Tuesday, September 18, 2012

परदे के चेहरे -हिंदी व्यंग्य कविता (parde ke chehre-hindi vyangya kavita,face on screen hindi satire on poem)

मुश्किल में देश है
हल के लिये सजती हैं महफिलें
बहसों में रोज वही चेहरे
नये अल्फाजों के साथ आते हैं,
नतीजा सिफर है
कहने वालों को मालुम नहीं क्या कहा
सुनने वाले भी भूल जाते हैं।
कहें दीपक बापू
हम तो चले भगवान भरोसे हमेशा
कभी खुश हुए कभी गमगीन,
पर्दे पर आते चेहरे देखे
कोई मीठे कोई नमकीन,
सभी बो रहे जमाने के लिये कांटे
अपने लिये उधार मे फूल लाते हैं।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Saturday, September 08, 2012

विज्ञापन युग-हिंदी कविता (vigyapan yog-hindi kavita advertisemeng-a hindi poem)

अपनी काबलियत पर
नहीं है जिनको भरोसा
अपने हाथ से छोटे काम कर
भीड़ में जाकर वही डंका बजाते हैं,
करते हैं ज़माने का काम
वह कभी अपने मशहूरी के लिये
चौराहों पर अपने गीत नहीं गाते हैं।
कहें दीपक बापू
यह विज्ञापन युग हैं
जिसमें हल्के लोग भी
साबुन और तेल की तरह
बाज़ार में बिने आते  हैं।
................................
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poem-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior mdhya pradesh
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Tuesday, August 28, 2012

बीमार समाज सेवक-हिंदी व्यंग्य कविता (bimar samaj sewas-hindi satire poem)

 समाज की हर बीमारी के इलाज का
दावा करते हैं वह लोग,
अस्पतालों के पीछे जाकर
छिपाते हैं जो अपने रोग।
कहें दीपक जिनकी देह
अपनी शक्ति से संभाली नहीं जाती
ज़माने भर की समस्याओं पर
उनकी ज्यादा ही नज़र जाती,
कोई चंदा कोई दान जुटा रहा,
 उनके इलाज का बोझ भी समाज ने सहा,
लाचार इंसानों के जज़्बातों से
खेलना कितना आसान हो गया है
उसमें उम्मीदों का झूठा जोश जगा रहे
फरिश्ता बने कुछ लोग,
जिनके तन और मन
बेबस हो गये हैं करते हुए भोग।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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Sunday, August 19, 2012

किसी ने ग़ज़ल कही किसी ने कहा अफसाना-हिंदी कविता (kisee ne gazal kahi kisee ne afasana-hindi kavita or poem)

तख्त वहीं रहा हमेशा
उस पर बैठे चेहरे बदलते रहे,
खजानों ने झेला हमलां
बाहर लगे पहरे बदलते रहे,
आम इंसान के बेबस रहने की कहानी एक
नाम बदला पर किरदार एक रहा,
किसी ने अफसाने  में
किसी ने गज़ल में कहा,
आसमान से कभी तारा टूटा नहीं,
कोई फरिश्ता ज़मीन पर उतरा नहीं,
सदियों करता रहा इंसान इंतजार।
कहें दीपक बापू
किसे कहें भ्रष्ट,
किसे बतायें इष्ट,
नज़र बंद कर बना रहे लोग अपना नजरिया,
सच से दूर ढूंढ रहे ख्वाब का दरिया,
बाहर के गद्दारों से खौफ नहीं
अंदर के वफदारों से ही हुए हम बेज़ार।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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Monday, August 13, 2012

आओ क्रांति पर बात करें हिंदी कविता (aao kranti par bat karen)

सावधान!
क्रांति आ रही है
डरना नहीं
तुम्हें कुछ नहीं होगा
क्योंकि तुम आदमी हो
तुम्हारे पास खोने के लिये कुछ नहीं है,
मगर खुश भी न होना
तुम्हारे लिये पाने को भी कुछ नहीं ह
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Monday, July 30, 2012

समझौतावादी-हिन्दी हास्य कविता (samjhautawadi-hindi hasya kavita or saitre comedy poem)

समाज सेवक ने कहा अपने चेले से
‘‘अब न अपने पास कोई  पद है
न जनता में अपनी छवि का कोई कद है,
चलो कोई विषय बताओ
जिसे लेकर आंदोलन चलायें,
अपनी डूबती प्रतिष्ठा की नाव पार लगायें।’
तब चेला बोला
‘‘महाराज,
आप अब किसी आंदोलन के
चक्कर में नहीं पड़ना,
कहीं उससे न पड़ जाये
व्यर्थ में आपको लड़ना,
अपने बहुत सारे मसले दबे हुए हैं,
विरोधियों की नजर में फंसे हुए हैं,
इसलिये अब समझौतावादी बन जाईये,
जहां कोई आंदोलन चल रहा हो
वहां एक पांव समर्थन में
दूसरा बातचीत में लगाईये,
इससे निष्पक्ष छवि बन जायेगी,
जनता आपको सर्वमान्य बतायेगी,
लड़ रहें हो दो पक्ष
मध्यस्थ बनकर वहां घुस जायें,
वह लड़ते रहें
कभी एक न हों
यह हमेशा याद रखें
किसी के समझ में न आये
वही बात सभी को समझायें।

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Saturday, June 02, 2012

पहचान और वफा-हिन्दी कविता (pahachan aur vafa)

हमने अपने अरमान टिकायें जिनके कंधों पर
उनके  कदम मंजिल से पहले हमेशा लड़खड़ा जाते है,
उनकी जुबान से टपकते लफ्ज़ मोतियों की तरह
मगर उनसे हमारे सपने नहीं पूरे हो पाते हैं।
कहें दीपक बापू जान पहचान में न मिली वफा कभी
भटकते हैं जब हम राह, अजनबी रास्ता दिखाते हैं।
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