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Wednesday, September 18, 2013

खबर और आग-हिन्दी व्यंग्य कविता(khabar aur aag-hindi vyangya kavita)



सामने पर्दे पर खबरची टीवी पर
खबरें ही खबरें चल रही हैं,
देखते रहो तो मानस रोऐगा
यह मानकर गोया कि पूरी दुनियां में
आग ही आग जल रही है,
अरे, जल्दी रात को सो जाओ
कुछ खूबसूरत कुछ डरावने सपने
आने को तैयार खड़े हैं
पथराई आंखें खोले बैठे हो
जिनमें नींद करवट बदल रही है।
कहें दीपक बापू
खबरे पहले से आयोजित,
बहसें हैं प्रायोजित,
कपड़े पहने घूमती नारियों की मर्यादा
कभी बाज़ार में बेचने की शय नहीं होती
पर्दे की नायिकायें बनती वही
जो कपड़ों से बाहर झांकते अंगों वाली
तस्वीर में ढल रही हैं,
खबर दर खबर से ज़माना सुधर जायेगा
यह आसरा देते प्रचार के प्रबंधक,
जिनकी नौकरी है बाज़ार के सौदागरों के यहां बंधक,
भूखे को रोटी देने की बजाय
वह उसकी खबर पकायेंगे,
शीतल हवा क्या वह बहायेंगे,
जिनके खाने की  पुड़ी
देशी घी से भरी कड़ाई में
आग पर तल रही है।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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Wednesday, September 11, 2013

हिन्दी दिवस पर हास्य कविता-कार्यक्रमों की भीड़ में अकेली कविता(hindi satire poem on hindi day,hindi diwas par hasya kavita)



रास्ते में मिला फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू, आप बरसों से
हिन्दी में लिखते हो,
फिर भी फ्लाप दिखते हो,
अब हिन्दी दिवस आया है
कोई कार्यक्रम कर
अपनी पहचान बढ़ाओ,
लोग तुम्हें ऐसे ही पढ़ें
यह तुम भूल जाओ,
आजकल प्रचार का जमाना है,
हाथ पांव मारो अगर नाम कमाना है,
तुम भी करो स्थापित कवियों की चमचागिरी,
अपने से कमतर पर जमाओ नेतागिरी,
वरना लिखना छोड़ दो,
सन्यास से अपना नाता जोड़ लो।’’
सुनकर हंसे दीपक बापू
‘‘हिन्दी दिवस का प्रचार देखकर
तुम्हारा मन भी उछल रहा है,
अपने दोस्त को फ्लाप
दूसरों को हिट देखकर
तुम्हारा दिमाग जल रहा है,
लगता है तुमने ऐसे कार्यक्रमों
कभी गये नहीं हो,
इसलिये ऐसी सलाहें दे रहे हो
भले दोस्त नये नहीं हो,
हिन्दी दिवस पर लिखने के अलावा
हमें कुछ नहीं आता है,
ऐसे कार्यक्रमों में लेखन पर कम
नाश्ते और चाय के इंतजाम पर
ध्यान ज्यादा जाता है,
बाज़ार के इशारे पर नाचता है जमाना,
सौदागरों के रहम के बिना मुश्किल है कमाना,
अंग्रेजी के गुंलाम
हिन्दी से ही कमाते हैं,
यह अलग बात है कि
ज़माने से अलग दिखने के लिये
अंग्रेजी का रौब जमाते हैं,
सच यह है कि
हिन्दी कमाकर देने वाली भाषा है,
इसलिये भविष्य में भी विकास की आशा है,
चीजें बनायें अंग्रेजी जानने वाले
मगर बेचने के लिये हिन्दी में
पापड़ बेलना पड़ते हैं,
यह अलग बात है कि
हिन्दी लेखक होने पर
उपेक्षा के थपेड़े झेलना पड़ते हैं,
कार्यक्रमों की भीड़ में जाकर
हमारी लिखी रचना क्या करेगी,
अकेली आहें भरेगी,
इसलिये तुम्हारी सलाह नहीं मान सकते
भले ही तुम दोस्ती से मुंह मोड़ लो।


लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
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Thursday, September 05, 2013

जिंदगी में बेख़ौफ़ डटे हैं-हिंदी शायरी (zindagi mein bekhauf date hain-hindi shayri or poem)



सिर पर ताज सजे
यह ख्वाहिश कभी पाली नहीं
क्योंकि जिनके आगे सिर झुके हैं
उनके सिर कटे भी हैं,
रहने के लिये कोई राजमहल हो
इसका सपना कभी देखा नहीं
क्योंकि जिन्होंने ऐशो-ओ-आराम में
बितायी जिंदगी
उनके पांव जेलों में पहुंचकर फटे भी हैं।
कहें दीपक बापू
किसी ने सच कहा है
दाल रोटी खाओ
प्रभु के गुण गाओ
जिनकी चाल ने दिलाया उनको नाम,
चरित्र के लेकर हुए वही बदनाम,
पैसा, पद और प्रतिष्ठा कमाने के लिये लोग
पाखंड का रास्ता सरल मानते हैं,
अपने ही जाल में कभी फंसेंगे
यह कभी नहीं जानते हैं,
ख्वाब है सभी के आकाश में उड़ने के,
सपने हैं अपना नाम सितारों से जुड़ने के,
सभी के हिस्से में आकाश नहीं आता,
जिनके आया
गिरते हैं वह भी जमीन पर
एक दांत भी उनका सलामत  नहीं आता,
अपनी बात कहते रहें,
दर्द अपना यूं ही सहते रहें,
कोई न सुनता है न पहचानता है,
कम अक्लों से बहस करने से बचते हैं
क्योंकि कोई हमें शायर नहीं मानता है,
अपनी कही खुद ही सुनते हैं,
ऊंचाई पर चढ़ने के ख्वाब कभी नहंी बुनते हैं,
इसलिये जिंदगी की जंग में बेखौफ डटे हैं। 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Monday, August 12, 2013

