Sunday, December 12, 2010

खैरख्वाहों के दो रंग-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (khairkhavahon ke do rang-hindi vyangya kavitaen)

कुछ खबरची
सत्ता की दलाली करते
पाये गये,
सफाई में
उन्होंने खबर लाने के लिये
अपनी जुगाड़ का बहाना बनाया।
सच है
आजकल सारे काम
नकाब ओढ़कर ही किये जाते हैं,
भलाई के काम भी
दलाली की रकम जोड़कर किये जाते हैं,
ज़माने के दोगले चरित्र की बात सुनते थे
अब खैरख्वाहों ने भी
दो चेहरों में अपना रंग जमाया।
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किसने कहा कलमकार
कभी दलाल नहीं होते,
सारे दलाल कलम से लिखी
अपनी बही साथ रखकर ही सोते।
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Sunday, December 05, 2010

ख्वाबी पुलाव और सपनों का गोश्त-हिन्दी कविता (khvab ke purlav aur sapanon ka goshta-hindi kavita)

व्यंग्य लिखने का
अब मन नहीं करता है,
क्योंकि आज का सच ही
अट्टाहास करने लगता है।
कमबख्त
बेईमानी और भ्रष्टाचार पर
अब क्या अफसाना लिखें,
सामने खड़े हैं
तलवार लेकर कातिल
उनको कैसे ताना कसते दिखें,
जिम्मा है जिन पर शहर का,
ठेका है उनके पास बहपाना कहर का,
क्या ख्वाबी पुलाव पकायें,
जब अपने सपनों का गोश्त
सरेआम बाज़ार में बिकता है।
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Tuesday, November 23, 2010

इंसानी मुखौटे-हिन्द व्यंग्य कविता (insani mukhaute-hindi shayari)

मुखौटे कभी शब्द बोलते नहीं है
शब्दों को तोलते नहीं नहीं है,
कातिल का राज खोलते नहीं हैं।
दौलत मंद और शोहरत वाले
अपने चेहरे पर दाग लगाना
पसंद नहीं करते,
ज़माने पर काबू करने का
दंभ भी भरते
इसलिये सिंहासन में बिठा देते हैं
इंसानी मुखौटे
चढ़ा देते हैं शिखर पर उन इंसानों को
जो उनके इशारों के बिना
डोलते नहीं हैं।
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Thursday, November 18, 2010

नीयत और भरोसा-हिन्दी शायरी (neeyat aur bharosa-hindi shari)

सफेद कपड़े पर भी
कभी न कभी दाग लग जाते हैं,
मगर फिर भी काली नीयत
ओढ़ते हैं
छिप जाता है उनका बदन
मगर उनके कारनामों का
अक्स चेहरे पर दिखाई देता है,
अपनी जुबां से भले ही झुठ बोले जाते हैं।
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अपनो से वादे कर
वह बन गये सिरमोर बन गये,
मगर बेचा भरोसा परायों को
और अपनों में दौलतमंद की तरह तन गये।
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Thursday, November 04, 2010

दीपावली पर्व का अध्यात्मिक महत्व-हिन्दी लेख (deepawali parava par ka vishesh lekh)

