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Saturday, January 03, 2009

बाजार से धर्म बना या धर्म से बाजार-आलेख

धर्म यानि क्या? आप भारतीय पौराणिक ग्रंथों को अगर पढ़ते हैं तो उसका सीधा आशय आचरण से है पर उनमें किसी का नाम नहीं है। ‘हिंदू’ शब्द हमारे धर्म से जुड़ा है पर जिन पौराणिक ग्रंथों को हम अपना पूज्यनीय मानते हैें उनमें इसी शब्द की चर्चा कहीं नहीं हैं। भक्ति काल-जिसे हिंदी भाषा का स्वर्णकाल भी कहा जाता है-कहीं हिंदू शब्द का उपयोग हुआ हो कम से हम इस लेखक को तो पता नहीं। रहीम,कबीर,मीरा,सूर,और तुलसी ने हिंदू शब्द का उपयोग धर्म के रूप में किया हो यह जानकारी भी इस लेखक को नहीं है।

आजकल हिंदू धर्म को लेकर जब बहस होती है तो ऐसा लगता है कि जैसे वह बहस कहीं सतही विचारों पर केंद्रित है और उसमें गहन सोच नहीं है। बहरहाल जब सभी धर्मों को हम देखें तो ऐसा लगता है कि उनका अध्यात्म से कम बाजार से अधिक संबंध है। बाजार यानि उन लोगों का समूह जो व्यापार आदि कर अपना जीवन यापन करता है और जो इसके लिये भाषा,जाति,क्षेत्र और वर्ण के साथ ही सर्वशक्तिमान के स्वरूप का उसके मानने वाले समाजों और समूहों के हिसाब से ख्याल रखते हें। आखिर मूर्तियां,स्टीकर,छल्ले,कापियां, और पैन बेचने वाले व्यापारी होते हैं और उनकी दिलचस्पी इस बात में होती है कि उनके पास आने वाला ग्राहक किस बात से प्रभावित होगा।’

वही दावपैंच आजमा कर अपनी वस्तूओं को बेचते हैं और गरीब उत्पादक को इस बात के लिये बाध्य या प्रेरित करते हैं कि अपने उत्पाद को बाजार में बेचने के लिये उन प्रतीकों का उपयोग करे जिससे ग्राहक उसकी वस्तु की तरफ आकर्षित करे। अगर हम थोड़ा विश्लेषण करें तो यह साफ हो जायेगा कि बाजार ने ही धर्म बनाये है और जिन महापुरुषों को इनका प्रतिपादक बताया जाता है उनका नाम केवल विज्ञापन के लिये उपयोग किया जाता है। सच तो यह है कि दुनियां के सभी धर्म बाजार के बनाये लगते हैं। याद रखने वाली बात यह है सौदागर और पूंजीपति हर युग में रहे और उनका प्रभाव राज्य पर भी पड़ता है-इस मामले में अपने पुराने धार्मिक ग्रंथ भी प्रमाण देते हैं जहां राजतिलक के अवसर पर राज्य के साहूकारों,जमीदारों और सामंतों द्वारा राजा को उपहार वगैरह देने की परंपराओं की चर्चा है। जब यह धनी लोग राजा को उपहार देते होंगे तो उसका लाभ न लेते हों यह संभव नहीं है।
एक मित्र ब्लाग लेखक ने लिखा था कि बाजार नववर्ष के अवसर एक दिन के लिये धर्मपरिवर्तन करा देता है। प्रसंगवश यह बात ‘हिदू धर्म’ के बारे में कही गयी थी। यह लिखा गया था कि किस तरह ईस्वी नववर्ष पर प्रसिद्ध मंदिरों में लोग विशेष पूजा के लिये जाते हैं। उन्होंने यह सवाल भी उठाया था कि ‘किसी हिंदू पर्व पर क्या किसी अन्य धर्म के स्थान में भी ऐसी पूजा होती है। फिर उन्होंने यह भी लिखा था कि ईसाई नवसंवत् के आगमन पर जिस तरह लोगों द्वारा व्यय किया जाता है उतना भारतीय संवत् पर नहीं किया जाता है।

हमेशा आक्रामक और विचारोत्तेजक लिखने वाले उस मित्र ब्लागर ने हमेशा सभी लोगों प्रभावित किया है और उनका लेख पढ़ते हुए अगर किसी पाठक या लेखक के मन में केाई विचार नहीं आये तो समझिये कि वह आलेख पढ़ नहीं रहा बल्कि देख रहा है। ऐसे ही कुछ विचार उठे और लगा कि हमारे दिमाग में पड़ी कुछ चीजें हैं जिनको बाहर आना चाहियै। जो बात कई बरसों से दिमाग में बात घूम रही थी कि आखिर कही बाजार ने ही तो धर्म नहीं बनाया। वह धर्म जो सार्वजनिक रूप से बिकता है। दरअसल धर्म का संबंध हमेशा अध्यात्म से बताया जाता है पर है नहीं । जिसे अध्यात्म ज्ञान प्राप्त हो जाये वह दिखावे से परे रहते हुए अच्छे आचरण की राह पर चलता है जो कि स्वाभाविक रूप से धर्म है। जो लोग बिना ज्ञान के धर्म की बात करता हैं उनको यह पता ही नहीं कि धर्म होता क्या है?