जहन्नुम में जन्नत की तलाश-हिन्दी शायरी (jahannum mein zannat ki talash-hindi shayari)



दौलत की दौड़ में बदहवास है पूरा जमाना
या धोखा है हमारे नजरिये में
यह हमें भी पता नहीं है,
कभी लोगो की चाल पर
कभी अपने ख्याल पर
शक होता है
दुनियां चल रही अपने दस्तूर से दूर
सवाल उठाओ
जवाब में होता यही दावा
किसी की भी खता नहीं है।
कहें दीपक बापू
शैतान धरती के नीचे उगते हैं,
या आकाश से ज़मीन पर झुकते हैं,
सभी चेहरे सफेद दिखते हैं,
चमकते मुखौटे बाजार में बिकते हैं,
उंगली उठायें किसकी तरफ
सिलसिलेवार होते कसूर पर
इंसानियत की दलीलों से जहन्नुम में
जन्नत की तलाश करते लोगों की नज़र में
पहरेदार की तलाशी होना चाहिये पहले
कहीं अस्मत लुटी,
कहीं किस्मत की गर्दन घुटी,
लुटेरों की खता नही है।
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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
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Sunday, August 19, 2012

किसी ने ग़ज़ल कही किसी ने कहा अफसाना-हिंदी कविता (kisee ne gazal kahi kisee ne afasana-hindi kavita or poem)

तख्त वहीं रहा हमेशा
उस पर बैठे चेहरे बदलते रहे,
खजानों ने झेला हमलां
बाहर लगे पहरे बदलते रहे,
आम इंसान के बेबस रहने की कहानी एक
नाम बदला पर किरदार एक रहा,
किसी ने अफसाने  में
किसी ने गज़ल में कहा,
आसमान से कभी तारा टूटा नहीं,
कोई फरिश्ता ज़मीन पर उतरा नहीं,
सदियों करता रहा इंसान इंतजार।
कहें दीपक बापू
किसे कहें भ्रष्ट,
किसे बतायें इष्ट,
नज़र बंद कर बना रहे लोग अपना नजरिया,
सच से दूर ढूंढ रहे ख्वाब का दरिया,
बाहर के गद्दारों से खौफ नहीं
अंदर के वफदारों से ही हुए हम बेज़ार।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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Monday, August 13, 2012

आओ क्रांति पर बात करें हिंदी कविता (aao kranti par bat karen)

सावधान!
क्रांति आ रही है
डरना नहीं
तुम्हें कुछ नहीं होगा
क्योंकि तुम आदमी हो
तुम्हारे पास खोने के लिये कुछ नहीं है,
मगर खुश भी न होना
तुम्हारे लिये पाने को भी कुछ नहीं ह
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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Saturday, February 11, 2012

हमारे कदम-हिन्दी कविता (hamare kadam-hindi kavita or poem)


जिनका इंतज़ार किया वह कभी आए नहीं,
मिले हमसफर राह में कभी हमें भाए नहीं।
चले हम जमाने के साथ मगर हुए नापसंद
इतने तन्हा रहे की अपने साये भी साथ नहीं।
बस यूं ही लफ्जों में अपने जज़्बात भरते रहे,
जुल्म सहे पर तसल्ली है किसी पर ढाये नहीं।
कहें दीपक बापू खुद से बात करते बिताया समय
हमारे कदम चल अपनी राह,आँसू कभी बहाये नहीं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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Friday, December 30, 2011

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) बिन जनलोकपाल-हिन्दी चिंत्तन लेख (janlakpal withought janlokpal-hindi thought article)

