Tuesday, July 23, 2013

जिंदगी का दर्शन-हिन्दी कविता (zindagi ka darshan-hindi kavita)



जिंदगी का यही दर्शन है
दोस्त अगर दगा नहीं करते
गद्दारी और वफादारी की
पहचान करन मुमकिन नहीं होता है,
जिनको बख्शा प्यार
वह चोट नहीं करते दिल पर
यकीन और धोखे की पहचान में
इंसान अपना दिमाग कभी नहीं खोता है।
कहें दीपक बापू
जुबां पर ताला लगा लें हम
ज़माना खामोशी पर चिल्लाता है,
नज़रअंदाज करें किसी की अदायें
वह आगे पीछे घूमकर दिखलाता है,
किसी की तारीफ करो
फिर भी वह खुश नहीं होता है,
सच हो किसी के सामने
                                                              वह झूठ बात कहकर रोता है।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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Thursday, July 04, 2013

समझदारी बन गयी बीमारी-हिन्दी कविता (samajhadar ban gayi bimari-hindi kavita)



 जिनको नहीं चलने का तरीका
दौड़ने में मजा वही बताते हैं,
कभी दिल का हाल जाना नहीं
इश्क के गीत वही गाते हैं।
कहें दीपक बापू
ज़माने की समझदारी,
बन गयी  है एक बीमारी,
खाने का सामान लेकर
पहुचंते उद्यानों में
जीभ के स्वाद में लोग डूबते,
पेट भरकर जल्दी ऊबते,
गंदगी छोड़कर चल देते अपने घर,
शीतल हवाओं में विष घोलते उसके दर,
सुख के लिये इधर उधर दौड़ते हुए
ऐसे लोग मरे जाते हैं,
दूसरों की आंखों और सांसों में
करते हैं दर्द पैदा
स्वयं भी तनावों से नहीं परे रह पाते हैं।
............................................

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, June 01, 2013

क्रिकेट में यह क्या हो रहा है-हास्य कविता (cricket mein yah kya ho raha hai-hindi hasya kavita



यह क्या हो रहा है-हास्य कविता
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पोते ने दादा से पूछा
‘‘दादाजी, यह टीवी पर बार बार क्रिकेट का
समाचार आता ह,
चलती बहस में कोई मुस्कराता
कोई आस्तीर ऊपर कर गुर्राता,
मगर न बल्ला दिख रहा है
न गेंद नजर आ रही है,
कहीं मैदान पर हरियाली भी
नहीं छा रही है,
बातें मेरी समझ में नहीं आ रही है,
इतना पता है कहीं स्पॉट फिक्ंिसग
कहीं सट्टे की लहर छा रही है,
आप ही समझाओ यह क्या हो रहा है?
दादा ने हंसते हुए कहा
‘‘बेटा,
तेरा आईपीएल का खत्म हो गया खेल,
टीवी से चिपका रहा तू हो गया फेल,
मगर क्रिकेट के धंधे वालों की हो गयी चांदी
तिजोरियां भर गयी उनकी रुपये और सोने से
सट्टे की आई जो आंधी,
अभी चैंपियन ट्राफी शुरु होने में समय बाकी है,
खाली समय में टीवी चैनलों के विज्ञापन का समय
पास होता रहे
यह बहसें उन्होंने इसलिये पर्दे पर टांकी है,
लोग भूल न जायें क्रिकेट को
इसलिये खाली समय में कर रहे फिक्स झगड़ा
इसमें ही मिक्स है इस्तीफों का भी रगड़ा,
अगर देखते रहना है क्रिकेट तो
बंद कर लो अक्ल के दरवाजे,
उसी पर आंख लगाओ जो पर्दे पर विराजे,
इसलिये मत पूछो यह क्या हो रहा है।


लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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Sunday, May 12, 2013

मंदिरों का भारतीय समाज में महत्व समझना चाहिये-विशेष हिन्दी रविवारीय लेख (mandiron ka bhartiya samaj mein mahatva samjhana chahiye-vishesh hindi ravivariy lekh.special hindi article on importance hindu temple)