दीपावाली, दिवाली, दीवाली   दीपोत्सव और प्रकाश पर्व के नाम से यह त्यौहार परंपरा हमारे भारत में हर वर्ष सदियों से मनाई जाती रही है। मज़े की बात यह है कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनवास समाप्ति के अवसर पर अयोध्या में आगमन पर उल्लास के रूप में मनाये जाने वाले इस पर्व पर लक्ष्मी की पूजा सर्वाधिक की जाती है और राम चरित्र की चर्चा बहुत कम ही होती है। इसके साथ इस तरह की अन्य मिथक कथायें भी हैं पर मूल रूप से यह श्रीराम के राज्याभिषेक के रूप में माना जाता है। दिपावली, दिवाली दीपोत्सव या प्रकाश पर्व के नाम से मनाऐ जाने वाले इस पर्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि सारे देश में एक ही दिन इसको मनाया जाता है। होली या अन्य पर्वों को पूरे भारत में एक तरह से न मनाकर अलग अलग ढंग से मनाया जाता है। देश ही नहीं वरन् विदेश में भी भगवान श्रीराम और सीता को याद कर लोग आनंदित होते हैं। वैसे देखा जाये तो भगवान श्रीराम के साथ भगवान श्रीकृष्ण भी लोगों के मन के नायक हैं पर उनको भारतीय सीमाओं के बाहर इस तरह याद नहीं किया जाता है। इसलिये ही जब भगवान श्रीराम की बात आती है तो कहा जाता है क वह तो सभी के हृदय के नायक हैं जबकि विश्व को तत्वज्ञान से अवगत कराने वाली श्रीमद्भागवत गीता को प्रकाशित करने वाले भगवान श्रीकृष्ण को इस रूप में स्मरण नहीं किया जाता है। भगवान श्रीराम के बारे में श्रीमद्भागवत गीता में एक जगह श्रीकृष्ण कहते भी हैं कि ‘धनुर्धरों में मैं राम हूं।’
धनुर्धर यानि पराक्रमी। पराक्रम की छबि में सक्रियता है-दूसरी तरह से कहें कि उसमें एक्शन है। एक्शन या सक्रियता को पसंद करने के कारण ही जनमानस में भगवान श्रीराम की छबि अत्यंत व्यापक हैं-हर वर्ग और आयु का मनुष्य उनको अपना आराध्य सहजता से स्वीकार करता है। भारतीय अध्यात्म और दर्शन में भगवान श्रीराम के हाथ से संपन्न अनेक महान कार्यों से तत्कालीन समाज में व्याप्त अन्याय और आतंक के विरुद्ध युद्ध में विजय को इस अवसर पर याद किया जाता है जिसमें अहिल्या उद्धार तथा रावण पर विजय अत्यंत प्रसिद्ध हैं। अधिकतर लोग राम को एक पराक्रमी योद्धा और मर्यादा पुरुषोत्तम होने की वजह से सदियां बीत जाने पर भी याद करते हैं तो जबकि बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि उन्होंनें राजकाज चलाने के लिये भी बहुत प्रकार के आदर्श स्थापित किये थे। बनवास प्रवास के दौरान जब उनके भ्राता श्री भरत परिवार समेत मिलने आये थे तब भगवान श्री राम ने उनसे अनेक प्रश्न किये जिनमें राज्य चलाने की विधि शामिल थी। देखा जाये तो वह सभी प्रश्न राजकाज और परिवार चलाने के संदेश के रूप में भारत को ज्ञान देने के लिये किये गये थे। आज जब लोग राम राज्य की बात करते हैं तो उनको उस प्रसंग का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। भगवान श्रीराम जब 14 वर्ष बनवास काटकर अपने गृह राज्य अयोध्या लोटे तो सभी आमजन प्रसन्न हुए थे। यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण था जिसे बिना सार्वजनिक उपकार की राजनीति किये बिना प्राप्त करना संभव नहीं है। साथ ही यह भी लोग उनके सम्मान के लिये स्वप्रेरित थे न कि प्रायोजित, जैसे कि आजकल के राजाओं के लिये एकत्रित होने लगे हैं।