         मात्र एक दिन पहले तक अन्ना का जादू खत्म होने का प्रचार करने वाले भौंपू अब अचानक उनको याद कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे कि अन्ना बिल लोकपाल सून’। 27 दिसंबर को लोकसभा में लोकपाल बिल पास होने के बाद अन्ना ने 28 को अनशन खत्म कर दिया। आमतौर से हम जैसे समाचार पढ़ाकुओं का यह अनुभव रहा है कि लोकसभा में प्रस्ताव पास होने के बाद उपरी सदन राज्यसभा में भी पास हो जाता है। संभवत अन्ना को भी यही अनुभव याद रहा होगा। मगर यह क्या लोकपाल बिल वहां अटक गया। समाचार विश्लेषण करने वाले अनेक अनुभवहीन बुद्धिजीवी इसे लटकना कह रहे हैं। यह गलत है। संसदीय प्रक्रिया में रुचि रखने वालों के लिये इस तरह का अनुभव कोई नया नहीं है। बजट सत्र में इसके पास होने की संभावना बनी हुई है इसलिये लटकना मानना गलत है। चूंकि देश के राजनीतिक स्वरूप बदलने के बाद यह ऐसी पहली महत्वपूर्ण घटना है इसलिये पुराने पढ़ाकुओं को भी चौंकाती है। एक समय था जब एक ही दल का वर्चस्व दोनों सदनों में रहता था तक इस तरह के विरोधाभास की कल्पना कोई नहीं करता था। अब वह बात नहीं है। इसलिये अनेक पुराने लोग इस तरह के समाचारों के अभ्यस्त नहीं है। शायद 28 दिसम्बर को अन्ना हजारे साहब ने अनशन इसलिये समाप्त कर दिया था कि अब तो बिल पास हो गया है और इसमें आगे अपने अनुरूप सुधार के लिये आंदोलन करेंगे। उनका स्वास्थ्य भी साथ नहीं दे रहा था।
            उनके अनशन से हटते ही यह लगा कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का समापन हो गया है। अस्वस्थ अन्ना जब रालेगण सिद्धि से मुंबई आये तो पता चला कि वह एक रात पहले सोये नहीं थे। 27 दिसंबर को भी सोये कि नहीं पर 28 को वापस चले गये। 29 को शायद आराम से सोये होंगे कि 30 की सुबह भाई लोगों ने यह कहते हुए जगा दिया होगा कि ‘‘अभी जागते रहिये लोकपाल के लिये आपकी जरूरत है।’
संसदीय प्रणाली में इस तरह के विधेयक पास होते रहते हैं। अलबत्ता प्रचार माध्यमों के लिये यह विषय अगले कुछ समय तक विज्ञापन चलाने के लिये चर्चित रहेगा। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि संभवत भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन किन्ही प्रायोजित लोगों ने अपना इतर लक्ष्य पाने के लिये प्रारंभ करने की योजना बनाई होगी और अन्ना साहब के पुराने सद्कर्मों की वजह से उनको अपना चेहरा प्रदान करने का आग्रह किया होगा। जिस तरह उनका आंदोलन चला और उसे प्रचार माध्यमों में समर्थन मिला उससे यही संदेह होता है। टीवी चैनलों पर अनेक उद्घोषक एक तरह उनके आंदोलन के प्रवक्ता बनकर दूसरे बहसकर्ताओं पर अपना विचार थोपते हैं। समस्त बहसों में बाहर से आये वक्ता कम चैनल के संपादक और उद्घोषक अधिक बोलते हैं। 28 जनवरी को जिस तरह अन्ना हजारे ने अपने साथियों के दबाव में आंदोलन खत्म किया वह उसमें प्रायोजन तत्व होने की पुष्टि भी करता है। अन्ना रालेगण सिद्धि से जब दो दिन पहले निकले थे तब भी स्वस्थ नहीं थे। ऐसे में उनका जिद्द कर आना और फिर अपनी इच्छानुरूप न होने के बावजूद बिल पास होने पर चले जाना इस संदेह को अधिक गहरा बनाता है।
              हम अगर देश के राजस पुरुषों की बात करें तो विश्व में भारत की जिस तरह भ्रष्टाचार की वजह से बदनामी हो रही है तो उसे बचाना भी उनकी जिम्मेदारी है। कहने वाले कुछ भी कहते हों पर इतना तय कि यह बात उनको भी पता है। लोकपाल का बिल सरकार ने पहले तैयार कर संसद में प्रस्तुत किया था। अन्ना हजारे तो बाद में उसे अपने अनुरूप बनाने के लिये मैदान में उतरे थे। यह उनका मौलिक विषय नहीं था पर उन्होंने इसे इतनी तेजी से अपनाया कि राजस पुरुष अचंभित हो गये कि उनका विषय एक समाजसेवी अपहृत कर ले गया। ऐसे में विवाद तो होना ही था।
           अन्ना हजारे की अधिक लोकप्रियता देखते हुए किसी राजस पुरुष ने प्रत्यक्ष छींटाकशी नहीं की पर यह शंका तो होती थी कि समय आने पर वह अपना हिसाब चुकायेंगे। अभी यह कहना कठिन है कि वास्तव में वही हो रहा है जो हम सोचते थे अलबत्ता एक समय राजपुरुषों से दूरी बनाये रखने के इच्छुक अन्ना और उनकी टीम ने आखिर उनको अपने मंच पर चर्चा में आने का आमंत्रण दिया और वह आये भी। ऐसा करके किसने किसका उपयोग किया यह बताना कठिन है पर अप्रैल में अन्ना साहेब के अनशन प्रारंभ होने के पहले ही दिन एक साध्वी तथा एक राजपुरुष को उनके समर्थकों ने जिस ढंग से अपमानित किया था उसे देश के राजसपुरुष भूल पायें यह इतना सरल नहीं था। अंततः अन्ना के सपनों का लोकपाल बनाना उनका ही काम है और उसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। बहरहाल प्रचार माध्यमों में अन्ना समर्थक कह रहे हैं कि राज्यसभा में विधेयक रुकने से हमारे आंदोलन को बल मिला है। इसका मतलब यह है कि 27 तारीख को बिल पास होते ही बल निकल गया था। अब यह उनको बल मिला है या दिया गया है आगे अधिक दौड़ लगवाने के लिये, इस पर भी हम जैसे लोग विचार कर सकते हैं। दो तीन जनवरी को अन्ना साहेब के चेले चपाटे फिर रालेगण सिद्धि में पहुंचने वाले हैं। भ्रष्टाचार रोकने के लिये लोकपाल बनना चाहिए और बनाये के प्रयास भी चल रहे है। वैसे कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि अगर वर्तमान व्यवस्था में ही काम किया जाये और इच्छा शक्ति हो तो भ्रष्टाचार कम किया जा सकता है मगर लगता है कि इस लोकतंत्र में जहां जनमानस को व्यस्त रखने के लिये आंदोलन चाहिये तो उन्हें चलाने वाले समाजसेवी भी जरूरी हैं जो प्रायोजन के बिना नहीं चलते।
          अन्ना समर्थक भी एक नया संस्थान बनाने के साथ उसमें आज कार्यरत संस्थाऐं मांग जोड़ने की मांग कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध सजा के प्रावधान भी वही रहेंगे जो पहले से हैं। अलबत्ता बाज़ार और प्रचार समूहों ने इसे बना दिया है अन्ना हजारे का जनलोकपाल जो फिलहाल तो लोकपाल ही है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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Friday, December 16, 2011