         भारत में रविवार का दिन अब आधुनिक समाज के अनेक लोगों के लिये अध्यात्म का दिन हो गया है। हालांकि भारत में  हर दिन ही अध्यात्म का दिन है। सोमवार शिवजी, मंगलवार जी, बुधवार गणेश जी, गुरुवार सांईबाबा, शुक्रवार माता और शनिवार नवग्रहों का दिन माना जाता है।  वैसे सांईबाबा के भक्तों ने गुरुवार का दिन शायद इसलिये चुना क्योंकि इस दिन भगवान के किसी खास स्वरूप की पूजा या स्मरण नहीं किया जाता वरन् बृहस्पति अपने आप में ही भगवत्स्वरूप माने जाते हैं। इस दिन कुछ लोग मांस मदिरा लेना ठीक नहीं मानते।   बृहज्ञनति  बुद्धि के देवता हैं और गुरुवार का दिन वैसे ही भारतीय जनमानस पवित्र मानता है।  आधुनिक समय में सांईबाबा को कथित रूप से सभी धर्मों के लिये पूज्यनीय प्रचारित कैसे और क्यों किया गया, यह अलग से बहस का विषय है।
          सांईबाबा के नाम पर भारत के अनेक क्षेत्रों में मंदिर बन गये हैं। जिनको बचपन से ही किसी आराध्य देव मानने का ज्ञान नहीं मिला वह अंततः मन के खालीपन को भरने के लिये संाई के चमत्कारी स्वरूप की तरफ आकर्षित हो ही जाता है। सांईबाबा के  सभी धर्मों के लिये पूज्यनीय इसलिये भी प्रचारित जाता है क्योंकि उनके साथ चमत्कार जुड़े हैं और किसी भी धर्म का आदमी हो वह अपने जीवन में ऐसा होता देखना चाहता है जो वह स्वयं नहंी कर सकता। शिर्डी के सांईबाबा के मंदिर में करोड़ों का चढ़ावा आता है।  इससे एक बात तो प्रमाणित होती है कि चमत्कारों के नाम पर आज भी लोगों का आकर्षित किया जा सकता है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक सांई बाबा के भक्त हिन्दू धर्म के देवी देवताओं की पूजा को अंधविश्वास जरूर बताते हैं पर सच यह है कि सबसे ज्यादा अब अधंविश्वास सांई बाबा के मंदिरों पर ही दिखने लगा है।  लोग अपने नये वाहन लाकर सांईबाबा के मंदिर के बाहर  खड़ा उसकी पूजा करवाते हैं। ऐसा किसी दूसरे मंदिर पर देखने को नहीं मिलता।  सांईाबाबा की प्रसिद्धि के पीछे  बाज़ार तथा प्रचार समूहों का प्रयास इसलिये भी दिखता है क्योंकि आधुनिक सामानों की पूजा की सुविधा शायद भारतीय धर्म के स्मरणीय महापुरुषों के मंदिरों में नहीं मिलती। बाज़ार को अपने उत्पाद धर्म के साथ जोड़े रखने हैं इसलिये संाईबाबा के मंदिर के बाहर इस तरह उनके उत्पादों की पूजा प्रचार का ही काम करती है।  हमने बचपन में सांई बाबा का नाम सुना था पर लंबे समय  तक  उनके मंदिर में नहंी गये।  बाज़ार के बदलते स्वरूप के साथ उनका प्रचार बढ़ा है इसलिये लगता है कि उनकी प्रसिद्धि बढ़ाने के पीछे आर्थिक कारण भी रहे होंगे।  शिर्डी में उनके मूल मंदिर हम कभी नहीं गये पर विभिन्न शहरों में उनके मंदिरों पर भीड़ देखकर हमें यह लगता है कि हमारे समाज में एक ऐसा वर्ग हमेशा रहा है जिसेे परमात्मा के भी नये स्वरूपों की जरूरत होती है और इसी कारण हमारे आर्थिक तथा सामाजिक रणनीतिकार कभी कभी नये भगवान भी गढ़ लेते है।  उनके अनेक मंदिरों पर बहुत सारा चढ़ावा आता होगा ऐसा माना जा सकता है।
