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Thursday, September 08, 2016

भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन -हिन्दी हास्य कविता (Anti Corruption Movement-Hindi Comedy Poem)

आज हमेें एक कविता हमारे ही एक फेसबुकिए साथी की दीवार पर चिपकी मिल गयी। यह कम से 4-5 चार बरस पहले हमने ब्लाग पर लिख थी ऐसा लगा कि यह आज भी प्रासंगिक है। उसे यहां हम फिर प्रकाशित कर रहे हैं।
-दीपक ‘भारतदीप’
भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन
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समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
शामिल मत हो जाना,
वरना पड़ेगा पछताना।
बंद हो जायेगा मिलना कमीशन,
रद्द हो जायेगा बालक का
स्कूल में हुआ नया एडमीशन,
हमारे घर का काम
ऐसे ही लोगों से चलता है,
जिनका कुनबा दो नंबर के धन पर पलता है,
काले धन की बात भी
तुम नहीं उठाना,
मुश्किल हो जायेगा अपना ही खर्च जुटाना,
यह सच है जो मैंने तुम्हें बताया,
फिर न कहना पहले क्यों नहीं समझाया।’
सुनकर समाज सेवक हंसे
और बोले
‘‘मुझे समाज में अनुभवी कहा जाता है,
इसलिये हर कोई आंदोलन में बुलाता है,
अरे,
तुम्हें मालुम नहीं है
आजकल क्रिकेट हो या समाज सेवा
हर कोई अनुभवी आदमी से जोड़ता नाता है,
क्योंकि आंदोलन हो या खेल
परिणाम फिक्स करना उसी को आता है,
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
मेरा जाना जरूरी है,
जिसकी ईमानदारी से बहुत दूरी है,
इसमें जाकर भाषण करूंगा,
अपने ही समर्थकों में नया जोशा भरूंगा,
अपने किसी दानदाता का नाम
कोई थोडे ही वहां लूंगा,
बस, हवा में ही खींचकर शब्द बम दूंगा,
इस आधुनिक लोकतंत्र में
मेरे जैसे ही लोग पलते हैं,
जो आंदोलन के पेशे में ढलते हैं,
भ्रष्टाचार का विरोध सुनकर
तुम क्यों घबड़ाती हो,
इस बार मॉल में शापिंग के समय
तुम्हारे पर्स मे ज्यादा रकम होगी
जो तुम साथ ले जाती हो,
इस देश में भ्रष्टाचार
बन गया है शिष्टाचार,
जैसे वह बढ़ेगा,
उसके विरोध के साथ ही
अपना कमीशन भी चढ़ेगा,
आधुनिक लोकतंत्र में
आंदोलन होते मैच की तरह
एक दूसरे को गिरायेगा,
दूसरा उसको हिलायेगा,
अपनी समाज सेवा का धंधा ऐसा है
जिस पर रहेगी हमेशा दौलत की छाया।’’

Saturday, July 09, 2016

नयी चाहत-हिन्दी कविता (Nayi Chahat-HindiPoem)

जीवन पथ पर
सहयात्री की खोज
आंखे करती हैं।

बहुत नरमुंड मिलते
उनकी इच्छायें ही साथी
हमेशा आहें भरती हैं।

कहें दीपकबापू याद में
किसे बसाकर
अपना दिल बहलाते
हृदय की भावनायें
नयी चाहत पर मरती है।
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Saturday, June 18, 2016

कांचघर के निवासी-हिन्दी कविता (Men Of GlassHouse-Hindi Poem)


देवता बनने की के प्रयास में
इंसान बड़े अपराध भी
कर जाते हैं।

भय के प्रसाद बांटकर
पुण्य के सागर में
तर जाते हैं।

कहें दीपकबापू नये जमाने में
पहरेदारों के आसरे
कांचघर के निवासी
राहगीरों पर फैंकते पत्थर
घायल मौन पीड़ा लेकर
घर जाते हैं।
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