कामयाबी के कायदे-हिन्दी शायारियाँ (kamyabi ke kayde-hindi shayariyan)

हम तय नहीं करेंगे
जमाना तय करेगा कि
ज़िंदा आदमी के इज्ज़त क्या होगी,
मर गया जो
उसको कैसे जन्नत नसीब होगी।
कहें दीपक बापू
देखा है हमने
सयानों को बता रहे हैं
कर्मकांड का योग
अक्ल से पैदल
और शरीर के रोगी।
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हवा के झौंके से काँपने वाले
तूफानों से लड़ने वालों को
रास्ता दिखा रहे हैं,
नाकामी रही जिनकी साथी
कामयाबी के कायदे
लोगों को वही सिखा रहे हैं।
कहें दीपक बापू
दौलत, शौहरत और ताकत पर
इतराते लोग
फरिश्तों की सूची में
अपना नाम लिखा रहे हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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Sunday, December 11, 2011

जैसी नज़र वैसी तस्वीर-हिन्दी शायरी (tasweer or tasvir aur nazar-hindi shayari)


रिश्ते जो दूर हो गये
यादों में धुंधले हो जाते हैं,
उनके साथ गुजरे पल
याद्दाश्त से होते हैं बाहर
मतलब है जिनसे
वही यार ताजगी भर पाते हैं,
कहें दीपक बापू
इस दुनियां में धोखा भी
वफा भी मिल जाती है
मगर लोगों के नजरिये अलग अलग
जिसकी नजर जैसी
वैसी ही तस्वीर वह सामने पाते हैं।
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Friday, November 25, 2011

यह महाशतक गिनती का कौनसा आंकड़ा है-हिन्दी व्यंग्य (wha is meaning of great century or mahashaktak-hindi satire article aur vyangya lekh)

