चलना सिखाने कोई फरिश्ता आयेगा।

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Tuesday, July 21, 2009

नजर और नजरिया-हिन्दी शायरी (nazar aur nazariya-hindi shayri)

अपनी पीर किसे दिखाऊं
हर शख्स आकंठ डूबा है
अपनी ही तकलीफों में
किसको अपना समंदर दिखाऊं।

लोगों के नजर और नजरिये में
इतना फर्क आ जाता है
जो सोचते और देखते है
अल्फाजों में बयां दूसरा ही बन जाता है
सुनते कुछ हैं
समझ में कुछ और ही आता है
पहले उनको अपना दर्द दिखाऊं
या इलाज करना सिखाऊं

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Friday, April 10, 2009

हरी दूब पर जो पांव चलते, रेत पर बुरी तरह जलते-हिन्दी शायरी

हरियाली के कायदे कभी
रेगिस्तान में नहीं चलते।
हरी दूब में चलते हों जो पांव
रेत की धरती पर बुरी तरह जलते।

जमीन के अपने है कायदे
पर इंसान ने अपने उसूल नये बना लिये
आसमान में देखता है फरिश्ते
अपनी अक्ल के चिराग बुझा दिये
हरियाली में मिलते हैं हाथी
कहां मिलेंगे वह रेत के समंदर में
जहां रेगिस्तान के जहाज ऊंट पलते।

इठलाते हैं वह पहाड़
जिनको साथ हिमालय का मिला है
वह हरियाली और जल के स्त्रोतों में नहाते
बसंत और वर्षा में खुशी के गीत गाते
सूखी धरती पर रेत के ढेरों को
नहीं नसीब पानी की बूंद
फिर भी उनको न शिकवा न गिला है
अपने हालातों में सभी यूं ही ढलते।

पर इंसानों को चैन नहीं
रेतीली जमीन पर हरियाली
और पेड़ पौद्यों से सजी धरती पर
रेगिस्तान के कायदे चलाने के लिये
करता है लड़ाई
ताकि हो उसकी बड़ाई
अपनी ताकत दिखाने के लिये उनके दिल मचलते।

इस धरती पर बदलाव की
धारा लाकर अपने इंसान होने का
सबूत देने के लिये
अपने दिमाग घमंड से सिल दिये
इंसान को मिली है अक्ल
दिखाये उसकी ताकत उसे चैन नहीं आता
मिसाल जमती हो या नहीं
हर कोई एक दूसरे पर थोप कर इतराता
रेगिस्तान में पीपल का पेड़ नहीं बो सकता
इसलिये हरियाली में खुजूर का पेड़ लगाता
तेल से कर रहा है अपनी दुनियां रौशन
जानता है कि पानी के बिना जिंदगी नहीं हेाती
फिर भी उसकी परवाह नहीं
जमीन के हर हिस्से के
अपने होते अलग कायदे
जिन पर चलकर ही होते हैं फायदे
पर उधार की अक्ल पर चलने वाले
इंसानों में अकड़ बहुत है
ला नहीं सकते जो अपने घर में अमन
सह नहीं पाते खामोश चमन
इसलिये उसे उजाड़ने के लिये
बना लेते हैं अपने कायदे
लड़ते हैं उनका नाम लेकर जंग
जिसमें शहर और घर जलते हैं।

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