आज आधुनिक लोकतंत्र में सभी देशों मंें अनेक ऐसे राजनेता काम कर रहे हैं जो राजनीति का कखग भी नहीं जानते बल्कि उनको अपराधियों, पूंजीपतियों तथा बाहुबलियों का मुखौटा ही माना जाना चाहिए। पश्चिमी देशों में कई ऐसे अपराधी गिरोह है जो वहां के राजनेताओं पर गज़ब की पकड़ रखते हैं। उनके पीछे ऐसे शक्तिसमूह हैं जिनके प्रमुख स्वयं अपने को राजकाज में शामिल नहीं कर सकते क्योंकि उनको अपने ही क्षेत्र में वर्चस्व बनाये रखने के लिये सक्रिय रहना पड़ता है। इसलिये वह राजनीति में अपने मुखौटे लाकर सामाजिक प्रभाव बनाये रखते हैं। सच कहें तो आधुनिक लोकतंत्र के नाम पर आर्थिक, धार्मिक, कला, साहित्य तथा समाज के शिखर पुरुष अपराधियों के साथ गठजोड़ कर राज्य को अपने नियंत्रण में कर चुके हैं। राजाओं, सामंतों और जागीरदारों के अत्याचारों की कथायें सुनी हैं पर आज जब पूरे विश्व में राज्य प्रमुखों, राजकीय कर्मियों तथा अपराधियों के वर्चस्व को देखते हैं तो उनकी क्रूरता भी कम नज़र आती है। पुराने समय के राजा लोग सामंतों, जमीदारों, साहुकारों तथा व्यापारियों से कर वसूल करते थे। इतना ही नहीं किसानों से भी लगान वसूल करते थे मगर वह किसी के सामने अपने राज्य या राजकीय व्यवस्था के अपनी आत्मक सहित गिरवी नहीं रखते थे। प्रजाहित में पुराने राजाओं के कामों को आज भी याद किया जाता है। मगर आज पूरे विश्व में हालत है कि चंदा लेकर आधुनिक राजा अपना राज्य, अपनी आत्मा तथा राज्य का हित दांव पर लगा देते हैं। ऐसे में बरबस ही राजा राम की याद आती है।
प्रसंगवश अयोध्या के राम मंदिर की याद आती है। राम के इस देश में अनेक मंदिर हैं। उससे अधिक तो उनका निवास अपने भक्तों के हृदय में है। कहने वाले तो कहते हैं कि न यह वह अयोध्या है न वही जन्म स्थान है जहां राम प्रकट हुए थे। यह गलत भी हो सकता है सही भी, पर सच यह है कि भगवान श्रीराम तो घट घट वासी हैं। उनके भक्त इतने अनन्य हैं कि उनके कल्पित होने की बात कभी स्वीकारी नहीं जा सकती। यही कारण है कि उनका चरित्र अब देश की सीमाओं के बाहर भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
इस दीपावली के अवसर पर अपने सभी ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों को हार्दिक बधाई। यह दिपावली सभी के लिये अत्यंत प्रसन्नता लाये यह शुभकामनायें। आध्यात्मिक लोगों के लिये हर पर्व चिंतन और मनन के लिये प्रेरणा देता है। ऐसे में सामान्य लोगों से अधिक प्रसन्नता भी उनको होती है। जहां आमजन अपनी खुशी में खुश होता है तो आध्यात्मिक लोग दूसरों को खुश देकर अधिक खुश होते हैं। यही भाव सभी लोगों को रखना चाहिये जो कि आज के समय की मांग है और जिसके प्रेरक भगवान श्रीराम हैं।
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Friday, October 29, 2010