          कल 26 नवंबर है और मुंबई पर दो वर्ष पूर्व हमले की याद या शोक में अनेक शहरों में मोमबत्तियां जलाकर मृतकों के प्रति सहानुभूति की रस्म अदा की जायेगी। अपना अपना तरीका है और उस पर टिप्पणियां करना ठीक नहीं लगता। अमेरिका के न्यूयार्क शहर के विश्व व्यापार केंद्र की इमारतें ढहने के बाद वहां हर वर्ष शून्य तल पर मोमबत्तियां जलाकर शोक मनाया जाता है। उसी की तर्ज पर यहां के आधुनिक लोगों ने इसे प्रारंभ किया है। अब यह पता नहीं कि वह अपने अंदर अमेरिकी जैसे होने का भाव पालकर एक सुखद अनुभूति पालते हैं या फिर अमेरिकियों को यह संदेश भेजते हैं कि देखो हम भी अब तुम्हारी तरह ही हैं। यह भी संभव है कि वहां रह रहे प्रवासियों को भी संदेश भेजते हैं कि हम भी कितने संवेदनशील हैं। संभव है यह तीनों बातें न हों पर इतना तय है कि आधुनिक रूप से शोक मनाना उनके लिये एक फैशन हैं जिसमें संवेदनायें होती नहीं पर दिखाई जाती हैं।
          देखा जाये तो हममारे देश में हमले कई जगह हुए हैं पर बरसी किसी की मनाई नहीं जाती। दरअसल अगर आतंकवादियों ने मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेल्वे टर्मिनल पर आक्रमण नहीं किया होता तो शायद हमले के प्रति इतना जनाक्रोश नहीं होता कि पाकिस्तान पर हमले की बात की जाती। दूसरा यह भी कि अगर यह हमला केवल शिवाजी टर्मिनल पर नहीं होता तो भी शायद ही कोई ऐसा शोक दिवस मनाता। आतंकवादियों ने ताज होटल पर हमला किया था जिसमें धनिक लोगों का आना जाना होता है। फिर व्यापारिक रूप से उसकी विश्व में प्रतिष्ठा है। शिवाजी टर्मिनल में मरने वाले आम लोग थे। भले ही वह अमीर हों या गरीब पर ताज में मरने वालों का खास होना वहां जाना ही प्रमाणित करता है। कहने को भले ही इस हमले में शिवाजी टर्मिनल का नाम लें पर सच यह है कि इस शोक दिवस को मनाने की पृष्ठभूमि में ताज होटल पर किया गया हमला है। वह अमेरिका के विश्व व्यापार केंद्र जैसा नहीं है पर अंततः उसका स्वामित्व अंततः भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूह का है और यही उसे विश्व व्यापार केंद्र के समक्ष खड़ा करता है।
      यह सब बाज़ार का खेल है। सौदागरों ने विश्व के अधिकांश आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक संगठनों पर नियंत्रण कर लिया है। संगठनों के मुखिया उनके मुखौटों की तरह हैं। जिन पर प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं है उन पर भी अपने धन और प्रचार की शक्ति भी इस तरह नियंत्रण किये रहते हैं कि उनके सहयोग के बिना मुखिया बेबस होता है। ऐसे में आम आदमी का नाम केवल सहानुभूति के लिये भी तब लिया जाता है जब उसका आर्थिक दोहन किया जा सके।
         वैसे प्रचार माध्यम इस समय व्यापारिक रूप से शोक जता रहे हैं। उनके भगवान का महाशतक पूरा नहीं हो सका। यह महाशतक क्या बला है? एक दिवसीय और पांच दिवसीय मैचों में कुल मिलाकर एक सौ शतक। यह महाशतक गिनती का कौनसा आंकड़ा है पता नहीं! बाज़ार चाहे जो बोले वही ठीक! मुंबई में
         वेस्टइंडीज के साथ बीसीसीआई की टीम का पांच दिवसीय मैच चल रहा था। क्रिकेट का भगवान 94 रन पर है यह हमें भी पता लगा। सारे समाचार चैनल इस खबर को लेकर बैठ गये। उनके पास विज्ञापनों का टाईम पास करने के लिये एक ऐसा मसाला मिल गया जिसे वह छोड़ नहीं सकते। आम आदमी को क्या कहें हम जैसा ज्ञानी ध्यानी भी चैनल बदलकर उस जगह पहुंचा जहां यह मैच दिखाया जा रहा था। भगवान का साथी खेल रहा था। जब हम बैठकर देखने लगे क्योंकि भगवान दूसरे सिरे पर था। हमने देखा है कि क्रिकेट के भगवान को 90 और सौ के बीच खरगोश से कछुआ बन जाता है। फिर भी तय किया कि बाज़ार के इस महानायक का खेल आज देख तो लें भले ही इसमें अब दिलचस्पी न के बराबर रह गयी है। मगर यह क्या खेलने के सिरे पर आते ही क्रिकेट का भगवान आउट हो गया।’
       स्टेडियम में सन्नाटा छाया था तो चैनलों के पास ब्रेकिंग खबर बन गयी थी। तमाम तरह के जुमले ‘पूरा देश हताश हो गया है’, सचिन के प्रशंसक दंग रह गये हैं’, ‘अभी क्रिकेट के भगवान का महाशतक पूरा होने के लिये और इंतजार करना होगा’ और ‘हो सकता है कि एकदिवसीय मैचों में यह महाशतक पूरा हो’।
         हम फिर मैच देखने लगे। मैदान पर हमने यह आवाज सुनी कि ‘वी वांट फालोआन’। पता नहीं यह संदेश वेस्ट इंडीज के खिलाड़ियों के लिये था या बीसीसीआई के कप्तान के लिये जो उस समय खेलने आया था। फालोआन का मतलब यह था कि वेस्टइंडीज की पहली पारी के 590 रन के जवाब में भगवान की टीम 390 पर यानि 200 रन पहले आउट हो जाये तो उसे फालोआन पर अपनी दूसरी पारी इंडीज टीम से की दूसरी पारी ने पहले खेलने को मजबूर किया जाये। देखा जाये तो बीसीसीआई टीम के साथ भारत शब्द जुड़ा है इसलिये भारतीय दर्शकों से ऐसी दर्दनाक दुआ की आशा तो की ही नहीं जा सकती। मगर यह हुआ।
        हालांकि पूरे स्टेडियम में यह आवाज नहीं थी इसलिये सभी दर्शकों पर कोई आक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। मगर यह हुआ। स्पष्टतः बाज़ार ने ऐसे कच्चे संस्कार देश के लोगों में बो दिये हैं कि वह चाहे उसे जब देशभक्ति की तरफ मोड़ ले या व्यक्तिपूजा की तरफ ले जाये। देश से बड़ा क्रिकेट का भगवान हो गया।
         बहरहाल बाज़ार ने क्रिकेट को अपना सबसे बढ़िया सौदा बना लिया है। अभी तक बाज़ार खुशी के माहौल का इंतजार करता था कि उसे ग्राहक मिलेगा पर अब सौदागरों ने अपने प्रचार समूहों की मदद से ऐसे अवसर बना लिये हैं जो उसे खुशी के साथ शोक भी क्रय विक्रय के लिये उपलब्ध कराते हैं। क्रिकेट का भगवान शतक नहीं बना सका इस पर शोक चैनल भुना रहे हैं तो प्रचार प्रबंधक प्रसन्न हो रहे होंगे कि चलो अभी और कमाने का मौका है। जब तक शोक बिकता है बेचते रहेंगे। हो सकता है कि प्रचार प्रबंधक इस बात का अनुमान भी लगा रहे हों कि अगली बार नब्बे के बाद भी यह महाशतक पूरा नहीं हुआ तो शोक बिक पायेगा कि नहीं। एक बार कथित महाशतक पूरा हो गया तो फिर क्रिकेट के भगवान की किस अदा को दिखाकर कमाया जायेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Monday, October 17, 2011

मंदी और महंगाई का मारा आशिक और सस्ती माशुका-हिन्दी हास्य कविता (mandi aur mehangai ka mara ashik aur sasti mashuka-hindi hasya kavita or hindi comic poem)