    वैसे देखा जाये तो अध्यात्म शांति के लिये किसी मंदिर या मूर्ति की आवश्यकता नहीं होती। कहीं आश्रम जाकर अपने दिल को यह तसल्ली देने की आवश्यकता नहीं होती कि हम भगवान के दर पर आये हैं। वैसे भी हमारे यहां प्रातःकाल धर्म का माना गया है बाकी तो पूरा दिन तो अर्थ के लिये होता है।  अगर प्रतिदिन प्रातःकाल ही धर्म के लिये व्यतीत किया जाये तो फिर किसी खास दिन की आवश्यकता नहीं होती।  अनेक आधुनिक ज्ञान साधक तो सुबह पार्क में एक घंटा भ्रमण करना भी धर्म का हिस्सा मानने लगे हैं। शरीर शुद्ध तो मन शुद्ध और मन शुद्ध तो भगवान के साथ आत्मा का साक्षात्कार स्वतः होता है।  कुछ लोग योगसाधना के समय आसन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्र जाप करने की क्रिया को ही धर्म निर्वाह मानकर तृप्त हो जाते हैं। उनकी यह तृप्ति उन्हें कहीं दूसरी जगह जाकर परमात्मा की आराधना के लिये भटकने नहीं देती।
            नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि अगर हृदय से पूजा की जाये तो पत्थर में भी भगवान का अनुभव होता हैं। उन जैसे महान लोगों के प्रयासों से जहां हमारा अध्यात्म समृद्ध हुआ वहीं भक्ति की हर प्रक्रिया को समाज ने स्वीकार किया।  अनेक भक्त निष्काम से मंदिर जाते हैं तो अनेक कामना लेकर जाते है।  हमारे देश में मंदिरों का महत्व समय के साथ बढ़ता रहा है।  आखिर मंदिरों में जाने से शांति क्यों मिलती है? इस प्रश्न का उत्तर हम  तभी समझ सकते हैं जब वहां के शांत, स्वच्छ तथा एकांत वातावरण का अध्ययन करें। हम गौर करें कि अधिकतर मंदिरों में चढ़ावा आता है। इस धन का उपयोग व्यवस्थापक अपने यहां सफाई, स्वच्छता तथा पेयजल सुविधा निर्माण के लिये करते हैं ताकि भक्त आते रहें।  उनका उद्देश्य व्यवसायिक  होता है या भावनात्मक यह अलग से विचार का विषय है।  बहरहाल वहां प्रवेश करते ही लगता है कि किसी अच्छी जगह पर आ गये।  यही अनुभूति ऐसी नवीनता देती है कि मनुष्य का मन प्रसन्न हो जाता हैं।  इसके अलावा राह चलते हुए कहीं बैठने या रुकने के लिये जगह नहंी है तो मंदिर में जाकर विश्राम कर सकते है। मंदिर ऐसी जगह है जहां प्रवेश करने पर कोई आने के संबंध में सवाल नहीं करता।  मूल बात यह कि वहां हर कोई आदमी पवित्र हृदय वाला हो जाता है और उनको देखकर एक सहज अनुभूति होती है।
    रविवार के दिन ही रोजगार की परीक्षाऐं भी होती हैं।  हमने रविवार के दिन एक बड़े मंदिर में देखा तो वहां अनेक युवक विराजमान थे। कोई कही बैंचों पर ं बैठा तो कहीं चबूतरे पर सो रहा था। अनेक लड़के लंबी सीढियों पर ही बैठे थे। कोई परीक्षा की किताब पढ़ रहा था तो कोई ऐसे ही बैठा इधर उधर देख रहा था। उनका सामान देखकर लगा कि यकीनन बाहर से आये हैं।  कोई बस से आया होगा तो कोई रेल से आकर वहां विश्राम कर रहा था। उनके चेहरे पर थकावट साफ देखी जा सकती है।  रोजगार के लिये संघर्ष हमारे देश के युवकों के लिये अत्यंत कठिन है।  वह मंदिर में विश्राम करने के लिये इसलिये आये होंगे क्योंकि उनकी परीक्षा प्रारंभ में समय होगा।  मंदिर में भी उनका मन भगवान में कम होगा जितना अपने भविष्य की चिंतायें या संभावनायें उनके मस्तिष्क को घेरे होंगी।  एक बुजुर्ग भक्त ने उनकी तरफ इशारा करते हुए दूसरे से टिप्पणी की कि-‘‘भगवान इन सबका भविष्य उज्जवल करे।’’
         ऐसी बातें मंदिरों में ही सुनी जा सकती हैं। जो लोग यह समझते हैं कि  देश के युवाओं का यह संघर्ष उनका निजी है तो गलती पर हैं।  यह हमारे समाज की विकट समस्या है। देश के आर्थिक रणनीतिकारों को इस पर विचार करना चाहिये।  बहरहाल इस रविवार के विशेष लेख के रूप में इतना ही।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
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Friday, April 19, 2013