कविता दिखायें कि सुनायें-हिन्दी व्यंग्य कविता (kavita dikhayen ki sunayen-hindi satire poem)

कदम कदम पर धोखे की खबर,
घोटाले बढ़ रहे जैसे हो कि कोई रबड़,
किसको याद रखें किसे भूल जायें,
शोर के आदी हो गये लोग,
सुनने की कोशिश करते
जबकि घेर चुका है बहरेपन का रोग,
ऐसे में सोचते हैं कि अपनी
अभिव्यक्ति की कौनसी चुने अदायें,
कविता दिखायें कि सुनायें।
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गूंगे कविता कहेंगे,
बहरे ताली बजायेंगे जब सुनेंगे,
घोटाले ऐसे ही तो बुनेंगे।
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Friday, October 15, 2010

आम और खास वर्ग की हिन्दी अलग अलग दिखती है-हिन्दी लेख (aam aur khas varg ki hindi-hindi lekh)

भारत की खिल्ली उड़ाने वाले विदेशी लोग इसे ‘‘साधुओं और सपेरों का देश कहा करते थे। भारत के बाहर प्रचार माध्यम इसी पहचान को बहुत समय आगे बढ़ाते रहे पर जिन विदेशियों ने उस समय भी भारत देखा तो पाया कि यह केवल एक दुष्प्रचार मात्र था। हालांकि अब ऐसा नहीं है पर अतीत की छबि अभी कई जगह वर्तमान स्वरूप में विद्यमान दिखाई देती है। इससे एक बात तो मानी जा सकती कि आधुनिक प्रचार माध्यमों के -टीवी, समाचार पत्र पत्रिकाऐं- अधिकतर कार्यकर्ता जनमानस में अपनी बात स्थापित करने में बहुत सक्षम है। इसी क्षमता का लाभ उठाकर वह अनेक तरह के भ्रम मी सत्य के रूप में स्थापित कर सकते हैं और अनेक लोग तो करते ही हैं। इस साधु और सपेरों की छबि से देश मुक्त हुआ कि पता नहीं पर वर्तमान में भी भारत की छबि को लेकर अनेक प्रकार के अन्य भ्रम यही प्रचार माध्यम फैलाते हैं और जिनका प्रतिकार करना आवश्यक है।
अगर हम इस पर बहस करेंगे तो पता नहीं कितना लंबा लिखना पड़ेगा फिर यह भी तय नहीं है कि बहस खत्म होगी कि नहीं। दूसरा प्रश्न यह भी है कि यह प्रचार माध्यम कार्यकर्ता कहीं स्वयं ही तो मुगालतों में नहीं रहते। पता नहीं बड़े शहरों में सक्रिय यह प्रचार माध्यम कर्मी इस देश की छबि अपने मन की आंखों से कैसी देखते हैं? मगर इतना तय है कि यह सब अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से संपन्न है और यहां की अध्यात्मिक ताकत को नहीं जानते इसलिये अध्यात्म की सबसे मज़बूत भाषा हिन्दी का एक तरह से मज़ाक बना रहे हैं और यह मानकर चल रहे हैं कि उनके पाठक, दर्शक तथा श्रोता केवल कान्वेंट पढ़े बच्चे ही हैं या फिर केवल वही उनके अभिव्यक्त साधनों के प्रयोक्ता हैं। मज़दूर गरीब, और ग्रामीण परिवेश के साथ ही शहर में हिन्दी में शिक्षित लोगों को तो केवल एक निर्जीव प्रयोक्ता मानकर उस पर अंग्रेजी शब्दों का बोझ लादा जा रहा है।
अनेक समाचार पत्र पत्रिकाऐं अंग्रेजी भाषा के शब्द देवनागरी लिपि के शब्द धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं-कहीं तो कहीं तो शीर्षक के रूप में पूरा वाक्य ही लिख दिया जाता है। यह सब किसी योजना के तहत हो रहा है इसमें संशय नहीं है और यह भी इस तरह की योजना संभवत तीन साल पहले ही तैयार की गयी लगती है जिसे अब कार्यरूप में परिवर्तित होते देखा जा रहा है।
अंतर्जाल पर करीब तीन साल पहले एक लेख पढ़ने में आया था। जिसमें किसी संस्था द्वारा रोमन लिपि में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को लिखने के लिये प्रोत्साहन देने की बात कही गयी थी। उसका अनेक ब्लाग लेखकों ने विरोध किया था। उसके बाद हिन्दी भाषा में विदेशी शब्द जोड़ने की बात कही गयी थी तो कुछ ने समर्थन तो कुछ ने विरोध किया था। उस समय यह नहीं लगा था कि ऐसी योजनायें बनाने वाली संस्थायें हिन्दी में इतनी ताकत रखती हैं कि एक न एक दिन उनकी योजना ज़मीन पर रैंगती नज़र आती हैं। अब यह बात तो साफ नज़र आ रही है कि इन संस्थाओं में व्यवसायिक लोग रहते हैं जो कहीं न कहीं से आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक शक्ति प्राप्त कर ही आगे बढ़ते हैं। प्रत्यक्षः वह बनते तो हिन्दी के भाग्य विधाता हैं पर वह उनका इससे केवल इतना ही संबंध रहता है कि वह अपने प्रयोजको को सबसे अधिक कमा कर देने वाली इस भाषा में निरंतर सक्रिय बनाये रखें। यह उन लोगों के भगवान पिता या गॉड फादर बन जाते हैं जो हिन्दी से कमाने आते हैं। यह उनको सिफारिशें कर अपने प्रायोजकों के साथ जोड़ते हैं-आशय यह है कि टीवी, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा रेडियो में काम दिलाते होंगे। हिन्दी भाषा से उनका कोई लेना देना नहीं है अलबत्ता कान्वेंट मे शिक्षित  लोगों को वह हिन्दी में रोजगार तो दिला ही देते होंगे ऐसा लगता है। यही कारण है कि इतने विरोध के बावजूद देश के पूरे प्रचार माध्यम धड़ल्ले से इस कदर अंग्रेजी के शब्द जोड़ रहे हैं कि भाषा का कबाड़ा हुए जा रहा है। अब हिन्दी दो भागों में बंटती नज़र आ रही है एक आम आदमी की दूसरी खास लोगों की भाषा।