आशिक ने कहा माशुका से कहा
‘‘तुम अपनी फरमाईशें कम किया करो
अब बढ़ गयी है मंदी और महंगाई,
एक जगह से क्लर्क पद से छंटनी हुई
दूसरी जगह बन गया हूं चपरासी
घट गयी हैं मेरी कमाई,
इस तरह मेरा कबाड़ा हो जायेगा,
देता हूं तुम्हें ऑटो का जो किराया
पेट्रोल के बढ़ते भाव से
उसका भी महंगा भाड़ा हो जायेगा,
मुझ पर कुछ पर तरस खाओ,
अपने इश्क की फीस तुम घटाओ।’’

सुनकर बिगड़ी माशुका और बोली
‘‘सुनो जरा मेरी बात ध्यान से,
महंगाई शब्द न चिपकाओं मेरे कान से,
देशभक्ति हो या इश्क
जज़्बात बाज़ार में बिकते हैं,
खरीदने का दम हो जिनमें
वहीं सौदा लेकर टिकते हैं,
सौदागरों के भोंपू चीख चीख कर
दिखाते हैं देशभक्ति,
वही गरीब की जिंदगी को सस्ता बनाकर
दिखते हैं अपने पैसे की शक्ति,
उनके कहने पर पर ही
सर्वशक्तिमान की तरफ इशारा करते हुए
आशिक माशुकाओं के इश्क पर लिखते हैं शायर,
जिस्म की चाहत होती मन में
दिखाने के लिये इबादत करते हैं कायर,
आजकल इश्क का मतलब है
माशुकाओं को सामान उपहार में देना,
चाहे पड़े बैंक से पैसा
भारी ब्याज पर उधार में लेना,
अगर तुम्हारी जेब तंग है,
इश्क अगर जारी रहा
मेरी त्वचा पड़ जायेगी फीकी
जिसका अभी गोरा रंग है,
मैं कोई ढूंढ लूंगी
ऊंची कमाई वाला आशिक,
लड़कियों की कमी है
जायेगा जल्दी मेरा इश्क बिक,
यह मंदी और महंगाई वाली
बात न सुनाओ,
ढूंढ लो कोई सस्ती माशुका
मेरे सामने से तुम जाओ।’’
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Tuesday, October 11, 2011

कद्रदान-हिन्दी शायरी (kadradan-hindi shayari or poem)

उनकी जुदाई के गम में
कभी हमने आँसू नहीं बहाये
भले ही उनको देखने के लिए तरसते रहे,
मगर टूटा आसमान सिर पर
जब पता चला कि
वह दूसरों की बाहों में
बाहर बनकर बरसते रहे।
------------------
खामोशी के बड़ा दोस्त
बहुत ढूँढने पर भी नहीं मिला,
सच बोले तो लोग बने दुश्मन
झूठ बोले तो हुआ जमाने में गिला।
फिर भी कोई शिकायत नहीं हैं
इस जहाँ में
भला कब किसे
अपनी जुबान से निकले लफ्जों का कद्रदान मिला।
------------------
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Sunday, September 11, 2011

हिन्दी के विकास का जिम्मा-हिन्दी दिवस पर कविता (hindi ke vikas ka jimma-hindi diwas or divas par kavita)

हिन्दी के विकास का जिम्मा
अंग्रेजी पसंद लोगों ने ले लिया है,
सारे वर्ष बतियाएंगे अंग्रेजी में
इसलिये एक दिन हिन्दी को दे दिया है।
कहें दीपक बापू
हिन्दी तो गरीबों की भाषा है,
निरीह लोगों की अभिव्यक्ति से ही उसमें आशा है,
अंग्रेजी से लड़ती हिन्दी
गली और मोहल्लों में जिंदा रहेगी,
पीड़ा तभी समझेगा कोई
जब जुबान हिन्दी में कहेगी,
उनसे उम्मीद करना बेकार है
जिन्होंने कार्यक्रम और नाश्तों के बहाने
हिन्दी विकास का जिम्मा ले लिया है।
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Wednesday, August 10, 2011

नाकामी की सफाई-हिन्दी कविता (nakami ki safai-hindi kavita)

पेट की भूख इंसान को शैतान बना देती है
भूखे की लाचारी गद्दारी का पैगाम थमा देती है।
पेड़ पत्थर और पहाड़ों के देश की भक्ति न सिखाओ,
महंगाई हर शहरी की कमर तोड़कर जमा देती है।
वातानुकूलित कमरों में बैठकर चर्चा आसान है,
ऊबड़ खाबड़ सड़क पर धूप केवल पसीना देती है।
रोते हुए मुद्दों पर मसखरे दे रहे बड़े बड़े बयान
उनकी कुर्सियां ही बैठकर रोटी और दारु कमा देती है।
कहें दीपक बापू, मेहनतकशों के हिमायती बहुत हैं,
भलाई की दलाली उनके बड़े बड़े महल बना देती है।
लुटी भीड़ को देते भाषण वह रौशनदानों से खड़े होकर
सच से छिपने की कोशिश भी उनको वीर बना देती है।
भूख मिटा नहीं सकते, प्यास बुझा नहीं सकते,
नाकामी पर जोरदार सफाई, उन्हें सफल बना देती है।
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Tuesday, July 26, 2011

बूढ़ा फंसे या जवान-हिन्दी हास्य कविता (boodha fanse ya jawan-hindi hasya kavita)