पांच तत्वों से बनी देह में हर जीव के उसके गुणों के अनुसार मन,बुद्धि और अहंकार अपनी सीमा के अनुसार रहता है। मनुष्य में कुछ अधिक ही सीमा होती है और चतुर व्यक्ति व्यापारी बनकर उसका दोहन अपने ग्राहक के रूप में करता है। वह सौदागर होता है और उनका समूह और स्थान बाजार कहलाता है। शादी हो या श्राद्ध उसके लिये सामान तो बाजार से ही आता है न! अपने बुजुर्गों की मौत पर अपने देश में अनेक लोग तेरहवीं धूमधाम से करते हैं और उसके लिये खर्च कर अपना सम्मान बचाते हैं। अगर आप भारत की कुरीतियों को देखें तो वह किसी अन्य देश या धर्म से अधिक खर्चीली हैं। तय बात है कि बाजार ने धर्म बनाया। जब बाजार ने धर्म बनाया है तो वह बिकेगा भी और बदलेगा भी। हमारे यहां धर्म का जो महत्व है वह अन्यत्र कहीं नहीं है। जिस तरह हम किसी लेखक या वैज्ञानिक को तब तक महत्व नहीं देते जब तक पश्चिम से मान्यता प्राप्त नहीं कर पाता वैसे ही पश्चिम में तब तक कोई धर्म श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता जब तक उसके मानने ने वाले पूरी तरह उसे नहीं माने। कम से कम चार धर्म ऐसे हैं जिनका उद्भव स्थल भारत नहीं है। यहीं से होता हो संघर्ष का सिलसिला। विदेशी धर्मो के आचार्य यहां अपने लोगों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं ताकि वह भी हिंदू धार्मिक संतों की तरह पुज सकें।

भारत के लोग धार्मिक अधिक हैं व्यवसायिक कम ओर पश्चिम में व्यवसायिक अधिक हैं और धार्मिक कम हैं। भारत में धर्म के आधार पर तमाम तरह का व्यापार तो बहुत पहले ही चल रहा था क्योंकि सकाम भक्ति उत्तरोतर बढ़ती गयी है। अगर आप पुराना इतिहास उठाकर कर देखें तो गुरुकुलों की चर्चा तो होती है पर मंदिरों में देवताओं के दिनवार मानकर उनकी पूजा होने की चर्चा नहीं है। हमारा दर्शन हमेशा निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया पर आधारित है जबकि समाज चल रहा है सकाम भक्ति और प्रयोजन सहित कार्य की राह पर। कहीं आपने सुना है कि प्राचीन समय में कार,फ्रिज,कार,टीवी और कंप्यूटर वगैरह लडकी को दहेज में दिया जाता था पर आजकल सभी चल रहा हैं। यह भारतीय बाजार ने ही बोया है जो इस तरह समाज को अपने नियंत्रण में रखता है। इसी का परिणाम है कि अनेक लोग तो केवल इसलिये कोई नया सामान नहीं खरीदते कि लड़के के दहेज में मिलेगा। गरीब से गरीब आदमी कुछ न कुछ लडकी को देता है वरना समाज क्या कहेगा?

बहरहाल बाजार अपने पुराने स्वरूप में रहा हो या आधुनिक दोनों में ही वह केवल क्रय विक्रय तक अपना काम सीमित नहीं रखता बल्कि सौदागरों की इच्छा उस पर नियंत्रण करने की भी रहती है और इसके लिये धर्म उनका सहारा बनता है। हमारा दर्शन द्रव्य यज्ञ की बजाय ज्ञान यज्ञ को श्रेष्ठ मानता हैं पर लोग बिना पैसे खर्च किये कोई यज्ञ होता है यह बात जानते तक नहीं है। कहीं कोई धार्मिक यज्ञ हो तो बस शुरु हो जाता है चंदे का दौर। ंचंदा लेने वाले कितना सामान बाजार से लाये और कितना जेब में रख लिया कभी कौन देखता है? मजे की बात यह है कि धनाढ्य सेठ ही तमाम तरह के धार्मिक कार्यक्रम कराते हैं जो कि सकाम भक्ति का प्रमाण है और इस तरह वह धर्म का प्रचार करते हैंं