रामनवमीःजीवन में सहज भाव लाने के लिये योग विद्या ही एकमात्र विकल्प-हिन्दी लेख (ramnawami or ramnavami-jivan mein sahaj bhaav lane ke liye yog vidya ekmaatra vikalap)

      आज रामनवमी का पर्व पूरे देश में बड़े उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।  इस अवसर पर अनेक धर्मभीरु लोग मंदिरों में जाकर आरती, भजन तथा वहां मूर्तियों के अभिषेक आदि कार्यक्रमों में भाग लेकर आनंद उठाते हैं।  अनेक मंदिरों में लंगर आदि का कार्यक्रम भी होता है।  हम जैसे योग तथा ज्ञानसाधकों को ऐसे अवसर नये नये अनुभवों को अपने साथ जोड़ने का होता है। सच बात तो यह है कि योगविद्या के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता के साथ जुड़ने पर इस संसार को देखने का हमारा ही दृष्टिकोण ही बदल गया है।  नित नयी अनुभूतियां होती हैं।  अनेक सुखद प्रसंग सामने इस तरह आते हैं कि कहना पड़ता है कि परमात्मा के खेल निराले हैं।
      पिछले दस बारह वर्षों से भारत में योग विद्या का प्रचार बढ़ा है। अनेक लोग मिलजुलकर योग साधना करते हैं।  इस दौरान आसन, प्राणायाम, ध्यान और मंत्रजाप करते करते वह एक दूसरे के सत्संगी बन जाते हैं।  भारतीय योग संस्थान और पतंजलि योग संस्थान के बैनरों के साथ होने वाले इन योग शिविरों ने सत्संगियों का एक नया समूह बनाया है।  हमने देखा है कि हमारे देश में पूजा पद्धतियों को लेकर अनेक पंथ बन चुके हैं। उनके पंथ प्रमुख अपने भक्तों के लिये पूज्यनीय माने जाते हैं।  उनके परमधाम गमन के पद उनका विश्राम आसन या कहें कुर्सी पर बैठने वाला दूसरा मनुष्य भी वहां प्रतिष्ठत होकर उनका  संचालन करता है।  इस तरह  पेशेवर ढंग से हमारे धार्मिक पंथ भी अपनी अध्यात्मिक विरासात संभाले रहते हैं।  आमतौर से अनेक धार्मिक विशेषज्ञ इन पंथों में बंटे समाज के विरोधी है पर योग शिविरों के आधार पर इन समूहों को वैसा नहीं माना जा सकता।
          पिछले कुछ वर्षों से रामनवमी, मकर सक्रांति, होली, जन्माष्टमी तथा अन्य धार्मिक पर्वों के अवसर पर हमारा संपर्क ऐसे ही योग शिविर से जुड़े लोगों से बढ़ता जा रहा है।  ऐसे अवसरों पर उनके साथ मिलकर बैठने में आनंद आता है।  यह आनंद रक्तशिराओं में जिस तरह के अमृत का संचालन करता है वह केवल योग से जुड़ी देह के लिये ही संभव है।
    आज रामनवमी के अवसर पर ऐसे ही एक योग सत्संगी के साथ हम अपने ही शहर के उन मंदिरों में गये जहां पहले भी जाते रहे हैं। इन मंदिरों का समय के साथ साथ आकर्षण बढ़ता ही गया है।  वह सत्संगी इन मंदिरों में हमारे साथ पहली बार चले।  वह बहुत प्रसन्न हुए।  कहने लगे ‘आपके साथ इतना घूमने में आज आनंद आ गया।’
 हमने हंसकर कहा कि‘‘जब भी ऐसे धार्मिक पर्व आते हैं हम अपने ही शहर के मंदिरों में जाकर आंनद उठाते हैं। सच बात तो यह है कि लोगों को बाहर दूसरे शहर में जाकर आंनद उठाने की बात मन में इसलिये आती है क्योंकि वह अपने शहर में घूमते नहीं।  उनका आदत ही नहीं। अगर अपने शहर में ही आनंद उठाने का अभ्यास हो तो फिर मन तृप्त हो जाता है तब कहीं बाहर जाकर भटकने का विचार नहीं आता है।’’