चेला भागता हुआ गुरु के पास आया
और बोला
‘‘अपने पास यह कैसा धर्म संकट आया है,
अपनी अधिग्रहीत जमीन वापस पाने की चाहत में
एक किसान ने दी है अपने आश्रम में हाजिरी
तो उधर एक उसकी जमीन पर
फ्लेट खरीदने वाले क्लर्क ने
भी आपका दरवाजा खटखटाया है,
आप तो बस, तथास्तु कहकर
छूट जाते हैं
मुझे ही करने पड़ते हैं
आपके आशीर्वाद को सत्य सिद्ध करने का काम,
इससे ही बढ़ता रहा है आपका नाम,
आपको शायद मालुम नहीं
किसान से कम भाव पर खरीदकर
भवन निर्माता को दी गयी,
इधर क्लर्क को घन का सपना दिखाकर
भारी रकम ली गयी,
मामला अब उलझ गया है,
यह मामला एकदम नया है,
किसान चला रहा है
अपने साथियों से मिलकर
जमीन वापस पाने का अभियान,,
इधर क्लर्क भी अपनी बाहें रहा है तान,
इन दोनों के हल कैसे होगा
मेरी समझ में नहीं आया।’’

सुनकर गुरूजी हंसे फिर बोले
‘इसलिये हम गुरु बने रहे
तू रहा पुराना चेला
जबकि तेरे जैसे मेरे पास कई चेले नये हैं,
किसान और क्लर्क ही
अपने पास नहीं आते,
बड़े बड़े दौलतमंद और ओहदेदार
मेरे यहां सिर झुकाते
सभी को देते हम विजयी भव का आशीर्वाद,
जो जीता वह हमारे गुण गाता
जो हारा नहीं रहता उसे कुछ याद,
जिसका काम हो जाये
उस पर हमारी कृपा होने का तुम दावा करना,
जिसका न बने उसका जिम्मा
सर्वशक्तिमान की इच्छा पर धरना,
आपना काम है बस दान और चंदा लेना,
समाज के ग्राहक को चमत्कार के नाम पर
धर्म का धंधा देना,
जाल में बूढ़ा फंसे या जवान,
हमें तो बस है आशीर्वाद देने से काम,
यही मेरे गुरु से मुझे बताया।’’
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Tuesday, June 21, 2011

कोई भेड़िया कोई नाग है-हिन्दी कविता(koyee bhediya koyee naag hai-hindi poem)

चांद पर भी कहीं न कहीं दाग है,
समंदर में भी कहीं न कहीं आग है।
ऊपर और नीचे होता खेल कुदरत का है
इंसान गाता मुख से अपना ही राग है।
शिष्टाचार बैठा है सोने के तख्त पर
सजावट में भ्रष्टाचार का पूरा भाग है।
कहें दीपक बापू दिखते सभी यहां इंसान
पर उनमें भी कोई भेड़िया कोई नाग है।
----------------
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Monday, June 13, 2011

बदलाव-हिन्दी शायरी (badlav-hindi shayri)

जमाने को बदल देंगे
यह ख्याल अच्छा है
पर कोई चाबुक नहीं
किसी इंसान के पास
जिससे दूसरे का ख्याल बदल दे।
अमीरी खूंखार ख्याल लाती है,
कहर बरपाने के कदमों में
ताकत का सबूत पाती है,
गरीबी मदद के लिये
भटकाती है इधर से उधर,
दरियादिली के इंतजार में खड़े टूटे घर,
न बदलती किस्मत
न होती हिम्मत
बस उम्मीद जिंदा रहती है कि
शायद कोई हालात बदल दे।
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Saturday, June 04, 2011

बाबा रामदेव के आंदोलन में चंदा लेने के अभियान पर उठेंगे सवाल-हिन्दी लेख (baba ramdev ka andolan aur chanda abhiyan-hindi lekh)

