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Tuesday, October 11, 2011

कद्रदान-हिन्दी शायरी (kadradan-hindi shayari or poem)

उनकी जुदाई के गम में
कभी हमने आँसू नहीं बहाये
भले ही उनको देखने के लिए तरसते रहे,
मगर टूटा आसमान सिर पर
जब पता चला कि
वह दूसरों की बाहों में
बाहर बनकर बरसते रहे।
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खामोशी के बड़ा दोस्त
बहुत ढूँढने पर भी नहीं मिला,
सच बोले तो लोग बने दुश्मन
झूठ बोले तो हुआ जमाने में गिला।
फिर भी कोई शिकायत नहीं हैं
इस जहाँ में
भला कब किसे
अपनी जुबान से निकले लफ्जों का कद्रदान मिला।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Monday, June 13, 2011

बदलाव-हिन्दी शायरी (badlav-hindi shayri)

जमाने को बदल देंगे
यह ख्याल अच्छा है
पर कोई चाबुक नहीं
किसी इंसान के पास
जिससे दूसरे का ख्याल बदल दे।
अमीरी खूंखार ख्याल लाती है,
कहर बरपाने के कदमों में
ताकत का सबूत पाती है,
गरीबी मदद के लिये
भटकाती है इधर से उधर,
दरियादिली के इंतजार में खड़े टूटे घर,
न बदलती किस्मत
न होती हिम्मत
बस उम्मीद जिंदा रहती है कि
शायद कोई हालात बदल दे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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Friday, September 04, 2009

कल्पनातीत-हिंदी शायरी (Unthinkable - Hindi poetry)

बरसात में सड़क पर चलते हुए
जब पानी से भरे छोटे छोटे समंदर
और कीचड़ के पहाड़ों से गिरता टकराता हूं।
तब याद आती है
सुबह अखबार में छपी तरक्की की खबरें
और उसे सभी में बांटने के लिये
शोर करते लोगों के जूलूस की फोटो याद
तब बरबस हंसी आ जाती है
उनको कल्पनातीत पाता हूं।
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Tuesday, July 21, 2009

नजर और नजरिया-हिन्दी शायरी (nazar aur nazariya-hindi shayri)

अपनी पीर किसे दिखाऊं
हर शख्स आकंठ डूबा है
अपनी ही तकलीफों में
किसको अपना समंदर दिखाऊं।

लोगों के नजर और नजरिये में
इतना फर्क आ जाता है
जो सोचते और देखते है
अल्फाजों में बयां दूसरा ही बन जाता है
सुनते कुछ हैं
समझ में कुछ और ही आता है
पहले उनको अपना दर्द दिखाऊं
या इलाज करना सिखाऊं

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Wednesday, June 24, 2009

चुभोने के लिये कांटे ढूंढ रहे हैं-व्यंग्य कविता

तुम लड़ना कभी बंद न करना
रुक जायेगी कलम हमारी वरना।
भाषा के तूणीर में तुम शब्द तीर भरकर
कागजी द्वंद्व करते हुए नायक बनना।
बाहर दर्शक बनकर देखेंगे तुम्हारा द्वंद्व
तुम्हारी अदाओं पर करेंगे कभी रचना।।
संकोच की कोई बात नहीं है लड़ने में
हर हालत में गुस्सा अपने अंदर भरना।
दुनियां के सारी सोच बनी है जंग पर
हम तो हैं दर्शक, तुम महायोद्धा बनना।
कुछ लोग रोऐंगे तुम्हारे हाल पर
कुछ हंसेंगे, तुम कभी परवाह न करना।
तलवार युग गया, तुम कलम वैसे चलाओ
लिखो लड़ने की तरह, हमें तो है पढ़ना।।
सच यह है तुमसे ही समझे अमन के फायदे
बीत जाती द्वंद्वों में अपनी जिंदगी भी वरना।
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कुछ नहीं देखा
कुछ नहीं सुना
कुछ नहीं बोला
देखो कितना अमन है।
फंसे हैं जो द्वंद्वों में,
फूलों को लेकर
किसी को तोहफे में देने की बजाय
चुभोने के लिये कांटे ढूंढ रहे है
उनके लिये अस्त्रागार
और हमारे लिये विश्रामगृह यह चमन है।

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Monday, March 30, 2009

भीड़ में अपना मुकाम तभी बनाओगे-हिंदी शायरी

कहीं समर्थन की माला चढ़ाओ
या फिर विरोधी चिंगारी जलाओ
नहीं तो बाजार से बाहर हो जाओगे।
भीड़ में जाकर छोर मचाओ
या जंगल में कहीं चले जाओ
खड़े देखते रहे खाली
तो कमअक्ल कहलाओगे।
बिक गयी है यहां सोच सभी की
किसी के गुलाम होकर पीछे चलो
या आजादी से अपने गीत गाओ
खामोश रहे तो गूंगे कहलाओगे।
दूसरे के दर्द पर हंसना नहीं
अपने गमों के जहर से किसी को डसना नहीं
किसी गरीब पर अपनी जुबां से
कभी फब्तियां कसना नहीं
अपने यकीन की राह से भटकना नहीं
जिंदगी के अपने उसूलों पर ही
खड़े करना अपनी कामयाबी की इमारत
तभी इस भीड़ में अपना मुकाम बनाओगे।
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खुश होने के लिये बहानों को
क्या ढूंढना
एक नहीं हजार मिलते हैं
खोल रखे हैं जिन्होंने अपने दिल के दरवाजे
वह खुशी के आने के इंतजार में
आखों की खिड़कियों पर लगाने के लिये
महंगे परदे नहीं सिलते हैं।

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Sunday, September 21, 2008

आत्ममुग्ध लोगों की कमी नहीं इस जमाने में-व्यंग्य कविता

अपने मूंह से अपनी तारीफ़

लोग कुछ इस तरह किये जाते हैं

जैसे दुनियां में उनके नाम के ही

सभी जगह कसीदे पढे जाते हैं

आत्म मुग्ध लोगों की कमी नहीं

इस जमाने में

तारीफ़ के काबिल लोग

इसलिये किसी के मूंह से

अपने लिये कुछ अच्छे शब्द सुनने को

तरस जाते हैं

शायद इसलिये ही

चमक रहे आकाश में कई नाम

गरीब लोगों की भलाई के सहारे

फ़िर भी गरीबी से सभी हारे

क्योंकि भलाई एक नारा है

जिसके पांव ज़मीं पर नज़र नहीं आते हैं
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उनका दिल समंदर है

इसलिये ही ज़माने भर का माल

उनके घर के अंदर है

ज़माने भर की भलाई का ठेका लेते हैं

सारी मलाई कर देते हैं फ़्रिज़

छांछ पिला देते हैं अपने ही गरीब चाकरों को

जो उनकी नज़र में पालतू बंदर हैं

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