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Thursday, January 05, 2012

रूह और दिल-हिन्दी हाइकू (rooh aur dil-hindi hique)

सुंदरता की
पहचान किसे है
सभी भ्रमित,

दरियादिली
किसे कैसे दिखाएँ
सभी याचक,

वफा का गुण
कौन पहचानेगा
सभी गद्दार,

खाक जहाँ में
फूलों की कद्र कहाँ
सांस मुर्दा है,

बेहतर है
अपनी नज़रों से
देखते रहें,

खुद की कब्र
खोदते हुए लोग
तंगदिली में,

भरोसा तोड़ा
जिन्होने खुद से
ढूंढते वफा,

उन चीजों में
जो दिल को छूती हैं
रूह को  नहीं,

उनके दाम
सिक्कों में नपे हैं
दिल से नहीं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Wednesday, May 26, 2010

आधुनिक युग का मूलमंत्र-हिन्दी शायरी (adhunik yug ka mulmantra-hindi shayari)

गरीबी हटाओ,
धर्म बचाओ
और चेतना लाओ
जैसे नारों से गुंजायमान है
पूरा का पूरा प्रचार तंत्र।
चिंतन से परे,
सुनहरी शब्दों से नारे भरे,
और वातानुकूलित कक्ष में
वक्ता कर रहे बहस नोट लेकर हरे,
खाली चर्चा,
निष्कर्ष के नाम पर काले शब्दों से सजा पर्चा,
प्रचार के लिये बजट ठिकाने के लिये
करना जरूरी है खर्चा,
भले ही आम आदमी हाथ मलता रहे,
मगर बाज़ार का काम चलता रहे,
सौदागर का खाता फलता रहे,
नयी सभ्यता का यही है अर्थतंत्र।
पैसे के लिये जीना,
पैसे लेकर पीना,
पैसा चाहिए बिना बहाऐ पसीना,
आधुनिक युग का यही है मूलमंत्र।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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Wednesday, March 11, 2009

अपना कदम पीछे हटाया-व्यंग्य कविता

नकली चेहरा लोग लगा लेते हैं।
पर रंग भी असली कहां आते
इसलिये ही नकली रंग से होली मना लेते हैं।

होली पर ही नहीं होते चेहरे रंगीन
यहां तो हर रोज लोग
खुद ही रंग लगा लेते हैं
आदमी की पहचान चेहरे से नहीं
दिल की नीयत से होती है
कोई झांक कर न देखे अंदर
इसलिये लोग रोज
देखने वालों को रंग से बरगला देते हैं।
.......................
उनके चेहरे पर वैसे ही रंग
बहुत लगे थे
इसलिये अपना रंग जाया न करने का
ख्याल हमारे दिल में आया।

उनके पास भी बहुत रंग थे
हमारे साफ चेहरे पर लगाकर
तरस न खायें
अपनी उदारता का अहंकार न जताये
उनसे पहले किसी ने हमसे होली खेली नहीं
इसकी अनुभूति न करायें
इसलिये हमने उनके दरवाजे से ही
अपना कदम पीछे हटाया।

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Thursday, February 26, 2009

अपनी मुट्ठी में पानी भरते बारंबार-हिंदी शायरी

एक से सौ
सौ से हजार
हजार से लाख
करोंड़ों की दौलत का इंसान ने लगा लिया अंबार
नहीं है उसे सुख की अनुभूति, बैचेनी है अपार।
जिन शयों को पुराना होना है
अपने सामने
उनके पीछे दौड़ रहे हैं लोग
लोगों के पीछे दौड़ रहे रोग
अंधे कुऐं में इधर उधर टकराकर
लोग ढूंढ रहे खुशियां
फिसल जायेगा थोड़ी देर में हाथ से
फिर भी इंसान
अपनी मुट्ठी में पानी भरते बारंबार

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