       अंततः बाबा रामदेव के निकटतम चेले ने अपनी हल्केपन का परिचय दे ही दिया जब वह दिल्ली में रामलीला मैदान में चल रहे आंदोलन के लिये पैसा उगाहने का काम करता सबके सामने दिखा। जब वह दिल्ली में आंदोलन कर रहे हैं तो न केवल उनको बल्कि उनके उस चेले को भी केवल आंदोलन के विषयों पर ही ध्यान केंद्रित करते दिखना था। यह चेला उनका पुराना साथी है और कहना चाहिए कि पर्दे के पीछे उसका बहुत बड़ा खेल है।
    उसके पैसे उगाही का कार्यक्रम टीवी पर दिखा। मंच के पीछे भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का पोस्टर लटकाकर लाखों रुपये का चंदा देने वालों से पैसा ले रहा था। वह कह रहा था कि ‘हमें और पैसा चाहिए। वैसे जितना मिल गया उतना ही बहुत है। मैं तो यहां आया ही इसलिये था। अब मैं जाकर बाबा से कहता हूं कि आप अपना काम करते रहिये इधर मैं संभाल लूंगा।’’
          आस्थावान लोगों को हिलाने के यह दृश्य बहुत दर्दनाक था। वैसे वह चेला उनके आश्रम का व्यवसायिक कार्यक्रम ही देखता है और इधर दिल्ली में उसके आने से यह बात साफ लगी कि वह यहां भी प्रबंध करने आया है मगर उसके यह पैसा बटोरने का काम कहीं से भी इन हालातों में उपयुक्त नहीं लगता। उसके चेहरे और वाणी से ऐसा लगा कि उसे अभियान के विषयों से कम पैसे उगाहने में अधिक दिलचस्पी है।
            जहां तक बाबा रामदेव का प्रश्न है तो वह योग शिक्षा के लिये जाने जाते हैं और अब तक उनका चेहरा ही टीवी पर दिखता रहा ठीक था पर जब ऐसे महत्वपूर्ण अभियान चलते हैं कि तब उनके साथ सहयोगियों का दिखना आवश्यक था। ऐसा लगने लगा कि कि बाबा रामदेव ने सारे अभियानों का ठेका अपने चेहरे के साथ ही चलाने का फैसला किया है ताकि उनके सहयोगी आसानी से पैसा बटोर सकें जबकि होना यह चाहिए कि इस समय उनके सहयोगियों को भी उनकी तरह प्रभावी व्यक्तित्व का स्वामी दिखना चाहिए था।
अब इस आंदोलन के दौरान पैसे की आवश्यकता और उसकी वसूली के औचित्य की की बात भी कर लें। बाबा रामदेव ने स्वयं बताया था कि उनको 10 करोड़ भक्तों ने 11 अरब रुपये प्रदान किये हैं। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली आंदोलन में 18 करोड़ रुपये खर्च आयेगा। अगर बाबा रामदेव का अभियान एकदम नया होता या उनका संगठन उसको वहन करने की स्थिति में न होता तब इस तरह चंदा वसूली करना ठीक लगता पर जब बाबा स्वयं ही यह बता चुके है कि उनके पास भक्तों का धन है तब ऐसे समय में यह वसूली उनकी छवि खराब कर सकती है। राजा शांति के समय कर वसूलते हैं पर युद्ध के समय वह अपना पूरा ध्यान उधर ही लगाते हैं। इतने बड़े अभियान के दौरान बाबा रामदेव का एक महत्वपूर्ण और विश्वसीनय सहयोगी अगर आंदोलन छोड़कर चंदा बटोरने चला जाये और वहां चतुर मुनीम की भूमिका करता दिखे तो संभव है कि अनेक लोग अपने मन में संदेह पालने लगें।
            संभव है कि पैसे को लेकर उठ रहे बवाल को थामने के लिये इस तरह का आयोजन किया गया हो जैसे कि विरोधियों को लगे कि भक्त पैसा दे रहे हैं पर इसके आशय उल्टे भी लिये जा सकते हैं। यह चालाकी बाबा रामदेव के अभियान की छवि न खराब कर सकती है बल्कि धन की दृष्टि से कमजोर लोगों का उनसे दूर भी ले जा सकती है जबकि आंदोलनों और अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी ही सफलता दिलाती है। बहरहाल बाबा रामदेव के आंदोलन पर शायद बहुत कुछ लिखना पड़े क्योंकि जिस तरह के दृश्य सामने आ रहे हैं वह इसके लिये प्रेरित करते हैं। हम न तो आंदोलन के समर्थक हैं न विरोधी पर योग साधक होने के कारण इसमें दिलचस्पी है क्योंकि अंततः बाबा रामदेव का भारतीय अध्यात्म जगत में एक योगी के रूप में दर्ज हो गया है जो माया के बंधन में नहीं बंधते।

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Monday, May 02, 2011

हिन्दी हास्य कविता-भ्रष्टाचार हटाने का कोई जंतर मंतर नहीं है (bhrashtachar hatane ka koyee jantar mantar nahin hai-hindi hasya kavita)

पोते ने का दादाजी से
‘कल हम सब बच्चे अपनी शिक्षिका के साथ
भ्रष्टाचार विरोधी रैली में जायेंगे,
खूब जोर से नारे लगायें,
अपनी कोशिश से इस देश में
 ईमानदारी  का युग फिर लायेंगे।’

सुनकर दादाजी  ने कहा
‘‘बेटा,
तुम जाओ हमें आपत्ति नहीं
पर शिक्षिका ने तुम्हें
भ्रष्टाचार का मतलब समझाया भी है  कि नहीं
लगता  नहीं वह भी जानती होगी,
बस नारे लगाना ही क्रांति मानती होगी,
सच बात तो यह है कि
इस संसार में भ्रष्टाचर मिटा सके,
ऐसा कोई जंतर मंतर नहीं है,
संसार के सारे इंसानों को
अपने कर्म में खोट भी लगता है शिष्टाचार
दूसरे का हर कर्म माने भ्रष्टाचार
सोच कां अंतर वहीं हैं,
हर कोई
पहले दूसरे से सुधरने की आशा करे,
फिर अपने भी उसी राह पर चलने का दिल में भाव भरे,,
यही बेईमानी सभी में आती है,
दूसरा शख्स झौंपड़ी में ही मरे,
अपनी इमारत चमचमाती होने  की
चाहत हर कोई धरे,
यही सोच भ्रष्टाचार की तरफ ले जाती है,
बड़े होकर
अगर तुम चल सको सत्य की राह
समझ लो पूरी हो जायेगी ईमानदारी लाने की चाह,
ऐसा ही हर कोई करे
तो भ्रष्टाचार मिट जायेगा,
वरना पहले से ही बढ़ा रहा है मुंह
सुरसा की तरह
अब और भी बढ़ायेगा,
हम भले उसे मिटाने के नारे लगाते
जीवन गुजारते जायेंगे।’
--------------


लेखक संपादक-दीपक "भारतदीप", ग्वालियर 
writer and editor-Deepak "Bharatdeep" Gwalior
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