    वह हमारी बात से  सहमत हुए। सांई बाबा, वैष्णो देवी, राम मंदिर, और गोवर्धन के मंदिर हमारे शहर में भी हैं।  इन स्थानों में जाकर ध्यान लगाने के बाद मन तृप्त हो जाता है।  ऐसे में कोई व्यक्ति दूसरे शहर में प्रसिद्ध मंदिरों जाकर वहां दर्शन के लिये प्रेरित करता है तब उसे ना करना पड़ता है।  नाराज लोग कहते हैं कि‘‘यार, कहीं बाहर जाकर घूमा करो। क्या हमेशा यहीं पड़े रहते हो?’’
    उनके ताने पर मुस्कराकर चुप रहना ही पड़ता है। श्रीमद्भागवत गीता के  संदेशों की बात उनसे करना व्यर्थ है।  हमने देखा है कि ऐसे महान दर्शन के बाद घर लौटे लोग अपने साथ थकावट लाते हैं। यह थकावट उनके दर्शन के आनंद को सुखा देती है।  रेल की यात्रा करने के बाद भीड़ में जूझते हुए जिन मंदिरों के वह दर्शन करते हैं इसके लिये उनकी प्रशंसा ही करना चाहिये। मगर घर लौटकर सभी के सामने उसका प्रचार करने की बात कुछ जमती नहीं है।  फिर जब हमारा दर्शन कहता है कि परमात्मा सभी जगह मौजूद है तब ऐसे प्रयास करना अजीब लगता है।  एक बात तय रही कि ऐसे लोग अपने ही शहरों में घूमते नहीं है।  उनके लिये दूर के ढोल ही सुहावने हैं। हमारी यह अनुभूति है कि  पास के ढोल का आनंद उठाने के लिये योग वि़द्या के साथ जुड़ना ही एकमात्र विकल्प है।  सच बात तो यह है कि योग तो सभी करते हैं। अंतर इतना है कि योग विद्या से जुड़ा साधक सहज योग करता है और न करने वाला असहज योगी हो जाता है। देह में स्थित मन इधर उधर दौड़ाकर असहज करता है। जबकि योग साधक अपने मन को जोड़ने के लिये विकल्प स्वयं चुनता है।  कुछ धार्मिक प्रवचनकर्ता कहते हैं कि काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा अहंकार छोड़ दो।  यह संभव नहीं है। योग विद्या से उन पर नियंत्रित किया जा सकता है।
               आज रामनवमी का पर्व हमारे लिये अध्यात्मिक सक्रियता का दिन रहता है।  मंदिरों में जाकर ध्यान लगाते हैं।  वहां अन्य भक्तों के श्रद्धामय प्रयास सुखद अनुभूति देते हैं।  इस आंनद को व्यक्त करने के लिये शब्द नहीं होते। किसी पर हंसते नहीं है वरन् उनकी सक्रियता देखकर उनके चेहरे पर आये सहज भाव को पढ़ते हैं।  सच बात तो यह है कि जब कोई आदमी पूजा, आरती या भजन कार्यक्रम में शामिल होता है तब उसके हृदय का भाव सात्विक हो जाता है।  यही चेहरे पर प्रकट होता है।
      इस रामनवमी पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों के इस आशा के साथ बधाई। साथ ही इस बात की शुभकामनायें कि उनके हृदय का अध्यात्मिक विकास हो।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
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Tuesday, March 26, 2013

