वह कहीं भीड़ में
अब होश आया तो
अपनी असलियत ढूंढ रहा है
जो टुकड़ा टुकड़ा हो गयी है।
चारों तरफ नरमुंडों के
झुंड के बीच वह खड़ा
फिर भी अकेलेपन का अहसास उसे सताता है
इस भीड़ का घर छोड़ा
दूसरी भीड़ के दरवाजे से नाता जोड़ा
फिर भी नहीं ढूंढ पाया अपना अक्स
वह शख्स!
लोगों के झुंड का बाहर से एकजुट होने भ्रम था
वह भीड़ अंदर टुकड़ा टुकड़ा हो गयी है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप