Sunday, June 28, 2015

प्राचीन संस्कार नवीन पाखंड-हिन्दी कविता(prachin sanskar naivin pakhand-hindi poem)

न सोच न समझ
समाज सुधारने के अभियान
नारों के सहारे चला रहे हैं।

अंधेरे  से दूर रहकर
चमकदार इलाकों में
प्रकाश जला रहे हैं।

कहें दीपक बापू चिंत्तन करते
विक्रय योग्य आस्था के उत्पादक,
 प्रभावहीन हैं उनके वाक्य
शब्द जरूर है मादक,
प्राचीन संस्कारों में
नवीन पाखंड ढला रहे हैं।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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