हिंदू धर्म को आखिर एक झंडे तले कैसे लाया गया यह तो पता नहीं पर ऐसा लगता है कि आजादी से पूर्व जो नये पूंजीपति थे वह अपने लिये एक ऐसा समाज चाहते रहे होंगे जिसका दोहन किया जा सके। उच्च और मध्यम वर्ग के लिये धर्म तो दिखावे की चीज है पर गरीब तबका उसका हृदय से सम्मान करता है। इस देश में गरीब अधिक हैं और उनकी कमाई भी भले ही व्यक्ति के हिसाब से कम हो पर कुल में वह कम नहीं होते-आंकड़े क्या कहते हैं यह अलग बात है-और उससे पैसा धर्म के आधार पर ही खींचा जा सकता है। यहां कई बार ऐसे समाचार आते हैं कि अमुक कारण से समूह विशेष ने धर्म परिवर्तन कर लिया। भारत में यह अधिक इसलिये है क्योंकि बाजार कहीं न कहीं इस खेल में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होता है-कम से कम प्रचार के रूप में तो होता ही है। वजह यह है कि चाहे आदमी कोई भी धर्म अपनाये उसके कर्मकांडों के निर्वहन के लिये तो बाजार ही जायेगा।

हमारे एक लेखक मित्र से एक जागरूक आदमी ने बहुत पहले कहा था कि ‘तुम स्वदेशी आंदोलन के बारे में लिखो।’
उसने लेखक मित्र को एक पर्चा दिया जिसमें विदेशी कंपनियों और देशी कंपनियों के नाम थे। हमारे लेंखक मित्र ने उसे देखा और उससे कहा-‘मैं नहीं लिख सकता। कारण मेरा पैसा तो जेब से जाना है अब वह देशी उद्योगपति के जेब में जाये या विदेशी के पास। मुझे क्या फर्क पड़ता है? हां, अगर इन देशी कंपनियों से कुछ दिलवाओं तो लिखता हूं।’
उसका जागरुक मित्र नाराज हो गया। लेखक की बात बहुत जोरदार थी और आज के संदर्भ में देखें तो अनेक लोग बात से सहमत हो सकते हैंं। विदशों से जो हमलावर भारत में आये उन्होंने यहां की इस कमजोरी को देखा और वह अपने संत अपने धर्मों के कुछ कथित आचार्य भी लाये। उन आचार्यों ने भारतीय अध्यात्म से ही सकाम भक्ति के शब्द लेकर उन पर चिपका दिये और आज उनमें से कई बरसो बाद भी पुज रहे हैं। प्रेतों की पूजा केा हमारा दर्शन विरोध करता है जिसका सीधा आशय समाधियों से हैं। आप देखिये तो अपने यहां अनेक संतों और साधुओं की समाधियां बन गयी हैं जहां उनके भक्त जाते हैं। हमारे दर्शन में जन्म तिथि और पुण्य तिथियां मनाने का कोई जिक्र नहीं आता क्योंकि आत्मा को अजन्मा और अविनाशी माना गया है। यह बाजार का खेल है। देश में स्वतंत्रता से पहले और बाद में सक्रिय आर्थिक शक्तियों का अवलोकन किया जाये तो पता लगेगा कि वह अंग्रेजों के बाद समाज पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहती थीं।
इस बाजार का खेल अभी बहुत कम हो रहा है। वजह भारत से बाहर बने धर्मों की संख्या चार या पांच से अधिक नहीं है। अगर पच्चीस होते तो वह उनका प्रचार भी यहां लाता। अगर बिक सकते तो वह वर्ष में पंद्रह नर्ववर्ष बेचता। याद रहे कि नववर्ष की परंपरा का जिक्र भी कहीं हमारे प्राचीन ग्रंथों में नहीं आता। फिर भारतीय नववर्ष के अवसर पर कम खर्च की बात है तो वह भी थोड़ा विवाद का विषय है। ईसवी संवत् पर सारा शोराशराब अविवाहित युवक युवतियां होटलों में अपना कार्यक्रम करते हैं और उनकी संख्या कम होती हैं। सभी टीवी चैनलों और अखबारों को देखकर ऐसा लगता है कि बहुत खर्च हो रहा है या बहुत लोग है पर ऐसा है नहीं। भारतीय नव संवत् आम आदमी मनाता है। यह बात अलग बात है कि गुड़ी पड़वा, तो कही वैशाखी या चेटीचंड में रूप में सामूहिक रूप से मनता है। कई जगह बहुत बड़े मेंले लगते हैं। रहा धर्म परिवर्तन का सवाल है तो भारत में बाजार ने इसे एक शय बनाया है जिसका अध्यात्म से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। जहां तक बाजार का सवाल है तो अपने देश के सौदागर कुछ धन की खातिर तो कुछ डंडे के डर से कहीं न कहीं सभी धर्मों के प्रति अपना झुकाव दिखाते हैं क्योंकि जब तक वह जीवित हैं वह समाज का दोहन करेंगे ओर बाद में उनकी पीढि़या। उनका तो एक ही नियम है जिस धर्म से पैसा कमा सकते हैं या जिससे सुरक्षा मिलती है उसी का ही प्रचार करो। इस लेख में लिखे गये विचार कोई अंतिम नहीं है क्योकि भारत में बाजार धर्म बनाता है या धर्म बाजार को यह बात चर्चा का विषय है।
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