हिन्दी के अखबार पढ़ते हुए तो अपने ही भाषा ज्ञान पर रोना आता है। ऐसा लगता है कि हिन्दी भाषी होने का अपमान झेल रहे हैं। इससे भी ज्यादा इस बात की हैरानी कि आम आदमी के प्रति ऐसी उपेक्षा का भाव यह व्यवसायिक संस्थान कैसे रख रहे हैं। सीधी बात कहें तो देश का खास वर्ग और उसके वेतनभोगी लोग समाज से बहुत दूर हो गये हैं। यह तो उनका मुगालता ही है कि वह समाज या हिन्दी को अपने अनुरूप बना लेंगें क्योंकि इस देश का आधार अब भी गरीब, मज़दूर और आम व्यवसायी है जिसके सहारे हिन्दी भाषा जीवीत है। जिस विकास की बात कर रहे हैं वह विश्व को दिखाने तक ही ठीक हैं। उस विकास को लेकर देश के प्रचार माध्यम झूम रहे हैं उसकी अनुभूति इस देश का आम आदमी कितनी करता है यह देखने की कोशिश नहंी करते। उनसे यह अपेक्षा करना भी बेकार है क्योंकि उनकीभाषा आम आदमी के भाव से मेल नहीं खाती। वह साधु सपेरों वाले देश को दृष्टि तथा वाणी से हीन बनाना चाहते हैं। अपनी भाषा के विलुप्तीकरण में अपना हित तलाश रहे लोगों से अपेक्षा करना ही बेकार है कि वह हिन्दी भाषा के सभ्य रूप को बने रहने देंगे।
हिन्दी के कथित विकास के लिये बनी संस्थाओं में सक्रिय बुद्धिजीवी भाषा की दृष्टि से कितने ज्ञाता हैं यह कहना कठिन है अलबत्ता कहीं न कहीं अंग्रेजी के समकक्ष लाने के दावे वह जरूर करते हैं। दरअसल ऐसे बुद्धिजीवी कई जगह सक्रिय हैं और हिन्दी भाषा के लिये गुरु की पदवी भी धारण कर लेते हैं। उनकी कीर्ति या संपन्नता से हमें कोई शिकायत नहीं है पर इतना तय है कि व्यवसायिक संस्थानों के प्रबंधक उनकी मौजूदगी इसलिये बनाये रखना चाहते हैं कि उनको अपने लिये हिन्दी कार्यकर्ता मिलते रहें। मतलब हिन्दी के भाग्य विधाता हिन्दी के व्यववायिक जगत और आम प्रयोक्ता के बीच मध्यस्थ का कार्य करते हैं। इससे अधिक उनकी भूमिका नहीं है। ऐसे में नवीन हिन्दी कार्यकर्ता रोजगार की अपेक्षा में उनको अपना गुरु बना लेते हैं।
ऐसे प्रयासों से हिन्दी का रूप बिगड़ेगा पर उसका शुद्ध रूप भी बना रहेगा क्योंकि साधु और सपेरे तो वही हिन्दी बोलेंगे और लिखेंगे जो आम आदमी जानता हो। हिन्दी आध्यात्म या अध्यात्म की भाषा है। अनेक साधु और संत अपनी पत्रिकायें निकालते हैं। उनके आलेख पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है क्योंकि उसमें हिन्दी का साफ सुथरा रूप दिखाई देता है। अब तो ऐसा लगने लगा है हिन्द समाचार पत्र पत्रिकाऐं पढ़ने से तो अच्छा है कि अध्यात्म पत्रिकायें पढ़कर ही अपने हिन्दी भाषी होने का गर्व महसूस किया जाये। अखबार में भी वही खबरें पढ़ने लायक दिखती हैं जो भाषा और वार्ता जैसी समाचार एजेंसियों से लेकर प्रस्तुत की जाती है। स्थानीय समाचारों के लिये क्योंकि स्थानीय पत्रकार होते हैं इसलिये उनकी हिन्दी भी ठीक रहती है मगर आलेख तथा अन्य प्रस्तुतियां जो कि साहित्य का स्त्रोत होती हैं अब अंग्रेजीगामी हो रही हैं और ऐसे पृष्ठ देखने का भी अब मन नहीं करता। एक बात तो पता लग गयी है कि हिन्दी भाषा के लिये सक्रिय एक समूह ऐसा भी है जो दावा तो हिन्दी के हितैषी होने का है पर वह मन ही मन झल्लाता भी है कि अंग्रेजी में छपकर भी वह आम आदमी से दूर है इसलिये वह हिन्दी भाषा प्रचार माध्यमों में छद्म रूप लेकर घुस आया है। अंग्रेजी की तरह हिन्दी को वैश्विक भाषा बनाने का उसका इरादा केवल तात्कालिक आर्थिक हित प्राप्त करना ही है। वह हिन्दी का महत्व नहींजानता क्योकि आध्यात्मिक ज्ञान से परे हैं। हिन्दी वैश्विक स्तर पर अपने अध्यात्मिक ज्ञान शक्ति के कारण ही बढ़ेगी न कि सतही साहित्य के सहारे। ऐसे में हिन्दी की चिंदी करने वालों को केवल इंटरनेट के लेखक ही चुनौती दे सकते हैं पर मुश्किल यह है कि उनके पास आम पाठक का समर्थन नहीं है। 
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