रंगों के त्यौहार होली का अध्यात्मिक महत्व भी है-हिन्दी लेख (holi festival of colour is important-hindi article on holi parva2013)

     होली का पर्व पूरे देश में मनाया जा रहा है। जब हम किसी त्यौहार की बात करते हें तो उसके दो पहलू हमारे सामने होते हैं-एक अध्यात्मिक दूसरा सामाजिक।  हम अपने पर्वों पर हमेशा ही सामाजिक दृष्टिकोण से विचार करते हैं। यह माना जाता है कि लोग इस अवसर पर एक दूसरे मिलते हैं जिससे उनके बीच संवाद कायम होता है जो कि  आपसी सामंजस्य मनाये रखने के लिये यह आवश्यक है।  अपने नियमित काम से बचता हुआ आदमी जब कोई पर्व मनाता है तो यह अच्छी बात है।  इस अवसर पर सामाजिक समरसता बनने का दावा भी किया जाता है।  वैसे हमारे देश में अनेक पर्व मनाये जाते हैं।  पूरा देश ही हमेशा पर्वमय रहता है।  अगर मई जून के गर्मी के महीने छोड़ दिये जायें तो हर महीने कोई न कोई त्यौहार होता है इसलिये किसी खास त्यौहार में सामजिक सरोकार ढूंढना व्यर्थ है।
                इसके अलावा हमारे देश में  तो अब मगलवार को हनुमानजी और सोमवार के दिन भगवान शिव के मंदिर के अलावा गुरुवार को सांई बाबा के मंदिर में भी भीड़ रहती है।  आम भक्त को कभी कहीं जाने में परहेज नही होती।  इसके अलावा अब तो रविवार लोगों के लिये वैसे भी अध्यात्मिक दिवस बन गया है-हालांकि इसके पीछे अंग्रेजी संस्कृति को अपनाना ही है। यह अलग बात है कि अवकाश की वजह से लोग अब अपने ढंग से छुट्टियां मनाते हैं। कोई अपने गुरु के दरबार जाता है तो कोई कहीं किसी तीर्थस्थान की तरफ निकल जाता है।  जहां तक समाज में औपचारिक मिलन की बात है तो दिवाली, राखी, रामनवमी, कृष्णजन्माष्टमी तथा अन्य अनेक पर्व आते हैं।  लोग एक दूसरे से मिलते हैं। मिलन से भीड़ एकत्रित होती है और वहां चहलपहल के वातावरण में एकांत साधना या ध्यान का कोई स्थान नहीं होता जो कि अध्यात्मिक शांति के लिये आवश्यक है।
   इन पर्वो का अध्यात्मिक महत्व भी है।  एकांत में बैठकर चिंत्तन और ध्यान कर हम अपने ज्ञान चक्षुओं को जाग्रत कर सकते हैं जो जागते हुए भी बंद रहते हैं।  होली रंगों का पर्व है पर इसका मतलब यह कतई नही है कि केवल भौतिक पदार्थ ही रंगीन होते हैं। दुनियां का हर रंग हमारे अंदर हैं।  जिस तरह हिन्दी साहित्य में नौ रस है वैसे शब्दों के रंग भी हैं।  अलंकार भी हैं।  उनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं  दिखता क्योंकि शब्दों ही जो भाव होता है उसमें रंग, रस और अलंकार की अनुभूति होती हैं।  सीधा आशय यह है कि खेल केवल बाहर ही नहीं अपने ंअंतर में भी हो सकता है।  यह क्या बात हुई हृदय में सूखा है और बाहर पानी बरसा रहे हैं।  दिमाग में कोई रंग नहंी है पर बाहर हम मिट्टी को रंगकर होली मना रहे हैं। रसहीन विचार होते हैं पर उल्लास का पाखंड करते हैं।
          मूल बात यह है कि सुख पाना चाहते हैं पर वह उसका स्वरूप क्या है? यह समझना अभी बाकी है।  लोग अपना मन बहलाने के लिये ताजमहल, कुतुबमीनार या कश्मीर जाते हैं। वहां जाकर अपने घर लौट आते हैं। सुख मिला कि पता नहीं पर घर आकर सफर की थकान मिटाते हुए उनको पसीना आ जाता है।  उस दिन एक सज्जन कुंभ से लौटे तो दो दिन तक घर में पड़े रहे।  दूसरे सज्जन ने पूछा-‘‘क्या बात है, आपकी तबियत ठीक नहीं है?’’
        उन्होंने जवाब दिया-‘‘नहीं यार, कुंभ गया था।  बड़ा परेशान हुआ। अब थकान की वजह से बुखार आ गया है। इसलिये आराम कर रहा हूं।’’
    क्या उन्होंने वाकई कुंभ में नहाने का सुख लिया। सुख लेने के बाद शरीर में स्फूर्ति होना चाहिये। यदि थकान है तो फिर सुख कहां गया?
        सुख लेने या खुश होने के तत्व शरीर में अगर न हों तो फिर कोई इच्छित वस्तु, विषय या व्यक्ति के निकट होने पर भी न दिमाग को राहत मिलती है न ही देह विकार रहित हो पाती है।  आज के मिलावटी तथा महंगाई के युग में तो भौतिकता से वैसे भी सभी को सुख मिलना संभव नहीं है। जिनके पास माया का भंडार है वह भी सुखी नहीं है जिसके पास नहीं है तो उसके सुखी होने की बात  सोचना की गलत है। हमें तो अपने अंदर आनंद प्राप्त करने के लिये योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान के अलावा कोई मार्ग नहीं दिखता।  यह एकांत में ही संभव है। कहीं भीड़ में जाकर आनंद ढूंढना एक व्यर्थ प्रयास है।  वहां से केवल थकावट साथ आती है सुख या खुशी मिलना तो एक स्वप्न होकर रह जाता है।
      होली का पर्व अपने अध्यात्मिक महत्व के कारण अत्यंत रंगीन है। मगर  सच बात तो यह भी है कि इस पर्व को अत्यंत संकीर्ण बना दिया गया है। अनेक शहरों में जिन लोगों  आज से बीस साल पहले तक की होली देखी होगी उनका मन कड़वाहर से भर जाता होगा।  उसमें होली के नाम हुड़दंग के अलावा दूसरों को अपमानित करने वालों ने इसे बदनाम किया।  कीचड़ फैंकना, नाली में किसी को गिराना, पगड़ी या गमछा कांटे से खींचना आदि ऐसे प्रसंग जो एक समय इसका हिस्सा थे। अनेक लोग  जबरदस्ती किसी दूसरे पर रंग डाल या मुंह काला कर  अपनी भड़ास निकालते या अपनी शक्ति दिखाते थे।  अब पुलिस तथा प्रशासन की मुस्तैदी के चलते रास्तों में ऐसी बदतमीजी करना खतरे से खाली नहीं है।  इसी कारण ऐसी घटनायें कम हो गयी हैं। फिर अब समय बदल गया है पर फिर भी पुराने लोग आशंकित रहते ही है।  जो लोग इस पर्व की प्रशंसा करते हैं वह जाकर शहरों की हालत देख लें। रंग खेलने  के समयकाल  में सड़कों में भीड़ एकदम इतनी कम हो जाती है जैसे कर्फ्य लगा हो।  अनेक लोग घर में दुबक जाते हैं।  वह तो गनीमत है कि अब मनोरंजन के लिये बहुत सारे साधन हो गये हैं पर जब कम थे तब भी अनेक भले लोग बोरियत झेलते पर घर के बाहर नहीं आते थे।
       बहरहाल जिन लोगों को होली भौतिक रंगों से खेलनी है वह खेलें, मगर जिन लोगों को रंगों से परहेज है वह ध्यान और चिंत्तन कर अपना समय निकालें।  उनको होली जैसा एकांत मिलना मुश्किल है। अध्यात्मिक शांति के लिये एकांत में ध्यान के साथ चिंत्तन करना आवश्यक है।  इस होली पर इतना ही। सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनायें।        
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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